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शाम-ए-मुंबई भी कम खूबसूरत नहीं

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यूं तो दुनिया भर में सुबह-ए-बनारस, शाम-ए-अवध और शब-ए-मुंबई की चर्चा ख़ूब होती है। लेकिन शाम-ए-मुंबई भी कम खूबसूरत नहीं होती। ख़ासकर अरब सागर में सूर्यास्त का ख़ूबसूरत नज़ारा। अगर आप भी शाम-ए-मुंबई के खूबसूरत नजारे का दीदर करना चाहते हैं तो सूर्यास्त के समय मरीन ड्राइव पहुंच जाए। रात ढलते ही मरीन ड्राइव के केला या ‘C’ आकार की घुमावदार सड़क पर लगी स्ट्रीट-लाइट जगमाती दिखने लगती है। यह नज़ारा हूबहू मोती की माला जैसा दिखता है। इसीलिए मरीन ड्राइव को ‘क्वीन्स नैकलेस’ कह जाता है। सड़क के किनारे कई नामचीन होटल्स और रेस्तरां इसके आकर्षण को बढ़ा देते हैं।

नववर्ष का स्वागत करना यहां का सबसे अधिक आकर्षक घटना होती है। नववर्ष के स्वागत के लिए हर साल 31 दिसंबर की शाम लोग मरीन ड्राइव पहुंच जाते हैं। अरब सागर तट पर एनसीपीए से लेकर गिरगांव चौपाटी तक स्ट्रीट-लाइट्स को सजा दिया जाता है। अरब सागर तट की छह लेन की ‘C’ आकार वाली कंक्रीट सड़क 3.6 किलोमीटर लंबी है। सड़क और सैरगाह का निर्माण पल्लोनजी मिस्त्री ने किया था। छह लेन की कंक्रीट की सड़क है जो एक प्राकृतिक खाड़ी के तट पर बनी है।

यह नरीमन पॉइंट को बाबुलनाथ और मालाबार हिल से जोड़ती है। उत्तरी छोर पर धनाढ्य लोगों की बस्ती मलाबार हिल है, जहां राजभवन भी है। दोनों ओर कभी ताड़ व नारियल के पेड़ होते थे। इनकी संख्या धीरे-धीरे कम होती गई। मरीन ड्राइव का चौपाटी भेलपुरी के लिए प्रसिद्ध है। सुरो की मलिका सुरैया यहीं के कृष्णा महल में अपने अंतिम समय तक रहीं। नरगिस और राजकपूर जैसे स्टार शुरुआती दिनों में यही रहते थे। यहां साल भर कोई न कोई आयोजन होता रहता है जिनमें बॉम्बे मैराथन, वायुसेना का एयरशो, फ्रेंच फेस्टिवल, इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और कई अन्य शामिल हैं।

मरीन ड्राइव 1940 में

अगर मरीन ड्राइव के इतिहास पर गौर करें तो जहां आजकल जहां चर्चगेट रेलवे स्टेशन है। वह इलाका 15वीं सदी तक लिटिल कोलाबा या ओल्ड वूमन आईलैंड हुआ करता था। सवा दो सौ साल पहले तक यह खालिस समुद्र था। पानी ही पानी था। पहले इसे क्षेत्र को स्थानीय लोग सोनापुर कहते थे। आजकल यह मरीन ड्राइव कहा जाता है। 1687 में ईस्ट इंडिया कंपनी मुख्यालय को सूरत से बॉम्बे करने के बाद बॉम्बे के सभी सातों द्वीपों – कोलाबा, लिटिल कोलाबा (ओल्ड वूमन आइलैंड), माहिम, मजगांव, परेल और वरली को जोड़ने का मिशन शुरू हुआ, क्योंकि पूरे इलाके में बीहड़ ही बीहड़ था।

बॉम्बे को विश्वस्तरीय कॉमर्शियल सिटी बनाने का काम सर बार्टले फ्रीर के बॉम्बे का गवर्नर बनने के बाद शुरू हुआ। समुद्र पाटने वाली परियोजना को हॉर्नबाय वेल्लार्ड परियोजना कहा गया। जो एक सदी से ज़्यादा समय तक चलती रही। मकसद यह था कि इस भूभाग को किले के दायरे से निकाल कर आधुनिक शहर में परिवर्तित करना।

वूमन आईलैंड पर समुद्र रिक्लेम करने के लिए बैकबे रिक्लेमशन प्रोजेक्ट 1915 में शुरू हुआ। पश्चिम रेलवे की लोकल गाड़ी शुरू होने के समय मरीन ड्राइव अस्तित्व में नहीं थी। चर्चगेट, मरीन ड्राइव और चर्नीरोड एकदम सी फेस पर थे। इतने करीब कि लहरें प्लेटफॉर्म तक आती थीं। तब मरीन ड्राइव रास्ते को कैनेडी सी-फेस कहते थे। इसकी आधारशिला 18 दिसंबर 1915 को रखी गई। पांच साल में गिरगांव से चर्चगेट तक समुद्र पाट दिया गया। 1930 तक एनसीपीए तक रिक्लेम कर दिया गया।

