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चीर-हरण के समय द्रौपदी की कृष्ण ने कोई सहायता नहीं की – डॉ. बोधिसत्व

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संवाददाता
मुंबई, बहुचर्चित किताब ‘महाभारत यथार्थ कथा’ के लेखक डॉ बोधिसत्व ने महाभारत कथा का हवाला देते हुए कहा कि जुए में जब युधिष्ठिर द्रौपदी को हार गए तो दुर्योधन द्रौपदी को दासी बना कर छोड़ दिया था लेकिन उसके मित्र कर्ण ने कहा कि नहीं मित्र इसे हम सबके सामने निर्वस्त्र करने का आदेश दो। इसके बाद दुर्योधन द्रौपदी को वस्त्रहीन करने का आदेश दिया और चीर-हरण की घटना हुई जो अंततः महायुद्ध की वजह बनी।

चित्रनगरी संवाद मंच मुंबई की ओर से रविवार की शाम मृणालताई हाल, केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट, गोरेगांव में आयोजित सृजन संवाद कार्यक्रम में वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से हाल में ही प्रकाशित अपनी किताब ‘महाभारत यथार्थ कथा’ का परिचय देते हुए डॉ बोधिसत्व ने शुरू में ही इस धारणा को भ्रम क़रार दिया कि घर में महाभारत रखने से गृह कलह नहीं होती है। उन्होंने कहा कि महाभारत एक वृहत ग्रंथ है। लिहाजा, इसे पढ़ते समय पाठक में धीरज और विवेक होना बहुत ज़रूरी है।

चीर-हरण प्रसंग की चर्चा करते हुए डॉ बोधिसत्व ने कहा कि चीर-हरण के बाद जब पांडव जंगल में चले गए तो एक दिन वहां कृष्ण उनसे मिलने आए। द्रौपदी से कृष्ण ने कहा कि उन्हें तो पता ही नहीं था कि जुआ या चीर-हरण की घटना हो रही है। अन्यथा मैं जुआ नहीं होने देता। चाहे बलपूर्वक ही उसे रोकना पड़ता। जब जुए या चीर-हरण की कृष्ण को खबर ही नहीं थी, इसका मतलब बहुचर्चित धारावाहिक महाभारत में चीर-हरण या वस्त्रवृद्धि की घटना चिपकाई हुई लगती है।

डॉ बोधिसत्व ने कहा कि जब जुए की घटना हुई तो उस समय कृष्ण बहुत दूर द्वारकापुरी में थे। उन्हें पूरी घटना की जानकारी भी बहुत देर से मिली। इससे स्पष्ट है कि धारावाहिक महाभारत में कृष्ण के द्रौपदी के लाज की रक्षा करने के प्रसंग को अतिरंजनापूर्ण है। उन्होंने इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि महाभारत के कई व्याख्याकारों ने मूल कहानी पर परदा डाल दिया। उन्होंने मूल कथा के हवाले से श्रीकृष्ण के गीता ज्ञान के बारे में कुछ रोचक बातें बताईं। उन्होंने पांडव के व्यक्तित्व का आकलन मूल महाभारत में वर्णित यथार्थ के साथ किया और बताया कि कई मानवीय कमज़ोरियों वाले उद्दंड कर्ण को कैसे नायक बनाया गया।

डॉ बोधिसत्व बताया कि वासुदेव शरण अग्रवाल की पुस्तक ‘भारत सावित्री’ पढ़ने के बाद महाभारत को दुबारा पढ़ने की इच्छा हुई और उन्होंने महाभारत पर लिखी गई तक़रीबन हर किताब का अध्ययन किया। इस कार्यक्रम में उन्होंने बड़े आत्मविश्वास और विनम्रता के साथ श्रोताओं के सवालों के जवाब दिया। डॉ बोधिसत्व ने बताया कि उनकी किताब का यह पहला भाग है। महाभारत यथार्थ कथा के अभी दो भाग और प्रकाशित होंगे।

कार्यक्रम का संचालन कर रहे शायर देवमणि पांडेय ने महाभारत के संवाद लेखक डॉ राही मासूम रज़ा से अपनी मुलाकात का हवाला देते हुए कहा कि रज़ा साहब ने स्वीकार किया कि कर्ण को जानबूझ कर महिमामंडित किया गया, जबकि वास्तविक महाभारत में उसका किरदार वाकई खलनायक जैसा है। देवमणि पांडेय के अनुसार रजा ने बताया था कि महाभारत धारावाहिक बनाते समय कई घटनाएं जोड़ी-घटाई गईं।

प्रतिष्ठित लेखक राजशेखर व्यास ने परिचर्चा के दौरान बताया कि जनमानस में कैसे सुयोधन को दुर्योधन और सुशासन को दुशासन बनाया गया। उनके अनुसार महाभारत में वेद, पुराण और उपनिषद सबका निचोड़ शामिल है। यह ज्ञान लोगों तक न पहुंचे इसलिए एक साज़िश के तहत यह दुष्प्रचार किया गया कि महाभारत घर में रखने से लड़ाई झगड़े होते हैं। चर्चा को पूर्णता पर पहुंचाते हुए उन्होंने कहा कि महाभारत में भारत समाया हुआ है।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में कई किताबें लिख चुकी कवयित्री शशि पुरवार ने अपनी रचना यात्रा का परिचय दिया। शशि पुरवार के गीत नवगीत संग्रह ‘भीड़ का हिस्सा नहीं’ को महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ने इसी साल संत नामदेव स्वर्ण पदक पुरस्कार से सम्मानित किया। अपने इस संकलन से कुछ चुनिंदा रचनाएं सुना कर शशि पुरवार ने समर्थ रचनाकार होने का परिचय दिया।

कार्यक्रम में आभा बोधिसत्व, सूर्यांश व्यास, डॉ दमयंती शर्मा, डॉ रोशनी किरण, सविता दत्त, नवीन कुमार भास्कर, प्रदीप गुप्ता, नरोत्तम शर्मा, देवदत्त देव, राजेश ऋतुपर्ण, सुधाकर पांडेय, जवाहर लाल निर्झर, ताज मोहम्मद सिद्दीक़ी, रासबिहारी पांडेय, अभिजीत सिंह, संजय गुप्ता, आकाश ठाकुर, गोविंद सिंह राजपूत, मोहन जोशी, सुषमा गुप्ता, सुरभि मिश्र आदि समेते कई रचनाकार और साहित्य प्रेमी मौजूद थे।

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मुस्लिम महिलाओं की बेबसी को बयां करता उपन्यास ‘सलाम बॉम्बे व्हाया वर्सोवा डोंगरी’

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अपने ढाई हज़ार के सफ़र के दौरान पहले बॉम्बे फिर बंबई और बंबई से मुंबई बनी मायानगरी अपनी ख़ूबियों और विसंगतियों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर रही है, लेकिन युवा पत्रकार और कवि-लेखक सारंग उपाध्याय ने इस शहर की विसंगतियों को भी मोहब्बत के चश्मे से देखा है। लेखक ने अपने पहले उपन्यास ‘सलाम बॉम्बे व्हाया वर्सोवा डोंगरी’ में मुंबई के आदि बाशिदों कोलियों की कहानी गढ़ी है और कोली समाज के साथ-साथ देश की आर्थिक राजधानी में हुए बदलावों और विषमताओं को प्रेम-कहानी के माध्यम से ख़ूबसूरती से काग़ज़ के कैनवास पर उकेरा है। लफ़्ज़ों एवं अल्फ़ाज़ों के चयन और बेहतरीन कला-शिल्प के चलते उनकी लेखन-शैली अपने आप में अद्भुत लगती है।

सारंग उपाध्याय (Sarang Upadhyay) का उपन्यास ‘सलाम बॉम्बे व्हाया वर्सोवा डोंगरी (Salaam Bombay Via Versova Dongri)’ मूलरूप से प्रेम कथा पर आधारित उपन्यास है। यह उपन्यास मालेगाँव की अरफ़ाना और कोली बस्ती वर्सोवा मुंबई के आलम मोहम्मद ख़ाँ उर्फ़ जालना और उन दोनों की बेटी सायरा और राघव कुमार यादव उर्फ़ रघु की प्रेम कहानी है। कहने का तात्पर्य उपन्यास दो पीढ़ियों की दास्तान-ए-मोहब्बत अपने आप में समेटे हुए है। यह उपन्यास इस्लाम की विसंगतियों के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं की शौहर की दूसरी बीवी यानी सौतन को झेलने की बेबसी को भी बख़ूबी बयां करता है।

कथित तौर पर चार-चार शादियों का मज़हबी हक़ रखने वाला मुस्लिम पुरुष कितना निरंकुश है। यह उपन्यास के चरित्र जालना के ग़ुस्से में बोली गई बात से स्पष्ट हो जाता है। जो अपनी बीवी अरफ़ाना को बुरी तरह पीटने के बाद कहता है, “हरामज़ादी, रंडी, कुतिया! शरम कर बेहया, दूसरा निकाह ही किया है करमजली ज़नाना, कोई गुनाह नहीं किया है मैंने। अरे मुसलमान मर्द चार बीवियाँ रख सकता है, इसमें कुछ हर्ज़ नहीं, कोई कसूर नहीं..! दूसरी बीवी रखना मेरा हक़ है। औरतों और मर्दों के फ़ासले को समझ, हरामज़ादी..!”

अपने शौहर से बेइंतहां मोहब्बत करने वाली अरफ़ाना उसकी बेवफ़ाई और बेरुखी से इस कदर टूट जाती है कि उसका अपने मज़हब की अमानवीय परंपराओं से पूरी तरह मोहभंग हो जाता है। वह कहती है, “अल्लाह क़सम सायरा, बिरादरी और मज़हब ने औरतों के हक़ों को कितना मारा है, इसे तो ख़ुदा ही जानता है।” थोड़ी देर बाद ही अपनी बेटी को हिदायत देते हुए अरफ़ाना कहती है, “तू अपनी मर्ज़ी से, अपनी पसंद के मर्द से निकाह करना। ऐसे मर्द के साए से भी दूर रहना जो धोखेबाज़ हो और बीवी से बेइमानी करता हो।”

अरफ़ाना शरिया क़ानून के तहत मुस्लिम पुरुषों को एक से अधिक विवाह करने की व्यवस्था पर अफ़सोस जताते हुए कहती है, “किसी हिंदू मर्द से निकाह पढ़ती तो दुनिया ख़ुशहाल होती मेरी। कम-से-कम यहाँ-वहाँ मुँह तो नहीं मारते और मारते भी हैं तो बीवी और हक़ के नाम पर घर में तो नहीं उठा लाते। …चार निकाह की दुहाई दे रहा है तेरा बाप… ग़लती कर गई मैं तो। यदि भाग गई होती उस हिंदू लड़के के साथ तो यह मुँह न देखना होता। वह प्यार से ही रखता और रंडी के पास मुँह भी मारता तो उसकी औक़ात में रखकर घर तो न उठा लाता।”

इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने पति के दूसरे निकाह के बाद मुस्लिम महिला की बग़ावत और अपने हक़ के प्रति सजगता भी दिखाया गया है। जब पिटती हुई अरफ़ाना अचानक उठती है और लगातार हाथ चला रहे जालना पर उसने पलट वार किया और उसकी टोपी उछाल दी, बनियान फाड़ दी, उसे धक्का देकर झिंझोड़ दिया और पास ही पड़ा नाव का चप्पू उठाकर जालना पर तान दिया। इसके बाद कहती है, “अब हाथ न उठाना जालना, वरना तेरा सिर खोल दूँगी मैं। और देखती हूँ तू कैसे लेकर आता है उस रंडी, हरामज़ादी को यहाँ।” उसके बाद शौहर जालना को चुनौती देते हुए कहती है, “यदि हिम्मत है तो यहाँ से निकालकर दिखा मुझे।” ऐसा तेवर मुस्लिम महिलाएँ आम तौर पर नहीं दिखा पातीं क्योंकि उन्हें अपने समाज और अपने ही लोगों से सहयोग नहीं मिलता।

सारंग ने अरफ़ाना और जालना के संवादों के बहाने इस्लाम की बहुविवाह जैसी कुरीतियों का बेबाकी से ज़िक्र किया है। धार्मिक कुरीतियों पर कलम चलाने में भारतीय बुद्धिजीवी और फिल्मकार डबल स्टैंडर्ड अपनाते रहे हैं। हिंदू धर्म की विसंगतियों पर तो वे करारा प्रहार करते हैं, लेकिन जब बात जब इस्लाम की कुरीतियों पर कलम चलाने या रूपहले परदे पर दिखाने की बात आती है तो बड़ी साफ़गोई से निकल जाते हैं। यहाँ लेखक ने न केवल इस्लाम में बेटियों की अहमियत को बहुत बारीक़ी को समझाया और उसे भी लिखने की हिम्मत भी जुटाई। और, साथ ही, समाज के उस चेहरे को भी दिखाने की कोशिश की है, जहाँ पितृसत्ता आज भी हावी है। यही बात सारंग को असाधारण लेखकों की फ़ेहरिस्त में ला खड़ा करती है।

