द मोस्ट वॉन्टेड डॉन – एपिसोड – 1 – जानिए मुंबई की पूरी क्राइम हिस्ट्री, आखिर कैसे हुई बंबई में अपराध की एंट्री? (The Most Wanted Don – Episode 1 – Know the complete crime history of Mumbai, how did the crime enter Bombay?)

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हरिगोविंद विश्वकर्मा

बॉम्बे, बंबई, सपनों का शहर, मायानगरी, आर्थिक राजधानी, मुंबई, और अंडरवर्ल्ड का हब। शहर एक, लेकिन नाम अनेक। एक ऐसा शहर, जहां दिन हो या रात, सुबह हो या शाम, हर पल ज़िंदगी जोश के साथ दौड़ती रहती है। यहां न कोई थमता है, न कोई रुकता है। संभवतः इसीलिए मुंबई के बारे में कहा जाता है कि यह ऐसा शहर है जो कभी सोता ही नहीं। इस शहर के बारे में एक तथ्य यह भी जुड़ा है कि जो भी इसकी शरण में आया, इस शहर ने उसे ही अपना बना लिया। यह दुनिया का एकलौता शहर है, जहां चाहे रंक हो या राजा, शरीफ़ हो या बदमाश सबका किसी न किसी तरह गुज़ारा हो ही जाता है।

सभ्य, शरीफ़ और शांतिपूर्ण लोगों को इस शहर में फलने फूलने का तो मौक़ा मिला ही। इस शहर ने गुंडे-बदमाश और असामाजिक तत्वों को भी पनाह दिया और उन्हें फलने-फूलने में मदद की। दरअसल, जिन्हें रोज़गार मिल गया, वे बतौर शरीफ़ जम गए। ढेर सारे लोग ऐसे भी थे, जिन्हें रोज़गार या कोई काम नहीं मिला। उनके सपने रेत के महल की तरह बिखर गए। उनमें से अनेक ग़लत हाथों में पड़ गए, तो कुछ गलियों के मवाली बन गए, तो कुछ दादा के रूप में कुख्यात हुए।

इंसानी फ़ितरत के मुताबिक यहां रहने वाले लोग आपस में यदा-कदा लड़ने भी लगे। लिहाज़ा, असुरक्षा की भावना के चलते जो जहां का था, वहीं अपने लोगों को एकजुट करने लगा। अपराधी भी कहां पीछे रहने वाले थे। वे अपराधियों को एकजुट करने लगे। इन मवाली या दादाओं की हरकतों के चलते पिछली सदी में इस शहर में अपराधों का सिलसिला शुरू हुआ। किसी ने किसी का पैसा ले लिया हो और दे न रहा हो तो लोग वसूली के लिए अपराधियों की मदद लेते थे। इसके बाद वसूली करने वाले लोग अपराध भी करने लगे। दादा शब्द भले हर जगह हिस्सों में सम्मानजनक संबोधन माना जाता है लेकिन मुंबई में इसका मतबल बड़ा गुंडा यानी छंटा हुआ बदमाश होता है। जिसके पास जितनी ताक़त होती है, वह उतना ही बड़ा दादा माना जाता है. दादा को ठेठ बंबइया भाषा में भाई भी कहा जाता है। ऐसा नहीं कि मुंबई शुरू से ही आपराधिक गतिविधियों का केंद्र रही है। मौर्य वंश से दो हज़ार वर्ष से अधिक अवधि तक यह भूभाग अपराधियों से से पूरी तरह मुक्त था।