1928 में चर्चगेट स्टेशन शुरू होने पर पश्चिम की ओर का भूभाग इमारत निर्माण के लिए दे दिया गया। गिरगांव तक धनवान पारसियों और दूसरे कारोबारियों ने इमारतों को विक्टोरियन गोथिक और आर्ट डेको शैलियों में बनवाया। मियामी के बाद आर्ट डेको शैली के भवन मुंबई में ही हैं। यह शैली 1920 और 1930 के दशक में बहुत लोकप्रिय थी। मरीन ड्राइव पर सबसे शुरुआती आर्ट डेको इमारतों में कपूर महल, ज़ेवर महल और केवल महल शामिल थे, जिन्हें 1937 और 1939 के बीच 10 लाख रुपए की कुल लागत से बनाया गया था।

एस्प्लेनेड के किनारे रियल एस्टेट की कीमतें बहुत ज़्यादा हैं। ड्राइव के आस-पास कई होटल हैं। मरीन ड्राइव नरीमन पॉइंट पर स्थित केंद्रीय व्यावसायिक जिले और शहर के बाकी हिस्सों के बीच पसंदीदा कनेक्टिंग रोड है।

मरीन ड्राइव क्षेत्र में समुद्र पाटने के लिए बैकबे रिक्लेमशन प्रोजेक्ट 1915 में शुरू हुआ। पहले चर्चगेट, मरीन ड्राइव और चर्नीरोड सी फेस पर थे। इतने कि समुद्री लहरें प्लेटफॉर्म तक आती थीं। इस रास्ते को केनेडी सी-फेस कहते थे। इसकी आधारशिला 18 दिसंबर 1015 को रखी गई। गिरगांव से चर्चगेट तक समुद्र 1920 तक पाट दिया गया। अगले 10 साल में एनसीपीए तक रिक्लेम कर दिया गया।

अरब सागर के हिलोरे मारती लहरें हैं तो दूसरी ओर आर्ट डेको शैली की इमारतें। मरीन ड्राइव की सड़क का निर्माण उद्योगपति भागोजीशेठ कीर और पलोनजी मिस्त्री ने करवाया था। आरसीसी से बनने वाला मुंबई का यह पहला मार्ग था। इसका आधिकारिक नाम सुभाषचंद्र बोस रोड है, लेकिन शायद ही इसे लोग इस नाम से पुकारते हैं। शाम के समय हमेशा यहां पर्यटकों की भीड़ रहती हैं।

– हरिगोविंद विश्वकर्मा

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समय बलवान

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समय बलवान

  • हरिगोविंद विश्वकर्मा

नहीं शाश्वत
यहां कुछ भी
निश्चित है अंत
हर चीज़ का
किसी को भी नहीं
समझना चाहिए
ख़ुद को स्थायी
यहां जब
मानव नहीं हरा पाता
जिस व्यक्ति को
तब उसे एक न एक दिन
करता है पराजित समय
रह जाता है
सारा वैभव और ऐश्वर्य
सारी शक्ति और सत्ता
धरा का धरा यहीं पर
क्योंकि
समय करता है सबके साथ न्याय
इसलिए
किसी भी को भी
विजेता और सर्वशक्तिमान को भी
नहीं पालना चाहिए
तनिक भी अहंकार
नहीं बघारनी चाहिए शेख़ी
और
नहीं करनी चाहिए
मनमानी
क्योंकि
जो भी आया यहां
मानव काया में
वह अंततः हो गया नष्ट
चाहे वह
अत्याचारी रावण हो
या
कंस हो
या फिर
मर्यादा पुरुषोत्तम राम
या
गीता के प्रवर्तक कृष्ण
***

 

फलों की रानी लीची

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प्रकृति के ख़ज़ाने में कई ऐसे पौधे हैं जो किसी वरदान से कम नहीं। ये पौधे ऐसे फल देते हैं जो फल तो हैं ही, उससे बढ़कर दवा है। पेड़-पौधों की इसी सीरीज़ में लीची आती है। गर्मी और बारिश के बीच आने वाली लीची से स्वाद तो मिलता ही है, तंदरुस्ती भी मिलती है। लीची का तो नाम सुनते ही मुंह मिठास से भर जाता है। देखने में ये जितनी ख़ूबसूरत लगती है, उतनी ही ज़्यादा मीठी और स्वादिष्ट होती है। तभी तो ये फल हरदिल अजीज है। अगर आम फलों का राजा है तो लीची भी फलों की रानी। गर्मियों की जान लीची बच्चे से लेकर बड़े-बढ़े की मनपसंद है।

पौष्टिक तत्वों की इसमें भंडार होता है। कार्बोहाइड्रेट, विटामिन ए, विटामिन बी, विटामिन सी, पोटैशियम, कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम और फॉस्फोरस जैसे खनिज प्रचुर मात्रा होते हैं। इसीलिए इसे रोगों का दुश्मन कहते है। सेहत का ख़ज़ाना लीची अपने अंदर समेटे इन गुणों के कारण ‘सुपरफ्रूट’ भी कहलाती है।