सारंग उपाध्याय ने अरफ़ाना और जालना के ज़रिए 1986 के दशक के बहुचर्चित शाहबानो की अदालती लड़ाई की ज़िक्र किया है। जब आउटडेटेड ट्रिपल तलाक़ की शिकार शाहबानो को सुप्रीम कोर्ट से इंसाफ़ मिलता है, लेकिन इस्लामिक कट्टरपंथों के समक्ष घुटने टेकते हुए राजीव गांधी की प्रचंड बहुमत वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को बदलते हुए संविधान में संशोधन करके एक लाचार मुस्लिम महिला के हाथ से इंसाफ़ छीन लिया था। इसीलिए दक्षिणपंथी लोग तर्क देते हैं कि 2018 में नरेद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने ट्रिपल तलाक़ विरोधी क़ानून को बनाकर कांग्रेस की उसी भूल का सुधार किया।

लेखक ने शाहबानो के अलावा इस उपन्यास में अयोध्या के विवादित ढाँचे को गिराए जाने के बाद मुंबई में दो चरण में हुए दंगे और उसके बाद 1993 और 2006 के विस्फोट जैसी ऐतिहासिक घटनाओं को भी समेटा है। उपन्यास को पढ़ते हुए ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि लेखक दरअसल, उस कालखंड की कहानी लिख रहा है, जिस कालखंड में उसका जन्म हुआ था। उपन्यास पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे लेखक ने उस दौर की कहानी को लिख रहा है जिसमें वह खुद जिया है। उपन्यास के चारों प्रमुख चरित्रों कि अपनी दुनिया है। यहाँ लेखक ने साहित्य के समाज का दर्पण होने के कथन को साबित किया है।

उपन्यास को पढ़ते समय वर्सोवा, डोंगरी, अंधेरी, जोगेश्वरी, चर्चगेट, भाऊचा धक्का और कोलाबा के मच्छी बाज़ारों का इस तरह ज़िक्र किया गया है जैसे लेखक ने ख़ुद उनके बीच रहने और कोलियों के साथ जीवन जाने के बाद ही इस कथानक को उपन्यास का रूप दिया है। इससे यह उपन्यास यथार्थ की कसौटी पर खरा उतरता है। उपन्यास के चरित्रों की दुनिया देश में हो रही घटनाओं से कैसे प्रभावित होती हैं, या कैसे चरित्रों की ज़िंदगी में यू-टर्न आता हैं, उसे सरल भाषा में काग़ज़ पर उतारना इतना आसान भी नहीं था।

लेखक ने इस उपन्यास को दादर के प्लेटफॉर्म पर रघु और सायरा के चुहलबाज़ी से शुरू किया और वही प्लेटफॉर्म पर ही दोनों के प्रेम का समापन होता है। वैसे इन दोनों की प्रेम कहानी काफी सस्पेंस से भरी हुई है। हर क्षण जिस तरह से कहानी बदली है, वह तेज़ी से उपन्यास को पढ़ने के लिए विवश करती है। पाठक सोचता रहता है कि कहानी का दुखांत होगा या सुखांत। लेकिन यहाँ फिल्मी स्टाइल में लेखक ने उपन्यास को सुखांत देकर पाठकों को पठनोपरांत होने वाले अवसाद से बचा लेता है।

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महिला क्यों बताए कि वह विवाहित है या नहीं – डॉ. प्रतिमा गोंड

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सजना-सँवरना स्त्री का हक लेकिन सुंदर दिखने का दबाव डालना सांस्कृतिक हिंसा

संवाददाता
वाराणसी, महिलाओं के नाम से पहले ‘कुमारी’ या ‘श्रीमती’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल की अनिवार्यता को सांस्कृतिक हिंसा बताकर उस पर पाबंदी लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाली महिला अधिकार की मुखर पैरोकार और काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में समाजशास्त्र पढ़ाने वाली सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रतिमा गोंड (Dr Pratima) ने देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा अपनी याचिका खारिज करने के फैसले से पूर्ण असहमति जताई है। वह स्पष्ट रूप से माननी हैं कि किसी महिला के नाम के आगे कुमारी या श्रीमती जैसे शब्द लिखने के लिए उस पर किसी भी तरह का दबाव डालना सांस्कृतिक हिंसा की कैटेगरी में आता है।

सदियों पुरानी परंपराओं के नाम पर स्त्री पर तरह-तरह की बंदिश लगाने का पुरजोर विरोध करने वाली डॉ. प्रतिमा गोंड ने सवाल किया है कि स्त्रियाँ अपने नाम के आगे वैवाहिक स्थिति को सूचित करने वाले कुमारी या श्रीमती जैसे शब्द भला क्यों लगाएं? उन्होंने कहा कि किसी महिला के किसी फोरम पर ‘कुमारी’ या ‘श्रीमती’ लिखने का आग्रह सांस्कृतिक हिंसा की श्रेणी में आता है, भले ही ऐसा आग्रह किसी अदालत ने की है। इस बारे में सविस्तार अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि कोई महिला यह क्यों बताए कि वह विवाहित है या विवाहित नहीं है।

मौजूदा समाज को स्त्री विरोधी समाज करार देते हुए मशहूर नारीवादी विचारक डॉ. प्रतिमा गोंड ने कहा कि पितृसत्ता स्त्री की यौन-गतिविधि को नियंत्रित करने के क्रम में उसकी परवरिश इस तरह से करती है कि भय उसके अवचेतन का हिस्सा बना रहे। घर लौटने में जरा सी देर हो जाने पर स्त्री डर जाती है और यह डर उस पर थोपे गए सोशल कंडीशनिंग की वजह से होता है। लोकोपवाद को लेकर अतिशय सजगता भी सहज-स्वाभाविक नहीं वरन पितृसत्ता द्वारा सायास निर्मित की गई होती है। बुद्धिसंगत स्टैंड लेने वाली स्त्रियाँ भी बहुत हद तक अपने अवचेतन से परिचालित होती हैं, जिसका निर्माण पुरुष-वर्चस्व वाली वैचारिकी के द्वारा किया गया होता है। स्त्री की सोशल कंडीशनिंग परिवार और समाज दोनों के ही द्वारा की जाती है।

डॉ. प्रतिमा गोंड ने कहा कि हमारे समाज में मनुष्य-विरोधी, तर्क-विरोधी प्रतिगामी विचारों के अनुसार स्त्री को चलने के लिए बाध्य करने हेतु पितृसत्ता सांस्कृतियों उपायों का सहारा लेती है। भारतीय संविधान उच्चतर मानवीय मूल्यों की स्थापना करता है लेकिन समाज उसके अनुसार चलने की बजाय मध्ययुगीन प्रतिगामी मूल्यों से संचालित होता है। लोकतांत्रिक तरीके से समाज को स्त्री-गरिमा के प्रति सजग-सचेत बनाने की हामी प्रतिमा गोंड का मानना है कि ऐसा समाज बनाने के लिए संघर्ष करने की आवश्यकता है जहाँ पर स्त्री को अपने जेंडर के कारण अलग से सचेत होने की आवश्यकता नहीं रहे।

आत्म-धर्माभिमानिता यानि कि सेल्फ-राइटिअसनेस के प्रसंग की चर्चा करते हुए डॉ. प्रतिमा गोंड ने कहा कि इसका कारण और परिणाम दोनों ही भय है। मसलन, मुस्लिमों को लेकर व्यापक समाज में भय का वातावरण बनाया गया है, जिस कारण से लोग उनसे नफरत करते हैं। जहाँ भय होता है, वहाँ तर्क-विवेक पंगु हो जाता है। स्त्रियों के आत्म-धर्माभिमानी होने यानि कभी भी अपनी गलती नहीं मानने की प्रवृत्ति के संदर्भ में भी उन्होंने यही बात कही।

अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा, “स्त्री को चूंकि अपने बच्चों का लालन-पालन करना होता है और वे प्रायः अपने पति की संपत्ति और उसके रुपये-पैसों पर निर्भर होती हैं, इसलिए उनमें अपने पति को लेकर बड़ा पजेस्सिवनेस होता है। पति का ध्यान किसी दूसरी स्त्री की तरफ जाने से आर्थिक असुरक्षाबोध भी जुड़ा होता है, इसलिए भी स्त्रियाँ प्रायः घेरेबंदी करती हैं। इस घेरेबंदी के विरोध में तर्क देते हुए प्रतिमा गोंड कहती हैं कि इससे निजता का हनन होता है, जो कि बर्बरता की निशानी है। मनुष्य अपने दिमाग में चल रही हलचलों को कई बार अपने तक सीमित रखना चाहता है। अपने प्रेम, अपनी नफरत और अपनी फैंटेसी को चर्चा का विषय नहीं बनाना चाहता। लेकिन पजेस्सिवनेस की भावना व्यक्ति की निजता का हनन करती है और मनुष्य को लोकतांत्रिक नहीं रहने देती। पजेस्सिवनेस की भावना का मूल स्रोत तो दुर्लभता है, साथ रहने के अवसर अगर विरल होंगे-कम होंगे तो असुरक्षाबोध रहेगा।”

डॉ. प्रतिमा गोंड ने आगे कहा कि रोजी-रोटी, आवास-चिकित्सा और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत प्रश्नों के इर्दगिर्द प्रश्न खड़ा करने और तुलनात्मक रूप से कम महत्व के प्रश्नों पर सापेक्षिक रूप से अधिक बल देने के प्रच्छन्न सवाल पर उन्होंने कहा कि समाज-व्यवस्था में अपनी अवस्थिति के हिसाब से भी कई बार सक्रियता दिखाई जाती है। परंपरागत रूप से शोषित-उत्पीड़त समाज का एक हिस्सा ऐसा भी है, जिनकी भौतिक जरूरतें पूरी होने लगी हैं तो वे अब अपनी मानवीय गरिमा और उच्चतर नैतिक-सांस्कृतिक मूल्यों के लिए क्यों न लड़ें?

बीएचयू की सहायक प्रोफेसर ने कहा कि पितृसत्ता द्वारा की जाने वाली सोशल कंडीशनिंग से पुरुष भी उतना ही त्रस्त है। स्त्री-पुरुष के बीच पार्थक्य सामंती-पितृसत्तात्मक समाज की निशानी है। कोई पुरुष जैसे ही मित्रता बोध के साथ किसी स्त्री के करीब नजर आती है तुरंत उसके चरित्र को लेकर सवाल उठने लगते हैं। सभ्यता के विकास के दौरान जब संसाधनों के असमान बँटवारे की स्थिति उत्पन्न हुई और जिनके हिस्से में अधिक संसाधन आए उन्होंने उसे अपनी संतान को हंस्तातरित करना चाहा तो स्त्री को गुलाम बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई।

डॉ. प्रतिमा गोंड ने आगे कहा कि संतानोत्पत्ति के समय स्त्री कमजोर होती है, उसे सुरक्षा की अधिक आवश्यकता होता है, संभवतः इस और दूसरे अनेक कारकों का लाभ उठाकर पुरुष ने उसे परवश बना दिया। सिर्फ बर्बर-निरंकुश ताकत के दम पर किसी को अपने अधीन रखना मुश्किल होता है इसलिए सांस्कृतिक उपायों के जरिए अपनी वैचारिकी का वर्चस्व कायम किया जाता है। पुरुष सत्ता ठीक यही काम करती आई है और स्त्रियों को भय के जरिए नानाविध रूपों से अनुकूलित करने का काम आज भी जारी है।

बीएचयू जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में समाजशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में अपने अनुभवों से निकलीं कुछ बातें भी बातचीत के दौरान साझा करते हुए डॉ. प्रतिमा ने कहा कि पुनर्जागरण-प्रबोधनकालीन सीखों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जब सारी गतिविधियों का केंद्र मनुष्य को माना जाने लगा और तर्क-विवेक के साथ ही मानववाद की प्रस्थापना हुई तो स्त्री की भी पुरुषों क समान ही मानवीय गरिमा होती है, होनी चाहिए, यह प्रश्न भी प्रस्तुत हुआ।

