द मोस्ट वॉन्टेड डॉन – एपिसोड – 27 – दाऊद की बहन हसीना पारकर के पति इब्राहिम पारकर की दिन-दहाड़े हत्या

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हरिगोविंद विश्वकर्मा
26 जुलाई 1992 को दोपहर ढाई बजे का वक़्त था। स्थान नागपाड़ा की अरब गली। वहीं होटेल क़ादरी के सामने सड़क पर इब्राहिम इस्माइल पारकर अपने ड्राइवर सलीम पटेल के साथ बातचीत में मशग़ूल था। अचानक दो मोटर साइकल से चार लोग वहां पहुंचे और इब्राहिम पर अंधाधुंध फ़ायर कर दिया। अचानक से हुए इस हमले में कई गोलियां इब्राहिम के जिस्म में समा गईं। इब्राहिम तो वहीं गिर पड़ा। संभवतः इतनी गोली लगने से घटनास्थल पर ही उसकी मौत हो गई। उसके ड्राइवर को जेजे अस्पताल ले जाया गया, जहां उसने भी दम तोड़ दिया। चारों हमलावर गवली गैंग के शूटर थे जिनमें शार्प शूटर शैलेश हल्दनकर और बिपिन शेरे भी शामिल थे।

दरअसल, 1990 के आस-पास दाऊद इब्राहिम अरुण गवली के शूटरों को चुन-चुनकर मरवा रहा था। दाऊद बेदह मजबूत था, क्योंकि उसका सिंडिकेट पेशेवर तरीक़े से ऑर्गनाइज्ड था। ऐसे में गवली गैंग को कोई सुराग मिल ही नहीं रहा था, जिसे पकड़कर वो दाऊद तक पहुंच सके। इसी सिलसिले में जब दाऊद ने अरुण गवली के भाई पापा गवली को मरवा दिया, तो अरुण और उसका गैंग फट सा पड़ा। वस्तुतः मुंबई की क्रिमिनल इंडस्ट्री में एक अघोषित नियम यह रहा है कि दो अपराधियों की दुश्मनी के बीच घरवाले और रिश्तेदार कभी नहीं आते है। आपकी जिससे दुश्मनी है, आप उससे ही निपटिए। पैसे का मामला हो या वर्चस्व का, आप सामने वाले के घरवालों पर हाथ नहीं डालेंगे। मजेदार बात यह है कि मुंबई पुलिस भी इस अघोषित नियम का अपराधियों की तरह ही पालन करती है।

पापा गवली की हत्या करके दाऊद इब्राहिम ने इस अघोषित नियम को तोड़ दिया था। पापा गवली की सरेआम हत्या से बौखलाए गवली ने भी इस नियम को तोड़ने का फ़ैसला किया दिया। पापा और अशोक जोशी की हत्या गवली के लिए सदमे से कम नहीं थी। जब अरुण को पता चला कि गाड़ी का मालिक मनोज कुलकर्णी है तो उसने चार लोगों को उसके घर भेजा। वे लोग खुद को क्राइम ब्रांच का अधिकारी बताकर मनोज से साथ चलने के लिए कहने लगे। बाद में गवली के इनक्वायरी रूम में मनोज का मर्डर कर दिया गया। बहरहाल, गवली इतने से शांत नहीं हुआ। उसने भी दाऊद को ऐसी चोट देने की योजना बनाई जिससे वास्तव में दाऊद रोए और भावनात्मक रूप से ज़ख्मी हो जाए और जिंदगी भर कराहता रहे। पश्चाताप करता रहे। लिहाज़ा, गवली ने दाऊद की पांच बहनों में सबसे प्यारी हसीना पारकर के शौहर इब्राहिम का गेम बजाने की योजना बनाई।

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1959 में पैदा हुई हसीना दाऊद से छोटी और 12 भाई-बहनों में सातवें नंबर पर थी। इब्राहिम कासकर के सारे बच्चे महाराष्ट्र के रत्नागिरि में पैदा हुए थे। दाऊद ने भाई साबिर के साथ डी-कंपनी शुरू की थी। उसकी पाँच बहनें सईदा, फरजाना, मुमताज, जैतून और हसीना थीं, लेकिन उसके धंधे में उसकी किसी बहन के लिए जगह नहीं थी। उसमें भी हसीना दाऊद की सबसे चहेती थी। ज़ाहिर है, सबसे प्रिय बहन के शौहर की हत्या से दाऊद को उसी तरह का दर्द होगा, जैसा दर्द गवली को उसके भाई की हत्या के बाद हुआ। इब्राहिम होटेल क़ादरी का मालिक था। लंबा, सुगठित शरीर वाला पारकर भी कोंकणी मुस्लिम समुदाय का था। वह पार्टटाइम ऐक्टिंग भी कर लेता था। वह जूनियर फिल्म आर्टिस्ट था, लेकिन बताते हैं कि बाद में उसने होटल का धंधा कर लिया। हसीना से उसका निकाह दाऊद की मर्जी से हुआ था।