एक लीची हज़ार गुण

ब्लडप्रेशर की दुश्मन
लीची को ब्लडप्रेशर का दुश्मन कहा जाता है। दरअसल इसमें मौजूद पोटैशियम और कॉपर हार्ट की बीमारियों से बचाते हैं। दिल की धड़कन की अनियमितता या अस्थिरता और बीपी को नियंत्रित रखने में ये सहायक होती है। ये हार्ट अटैक के जोखिम को ख़त्म कर देती है।

डायजेशन में मददगार
डायजेशन समस्या का लीची रामबाण इलाज है। इसमें बीटा कैरोटीन, राइबोफ़्लेबिन, नियासिन और फ़ोलेट जैसे विटामिन बी प्रचुर मात्रा में होते हैं। विटामिन बी रेड ब्लड सेल्स का निर्माण होता है। कोलेस्ट्रॉल स्तर को फ़ोलेट कंट्रोल में रखता है। इसीलिए इसके सेवन से डायजेशन समस्या नहीं होती।

कैंसर से करे हिफ़ाजत
लीची में मौजूद विटामिन सी कैंसर से भी लड़ने की क्षमता रखते हैं। रिसर्चे से साबित हो गया है कि इसमें कैंसर, खासतौर पर स्तन कैंसर, से लड़ने के गुण मिलते हैं। नियमित रूप से इसे खाने से शरीर में कैंसरस सेल्स ज़्यादा नहीं बढ़तीं। ये बेहतर एंटीऑक्सीडेंट और आयरन का अवशोषण भी करती है।

मोटापा को करे कम
लीची में एंटीओबेसिटी गुण भी होते हैं। इसमें फ़ायबर बहुत ज़्यादा मात्रा में होता है, जो भोजन बहुत अच्छी तरह पचाता है और फ़ैट कम बनाता है। इसीलिए इसे मोटापा कम करने के लिए रामबाण माना जाता है। फ़ायबर बीमारियों लड़ने के लिए इम्यून सिस्टम को मज़बूत रखता है।

बच्चों की सच्ची सहेली
लीची बच्चों की सच्ची सहेली है। उनके विकास के लिए ज़रूरी हर तत्व लीची में पाए जाते हैं। मसलन- कैल्शियम, फॉस्फोरस और मैग्नीशियम। ये बच्चों के विकास में अहम किरदार अदा करते हैं। लीची में मौजूद मिनरल्स हड्डियों की बीमारी ऑस्टियोपोरोसिस को भी रोकने में सहायक होते हैं।

ऊर्जा का अच्छा स्रोत
लीची को ऊर्जा का बेहतरीन स्रोत माना जाता है। जिनको ज़्यादा थकान या कमज़ोरी महसूस होती है उनके लिए लीची ब्रम्हास्त्र है। इसमें मौजूद नियासिन स्टेरॉयड हार्मोन और हीमोग्लोबिन बनाता है, जो ऊर्जा के लिए आवश्यक है। इसीलिए, लीची नियमित खाने वाले तरोताज़ा और एनर्जेटिक लगते हैं।

एंटीइन्फ़ेक्शन फल
लीची सर्दी-जुकाम, बुखार, खांसी और गले के संक्रमण से बचाती है। दरअसल, इसमें एक ऑलिगनॉल रसायन होता है जो एन्फ्लूएंजा के वायरस से मज़बूती से लड़ता है और बुखार वगैरह से बचाता है। वैसे
बहुत गंभीर हो चुकी सूखी खांसी के लिए तो लीची रामबाण की तरह है।

पानी का अच्छा वाहक
प्रकृति ने लीची को पानी भरपूर दिया है। इसके अंदर के पौष्टिक तरल में पानी प्रचुर मात्रा में होती है। ये शरीर में पानी सप्लाई भी करती है। इसीलिए इससे डिहाइड्रेशन नहीं होता है। इसका सेवन करने से गर्मी की बीमारियों से भी दूर रहा जा सकता है। यह गर्मी दूर करके शरीर को ठंडक पहुंचाती है।

सुंदरता निखार दे
लीची सौंदर्य का चमकाने का भी काम करती है। दरअसल, ये सूरज की अल्ट्रावॉयलेट किरणों से त्वचा की रक्षा करती है। इसीलिए, इसके नियमित सेवन करने से तैलीय त्वचा को भरपूर पोषण मिलता है, जिससे चेहरे पर पड़ने वाले दाग-धब्बों में कमी तो आती ही है, सौंदर्य भी निखर आता है।