सौंदर्य दिखने की चर्चा करते हुए डॉ. प्रतिमा गोंड ने आगे कहा, “इंसान अच्छा दिखना चाहता है। अगर स्त्री की बात करें तो सजना-सँवरना स्त्री का हक है, लेकिन सुंदर दिखने के लिए स्त्री पर परिवार-समाज द्वारा डाला जाने वाला दबाव सांस्कृतिक हिंसा है। गौरतलब है कि प्लेखानोव बता-समझा गए हैं कि प्रकृति में रिझाने का काम नर करता है। जैसे मोर अपने पंख फैलाकर नाचता है और मोरनी को रिझाता है। केवल मानव समाज में ही रिझाने का काम स्त्रियों के जिम्मे छोड़ दिया गया है क्योंकि स्त्री पराधीन है और सांस्कृतिक हिंसा की शिकार और उससे त्रस्त है।”

डॉ. प्रतिमा गोंड ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई अपनी याचिका के खारिज होने की मुख्यधारा के मीडिया की नकारात्मक रिपोर्टिंग की आलोचना करते हुए  कहा, “मुख्यधारा के मीडिया में पुरुषवादी सोच हावी है। दरअसल, मीडिया में 90 फीसदी पत्रकार स्त्रियों को लेकर पूर्वाग्रहित हैं। वे यह सहन ही नहीं कर पाते कि आदिवासी समाज से ताल्लुक रखने वाली कोई स्वतंत्र-चेता स्त्री कायदे की बात उठाए। या थोपी गई परंपराओं का विरोध करे। इसीलिए ये लोग हमारी याचिका को सिद्धि पाने की चाहत रखने वाला करार दे रहे हैं। जबकि मेरी याचिका बहुत जेनुइन है। हम लोग सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पेटिशन दायर करने का भी विचार बना रहे हैं।

सामाजिक विज्ञान की प्रोफेसर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए कहा है कि गैरज़रूरी याचिका दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के इस हिस्से को मुख्य धारा के अखबारों ने प्रमुखता से जगह दी। इस संदर्भ में पूर्वाग्रहित लोगों को उद्धृत करना जरूरी हो जाता है कि पूर्वाग्रहत जहर समाज की नस-नस में भरा हुआ है, किसी को भी कॉर्नर करके देखो, उसके अंदर पूर्वाग्रहत छलकता है।

डॉ. प्रतिमा गोंड ने स्पष्ट रूप से कहा कि इसी तरह की याचिका अगर स्थापित महिला द्वारा दायर की गई होती तो यही मीडिया उसे हाथों-हाथ लेता और ऐसे प्रचारित करता कि देखो कितना तो आमूलगामी कदम उठाया गया है। जबकि यहाँ तो सांस्कृतिक हिंसा के पूरे संदर्भ को स्पष्ट करते हुए लोकतांत्रिक तरीके से चेतना के स्तरोन्नयन का काम किया जा रहा है। लेकिन, हैसियत पूजने वाली और माल अंधभक्ति से ग्रस्त हमारी मीडिया मुद्दे को सही परिप्रेक्ष्य में उठाने से बचते हुए स्त्रीद्वेषी रुख अपनाए हुए है।

अपनी आगे की सक्रियता के बारे में प्रतिमा गोंड का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश और लैंगिक समानता के पैरोकारों के साथ बातचीत के आलोक में हम संसद में बैठे अपने सक्षम जन प्रतिनिधियों, संस्थाओं, लोगों को पत्र लिखकर, उनसे संपर्क इत्यादि करके इस विषय पर चर्चा करने और पहलकदमी करने का आह्वान करेंगे।

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सूफी या भक्ति संगीत दिलों को दिल से जोड़ता है – पूनम विश्वकर्मा

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शुक्रवार की शाम  सुल्तानपुर के लंभुआ में हुई दर्शन यात्रा

संवाददाता
सुल्तानपुर। गीतकारा-गायिका पूनम विश्वकर्मा का मानना है कि दुनिया में संगीत एक मात्र ऐसी विधा है जो इंसान के बीच की सारी दूरियों, सारे मतभेद और सारे गिले-शिकवे को मिटा देता है और संगीत में अगर भक्ति संगीत यानी भजन के रूप में हो तो उसका असर और अधिक होता है। सूफी संगीत या भजन इंसान के मन के अंदर में अहं रूपी मैल को साफ कर देता है। इंसान के हृदय को पवित्र करता है और उसकी तबियत में प्यार, सद्भाव और सहानुभित का बीजरोपण करता है।

पूनम विश्वकर्मा ने कहा कि सूफी या भक्ति संगीत इंसान को यह सीख देता है कि छोटे से जीवन को मतभेद और शत्रुता से नहीं प्यार और मित्रता के साथ गुजारा जाए। यह भजन या सूफी संगीत की ताकत है कि उसे सब लोग मिल बैठ कर सुनते हैं। इसीलिए समाज की एकता और एकजुटता के लिए मैंने भजनों को ही माध्यम बनाया है। यह विचार गीतकारा-गायिका पूनम विश्वकर्मा ने शुकवार की शाम सुल्तानपुर के लंभुआ कस्बे में अपनी दर्शन यात्रा के दौरान व्यक्त किया।

फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय पूनम विश्वकर्मा समाज को एकजुट करने और लोगों में भाई-चारे का संदेश देने के लिए 2021 से हर महीने की अमावस्या को दर्शन यात्रा करती आ रही हैं। शुकवार की शाम सुल्तानपुर के लंभुआ में स्थित श्री शिवदुर्गा विश्वकर्मा मंदिर में आयोजित की गई। जिसमें बहुत बड़ी संख्या में स्थानीय लोग उपस्थित हुए। कार्यक्रम में पूनम विश्वकर्मा के पिता डॉ. रामजीत विश्वकर्मा, रिटायर्ड मेडिकल ऑफीसर, उनकी मां अमृता विश्वकर्मा और बहन इंदू विश्वकर्मा को सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम को सफल बनाने में लंभुआ के रामजी विश्वकर्मा, बृजलाल विश्वकर्मा, बाबूलाल विश्वकर्मा, गंगा सागर विश्वकर्मा, अमृतलाल विश्वकर्मा, लीलावती विश्वकर्मा, अनामिका विश्वकर्मा, अनोखी विश्वकर्मा, जोखन विश्वकर्मा, जीतलाल विश्वकर्मा, हरिप्रसाद विश्वकर्मा, रामलाल विश्वकर्मा, उमाशंकर विश्वकर्मा,  रामानुज विश्वकर्मा, सुभाष विश्वकर्मा शिक्षक, विजय विश्वकर्मा, सुनील विश्वकर्मा, ओमप्रकाश विश्वकर्मा, संतकुमार विश्वकर्मा, अशोक विश्वकर्मा, गंगाराम विश्वकर्मा, राकेश विश्वकर्मा और राजू विश्वकर्मा ने काफी सहयोग किया।

डॉ. मुकेश विश्वकर्मा, भोलानाथ विश्वकर्मा (चौधरी), चंद्रकांत विश्वकर्मा (सभासद – राजा नगर), डॉ. रामशरण विश्वकर्मा और डॉ. पवन विश्वकर्मा समेत बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों ने भक्तिमय संगीत का आनंद लिया।

वह घटना जिसने हरिशंकर तिवारी को अपराध के रास्ते पर ढकेल दिया

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आज़ादी के बाद 1956 में उत्तर प्रदेश के पहले विश्वविद्यालय के रूप में गोरखपुर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। उस समय कांग्रेस के नेता पूरे देश में स्वतंत्रता संग्राम में अपने नेताओं के बलिदान को भुना रहे थे। महात्मा गांधी की हत्या के बाद लगे प्रतिबंध से उबरने के बाद हिंदू महासभा भी पांव पसारने की कोशिश कर रहा था। उसी के तहत गर्मियों के मौसम में शाम को विश्वविद्यालय परिसर में महासभा की पब्लिक मीटिंग चल रही थी। मंच पर कई बड़े नेता मौजूद थे। गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ सिंह का भाषण चल रहा था। गांधी हत्याकांड में गिरफ़्तार हो चुके महंत गोरखपुर विश्वविद्यालय की संचालन समिति के सदस्य भी थे। कहा जाता है कि उन्होंने अपने भाषण में अपने प्रतिद्वंद्वी ब्राम्हण नेता के बारे में कोई अशोभनीय टिप्पणी कर दी।

ब्राम्हण नेता के बारे में महंत दिग्विजयनाथ सिंह की टिप्पणी वहीं सामने बैठे स्नातक में प्रवेश लेने वाले एक छात्र को बड़ी नागवार लगी। अप्रत्याशित रूप से वह छात्र मंच पर चढ़ गया और भाषण दे रहे महंत पर हमला कर दिया। किसी के कुछ समझ में नहीं आया कि क्या हो रहा है। मंच पर भगदड़ मच गई। महंत की सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मी कुछ समझ पाते, तब तक हमलावर नवयुवक ग़ायब हो चुका था। आनन-फ़ानन में चोटिले महंत को वहां से सुरक्षित स्थान पर जाया गया। दस-पंद्रह मिनट में जब मामला शांत हुआ। तब छात्रों ने बताया कि हमलावर का नाम हरिशंकर तिवारी (Harishankar Tiwari) है। वह बीए प्रथम वर्ष का छात्र है।

यह भी पता चला कि हमलावर हरिशंकर तिवारी पास के बड़हलगंज के टाड़ा गांव का निवासी भोलानाथ तिवारी का बेटा है। हरिशंकर ने उसी साल गोरखपुर विश्वविद्यालय में बीए में एडमिशन लिया है। बाद में उन्होंने वहीं से ही एमए किया। वह उच्च शिक्षा लेकर कुछ बनना चाहता थे, लेकिन अपराध की ओर मुड़ गए। उन्हें शायद नहीं पता था कि उन्होंने किस व्यक्ति पर हाथ उठा दिया।

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गोरखनाथ मंदिर के शिल्पी महंत दिग्विजयनाथ सिंह उस समय राष्ट्रीय नेता थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र, धर्म एवं लोक कल्याण के लिए समर्पित कर दिया था। 1920 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के बाद पढ़ाई छोड़ने वाले महंत 1922 के चौरी-चौरा कांड में गिरफ़्तार भी हुए थे। वह इतने ताकतवर थे कि उन पर हमले की कोई सोच भी नहीं सकता था, लेकिन हरिशंकर ने यह दुस्साहस किया। यह ख़बर लखनऊ-दिल्ली तक गई और सभी अख़बारों की सुर्ख़ियां बनी। महंत के साथ हरिशंकर भी अख़बारों की सुर्ख़ियों में आ गए और विश्वविद्यालय के बड़े छात्र नेता बन गए।

यहां यह बताना ज़रूरी है कि गोरखनाथ मठ पर शुरू से ही ठाकुरों का वर्चस्व रहा है। ठाकुर ही मुख्य पुजारी बनते आए हैं। महंत दिग्विजयनाथ सिंह से पहले महंत सिंहासन सिंह और उनके बाद महंत अवैद्यनाथ मुख्य पुजारी बने। महंत अवैद्यनाथ ने अपना उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ को बनाया। उल्लेखनीय बात यह है कि तब राज्य में भले कांग्रेस सरकार थी, लेकिन गोरखपुर में केवल मठ की ही चलती थी। मठ के आगे सूबे के मुख्यमंत्री की नहीं चलती थी। जिले के डीएम और एसपी भी असहाय महसूस करते थे।

गोरखनाथ मठ के बाद धीरे-धीरे गोरखपुर विश्वविद्यालय में भी ठाकुरों का दबदबा हो गया। छात्रसंघ चुनाव में ठाकुर ही जीतते थे। 1960 के दशक में रवींद्र सिंह चर्चित छात्र नेता थे। वह 1967 के छात्रसंघ चुनाव में गोरखपुर विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने तिवारी गुट के छात्रनेता रंग नारायण पांडेय को हराया। रवींद्र सिंह 1973 में लखनऊ विश्वविद्यालय के भी अध्यक्ष चुने गए। बहरहाल, महंत पर हमले के बाद हरिशंकर तिवारी को पुलिस खोजने लगी। हमले को लेकर कोई संगीन मामला तो नहीं बना लेकिन अपराध की दुनिया में उनकी घुसपैठ हो गई।

शुरुआत में हरिशंकर तिवारी गोरखपुर में किराए के कमरे में रहते थे। महंत पर हमला करने के उनके दुस्साहस ने उन्हें ब्राम्हणों में लोकप्रिय बना दिया। उनकी राजनीति विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रही, बल्कि परिसर से बाहर भी उनकी चर्चा होने लगी। वह ठाकुर नेताओं की हिटलिस्ट में थे। इसलिए अपनी सुरक्षा को लेकर हमेशा सतर्क रहा करते थे। वह चलते, उठते-बैठते चौकन्ने रहते थे। कह सकते हैं कि वह क़द में भले छोटे थे लेकिन उनकी निगाहें पैनी थी। किसी को देखकर ही तो अंदर तक थाह ले लेते थे कि कैसा आदमी है। वह जब बाहर निकलते तो बहुत कम लोगों को पता होता था कि कहां जाना है। उनके आसपास केवल विश्वसनीय लोग ही पहुंच पाते थे।