मुंबई पुलिस की डायरियों, क्राइम पर अख़बारी रिपोर्ट्स और अंडरवर्ल्ड पर लिखी गई किताबों को खंगालने से पता चलता है कि शहर का बंबई से मुंबई बनने का सफ़र ख़ून से सना है। पिछली सदी के पचास के दशक में नन्हें ख़ान नाम के अपराधी ने दक्षिण मुंबई में पहली बार अपनी मौज़ूदगी दर्ज़ करवाई थी। भायखला पुलिस थाने के रिकॉर्ड के मुताबिक नन्हें ख़ान शहर का पहला हिस्ट्रीशीटर था। वह इलाहाबाद का रहने वाला था, इसीलिए उसके गैंग का नाम इलाहाबादी गिरोह था। उसके गैंग में कई गुंडे थे, लेकिन नन्हें के अलावा वहाब ख़ान उर्फ़ पहलवान और दादा चिकना जैसे अपराधी ही कुख्यात थे। उस दौर में किसी अपराधी के पास पिस्तौल या बंदूक नहीं होती थी। लिहाज़ा, चापर, तलवार और हॉकी स्टिक के अलावा एक ख़ास चाकू अपराधियों का पसंदीदा हथियार हुआ करता था। वह चाकू रामपुर में बनता था, सो उसे रामपुरी चाकू कहा जाता था। बाद में रामपुरी चाकू बेहद लोकप्रिय हुआ। उस समय छिनैती सबसे बड़ा अपराध था। नन्हें ख़ान और दूसरे गुंडे चाकू दिखाकर लोगों के पैसे और गहने लूट लेते थे।

इसी तरह मुंबई में पहली बैंक डकैती अनोखेलाल नाम के दूसरे गुंडे ने डाली। कई लोगों का मानना है कि उसने डकैती के लिए फ़र्ज़ी नाम का इस्तेमाल किया। उसका नाम अनोखेलाल नहीं कुछ और था। बताया जाता है कि उसे डकैती की प्रेरणा 1950 में रिलीज़ अमेरिकी मूवी ‘हाइवे 301’ से मिली। उस फिल्म देखने के बाद वह मुंबई चला आया और यहां स्थानीय टपोरियों को एकजुट किया और डकैती का तीन बार रिहर्सल किया। इसकी किसी को ख़बर तक न लगी क्योंकि तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि बैंक में भी डकैती हो सकती है। एक दिन अनोखेलाल ने अपने गुंडों के साथ फोर्ट इलाके की लॉयड्स बैंक में घुसा और चाकू की नोंक पर वहां रखे 16 लाख रुपए लूटकर चंपत हो गया। बैंक के सुरक्षा गार्ड ने गुंडों को रोकने की कोशिश की, लेकिन चाकूबाज़ी में वह वहीं ही मारा गया। मज़ेदार बात यह रही कि इस घटना के बाद ‘हाइवे 301’ फ़िल्म पर मुंबई में प्रतिबंध लग गया। मुंबई पुलिस ने डकैती की जानकारी देने वाले को 10 हज़ार रुपए इनाम की घोषणा की और इनाम की चादर हाजी अली दरगाह पर रखी गई।

बहरहाल, समय-समय पर यहां कानपुरी गैंग, जौनपुरी गैंग, बनारसी गैंग और रामपुरी गैंग जैसे अपराधी गिरोह एक के बाद एक अस्तित्व में आए। सबसे बड़ी बात मुंबई में बनने वाले गैंग के सरगना के मारे जाते ही गैंग का अस्तित्व समाप्त हो जाता था। इस तरह यहां गैंग बनते और ख़त्म होते रहे। दक्षिण मुंबई का रामपुरी गैंग और जॉनी गैंग भी प्रमुख गिरोह थे। रामपुरी गैंग की सरगना इब्राहिम दादा था जो ख़ुद बहुत कुख्यात गुंडा था और कई हत्याएं कर चुका था। इसी तरह जॉनी गैंग में तीन ईसाई भाइयों का वर्चस्व था। रामपुरी गैंग का इब्राहिम दादा शिक्षित था और फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोलता था। मारिया नाम की एक ईसाई युवती का दिल इब्राहिम पर आ गया। वह उस गुंडे पर फ़िदा हो गई। उनके अफ़ेयर पर जॉनी गैंग के बदमाशों ने गहरी आपत्ति जताई लेकिन इब्राहिम ने हर धमकी को दरकिनार करते हुए मारिया से निकाह कर लिया।