बीज-छिलका भी उपयोगी
बढ़िया लीची ही नहीं ख़राब लीची भी काम की है। इसके बीज का पाउडर शहद के साथ खाने पर पेट के कीड़े मर जाते हैं। डायजेशन प्रॉब्लम में पाउडर की चाय आराम देती है। पाउडर न्यूरो सिस्टम में दर्द से भी राहत दिलाता है। इसके गूदे और छिलके से हाइड्रोक्सीकट, लीची-60 सीटी और एक्सेंड्रीन बनाई जाती है, जिसका प्रयोग वेट लॉस, ब्लडप्रेशर नियंत्रण और हॉर्ट डिज़ीज़ की सप्लीमेंट्री दवा के रूप मे होता है। इससे बने स्किन क्रीम चेहरे की झुर्री घटाकर चमक भी बढ़ाती है।

बहुत ज़्यादा न खाएं
लीची हैं फ़ायदेमंद लेकिन ज़रूरत से ज़्यादा खा लेने से ये नुकसान भी कर सकती है। 10-12 लीची से ज़्यादा कतई न खाएं। अन्यथा नकसीर और सिरदर्द की समस्याओं हो सकती है। ज़्यादा लीची जीभ और होंठों में सूजन, सांस समस्या के साथ शरीर में खुजली भी पैदा कर सकती है।

भारत में लीची का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है। देहरादून की लीची बड़ी स्वादिष्ट मानी जाती है। बिहार भी लीची का बड़ा उत्पादक है। इसका वैज्ञानिक नाम लीची चिनेन्सिस है। जीनस इसका इकलौता सदस्य है। इस ट्रॉपिकल फ़ल का परिवार सोपबैरी है। इसका मूल चीन है। वहां प्राचीन काल में तंग वंश के राजा ज़ुआंग ज़ांग की प्रिय फल थी। वहां बड़े पैमाने पर उगाई जाती है। सामान्यतः मैडागास्कर, ताइवान, वियतनाम, इंडोनेशिया, थाईलैंड, फिलीपींस, लाऔस, कंबोडिया, जापान, बांग्लादेश, पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका में पाई जाती है। अब कैलिफ़ोर्निया और फ्लोरिडा में भी पैदा होने लगी है। इसका सदाबहार पेड़ मध्यम ऊंचाई का यानी 15 से 20 मीटर लंबा होता है। इसकी अहमियत इसी बात से समझी जा सकती है कि मुजफ्फरपुर (बिहार) की लीची हर साल राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित अन्य गणमान्य व्यक्तियों को भेजी जाती है।

गर्व से कहो हम चमचे हैं!

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यह चमचायुग है। कलियुग तो कब का ख़त्म हो चुका। उसके ख़त्म होते ही चमचायुग शुरू हुआ। कलियुग के बाद सतयुग को आना था। लेकिन कलयुग ने साफ मना कर दिया। नारायण ने सतयुग को मनाने की हर संभव कोशिश की पर सतयुग नहीं माने।

सतयुग ने कहा, -महाराज, मैं धरती पर नहीं जा सकता। आप समझ सकते हैं। वहां आजकल कैसा माहौल है। बोलना कम समझना ज़्यादा प्रभु जी!

मजबूरन विष्णु भगवान ने चमचा महाराज को मृत्युलोक में भेजने का निर्णय लिया।

नारायण ने चमचा महाराज से कहा, -वत्स, सतयुग तो विधायकों-सांसदों की तरह बगावत कर रहा है। कलयुग ख़त्म हो रहा है। धरती बिना युग के रह जाएगी। अब तुम ही धरती पर जाओ। वहां तुम्हारी बहुत ज़रूरत है। तुम्हारे कार्यकाल को चमचायुग के रूप में जाना जाएगा।

-आपका आदेश सिरोधार्य प्रभु जी। आपका आग्रह कैसे टाल सकता हूं। चमचा महाराज ने दंडवत प्रणाम किया। धरती पर आने के लिए तैयार हो गए। चमचा महाराज की बड़ी इच्छा थी कि धरती पर जाएं। ख़ासकर भारत की पवित्र धरती पर। अब मन की मुराद पूरी हो रही थी तो मना करने का सवाल ही नहीं पैदा होता था।

चमचा महाराज के आगमन के साथ ही धरती चमचायुग शुरू हुआ। उन्होंने यहां जी-तोड़ मेहनत की। धरती पर चमचाक्रांति कर दी। चमचाक्रांति का नतीजा यह हुआ कि धीर-धीरे हर जगह चमचे मिलने लगे। कोई जगह या महकमा अथवा कोई दफ़्तर चमचारहित नहीं रह गया। हर जगह चमचे मौजूद। मजे से चमचागिरी कर रहे हैं।

कुछ लोग हैरान हुए। चमचा महाराज के पास जाकर पूछा, -चमचा महाराज जी, आपने चमचाक्रांति कैसे कर दी? आख़िर चमचागिरी है क्या बला?