बहरहाल, रवींद्र सिंह के अध्यक्ष चुने जाने के बाद उनके शागिर्द ठाकुर वीरेंद्र प्रताप शाही की भी तूती बोलने लगी। कहा जाता है कि 1970 के दशक में हरिशंकर तिवारी के प्रतिद्वंदी बलवंत सिंह थे। वह मदद के लिए शाही के पास गए और शाही से बलवंत को सहयोग मिलने लगा। हरिशंकर और बलवंत सिंह के बीच अक्सर भिड़ंत होती थी। शाही के बीच में आने से हरिशंकर की दुश्मनी उनके साथ हो गई। धीरे-धीरे यह भिड़ंत ठाकुर बनाम ब्राह्मण की लड़ाई में बदल गई।

हरिशंकर तिवारी को लगा कि किराए के घर में रहने से पहचान नहीं बनेगी। उन्हें ऐसी जगह की तलब थी, जहां उनका अपना राज चले। जो सुरक्षित हो। जानकार कहते हैं कि हरिशंकर तिवारी को शह मिली एक बड़े अधिकारी की, जो गोरखनाथ मठ की तानाशाही से परेशान था। अधिकारी मठ के समानांतर एक शक्ति केंद्र खड़ा करना चाहता था और हरिशंकर तिवारी शक्ति केंद्र बनने की कूबत तो रखते ही थे। उस अधिकारी ने ही तिवारी को रेल के ठेके में हाथ आजमाने का सुझाव दिया और राह भी दिखाई। उसकी शह पर हरिशंकर ने गोरखनाथ मठ के पास धर्मशाला बाज़ार में विशाल भूखंड को घेर कर अहाता बना लिया। बाद में अहाता ‘हाता’ के नाम से मशहूर हो गया।

कालांतर में हाता शक्तिशाली केंद्र बनकर उभरा। हरिशंकर तिवारी ने ख़ौफ़ की ऐसी दुनिया रची कि उनके ‘हाते’ में घुसने का साहस अपराधी और पुलिस वाले नहीं कर पाते थे। धीरे-धीरे वह हरिशंकर तिवारी से पंडित हरिशंकर तिवारी हो गए। वह कोई भी काम खुद नहीं करते थे। हर जगह उनके ही विश्वासपात्र का नाम होता था। उन्होंने यह अघोषित नियम बना लिया कि आम पब्लिक को कभी परेशान नहीं करना है। वह ग़रीबों के मसीहा भी थे। ग़रीब उनके दर से कभी खाली हाथ वापस नहीं गए।

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हरिशंकर तिवारी ने पूर्वांचल में राजनीति की नई परंपरा शुरू की। उनसे पहले अपराधी नेताओं के इशारे पर काम करते थे, लेकिन तिवारी ने सोचा कि राज करना है तो खुद ही राजनीति में क्यों न उतरें। अगर हम जिताने का दम रखते हैं तो ख़ुद क्यों जीत नहीं सकते। लिहाज़ा, 1973 में उन्होंने विधान परिषद चुनाव में क़िस्मत आजमाया, लेकिन हार गए। इस बीच वीरेंद्र प्रताप शाही से दुश्मनी चलती रही। शाही के सिर पर रवींद्र सिंह का वरदहस्त था। इससे शाही कही-कहीं हरिशंकर से बीस पड़ते थे। यह तिवारी को बहुत खलता था। इमरजेंसी के बाद 1978 के चुनाव में रवींद्र सिंह जनता पार्टी के टिकट पर विधायक चुने गए। अपने आका के विधायक बनने से शाही और ताक़तवर हो गए।

हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र प्रताप शाही के बीच दुश्मनी गहराती गई। 1978 में हरिशंकर के शूटर रुदलप्रताप सिंह ने बलवंत सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी। बलवंत के अंतिम संस्कार के बाद शाही के नेतृत्व में हज़ारों समर्थकों ने कैंट पुलिस स्टेशन को घेर लिया। वे हरिशंकर के ख़िलाफ़ नामजद रिपोर्ट दर्ज करने की मांग करने लगे। आख़िरकार तिवारी के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज हुई। बलवंत की हत्या के कुछ दिनों बाद शाही ने तिवारी के क़रीबी मृत्युंजय दुबे की हत्या करवा दी। जवाब में शाही के क़रीबी बचई पांडेय की हत्या हो गई। शाही समर्थक पांडेय की लाश लेकर आ रहे कि रास्ते में हरिशंकर के तीन आदमी दिख गए। शाही के लोगों ने तीनों की हत्या कर डाली। जवाब में तिवारी गुट ने शाही के तीन लोगों की हत्या कर दी।

वीरेद्र शाही के सरपरस्त विधायक रवींद्र सिंह 27 अगस्त 1979 को शान-ए-अवध एक्सप्रेस से लखनऊ जा रहे थे। उन्हें मुख्यमंत्री बनारसी दास के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर वोट डालने थे। गोरखपुर रेलवे स्टेशन पर जैसे ही ट्रेन में सवार हुए शूटरों ने उन पर गोली चला दी। तीन दिन मौत से संघर्ष करने के बाद उनकी मौत हो गई। उनकी हत्या में भी हरिशंकर तिवारी का नाम आया। बदले में शाही के लोगों ने हरिशंकर के शागिर्द रंग नारायण पांडेय की हत्या कर दी। गोरखपुर छात्रसंघ चौराहे पर रवींद्र सिंह और रंग नारायण पांडेय दोनों की प्रतिमा लगी है। तिवारी और शाही गुटों की वर्चस्व की लड़ाई में 50 से अधिक हत्याएं हुईं।

हरिशंकर तिवारी पर हत्या, हत्या का प्रयास, हत्या की धमकी, रंगदारी और मारपीट के मुक़दमे लगातार दर्ज होते रहे। 1980 के दशक तक उन पर 26 आपराधिक मामले दर्ज थे। वह आसपास के ब्राह्मणों को एकजुट कर रहे थे लेकिन बात नहीं बन पा रही थी। वह पैसा-पावर और पॉलिटिक्स का कॉकटेल भी बूझने लगे। वह जानते थे कि शहर में गोरखनाथ मठ का दबदबा अधिकारियों को खलता है। मौक़ा ताड़कर उन्होंने अपनी मां के नाम से गंगोत्री इंटरप्राइजेज कंपनी बना ली। अब रेलवे के टेंडर इसी कंपनी को मिलने लगे। जिस टेंडर को गंगोत्री इंटरप्राइजेज भरता था, बाक़ी ठेकेदार उस ओर देखने की भी हिमाक़त नहीं कर पाते थे।

पंडित हरिशंकर तिवारी ने पंगा उन लोगों से लिया जिनकी तूती बोलती थी। वह जानते थे कि प्रभावशाली लोगों को पटखनी देने से कड़ा संदेश जाता है और छोटे-मोटे लोग ख़ुद शरणागत हो जाते हैं। उनका यह भी दर्शन था कि जो शरण में आ जाए, उसका साथ देना चाहिए, चाहे उसकी कितनी भी ग़लती हो। वह प्रशासन से पंगा नहीं लेते थे। गांव से लेकर स्कूल-कॉलेज तक अपने आदमी तैयार किए थे। ऐसे लोगों की टीम थी जो उनके इशारे पर मरने-मारने पर उतारू हो जाते थे। वह युवाओं के आदर्श थे। उन्होंने ब्राह्मण युवाओं को गोलबंद करने का काम किया। हालात ऐसे बन गए कि गोरखपुर विश्वविद्यालय और आजमगढ़, मऊ, देवरिया और जौनपुर तक के कॉलेजों ठाकुर बनाम ब्राह्मण की राजनीति होने लगी। इससे पूर्वांचल में आए दिन खूनी संघर्ष होने लगा। जैसे-जैसे हरिशंकर बड़े होते गए हाता में आने-जाने वालों का हुजूम बढ़ता गया।

इस बीच विरोधी वीरेंद्र प्रताप शाही 1980 के उपचुनाव में लक्ष्मीपुर से विधायक बन गए। उनका चुनाव निशान शेर था। इसलिए लोग उन्हें ‘शेर-ए-पूर्वांचल’ कहने लगे। अपने विरोधी के विधायक बन जाने के बाद हरिशंकर भी विधायक बनने के सपने देखने लगे। हरिशंकर तिवारी ने 1984 के लोकसभा चुनाव में महाराजगंज से बतौर निर्दलीय उम्मीदवार पर्चा भरा। बाद में वीरेंद्र प्रताप शाही भी अपक्ष प्रत्याशी के रूप मे मैदान में उतरे। जितेंद्र सिंह कांग्रेस प्रत्याशी थे। परचा भरने वाले दिन ही शाम को हरिशंकर तिवारी एनएसए में गिरफ़्तार कर लिए गए। चुनाव में शाही और तिवारी दोनों हार गए। उसी समय गोरखपुर के वीरबहादुर सिंह सूबे के धाकड़ कांग्रेस नेता के रूप में उभरे। जैसे-जैसे वीर बहादुर मज़बूत होते गए हरिशंकर पर शिकंजा कसता गया।

चिल्लूपार से तीन बार चुनाव जीतने वाले भृगुनाथ चतुर्वेदी ने हरिशंकर को कांग्रेस में प्रवेश नहीं करने दिया। लेकिन हरिशंकर जानते थे कि इलाक़ा जीतना है तो भृगुनाथ का आशीर्वाद ज़रूरी है। चिल्लूपार से ही सटा बड़हलगंज क़स्बा है। वहां डॉ. मुरलीधर दुबे प्रैक्टिस करते थे। उन्हें भृगुनाथ का राजनैतिक वारिस माना जाता था। लेकिन उनकी हत्या हो गई। इस हत्या का कारण भी ब्राम्हण और ठाकुर का संघर्ष था।

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इसके बाद भृगुनाथ को एहसास हुआ कि अगर ब्राम्हणों की रक्षा करनी है तो बाहुबल ज़रूरी है। हरिशंकर तिवारी उन्हें बताया कि अपने लोगों के लिए लड़ना हमारा फ़र्ज़ है। महावीर प्रसाद तब गोरखपुर से कांग्रेस के बड़े नेता थे। उन्होंने हाईकमान को बताया कि तिवारी अपराधियों के संरक्षक हैं। उन्हें टिकट देने से पार्टी की छवि खराब होगी। उधर भृगुनाथ हरिशंकर को विधान सभा चुनाव लड़ाने की ठान चुके थे। 1985 के विधानसभा चुनाव की घोषणा हुई तो उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफ़ा दे दिया और चौधरी चरण सिंह के लोकदल से टिकट लिया। हरिशंकर ने जेल से पर्चा भरा। अंततः भृगुनाथ के समर्थन से वह भारी मतों से जीत गए। जेल से विधायक बनने वाले वह पहले माफ़िया थे।

अगले तीन साल हरिशंकर तिवारी के लिए घातक थे। 24 सितंबर 1985 को ठाकुर वीर बहादुर सिंह ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वह जानते थे कि पूर्वांचल ख़ून-ख़राबे के लिए हरिशंकर तिवारी ज़िम्मेदार हैं। उन्होंने राज्य एसेंबली में गैंगेस्टर एक्ट पारित करवाया और गुंडों पर कार्रवाई शुरू कर दी। अब उन के निशाने पर हरिशंकर थे। उनके इशारे में एक बार पुलिस ने हरिशंकर को घेर लिया। यह खबर आग की तरह फैली कि तिवारी का इनकाउंटर होने वाला है। क़रीबी लोग बताते हैं कि उस समय एसपी ब्राह्मण थे। उन्होंने हरिशंकर को किसी तरह पुलिस घेरे से सकुशल बाहर निकाल कर उनके प्राण की रक्षा की।

हरिशंकर तिवारी ख़ुद को बहुत असुरक्षित महसूस करने लगे। उन्हें लगा कि वीर बहादुर उनको मरवा देंगे। उन्होंने ब्राह्मण कार्ड खेला और कांग्रेस के बड़े नेता पंडित कमलापति त्रिपाठी को अपने डिग्री कॉलेज में बुलाया। कार्यक्रम के बाद कमलापति के क़ाफ़िले को छोड़ने के लिए वह दोहरीघाट तक गए। वापस लौटते समय गोरखपुर पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया। पुलिस उन्हें लेकर जहां गई, उस जगह को पांच हज़ार लोगों की भीड़ ने घेर लिया। भीड़ ‘जय-जय शंकर, जय हरिशंकर’ के नारे लगा रही थी। कमलापति बनारस पहुंचे तो उन्हें यह ख़बर मिली। उन्होंने सीएम से बात की। आख़िरकार हरिशंकर को छोड़ दिया गया। इसके बाद वह ब्राह्मणों के निर्विवाद नेता हो गए। उनकी जान तब तक सांसत में रही, जब तक वीर बहादुर सीएम थे। 25 जून 1988 को उनके इस्तीफ़े के साथ उन पर मंडरा रहा मौत का संकट टल गया।