इब्राहिम के मारिया से निकाह करने के बाद रामपुरी गैंग और जॉनी गैंग के बीच छत्तीस का आंकड़ा हो गया। जॉनी गैंग का सरगना जॉनी ब्रदर्स में सबसे बड़ा था। उससे छोटे चिकना जॉनी और छोटा जॉनी गैंग के दूसरे गुंडे थे। बहरहाल एक दिन जॉनी के गोराई बीच पर समुद्र में डूबने की ख़बर आई। लेकिन कहा जाता है कि प्रतिद्वंद्वी गिरोह ने उसे डुबो दिया। बहरहाल, जॉनी की मौत के बाद उसके गिरोह का नाम मुंबई के अपराध मानचित्र ग़ायब हो गया। उसके बाद दक्षिण मुंबई में रामपुरी गैंग का मुक़ाबला कश्मीरी गैंग करने लगा। कश्मीरी गैंग कमाठीपुरा से चलता था। कश्मीरी गैंग हर किसी की ज़बान पर था। इसका सरगना हबीब कश्मीरी जुआघर चलाता था।

उस समय दक्षिण मुंबई में इन दो गिरोहों के अलावा और कई और गैंग सक्रिय थे। इतना ही नहीं, अहमद कश्मीरी, अयूब ख़ान और फ़िरोज़ ख़ान जैसे ख़तरनाक गुंडे भी आम जनता, व्यापारी और पुलिस की नींद हराम किए हुए थे। कहते हैं कि किसी बात पर अहमद कश्मीरी की अयूब ख़ान से अनबन हो गई। अहमद ने अयूब की प्रेमिका अगवा कर लिया। इससे अयूब इतना आग-बबूला हुआ कि रामपुरी चाकू लेकर अहमद को खोजने लगा। एक दिन संयोग से दोपहर के समय कमाठीपुरा में अहमद मिल गया। बस क्या था, अयूब ने सरेआम रामपुरी चाकू से उसका शरीर गोद डाला। अहमद की घटनास्थल पर ही मौत हो गई। दरअसल, नागपाड़ा, डोंगरी, जेजे और आसपास के इलाक़े में सक्रिय गुंडे एक दूसरे से ही लड़ रहे थे। इससे पुलिस का काम ही आसान हो रहा था।

मुंबई के वाणिज्य केंद्र के रूप में विकसित होने के बाद यहां क्राइम सिंडिकेट शुरू हुआ। माना जाता है कि 1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक के आरंभ में यहां अंडरवर्ल्ड अस्तित्व में आया। माना जाता है कि अब्दुल करीम लाला मुंबई का पहला अंडरवर्ल्ड डॉन था। हालांकि अंडरवर्ल्ड पर लिखने वाले कई लोग मानते हैं मिर्ज़ा हाजी मस्तान मुंबई का पहला डॉन था। लेकिन यह सही है कि 1970 के दशक में मुंबई के अंडरवर्ल्ड पर तीन-तीन डॉन करीम लाला, हाजी मस्तान और वरदराजन मुदलियार का वर्चस्व था। समय के साथ यहां अंडरवर्ल्ड की जड़ें गहरी होती चली गईं। सत्तर-अस्सी साल बाद आज भी यह शहर अपराधियों से लिए सबसे सुरक्षित पनाहग़ार है। एक समय ऐसा भी आया जब शहर क़ानून व्यवस्था संभालना पुलिस के लिए अहम चुनौती बनी। यहां अब भी कई अपराधी गिरोह अपने-अपने गुर्गे के ज़रिए वसूली करते हैं। हफ़्ता-उगाही करने वालों में डी गैंग यानी दाऊद इब्राहिम गिरोह सबसे प्रभावशाली है।

(The Most Wanted Don अगले भाग में जारी…)

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