तो चमचा महाराज आराम से चमचा बनने की टिप्स दी। कहने लगे…

चमचा बनना इज़ वेरी सिंपल। पहले केवल तारीफ़ करना सीखिए। तारीफ़ से चापलूसी। बॉस या मालिक को हर वक़्त यस सर-यस सर कहें। मौक़ा मिलने पर उसके जूते तक पोछने को तत्पर रहें। यह महसूस करें कि आपके रीढ़ की हड्डी नहीं है। इसके अलावा सहयोगियों की नियमित शिकायत करें। सहयोगियों की इतनी शिकायत करें कि बॉस पगला जाए। ये सब व्यवहार जब आदत बनेंगी तो आप अच्छा चमचा बन जाएंगे।

चमचा महाराज की कुछ और टिप्स

वर्क प्लेस पर ऐसा माहौल बनाएं कि काम बिलकुल न हों। ध्यान रखें, काम होगा तो चमचागिरी नहीं होगी। काम और चमचागिरी परस्पर विरोधी हैं। काम करने वाले चमचागिरी में बाधा होते हैं। इसलिए काम करने वाले को दफ़्तर में टिकने ही मत दें। शिकायत करके उसे निकलवा दें। जो लोग किसी तरह टिक भी जाएं तो ध्यान रखें वे बिल्कुल हाशिए पर रहें।

पहले अपने देश में बेचारे चमचों को हेय दृष्टि से देखा जाता था। लोग उपेक्षा के साथ कहते थे, -हुंह चमचा है। कुछ लोग तो गाली देते थे, -साला चमचा है। बॉस का चमचा है। लेकिन चमचा महाराज के प्रयास से अब यह धारण बदल चुकी है। चमचों को सम्मान मिलने लगा है। चमचे सीना तान कर चलते हैं। गर्व के साथ कहते है, -हां-हां मैं चमचा हूं। मुझे चमचा होने का गर्व हैं। किसी को हिंदू होने का गर्व है। किसी को भारतीय होने का गर्व है तो चमचों को चमचा होने पर गर्व है। चमचों को पूरे देश में प्रमोशन और एप्रिशिएशन मिल रहा है। चमचे ऊंचे पदों पर विराजमान हैं। इससे चमचों की संख्या बढ़ रही है। अब तो हर कोई चाहता है, वह चमचा बने। चमचा बनकर ऐश करे।

सच कहें तो चमचा महाराज की चमचाक्रांति के बावजूद देश में पेशेवर चमचों को अभाव है। चमचे उतने तेज़-तर्रार नहीं हैं, जितने होने चाहिए। चमचे प्रशिक्षित भी नहीं हैं। इसकी वजह यहां चमचागिरी का प्रशिक्षण देने वाले किसी कॉलेज का न होना है। इतने इंस्टिट्यूट और यूनिवर्सिटीज़ हैं, परंतु चमचा इंस्टिट्यॉ एक भी नहीं। शिक्षण संस्थानों में चमचागिरी का कोर्स कहीं उपलब्ध नहीं। कहां से सीखे कोई चमचागिरी। उम्र है कि बीती जा रही है। चमचा बनने की कसक मन में ही रह जाती है। देश के मौजूदा चमचों के पास कोई डिग्री नहीं है। काश! देश में कम से कम कुछ चमचा ट्रेनिंग कॉलेज होते।

सरकार नई शिक्षा लाई, लेकिन चमचागिरी के लिए किसी कोर्स का प्रावधान नहीं है। केंद्र सरकार को चाहिए था कि नई शिक्षा नीति में चमचा कोर्स शुरू करने पर ज़ोर देती। बीए, बीएससी की तर्ज पर बीसीएच। बैचलर ऑफ चमचागिरी। इससे चमचा महाराज का बोझ थोड़ा कम हो जाता। बेहतरीन किस्म के चमचे उपलब्ध होते। लोग इच्छानुसार चमचों को हायर करते। उन्हें कॉट्रेक्ट पर रखकर चमचागिरी का लाभ लेते। लेकिन नई शिक्षा नीति ने निराश किया।

वैसे देश में जो भी चमचे हैं वे ख़ुद कोशिश करके चमचे बने है। जिसमें टैलेंट होता है, वह ख़ुद चमचा बन जाता है। अब हर आदमी में तो टैलेंट तो होता नहीं। इसलिए हर कोई चमचा नहीं बन पाता। इसके बावजूद देश में चमचा कॉलेज न होने के बाद भी चमचों की पैदावार उतनी बुरी नहीं है। हां कॉलेज के अभाव में चमचागिरी सीखने में पूरी उम्र गुज़र जाती है। अच्छा चमचा बनते-बनते रिटायरमेंट की उम्र आ जाती है। चमचागिरी का सर्वश्रेष्ठ समय घर में जाया होता है।

वैसे चमचा महाराज की कृपा से आजकल दफ़्तर में चमचे हो गए हैं। कई दफ़्तरों में तो चमचों के चमचे भी हैं। दफ़्तर में चमचों की पूरी श्रृंखला है। एक चमचा तरक़्क़ी के लिए दूसरे चमचे को रास्ते से हटाता है। ताकि वह मजे से चमचागिरी कर सके। चमचागिरी में भी गलाकाट स्पर्धा शुरू हो गई है।