1990 के दशक में गोरखपुर में नए लड़के का उदय हुआ। उसका नाम श्रीप्रकाश शुक्ला था। उसका जन्म चिल्लूपार के मामखोर गांव में अध्यापक रामसमुझ शुक्ला के यहां हुआ। श्रीप्रकाश क़द-काठी से मज़बूत था तो अध्यापक पिता ने पहलवानी करने भेज दिया। उसने अखाड़े से यह सीखा कि अगर भुजाओं में दम है तो बाज़ी पलटी जा सकती है। तब न तो हरिशंकर श्रीप्रकाश को जानते थे और न ही श्रीप्रकाश हरिशंकर को। 1993 में श्रीप्रकाश घर के कमरे में बैठा था कि बाहर उसके बहन के रोने की आवाज सुनाई दी। बहन पिता को बता रही थी कि राकेश तिवारी नाम के गुंडे ने सरेआम सड़क पर उसके साथ बदतमीज़ी की।

राकेश तिवारी दरअसल, वीरेंद्र शाही का ख़ास शूटर था। इलाक़े में उसका ख़ौफ़ था। वह अक्सर क्षेत्र में गुंडई करता था। लेकिन डर के मारे कोई कुछ नहीं बोलता था। श्रीप्रकाश आग-बबूला हो गया। भूल गया कि राकेश किसका गुर्गा है। पहलवान तो वह था ही, राकेश को दौड़ा-दौड़ा कर मारा और कट्टे उसका मर्डर कर दिया। दिन-दहाड़े वीरेंद्र शाही के ख़ास आदमी की हत्या से गोरखपुर में सनसनी फैल गई। दो लोग श्रीप्रकाश को तलाशने लगे। पहली पुलिस थी और दूसरे थे हरिशंकर तिवारी। पुलिस श्रीप्रकाश को गिरफ़्तार करना चाहती थी, जबकि हरिशंकर उसे बचाना चाहते थे।

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हरिशंकर तिवारी ऐसे जुनूनी लड़कों के मसीहा थे। उन्हें लगा श्रीप्रकाश काम का बंदा है। उन्होंने संपर्क किया और उसे बैंकॉक भगा दिया। मामला ठंडा होने के कुछ महीने बाद श्रीप्रकाश लौट आया। वह हरिशंकर से पैलगी करने हाते में जाने लगा। तिवारी की शह पर वह दिन-दहाड़े हत्याएं करने लगा और फिरौती मांगने लगा। वह किसी को कभी भी मार देता था। उस समय होने वाली हत्याओं में श्रीप्रकाश का नाम आ रहा था। 1997 में श्रीप्रकाश ने लखनऊ में वीरेंद्र प्रताप शाही को ही दिन-दहाड़े गोलियों से भून डाला। कहा जाता है कि हरिशंकर के कहने पर शाही की हत्या की थी। हालांकि हरिशंकर ने साफ़ इनकार किया।

श्रीप्रकाश शुक्ला की निरंकुशता देखकर हरिशंकर तिवारी खुद महसूस करने लगे कि बैंकॉक में मौज़मस्ती करने बाद वह बेलगाम हो चुका है। जितनी तेज़ी से श्रीप्रकाश अपराध की सीढ़ियां चढ़ रहा था, किसी के लिए उसे क़ाबू में करना असंभव हो गया। अंततः हरिशंकर से भी उसकी अनबन हो गई। बिहार जाकर उसने कुख्यात माफ़िया सूरजभान से हाथ मिला लिया। कहा जाता है कि सूरजभान के कहने पर जून 1998 में उसने पटना में बिहार के मंत्री बृजबिहारी प्रसाद को गोलियों से भून दिया गया।

श्रीप्रकाश ने घोषणा कर दी कि रेले ठेके उसके सिवा कोई और नहीं लेगा। सबको रंगदारी देने का फ़रमान भी जारी कर दिया। उसने हरिशंकर को भी धमकी दे दी। संदेश पहुंचाया कि चिल्लूपार से वह चुनाव लड़ेगा। बताया जाता है कि श्रीप्रकाश की धमकी के बाद हरिशंकर तनाव में आ गए। एहतियात के तौर पर उन्होंने उसके पिता रामसमुझ शुक्ला को अपने साथ ले लिया। रामसमुझ उनकी गाड़ी में बैठ रहते थे। अगर कहीं गाड़ी से उतरना होता तो पहले रामसमुझ उतरते थे फिर हरिशंकर तिवारी। रामसमुझ ने श्रीप्रकाश को समझाने की कोशिश की कि पंडित जी से दुश्मनी मोल ना ले, लेकिन वह नहीं माना। हरिशंकर के साथ दुश्मनी श्रीप्रकाश को महंगी पड़ी। उन्होंने तो श्रीप्रकाश को गोरखपुर आने और सामने से मुक़ाबला करने की चुनौती दी, लेकिन श्रीप्रकाश कभी गोरखपुर आया ही नहीं। उसकी बहन की शादी भी हरिशंकर ने ही करवाई थी। वो मंडप में कई घंटे बैठे रहे, लेकिन श्रीप्रकाश नहीं आया।

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श्रीप्रकाश शुक्ला के बारे में मीडिया में ख़बर में आई कि उसने मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की हत्या की सुपारी ले ली है। पुलिस को उसका मोबाइल नंबर मिल गया। फोन ट्रैक करने पर पता चला कि ग़ाज़ियाबाद में उसकी प्रेमिका रहती है। कहा जाता है कि पुलिस ने श्रीप्रकाश शुक्ला को गिरफ़्तार कर लिया था। लेकिन तीन दिन बाद 23 सितंबर, 1998 को पुलिस ने प्रेस रिलीज़ जारी किया कि श्रीप्रकाश पुलिस एनकाउंटर में मारा गया। वह एनकाउंटर में मारा गया या पुलिस ने पकड़ कर उसे मारा, यह स्पष्ट नहीं हुआ। यह भी अजब संयोग है कि जिन लोगों ने हरिशंकर से दुश्मनी मोल ली, उसकी हत्या हो गई या निधन हो गया। हरिशंकर की जान लेने की फिराक में जीवन भर रहे वीरेंद्र प्रताप शाही की हत्या हो गई। हरिशंकर को ख़त्म करने की कोशिश में रहे वीर बहादुर का निधन हो गया और उन्हें धमकी देने वाला श्रीप्रकाश मुठभेड़ में मारा गया।

हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र शाही की दुश्मनी में ही बृजेश सिंह और मुख़्तार अंसारी जैसे बड़े अपराधियों का उदय हुआ था। हरिशंकर के दो शार्प शूटर साहेब सिंह और मटनू सिंह थे। मटनू की गाजीपुर जेल के पास हत्या हो गई। इसके बाद उसके भाई साधु सिंह हरिशंकर के लिए काम करने लगा। गाजीपुर का मुख़्तार उसका साथी बन गया। मुख़्तार को अपराध में अच्छा स्कोप दिखा। इसी दौरान ज़मीन विवाद में साधू सिंह ने 1984 में अपराधी बृजेश के पिता की हत्या कर दी। साधू का मित्र होने की वजह से मुख़्तार बृजेश के निशाने पर आ गया। ऐसे में गोरखपुर-मऊ गाजीपुर में गैंगवार की कई वारदातें हुईं जिसमें कई निर्दोष भी मारे गए।

हरिशंकर तिवारी 1985 से 2002 के बीच छह बार विधायक बने। कांग्रेस के टिकट पर तीन बार 1989, 1991 और 93 में चुनाव जीते। 1997 में तिवारी कांग्रेस से और 2002 में लोकतांत्रिक कांग्रेस से चुनाव लड़े और जीत दर्ज की। वह कल्याण सिंह, मायावती, मुलायम सिंह यादव और राजनाथ सिंह सरकार में मंत्री रहे। 2007 में वह अपने ही शिष्य, राष्ट्रीय सहारा के पत्रकार रहे राजेश त्रिपाठी से हार गए। 2012 में भी वह चुनाव नहीं जीत सके। इस तरह उनका राजनीतिक जीवन ख़त्म हो गया। जीवन के अंतिम दौर में वह किसी को पहचान नहीं पाते थे।

हरिशंकर तिवारी को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कभी पसंद नहीं किया। योगी तिवारी के साम्राज्य को ध्वस्त करने का संकल्प लेकर मुख्यमंत्री बने थे। योगी के निर्देश पर हाता में पहली बार पुलिस घुसी। इसीलिए योगी के शासन में हरिशंकर हाशिए पर चले गए थे। सत्ता संभालते ही योगी ने हरिशंकर तिवारी के पर्सनॉलिटी कल्ट को ही ख़त्म कर दिया। यही वजह है कि हरिशंकर तिवारी के निधन पर देश के कई बड़े नेताओं ने संवेदना प्रकट की लेकिन योगी ने न तो कोई ट्वीट किया न ही संवेदना प्रकट की।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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‘बिसात पर जुगनू’ उपन्यास पर बीएचयू में परिचर्चा 17 मई को

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संवाददाता
वाराणसीः काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के हिंदी विभाग का शोध समवाय बृहस्पतिवार 17 मई को लेखक से मुलाक़ात और कृति परिचर्चा के तहत वंदना राग कृत उपन्यास ‘बिसात पर जुगनू’ कार्यक्रम का आयोजन करने जा रहा है। कार्यक्रम की शुरुआत 12 बजे से की जाएगी। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. सदानंद शाही करेंगे और स्वागत वक्तव्य प्रो. नीरज खरे का होगा। कार्यक्रम का संचालन प्रवीण कुमार गौतम करेंगे और धन्यवाद ज्ञापन आकांक्षा मिश्रा करेंगी। कार्यक्रम के संयोजक डॉ. विवेक सिंह और डॉ. प्रियंका सोनकर हैं। इस कार्यक्रम को लेकर छात्र और प्रोफेसर सब उत्साहित हैं।

कार्यक्रम की संयोजक सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रियंका सोनकर कहती हैं कि कोई भी जन आंदोलन अथवा सामाजिक बदलाव की कोई भी लड़ाई स्त्रियों की भागीदारी के बिना आगे नहीं बढ़ सकता है। स्त्रियाँ हर जन आंदोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती रही हैं। लेकिन इतिहास ने आधी आबादी के साथ हमेशा पक्षपात किया और उनकी भूमिका को उनके योगदान के अनुसार सही ढंग से दर्ज करने का काम नहीं किया। स्वतंत्रता आंदोलन का ही उदाहरण लें तो उसमें भी स्त्रियों की भागीदारी पुरुषों से कम नहीं थी, लेकिन यहाँ भी इतिहास ने उनके साथ न्याय नहीं किया। सबाल्टर्न धारा ने हाशिए के लोगों के समाज-विकास में योगदान को दर्ज करने की कोशिश ज़रूर की है, लेकिन यह कोशिश उल्लेखनीय नहीं मानी जाएगी।

लेखिका वंदना राग के उपन्यास ‘बिसात पर जुगनू’ की चर्चा करते हुए डॉ. प्रियंका सोनकर ने कहा कि इस उपन्यास की विषयवस्तु औपनिवेशिककालीन भारत है। जब पूरा देश ब्रिटिश साम्राज्य के ख़िलाफ़ लड़ रहा था, तब देश की आधी आबादी किस तरह से घर-परिवार संभालते हुए उस संघर्ष में अपना योगदान दे रही थी। यह उपन्यास इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि इसमें महिलाओं की भूमिका को बड़े रचनात्मक तरीक़े से उपन्यास में दर्ज किया गया है। उपन्यास में चीन का भी जिक्र आया है और आदिवासियों के प्रतिरोध को भी दर्ज़ किया गया है।

डॉ. प्रियंका सोनकर कहती हैं कि यह उपन्यास कई स्तरों पर एक साथ चलता हुआ पाठकों को बड़े फलक की ओर ले जाता है। उपन्यास में 1857 की क्रांति की भी चर्चा है। वीर कुंवर सिंह से लेकर बहादुरशाह जफर तक का भी जिक्र है। लक्ष्मीबाई और सावित्री बाई फुले के साथ-साथ हजरत महल की भी चर्चा है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के इस उपन्यास के बाकी सभी क़िरदार यूँ तो लेखिका की कल्पना की उपज हैं, लेकिन यह कल्पना भी बहुत सशक्त और अपील करने वाली है। इसके पात्र अपनी बुनावट में इतने मज़बूत कि वे इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का हिस्सा बन जाते हैं। फिरंगियों की व्यापार नीति का दबाव झेल रहे पात्र चाहे चीन के हों या भारत के, सभी उस वक्त की त्रासदी से जूझते दिखते हैं। अपने-अपने देश के लिए उनकी चिंताएँ दिखती हैं।