इब्राहिम इस्माइल की हत्या की ख़बर से दाऊद परिवार और डी गैंग में उसी तरह हाहाकार मचा जैसे साबिर की हत्या से मचा था। दुबई में बैठे दाऊद ने सोचा भी नहीं था, कोई उसके बहनोई की ओर आंख उठाकर देख भी सकता है। यह हत्या उसके लिए बहुत बड़ा निजी आघात था। डॉन ने बदला लेने की कसम खाई। गवली गिरोह के लोग इतने पर नहीं रुके। जो भी हो डॉन की बहन हसीना जिसकी 17 साल में शादी हुई, पति की मौत के बाद अपराध की दुनिया की मल्लिका बन गई। आगे चलकर हसीना पारकर को मुंबई की ‘गॉडमदर’ बनी। उसका दक्षिण मुंबई ही नहीं संपूर्ण मुंबई और आसपास के इलाक़े में काफी दबदबा कायम हो गया। कहतें हैं कि उनकी मर्जी के बिना परिंदा भी पर नहीं मार सकता था. यही कारण था कि लोग उसे लेडी डॉन और पता नहीं किस किस नाम से भी बुलाते थे। हसीना के धंधे में आने की कहानी एकदम फिल्मी है। हसीना पारकर पर ‘गॉडमदर’ फिल्म भी बनी थी, जिसमें हसीना का किरदार श्रद्धा कपूर ने निभाया था।

हैरान करने वाली बात यह रही कि 30 अगस्त 1992 की रात शैलेश, शेरे, राजू बटाटा और संतोष पाटिल ने फिर धावा बोला। कुंभारवाड़ा में दाऊद के ख़ास आदमी पर फ़ायर कर दिया। दो दिन बाद 2 सितंबर की सुबह वे दोनों फिर उस इलाक़े में देखे गए। इस बार भी वे लोग दाऊद के किसी ख़ासमख़ास को मारने की फिराक में थे। बहरहाल, उनकी मूवमेंट की सूचना किसी ने नागपाड़ा पुलिस को दे दी। पुलिस वहां पहुंची और शैलेश और विपिन को दौड़ाकर पकड़ लिया। तीसरा अपराधी राजू वहां से सिर पर पैर रखकर भागने में सफल रहा। गिरफ़्तारी के बाद स्थानीय लोगों ने दोनों गुंडों को पुलिस से छीन लिया और उनकी जमकर पिटाई की। इतना मारा कि दोनों अपराधी अधमरे हो गए। सीरियस हालत में उन्हें जेजे अस्पताल भेजा गया। वे तीसरी मंज़िल पर वार्ड 18 में भर्ती कराए गए। सुरक्षा के लिए एक पीएसआई समेत चार पुलिस वालों की ड्यूटी लगा दी गई।

सुपर बॉस के जीजा की हत्या का फ़ौरन बदला लेने की पूरी और इकलौती ज़िम्मेदारी गैंग में नंबर दो होने के नाते छोटा राजन की थी। उसने मुंबई में अपने शार्प शूटरों से कह दिया था कि हत्यारों की जल्द से जल्द गेम बजाकर उसे सूचित करें, लेकिन उसके शूटरों के लिए जेजे अस्पताल के घेरे को तोड़ पाना मुश्किल हो रहा था। उनके लिए शैलेश तक पहुंचना बहुत कठिन हो रहा था। छोटा राजन ने वफ़ादार सिपाही की हैसियत से कहा, “भाई जीजाजी की हत्या का बदला मैं ख़ुद लूंगा।” उसने डॉन को बताया कि हत्यारे फिलहाल जेजे अस्पताल में एडमिट हैं और वहां फिलहाल बहुत कड़ी सिक्यूरिटी लगी हुई है। जिससे शूटर उन तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। राजन ने भरोसा दिया कि जिस दिन शैलेश और बिपिन डिस्चार्ज होंगे, वह दिन उनका आख़िरी दिन होगा। इसके अलावा राजू बटाटा और संतोष पाटील को भी फॉलो किया जा रहा है, उनका गेम कभी भी बज सकता है।

(The Most Wanted Don अगले भाग में जारी…)

अगला भाग पढ़ने के लिए क्लिक करें – द मोस्ट वॉन्टेड डॉन – एपिसोड – 28