चमचा महाराज कहते हैं कि थोड़ी बहुत चमचागिरी सबको आनी चाहिए। इसका आरंभ घर या दफ़्तर से भी की जा सकती है। झाडू वाले की चमचागिरी करें, मेज साफ़ रखेगा। बाबू की चमचागिरी करें, फाइल आगे सरकती रहेगी। अकांउंटेंट की चमचगिरी करें, पैसे मिलने में देरी न होगी। छोटे साहब की चमचागिरी करें, वह बड़े साहब से आपकी तारीफ़ करेंगे। बड़े साहब पटें तो उनकी भी चमचागिरी करें। आप देखेंगे, पूरा दफ्तर आपकी चमचागिरी करने लगेगा।

वैसे चमचागिरी हर किसी को अच्छी लगती है। इसीलिए तो चमचे बॉस के सबसे प्रिय होते हैं। चमचागिरी के अलावा दफ़्तर में विरोधियों की हरकतों की जानकारी देते रहें। किसी दफ़्तर में कोई बॉस उतना ही ज़्यादा टिकता है, जिसके जितने ज़्यादा चमचे होते हैं। चमचों को नापसंद करने वाला बॉस ज़्यादा दिन नहीं टिक पाता। उसे पनिशमेंट पोस्टिंग हो जाती है।

आज के दौर में चमचे दफ्तर में अपरिहार्य हैं। हर जगह चमचों की ज़रूरत है। दफ़्तर ही नहीं पूरे देश में चमचों की ज़रूरत है। टैलेंटेड चमचे हों तो डॉक्टर, इंजीनियर और वैज्ञानिक की क्या जरूरत है। यानी चमचों की अहमियत सबसे अधिक है। लोकतंत्र चार पाए पर नहीं, बल्कि केवल एक पांव पर खड़ा है। वह पाया है चमचास्तंभ। इसीलिए लोकतंत्र को चमचातंत्र भी कहते हैं। यहां सरवाइव करने के लिए चमचागिरी आनी ही चाहिए। आप भी सरवाइव करना चाहते हैं? तो चमचागिरी शुरू करें। गर्व से कहें हम चमचे हैं। इसके आगे गाइड करने के लिए चमचा महाराज हैं।

इसे भी पढ़ें – आशातीत सफलता दिलाता है चमचासन!

UNESCO report highlights growing risk for environmental journalism

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A journalist covering the environmental issue. Courtesy - International Federation of Journalists (IFJ)

UNESCO report highlights growing risk for environmental journalism

The United Nations Educational, Scientific and Cultural Organization (UNESCO), in its latest report on “Press and planet in danger” published on 15 May in partnership with the International Federation of Journalists (IFJ) highlights the safety challenges facing journalists in the past 15 years while covering the environmental issues. It report, it shows a spike in attacks over the last five years (2019-2023) with a 42 percent increase compared to the 2014-2018 period, making the situation more serious than ever.

The report’s findings are based on the collection of data from 2009 to 2023 and on a survey conducted with the support of the IFJ in March 2024 on 905 respondents in 123 countries. It highlights key figures on the threats facing climate journalists and news outlets. With an average of 50 attacks per year, the review found that at least 749 journalists, groups of journalists and news media outlets have been attacked while covering environmental issues in 89 countries between 2009 and 2023, in all regions in the world.

The topics covered are mainly environmental protests, mining and land conflicts. At a more local level, the range of topics can differ (logging, deforestation and pollution) as this type of reporting focuses more on the impact on local and regional communities. According to the report, 353 physical attacks have been reported since 2009, including several types of threats: assaults, arbitrary arrests, physical harassment, attempted murders, abduction or property damaged. Physical attacks are the most important kind of threat. Their amount has doubled between the two most recent periods studied (from 85 incidents to 183).

The data also reveal that legal attacks are the second most serious threat, with a total of 210 cases registered since 2009. The charges involve public order disruption, terrorism, hate speech, dissemination of fake news and resulted in 39 journalists convicted and jailed for their environmental reporting. Defamation lawsuits are predominantly common in Europe and North America, with at least 63 cases recorded.

The report underscores that, while 180 attacks remain unidentified, 382 were perpetuated by state actors (police, military forces, government officials and employees, local authorities) and 207 by private actors (extractive industry companies, criminal groups, protesters and local communities). Those figures reflect a high level of complexity and vulnerability of the profession, as environmental journalism faces pressure from political powers and interference from highly profitable businesses.

The UNESCO-IFJ joint survey discloses additional challenging aspects such as censorship, gender-based threats and working as a freelance. Out of 905 respondent reporters, 70% indicated they had been subject to attacks, threats or pressure while covering environmental issues, with a higher level for freelancers. In addition, 407 respondents declared having self-censorsed their environmental reporting activities. Finally, the journalists said the following measures would improve their safety: training for high-risk reporting, situational awareness, pre-reporting risk assessment, self-defense, and stress management.