डॉ. प्रियंका सोनकर ने कहा कि ‘बिसात पर जुगनू’ उपन्यास में कई जुगनू हैं। सबके अपने-अपने संघर्ष और अपनी-अपनी चिंताएं हैं। इस नज़रिए से अगर देखें तो उस दौर का चीन हो अथवा भारत, दोनों ही जगहों के चरित्रों के व्यक्तित्व की बुनावट, उसकी कसावट और समाज का तानाबाना एक-सी नज़र आएगा। उपन्यास में चांदपुर रियासत के बड़े राजा और उनके बेटे सुमेर सिंह की कहानी है। बड़े राजा की चिंता का एक सिरा अंग्रेज़ों से जुड़ा है जो भारत में कारोबार करने आए हैं और रियासतें हड़प रहे हैं। चिंता के दूसरे छोर पर बेटा सुमेर सिंह है जो अपनी कल्पनाओं की दुनिया में मस्त है। उसके बर्ताव में राजाओं वाला कोई लक्षण नहीं दिखता। भोले और मासूम सुमेर सिंह का अपना संघर्ष है जो वह अपने मन के मीतों से बाँटता चलता है।

डॉ. प्रियंका सोनकर ने बताया कि वस्तुतः ‘बिसात पर जुगनू’ में लेखिका ने चीनी जनजीवन का कठिन संघर्ष भी दर्ज किया है। उपन्यास के महिला चरित्रों की चर्चा करते हुए डॉ. प्रियंका ने कहा कि इसमें चीन की ली-ना का भी संघर्ष दिखता है। तो दो चीनी बहनों का भी संघर्ष दिखता है। उपन्यास में खुदीजा बेगम भी संघर्ष करती दिखती हैं। उनका दुस्साहस याद रखने लायक है जो अपनी कला के प्रति इतनी समर्पित हैं कि मुसव्विरखाने में पहचान छुपा कर आती-रहती हैं। उपन्यास में प्रेम की वह महीन धारा भी बहती मिलती है। उन्होंने कहा कि इसी प्रेम का प्रत्यक्षीकरण शंकर लाल और खुदीजा बेगम के बेटे समर्थ लाल हैं। समर्थ लाल के पैदा होने को खुदीजा बेगम के संघर्ष के तौर पर भी रेखांकित किया गया है। बाद के हिस्सों में दो देशों की सीमाओं की बंदिशों को लांघते हुए समर्थ लाल और ली-ना का तालमेल भी देखा जा सकता है। समर्थ लाल चीन से पटना आई ली-ना के शोध-निदेशक भी हैं। ली-ना भारत में अंग्रेज़ों के अत्याचार से लड़ते देखकर सोचती है कि दोनों मुल्कों के दुखों की दास्तान एक-सी है और दोनों ज़मीनों पर संघर्ष में कूद पड़नेवाली स्त्रियों की गुमनामी भी एक सी है। ऐसी कई गुमनाम स्त्रियाँ इस उपन्यास का मेरुदंड है।

‘बिसात पर जुगनू’ उपन्यास में ऐसा बहुत कुछ है, जिसे जानना भविष्य के कार्यभारों को समझने और पूरा करने के लिए बहुत ज़रूरी है। मेहनतकश दलित स्त्री की ज़मीन पर खड़े होकर देश के मेहनतकशों की मुक्ति के बारे में हमें सोचना है और इस दिशा में लेखिका ने उपन्यास के माध्यम से सराहनीय प्रयास किया है। डॉ. प्रियंका सोनकर ने बताया कि गहरे शोध और एतिहासिक अंतर्दृष्टि से भरी इस कथा में इतिहास के कई विलुप्त अध्याय और उनके वाहक चरित्र जीवंत हुए हैं। ‘बिसात पर जुगनू’ कालक्रम से घटना-दर-घटना बयान करनेवाला सीधा-सादा उपन्यास नहीं है। यहाँ आख्यान समय में आगे-पीछे पेंगें मारता है और पाठक से, अक्सर ओझल होते किंवा प्रतीत होते कथा-सूत्र के प्रति अतिरिक्त सजगता की मांग करता है।

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पति-पत्नी के बिखरते रिश्ते को चित्रित करता है ‘पूर्ण पुरुष’

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मधुबाला शुक्ला

विजय पंडित द्वारा लिखित ‘पूर्ण पुरुष’ नाटक का हाल ही में लोकार्पण दिल्ली के पुस्तक मेले में वाणी प्रकाशन द्वारा संपन्न हुआ। सोशल मीडिया पर इस नाटक की बहुत चर्चा हो रही है। विजय मीडियाकर्मी होने के साथ-साथ रचनाकार भी हैं। कई फिल्मों और धारावाहिकों का लेखन कार्य आपने बड़े बैनरों के लिए किया है। नाटकों का निर्देशन व मंचन भी आपके द्वारा समय-समय पर होता रहा है। ‘पूर्ण पुरुष’ (Purna Purush) नाटक का मंचन कई संस्थानों द्वारा अलग-अलग शहरों में निरंतर होता रहा है। इस नाटक के लिए उन्हें दिल्ली सरकार के ‘साहित्य कला परिषद’ द्वारा ‘मोहन राकेश सम्मान’ से सम्मानित भी किया गया है।

रचनाकार ने इस नाटक का मंचन लगातार कई मंचों पर किया है। इस नाटक में संशोधन करके, 20 वर्षों बाद इसे एक क़िताब का स्वरूप दिया है। पाठकों के लिए यह बड़ी ख़ुशी की बात है कि नाटक को यदि वे नहीं देख सकें तो कम से कम यह क़िताब ज़रूर पढ़ सकते हैं। ‘पूर्ण पुरुष’ नाटक पति-पत्नी के रिश्ते पर आधारित है। जहाँ नाटककार पति-पत्नी के बीच टूटते-बिखरते संबंधों के बारे में चित्रित करते हैं, वहीँ वे यह भी संकेत करते हैं कि पति-पत्नी के रिश्तों में बहुत से उतार-चढ़ाव होते हैं। दोनों ही अच्छे-बुरे समय को एक साथ रहते हुए स्वयं ही जीते हैं, तभी तो वह पति-पत्नी संबंध कहलाता है। यह नहीं कि सुख के समय पति-पत्नी साथ हो और कठिन समय में दोनों एक दूसरे का साथ छोड़ दें। तब वह पति-पत्नी का संबंध नहीं रह जाता। तब वह स्त्री और पुरुष का संबंध कहलाता है।

सदियों से हमारे समाज का एक ढाँचा बना है। जब एक स्त्री-पुरुष, पति-पत्नी के संबंध में बँधते हैं तो उन्हें आखिरी साँस तक उस वैवाहिक संबंध को निभाना ही पड़ता है। हमारी भारतीय सामाजिक व्यवस्था ऐसी है कि पति-पत्नी का तलाक़ लेना या विवाह विच्छेद होना सामाजिक दृष्टि से अपराध माना जाता था। समाज की दृष्टि में वह ग़लत होता था। परंतु, एक समय ऐसा आया जब स्त्रियाँ अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुई, समाज में अपना अस्तित्व स्थापित करने के लिए उन्होंने संघर्ष किया और इसका प्रभाव (वैवाहिक संबंधों) पति-पत्नी के रिश्ते पर भी पड़ा, इस जागरूकता (बदलाव) ने पति-पत्नी के संबंधों की धारणा ही बदल दी।

‘पूर्ण पुरुष’ नाटक में, नाटककार ने पति-पत्नी के संबंधों की बात कही है। किस तरह प्रेम विवाह के 15 वर्षों बाद शाश्वती (नाटक की नायिका) अपने पति समग्र (नाटक के नायक) से तलाक़ लेना चाहती है। समग्र एक कलाकार है, वह पेंटिंग बनाता है। इसी कला पर मोहित होकर शाश्वती ने पागलों की तरह चूर होकर उससे प्रेम किया था क्योंकि तब उसे समग्र की आँखों में एक बच्चे सी मासूमियत, पवित्रता दिखाई देती थी। उसे ऐसा लगता था जैसे समग्र कैनवास पर ब्रह्मा की तरह सृष्टि का निर्माण कर रहा हो। वही समग्र आज उसके लिए बोझ हो गया है। समग्र के पास यश, कीर्ति तो है परंतु वह आर्थिक रूप से कमज़ोर है। यही बात नायिका शाश्वती को खाए जा रही है। जो पति अपनी पत्नी की इच्छाओं, अपनी बेटी की इच्छाओं को पूरा नहीं कर पा रहा है, वह उसके साथ नहीं रह सकती। शाश्वती को लगता है कि समग्र एक काल्पनिक दुनिया में जी रहा है। उसे समग्र से तलाक़ चाहिए।

शाश्वती एक महत्वकांक्षी स्त्री है। वह काल्पनिक दुनिया में नहीं जीना चाहती, उसे यथार्थ के धरातल पर जीना है। उसे खुले आसमान में अपने पंख फैलाकर उड़ना है, दूर बहुत दूर तक और वह समग्र के साथ संभव नहीं है। अतिरेक, शाश्वती का पुरुष मित्र है, वही उसके सपनों की ऊंची उड़ान को हक़ीक़त में रूपांतरित कर सकता है। वह अतिरेक के साथ वैवाहिक सूत्र में बँधना चाहती है। शाश्वती के लिए समग्र एक अतीत है और अतिरेक वर्तमान। वह वर्तमान के साथ अपना जीवन जीना चाहती है।

समग्र को दुःख है कि वह अपनी पत्नी की महत्वाकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर पा रहा है, उसे इस बात का भी दुःख है कि वह अपनी बेटी को अच्छे स्कूल में नहीं पढ़ा पा रहा है। समग्र को पूरी दुनिया जानती है, लोग उसे अपना आदर्श मानते हैं। उसकी यश और प्रसिद्धि दुनिया में फैली हुई है, परंतु वह इस बात को भी जानता है कि यश, कीर्ति, आदर्श और मूल्यों से घर-परिवार नहीं चलता। ये सारी चीज़ें उसके लिए बेमानी हैं। शाश्वती और अतिरेक के संबंधों के बारे में वह जानकारी रखता है, फिर भी वह अपने इस रिश्ते को किसी भी हाल में बचाने के लिए प्रयासरत है।

आख़िर में जब समग्र को भारत सरकार द्वारा ‘पद्मश्री’ मिलने की बात शाशा (उन दोनों की बेटी) फोन करके सूचित करती है, तो दोनों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता। दोनों पति-पत्नी टेलीविज़न चालू करके सोफ़े पर आराम से बैठकर समाचार में जारी घोषणा देखते हैं। इस तरह पति-पत्नी के 15 वर्षों का वैवाहिक संबंध एक नई दिशा को प्राप्त होता है। नाटककार ने इस नाटक में पति-पत्नी के संबंधों का चित्रण बख़ूबी किया है। पति-पत्नी का संबंध अन्य सभी संबंधों से श्रेष्ठ है। यही वह रिश्ता है जहाँ दोनों अपनी-अपनी पारिवारिक, सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए एक दूसरे को इतना क़रीब से जानने लगते हैं कि एक दूसरे से बिछड़कर जीने की कल्पना से ही कौंध उठते हैं।

यह नाटक वर्तमान समय में बहुत ही प्रासंगिक है, जहाँ आज के युवा पति-पत्नी रिश्तों में बिल्कुल समझौता करने के लिए तैयार नहीं है। छोटी-छोटी बातों पर बात तलाक तक पहुँच जाती है। ऐसे समय में यह नाटक युवा पति-पत्नी के लिए मील का पत्थर साबित होगी। नाटक पति-पत्नी के संबंधों की समस्याओं को उजागर तो करता ही है, साथ ही समाज में ‘कला’ और ‘कलाकार’ की क्या स्थिति है, उस पर भी तंज कसता है। सामाजिक समस्याओं को चित्रित करते हुए नाटककार ने बहुत ही सरल, सहज शैली में नाटक लिखा है।

(डॉ मधुबाला शुक्ला ने हाल ही में ‘स्वातंत्र्योत्तर हिंदी उपन्यासों में व्यक्त साम्प्रदायिकता’ विषय पर अपनी पीएचडी डिग्री पूरी की। लेखन में सक्रिय हैं और इनके लेख और साक्षात्कार विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में छपते रहते हैं।)

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बेहतर दुनिया के लिए संघर्ष का आह्वान करती हैं डॉ अलका प्रकाश की कविताएं

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कामता प्रसाद

इंतज़ार जीवन की उम्मीद है
उम्मीद में है दुनिया
और जब तक इंतज़ार है
हम नाउम्मीद होने से बचे रह सकते हैं

उपर्युक्त पंक्तियाँ कवयित्री डॉ. अलका प्रकाश के काव्य संग्रह देह और प्रज्ञा के बीच में शामिल इंतज़ार नहीं होता महज़ एक शब्द नामक कविता से ली गई हैं। कवयित्री के मनोजगत में बेहतर दुनिया के लिए संघर्ष का आह्वान तो है ही, साथ ही वह सुबह कभी तो आएगी, इसका इंतज़ार भी है। बसंत में फूल खिलेंगे ही, दुनिया सुंदर बनेगी ही, मज़दूर वर्ग लड़ेगा और जीतेगा ही, यह तो हमारी चाहत है अनिवार्य भविष्य तो नहीं। लेकिन इस कविता में कहा गया है कि हो सकने का होने की तरह इंतज़ार जीवन की उम्मीद है।

औरत का मर्सिया इस संकलन की पहली कविता है। प्राचीन भारत की कथाओं के जरिए स्त्री-पराधीनता का चित्र प्रस्तुत करते हुए समकालीन विमर्श भी प्रस्तुत किया गया है। मनोविज्ञान के हिसाब से सामूहिक अवचेतन को समझने की बात कही गई है और अंत में संघर्ष का आह्वान भी है और अपनी निष्क्रियता को लेकर कुढ़न भी।

सिर्फ़ सवाल नहीं में कवियत्री का कहना है कि नहीं रहीं स्थितियाँ हमारे अनुकूल, होना होगा हमें ख़ुद प्रतिकूल। सिर्फ़ सवाल नहीं, चाहिए कुछ जवाब भी। यह कविता स्त्रियों को बाग़ी बनने के लिए कहती है और ज़ाहिर है कि वैचारिकी के बिना बग़ावत अंधी खाई तक ले जाती है तो यहाँ पर परोक्ष रूप से सुंसगत होने का आह्वान भी है।

अविवाहिता अपने देश-काल में घर-गृहस्थी के सुख, मातृत्व की अहमियत की पृष्ठभूमि में स्त्री के अकेलेपन को स्वर देने की कोशिश की गई है। समाजवाद में क्या होगा, इसके इंतज़ार में पूरा जीवन तो नहीं गुजारा सकता और अगर गुजारा जाएगा तो वह तो दयनीय होगा ही।

कस्बाई लड़की में कहा गया हैः दूसरों के दिमाग के घुन निकालते-निकालते, फँसती गई ख़ुद मकड़जाल में, बाजार और समाज के। स्त्री को स्त्री की नज़र से देखने की कोशिश की है। मर्दवादी सामाजिक संरचना और मानसिक बनावट-बुनावट को लेकर आक्रोश भी है और निरुपायता भी।

देह और प्रज्ञा के बीच जैसे माओत्से तुंग ने चीन के प्राचीन वांग्मय का गहन अध्ययन कर रखा था, वैसे ही इस कविता में प्राचीन भारतीय मिथकों का ख़ूब प्रयोग हुआ है। यहाँ द्वंद्वात्मकता का अभाव स्पष्ट रूप से झलकता है। सोच में इकहरापन-यांत्रिकता हावी है। आत्मिक-सांस्कृतिक रिक्तता पर बिसूरते हुए भौतिकता को महत्वहीन बताने तक जाने की प्रवृत्ति नज़र आती है। हालांकि इसी कविता के नाम पर संग्रह का नाम रखा गया है, लेकिन यह कवयित्री की सबसे कमज़ोर रचना है।

उखड़ना तय है हालांकि पुरुष के पज़ेस्सिवनेस से जुड़ी कुरूपता पर अलग से जोर देकर रोशनी डाली गई है, लेकिन एसिड-अटैक अपवाद है नियम नहीं। वर्ग-समाज में प्रेम भी दुर्लभ चीज़ है और जहाँ दुर्लभता होती है, उस पर क़ब्ज़ा बनाए रखने का आग्रह भी होता है। पज़ेस्सिवनेस से जुड़ी तमाम कुरूपताएं स्त्रियों में भी उतनी ही पाई जाती हैं और निश्चित रूप से उसके भौतिक आधार भी होंगे ही। मुख्य बात यह है कि पूँजीवादी समाज में चरम व्यक्तिवाद उन लोगों में भी पाया जाता है, जिन्हें सोचने-समझने वाला मनुष्य माना जाता है। इस कविता में पुरुष-द्वेष साफ़ तौर पर नज़र आता है।

पितृसत्ता की संवाहिकाएं स्थितियों के दार्शनिकीकरण की निर्वैयक्तिक अभिव्यक्ति है। कवियत्री का अपना सच तो इससे कहीं नत्थी है नहीं। स्त्रियाँ भी अपने सामाजिक परिवेश की उपज हैं, उनके अंदर भी पितृसत्ता है और इससे उन्हें मुक्त कराने के लिए सामाजिक आंदोलन को वेगवाही बनाना होगा। एकांगी तौर पर उन्हें कुसूरवार ठहराना सपाटबयानी के सिवाय कुछ भी नहीं। इस कविता को पढ़कर बिल्कुल भी मौज़ नहीं आई, संश्लिष्टता सिरे से ग़ायब है, काव्य-तत्व कहीं नज़र ही नहीं आया।

चुना मैंने प्रेम शब्दों की, भाषा की अपनी स्वतंत्र सत्ता होती है, लेकिन यह कविता एकदम से आत्मगत है और इसे वही समझ सकता है, जिसके पास अपने भी कुछ अनुभव हों। तो पाठक स्वयं इस कविता को पढ़ें और अर्थ निकालें, रिव्यूअर कोई मदद नहीं कर सकता। प्रेम होते हुए इसे भी पाठकों को ख़ुद से समझना है। रिव्यूअर के पास इनपुट नहीं कि राह दिखाए।

जीवन-समय यह भी प्रेम कविता है। अमर-प्रेम जैसी कोई चीज़ नहीं होती। समय के साथ सब कुछ अपने से विपरीत में बदल जाता है। यही प्रकृति का नियम है। हाँ, स्मृतियाँ सुमधुर हो सकती हैं और संभवतः उन्हीं स्मृतियों को कविता में लिपिबद्ध किया गया है।

प्रेम है वह दान अच्छी प्रेम कविता है। अतीत डरावना कुआँ है, वर्तमान उचाट दिनों की फ़ेहरिश्त भर, यदि नहीं याद में कोई। यादों में अपने ख़ुद के डीएनए के विस्तार नाती-पोते भी हो सकते हैं। लेकिन अगर यौवन है – उमंग है तो यौन-प्रेम को भी सहज-स्वाभाविक मानकर चला जाना चाहिए। मित्रता में विस्तार है, कॉमरेडशिप में साझेपने का आनंद है लेकिन गहनता तो ऐंद्रिकता में ही है और कोई भी एक दूसरे का विकल्प नहीं, सभी पूरक हैं और उन्हें इसी रूप में लिया जाना चाहिए। लेकिन, ऐंद्रिकता का बखान सामाजिक सरोकारों के साथ किया गया होता तो उसकी अर्थवत्ता कहीं अधिक होती। प्रेम-कविताएं इन अर्थों में वर्गीय-विमर्श से रहित हैं और कवियत्री को अपनी रचनाओं में इतिहास-निर्माता शक्तियों को लेकर अधिक सरोकारी होना चाहिए था।

जन्म लेते फिर एक बार प्रेम मारता अहं को, मुक्त होते हम अपनी क्षुद्रताओं से। यहाँ भी एक को दो में बाँटकर देखने की ज़रूरत थी और सामान्यीकरण से बचा जाना चाहिए था। ऐसा मालूम पड़ता है कि कवि-कर्म करते समय अपने विशिष्ट अनुभव ही काम आते हैं और उन्हीं की ज़मीन पर खड़े होकर सामान्यीकरण किया जाता है और पाठक अपने जीवनानुभवों की ज़मीन पर खड़ा होकर अपना अर्थ निकालने के लिए स्वतंत्र होता है। फिर ज़रूरी नहीं कि उसके अर्थ में और कवि के मूल अर्थ में कोई साम्यता हो ही।

हमख़्याल इस काव्य-संग्रह की ख़ूबसूरती यह है कि निज की अनुभूति वाली कविताएं जहाँ संख्या में अधिक है, वहीं राजनीतिक ताप-तेवर वाली कविता को भी जगह प्रदान की गई है और हमख़्याल कविता इसकी बानगी प्रस्तुत करती है। सामाजिक संगठन ही लिंग विभेद पैदा करते हैं, ‘व्यक्तिगत ही राजनीतिक’ कह बहनों ने घरेलू श्रम और पुनरुत्पादन पर विमर्श किया। व्यापक पढ़ाई-लिखाई और गहरी समझ इस कविता में प्रतिबिंबित हुई है। पाठक जब कविता को पूरा पढ़ेंगे तो उन्हें मेरी बात समझ में आएगी।

औरत हूँ न जो बात हो सकता है कि मैं कहता ख़ुद अलका प्रकाश कह गई हैं। अब व्यंजना का नहीं प्रश्न, बात सीधे-सीधे कहती हूँ, सपाटबयानी मेरी आदत, कला तो उलझाती है, उसका अंत करती हूँ।
एक लड़की की उधेड़बुन बाज़ार की चकाचौंध के विरुद्ध संघर्ष करती लड़की कहती हैः मेरी देह में एक आत्मा भी है, इसका मैं क्या करूं?

यहाँ संदर्भ देह के दम पर तरक्की की सीढ़ियाँ चढ़ते जाने का है।

एक बहाना जरा जीने का ढूँढ़ो उदास रहने के तो अनगिनत कारण बताए जा सकते हैं, लेकिन जीवन को उसके सभी रंगों में जीने के बहाने भी तो मनुष्य को ही तलाशने होते हैं और इस कविता में उसी की वकालत की गई है। और यह हिमायत-वकालत जेंडर निरपेक्ष है माने स्त्री-पुरुष सभी के लिए है।

संकलन की आख़िरी कविता है कोरोना वार्ड उस दौर में सबसे बड़ा आश्चर्य था कि अरे हम तो ज़िंदा बच गए।

डॉ. अलका प्रकाश की कविताओं को पढ़ने के लिए किसी ख़ास ट्रेनिंग की ज़रूरत नहीं। सामान्य भाषाई समझ हो और बुनियादी मानवीय सरोकार और संवेदनशीलता तो आप बड़े आराम से उन्हें पढ़ सकते हैं। जिन कविताओं में सब्जेक्टिविटी है, वे सभी को भाएंगी ही बशर्ते कि आपके अंदर मानवीय सारतत्व हो।

पूरे कविता संग्रह की बुनियाद स्वयं कवयित्री के ही शब्दों मेंः जीवन एक सा नहीं रहता, स्थितियाँ बदलती हैं तो जीवन भी उसके अनुसार ढलने लगता है। परिवर्तन न हो और उम्मीदें करवट न लें तो मनुष्य के लिए जीना दूभर हो जाता है।

रुद्रातित्य, प्रकाशन प्रयागराज ने इसे छापा है।

(कामता प्रसाद वरिष्ठ पत्रकार हैं और देश के लगभग सभी हिंदी अख़बारों में काम करने के बाद इन दिनों वाराणसी में रह रहे हैं।)

 

 

बीएचयू में हिंदी विभाग का ‘लेखक के घर चलो’ कार्यक्रम का अभिनव प्रयोग

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साहित्यकार जयशंकर प्रसाद के घर पहुंचे और आयोजित की साहित्यिक गोष्ठी

रोशनी धीरा
वाराणसी, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से ‘लेखक के घर चलो’ कार्यक्रम का अभिनव प्रयोग शुरू किया गया है और इस कार्यक्रम के तहत शनिवार को साहित्यकारों, प्रोफेसरों और शोध छात्र-छात्राओं का लगभग दो सौ सदस्यीय दल हिंदी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक कवि, नाटककार और उपन्यासकार जयशंकर प्रसाद के घर का दौरा किया। वहां पर पिछली सदी के कालजयी रचनाकार जयशंकर प्रसाद की पारिवारिक सदस्य कविता कुमारी और प्रपौत्र विजयशंकर प्रसाद ने साहित्यकारों एवं साहित्य-अनुरागियों का स्वागत किया।