The report recommends the following actions:

  • The Government must fight against impunity, investigate and sanction cases of attacks against journalists, improve existing prevention mechanisms and strengthen protective measures to counter the threats facing journalists covering the environment.
  • The Media employers must develop training programs and risk assessments to prioritise journalists’ safety and the sharing of responsibility and ensure the efficiency of these safety protocols.

आशातीत सफलता दिलाता है चमचासन!

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हरिगोविंद विश्वकर्मा

भारत प्राचीनकाल से दुनिया में विश्वगुरु रहा है। या कहें कि सभ्यता के आरंभ से ही भारत की धाक रही है। यहां की संस्कृति गौरवशाली रही है। मन को स्वस्थ रखने के लिए भारत के योग और आसन पूरी दुनिया में मशहूर रहे हैं। अब तो कुछ साल से 21 जून को योग दिवस भी मनाया जाने लगा है। भारत योगासन तक ही नहीं रुका। अब देश योगासन के आगे भी पहुंच गया है। जी हां, योग गुरुओं ने योगासन से भी महत्वपूर्ण मुद्रा खोज ली है। पिछले कुछ दशक से भारत में कुछ नए आसन बहुत तेज़ी से लोकप्रिय हुए हैं। इनमें सबसे अधिक लोकप्रिय हुआ है चमचासन। चमचासन इतना आसान है कि महज दो हफ़्ते के अभ्यास में कोई भी परिपक्व चमचे की तरह चमचासन कर सकता है।

इसे भी पढ़ें – यूपी-बिहार के यात्रियों के लिए मालगाड़ी चलनी चाहिए!

चमचासन तीन चरण में किया जाता है। पहले दो चरण खड़े होकर और तीसरा चरण बैठकर किया जाता है। पहला चरण आंख और चेहरे को अनुकूल करके चाटुकार बना देता है। दूसरा चरण रीढ़ को लचीला कर झुकने में माहिर कर देता है। और, तीसरा चरण पांव वाली मुद्रा घुटने टेक कर नाक रगड़ने में पारंगत कर देती है। तो आइए सबसे पहले चमचासन सीखने की विधि की चर्चा करते हैं। ताकि इच्छुक लोग चमचासन करके बेहतर और प्रशिक्षित चमचे बन सकें। चमचासन की ख़ूबियों से लाभान्वित हो सकें। जो लोग राजनीति या पत्रकारिता को करियर बनाना चाहते हैं, उनके लिए चमचासन सीखना अतिरिक्त योग्यता मानी जाती है।

इसे भी पढ़ें – नेताजी, एक इंटरव्यू दे दीजिए प्लीज!

तो सबसे पहले पहले चरण में सीधे खड़े हो जाइए। आपकी नज़र सामने होनी चाहिए। आंखों में मक्कारी की मुद्रा लाइए। चेहरे पर कुटिलता के भाव होने चाहिए। फिर चेहरे की नसों को आहिस्ता-आहिस्ता से ढीला करते हुए कुटिलता को भोलेपन में बदलिए। कुछ सेकंड उसी मुद्रा में रहने के बाद भोलेपन को दीनता में परिवर्तित कीजिए। अंत में चेहरे पर खिस निपोरने जैसी मुद्रा दिखनी चाहिए। इसका भी ख़ूब अभ्यास करना चाहिए। इतना अभ्यास करना चाहिए कि आप खिस निपोरने में माहिर हो जाएं। आप एक बार खिस निपोरने में माहिर हो गए तो सफल चमचा बनने से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती। खिस निपोरना एक तरह का समर्पण है।

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दूसरे चरण में आप अपनी आंखों में मौजूद मक्कारी की मुद्रा को धीरे से मासूमियत में बदलिए। कुछ सेकंड उसी मुद्रा में रहने के बाद आंखों की मासूमियत को समर्पण वाली मुद्रा में तब्दील कर दीजिए। अंत में समर्पण को चाटुकारिता में परिवर्तित कीजिए। इसके बाद नज़र को धीरे-धीरे नीचे लाइए। पांवों को सीधा रखते हुए आगे की ओर झुकिए। जितना झुक सकें उतना झुकिए। कुछ सेकंड उसी मुद्रा में रहकर धीरे-धीरे पहले वाली मुद्रा में आ जाइए। इसका अभ्यास दस बार करिए। इससे आपकी रीढ़ बहुत अधिक लचीली हो जाएगी। लचीली रीढ़ से झुकने में होने वाली असुविधा दूर हो जाता है। इससे आपको अपनी रीढ़ अस्थिविहीन महसूस होगी और आप जब चाहे तब केंचुए की तरह विनीत हो सकते हैं। इसके अभ्यास से आप अपने अंदर के स्वाभिमान को हमेशा के लिए ख़त्म कर सकते हैं।