जयशंकर प्रसाद के घर के सामने ही प्रांगण में एक गोष्ठी और संगीत संध्या का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में अपने स्वागत संबोधन में जयशंकर प्रसाद की पारिवारिक सदस्य कविता कुमारी ने कहा कि जयशंकर प्रसाद के दर्शन को समझे बिना आप न तो उनको समझ सकते हैं और न ही उनके साहित्य अथवा साहित्य रचने के उनके मंतव्य को समझ सकते हैं। उन्होंने कहा कि हमें अपने साहित्यकारों का सम्मान करने की परंपरा शुरू करनी चाहिए और इसी के तहत जयशंकर प्रसाद का एक स्मारक तो बनाना ही चाहिए।

‘लेखक के घर चलो’ कार्यक्रम की सूत्रधार प्रो. आभा गुप्ता-ठाकुर थीं, उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि जयशंकर प्रसाद हिंदी के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक रहे हैं और उनका साहित्य निश्चित तौर पर उदात्त भावभूमि पर ले जाने वाला मानवीय साहित्य है। उन्होंने कहा कि आधुनिक हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रसाद के कृतित्व का गौरव अक्षुण्ण है। जयशंकर प्रसाद वस्तुतः युगप्रवर्तक लेखक थे। उन्होंने हिंदी साहित्य को एक ही साथ कविता, नाटक, कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में हिंदी को गौरवान्वित करने वाली कालजयी रचनाएं दीं।

साहित्य-मनीषी और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. सदानंद शाही ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। लेकिन अगर हम पिछले तीन दशक के कालखंड पर नज़र दौड़ाएं तो साहित्य और समाज का रिश्ता विछिन्न हुआ दिखता है। आज साहित्य और समाज के रिश्ते की डोर को और मज़बूत करने की ज़रूरत है, क्योंकि लेखक अपने समाज का आकाशदीप होता है।

बीएचयू के हिंदी विभागाध्यक्ष ने लोगों को आगाह करते हुए कहा कि ‘लेखक के घर चलो’ कार्यक्रम सकारात्मक माहौल बनाने के लिए शुरू किया गया है। दरअसल, यह साहित्य और समाज के रिश्ते को मज़बूत करने की एक सकारात्मक पहल है। इसलिए किसी को ‘लेखक के घर चलो’ कार्यक्रम को केवल पर्यटन समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वस्तुतः ‘लेखक के घर चलो’ कार्यक्रम अंतःकरण के आयाम का विस्तार है।

प्रो. सदानंद साही ने इस मौक़े पर घोषणा की कि जयशंकर प्रसाद के साहित्य के प्रति लोगों का रूझान बढ़ाने के लिए ‘लेखक के घर चलो’ कार्यक्रम की अगली कड़ी के तहत काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में 23, 24 और 25 जून को जयशंकर प्रसाद की कालजयी रचना ‘कामायनी’ पर एक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जाएगी। जिसमें देश के कई नामचीन साहित्यकार ‘कामायनी’ के आधुनिक संदर्भ पर अपने विचार रखेंगे। उन्होंने कहा कि सवाल मानवता के विजयी होने का है, किसी एक व्यक्ति के विजयी होने का नहीं है। आज की शाम मानवता के लिए साहित्य की ओर लौटने का आरंभ है।

हिंदी विभाग के प्रोफेसर रहे साहित्यकार अवधेश प्रधान ने जयशंकर प्रसाद की आत्मकथात्मक कविता “मधुप गुन गुनाकर कह जाता कौन कहानी यह अपनी” का बड़ी ख़ूबसूरती से पाठ किया। जिसकी गोष्ठी में उपस्थित लोगों ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की। संयोग से जयशंकर प्रसाद की यह मशहूर कविता साहित्य की शीर्ष पत्रिका ‘हंस’ के आत्मकथात्मक विशेषांक में प्रकाशित हुई थी। प्रो. अवधेश प्रधान ने बताया कि जयशंकर प्रसाद और कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद बहुत अच्छे दोस्त थे। दोनों कालजयी साहित्यकार प्रतिदिन बनारस के बेनिया बाग मैदान में टहलते हुए साहित्य पर चर्चा किया करते थे। उन्होंने कहा कि किसी समाज का सौंदर्यबोध कतई ख़त्म नहीं होना चाहिए, क्योंकि किसी समाज के सौंदर्यबोध का ख़त्म हो जाना उस समाज के पतन की पराकाष्ठा को व्यक्त करता है।

इस अवसर पर ‘लेखक के घर चलो’ कार्यक्रम के कला दीर्घा के तहत संगीत संध्या का भी आयोजन किया गया जिसमें सुशांत कुमार शर्मा, रूक्मणी राय, शीश कुमारी, विमलेश सरोज और पवन सोनकर ने “अरुण यह मधुमय देश हमारा” के साथ जयशंकर प्रसाद के कई अन्य गीतों को प्रस्तुत किया। यह प्रस्तुतिकरण इतनी कर्णप्रिय और असरदार थी, दर्शक दीर्घा में बैठे लोगों ने खूब तालियां बजाई। यह ख़ूबसूरत गीत प्रसाद के नाटक चंद्रगुप्त में वर्णित है। इस तरह यह कार्यक्रम ‘लेखक के घर चलो’ कार्यक्रम का सांस्कृतिक पक्ष रहा।

‘लेखक के घर चलो’ कार्यक्रम के समापन पर बीएचयू के हिंदी विभाग की सहायक आचार्या डॉ. प्रियंका सोनकर और डॉ. विवेक सिंह ने सभी अतिथियों का आभार व्यक्त किया और कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सभी को धन्यवाद ज्ञापित किया। ‘लेखक के घर चलो’ कार्यक्रम में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के लगभग डेढ़ सौ छात्र-छात्रा मौजूद थे। बतौर शिक्षक प्रो चंद्रकला त्रिपाठी, प्रो. वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी, प्रो. आनंदवर्धन, प्रो. श्रद्धा सिंह, प्रो. प्रभाकर सिंह, प्रो. अशीष त्रिपाठी, डॉ. रामाज्ञा राय, डॉ. किंग्सन सिंह पटेल, डॉ. रविशंकर सोनकर, डॉ.अजीत कुमार पुरी, डॉ.अशोक कुमार ज्योति, डॉ. प्रभात मिश्र, डॉ. प्रीति त्रिपाठी, डॉ. विंध्याचल यादव, डॉ. हरीश यादव, डॉ. सुभांगी श्रीवास्तव, डॉ. किरन आदि की उपस्थित ने हौसला बढ़ाने का काम किया।

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देश से विदेशों तक छाया “क्वीन ऑफ कुमाऊँ” का जादू

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देश की आर्थिक राजधानी मुंबई के आला दर्जे के कार्यक्रमों में छाई रहने वालीं, कवयित्री, गायिका, संगीतज्ञ और लेखिका डॉ. मेघा भारती मेघल (Dr Megha Bharati Meghil) को “क्वीन ऑफ कुमाऊँ” भी कहा जाता है। डॉ. मेघल संगीत और साहित्य समेत अनगिनत क्षेत्रों में विश्व पटल पर अपना परचम लहरा चुकी हैं। कई वैश्विक उपलब्धियाँ हासिल कर चुकी डॉ. मेघल को अंतर्राष्ट्रीय सेलिब्रिटी का दर्जा हासिल है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय शोधपत्रों में उनके उद्धरण दिए जाते हैं। उनके कृतित्व एवं व्यक्तिव पर निरंतर शोध कार्य हो रहे हैं। किशोरावस्था से ही सृजन शुरू करने वाली डॉ. मेघल की ख़ासियत है कि जिस भी क्षेत्र में उन्होंने कार्य किया उसमें श्रेष्ठ शिखर तक पहुँच, अपनी अमिट छाप छोड़ी। वे ‘प्रथम अन्वेषक’ भी कही जाती हैं। रचनात्मक योगदान और हमेशा कुछ नया करने की प्रवृत्ति के चलते डॉ. मेघल अक्सर सुर्ख़ियों में रहती हैं। उनका स्टाइल स्टेटमेंट और बहुमुखी प्रतिभा ने उन्हें यह लोकप्रिय मक़ाम दिलवाया है।

पिछले वर्ष सैन फ्रांसिस्को से डॉ. मेघल को इंटरनैशनल अवॉर्ड फॉर आउटस्टैंडिंग वर्क जैसा प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला जिससे उनकी लोकप्रियता में चार चांद लग गए। उन्हें पिछले साल नाइजीरिया के डिफेंस मिनिस्टर, नाईजीरिया की प्रिंसेस के साथ पुरस्कृत किया गया। इस समारोह में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उल्लेखनीय योगदान के लिए यूक्रेन, जॉर्जिया, बेलारूस, फ़्रांस, जर्मनी, स्पेन एवं इटली समेत कई देशों से कुल 18 कलाकारों, लेखकों, राजनीतिज्ञों और समाजसेवियों को भी पुरस्कार से नवाज़ा गया था। डॉ. मेघल ने यह सम्मान जीतकर देश का गौरव बढ़ाया। हाल ही में उन्हें यूक्रेन अकादमी से ऑनरेरी सम्मान अवॉर्ड भी प्राप्त हुआ है। महाराष्ट्र सरकार भी उनके कार्यों के लिए उन्हें सम्मानित कर चुकी है। उन्हें “महादेवी वर्मा सम्मान”, “हिंदी काव्य रत्न”, “लिटरेरी एक्सिलेंस अवॉर्ड” और “ग़ज़ल शहज़ादी” जैसे ख़िताब भी मिल चुके हैं। उत्तराखंडी संगीत और संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए भी उन्हें कई सम्मान प्राप्त हुए हैं।

अपने असाधारण हुनर के चलते वह बॉलीवुड में भी अपनी खास जगह बना चुकी हैं। डॉ. मेघल कई टीवी शोज़ में भी नज़र आती हैं। वह उत्तराखंड की पहली और एकमात्र महिला गायिका, गीतकार और संगीतकार हैं। छात्र जीवन में ही मेघल ने एक फ़िल्म में गीत लिखे एवं कंपोज किए और उन गीतों को साधना सरगम ने आवाज़ दी। इसके लिए मेघल को ‘सर्वश्रेष्ठ गीतकार’ का भी सम्मान मिला। इस फ़िल्म में उनका नृत्य भी सराहा गया। उसके बाद तो उन्होंने अनगिनत फिल्म एवं म्यूजिक एलबम्स किये। वह उत्तराखंड की पहली गायिका हैं जिनके सोलो एलबम्स सर्वप्रथम मार्केट में आए। पहाड़ी संगीत को नया आयाम देते हुए इन्होंने पहाड़ी पॉप म्यूजिक को जन्म दिया। एक नया प्रयोग किया जो बहुत सफल रहा और अब कई कलाकार इनको फ़ॉलो करते नज़र आ रहे हैं। हर क्षेत्र में कई ऐतिहासिक उपलब्धियां डॉ. मेघल ने हासिल की हैं।

उनकी हिंदी, अंग्रेज़ी एवं कुमाऊँनी भाषाओं में लिखी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती रहती हैं। अंग्रेज़ी साहित्य में पीएचडी करने के बाद डॉ. मेघल बतौर प्रोफेसर विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं। विभिन्न भाषाओं में उनके कविता संकलन एवं नारीवाद पर पुस्तकें भी प्रकाशित हुई हैं, जिन्हें अमेरिका से फाइव स्टार की रेटिंग्स प्राप्त हुई हैं। उनकी कृतियों का विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में भी वह कई हिंदी और अंग्रेज़ी पत्र-पत्रिकाओं को अपनी सेवाएं दे रही हैं। मेघल को “साहित्य प्रतिभा सम्मान” का ख़िताब भी हासिल है।

हिंदी, अंग्रेज़ी और कुमाऊँनी भाषा में सृजन करने वाली समर्पित समाज सेविका डॉ. मेघल ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को अपने जीवन का मूल-मंत्र मानती हैं। समाज के उत्थान के लिए वह निरंतर रचनात्मक कार्य करती रहती हैं। वह निर्धन बच्चों एवं युवाओं को विशेष रूप से बालिकाओं को प्रशिक्षण देतीं हैं और प्रतिभा प्रदर्शन के लिए मंच भी प्रदान करती है। अपने इस अनोखे कार्य से अपने प्रशंसकों और फैंस के हृदय को छू लेती हैं। इन्हें “यूथ आइकॉन” का ख़िताब भी हासिल है। नैनीताल में जन्मी और पली बढ़ी डॉ. मेघल के प्रशंसकों को उनके आने वाले गीतों और पुस्तकों की प्रतीक्षा रहती है। अपने कार्यों से निरंतर देश का नाम विश्वपटल पर रौशन करने वाली डॉ. मेघल बधाई की पात्र हैं।

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