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तीसरे चरण में टांगों को सीधा रख कर धीरे-धीरे झुकिए। फिर घुटने के बल बैठ जाइए। घुटने के बल बैठने के बाद चेहरे को आगे लाएं और नाक से फ़र्श से हल्के से स्पर्श करें। उसी मुद्रा में दस सेकंड रहें। उसके बाद नाक से फ़र्श पर रगड़ें। यह क्रिया तब तक करें जब तक नाक में दर्द न होने लगे। आरंभ में नाक रगड़ने में दर्द के साथ असुविधा भी होती है। लेकिन ऐसा महसूस हो तो लंबी-लंबी सांस लें। थोड़ी देर बाद उस क्रिया को पुनः दोहराएं। विशेषज्ञों का मानना है कि नाक की त्वचा संवेदनशील होती है। आरंभ में नाक रगड़ने में असुविधा होती है। लेकिन लगातार अभ्यास से आप नाक रगड़ने में सिद्धहस्त हो सकते हैं। साथ ही साथ आपके अंदर की संवेदना मर जाएगी। संवेदना के मरते ही उच्च कोटि का चमचा आप पर हावी हो जाएगा और यह आपके लिए तरक़्क़ी के दरवाज़े खोल देगा।

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चमचासन करने से आप अंदर का स्वाभिमान और संवेदना मर जाती है। इसके बाद आप दूसरों के सामने खिस निपोर सकते हैं। चाटुकारिता कर सकते हैं। तलवे चाट सकते हैं। इसीलिए चमचासन करने सीखने वाला सुयोग्य चमचा बनकर आशातीत सफलता हासिल करता है। यह गुण आपको राजनीति और पत्रकारिता में शिखर पर ले जा सकता है। आज के दौर में चमचासन सफलता की गारंटी है। चमचासन सीखने के बाद बिना परिश्रम के काम, नौकरी, इनक्रीमेंट, प्रमोशन मिल सकता है।

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यूपी-बिहार के यात्रियों के लिए मालगाड़ी चलनी चाहिए!

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हरिगोविंद विश्वकर्मा

बेचारा रेल विभाग! बहुत लाचार है इन दिनों। दिल्ली हो या मुंबई। हर जगह रेलवे प्लेटफॉर्म पर भारी भीड़ है। यूपी-बिहार के लिए इतनी स्पेशल गाड़ियां चलाई जा रही हैं। फिर भी गाड़ियों में रेलमपेल मची हुई है। सीट की बात तो छोड़ दीजिए। लोग आने जाने के गलियारे और सीट के नीचे सो कर यात्रा कर रहे हैं। बस सबका एक ही इरादा है। घर पहुंचना। किसी भी पहुंचना। चाहे टायलेट में ही यात्रा क्यों न करनी पड़े। वह भी मंजूर है। बस गांव पहुंच जाए।

रेल कितनी ट्रेन चलाए। हर संस्थान की तरह भारतीय रेलवे की भी एक सीमा होती है। वह उससे ज़्यादा काम नहीं कर सकती। भारतीय रेल की भी सीमा है। जितने यात्री गांव जाना चाहते हैं। उतने यात्री भेजने की क्षमता रेलवे के पास नहीं है। रेल विभाग के लोग दिन रात काम कर रहे है। फिर भी हो-हल्ला मचा हुआ है। लोग रेल विभाग की आलोचना कर रहे हैं। सुबह शाम कोस रहे हैं। ऐसे प्रतिसाद की उम्मीद नहीं की थी रेल कर्मियों ने। काम भी कर रहे हैं और आलोचना भी झेल रहे। यह बुरी बात है। केवल बुरी नहीं, बल्कि बहुत बुरी बात है।

ऐसे में मेरा एक सुझाव है। रेल विभाग को यूपी-बिहार के यात्रियों के लिए 85 डिब्बे वाली मालगाड़ी चलानी चाहिए। वैसे भी यूपी जाने वाले लोग किसी भी तरह जा सकते हैं। उन्हें रास्ते में पंखा यानी हवा-पानी की ज़रूरत नहीं पड़ती है। अगर दृढ़ संकल्प कर लें तो हगने-मूतने की तलब भी नहीं होगी। मुंबई के बाद सीधे गांव में प्रधानमंत्री द्रावा बनवाए गए टायलेट में जाएंगे। इसलिए टायलेट का भी इस्तेमाल यात्रा करने के लिए कर रहे हैं। इन दिनों कई बहादुर किस्म के लोग टायलेट में ही यात्रा कर रहे हैं।

कहा भी जाता है। यूपी-बिहार के लोगों को खड़े होने की जगह मिल जाए। बाक़ी व्यवस्था ख़ुद कर लेते हैं। यही हाल यात्रियों का है। बस पांव रखने की जगह मिल जाए। बस सब कुछ मैनेज कर लेंगे। गाते-गुनगुनाते और रील देखते हुए पहुंच जाएंगे गांव। इस तरह के ज़रूरतों से परे यात्रियों के लिए मालगाड़ी सबसे बढ़िया विकल्प हो सकता है। कुछ माल गाड़ियों को यूपी-बिहार के यात्रियों की सेवा में लगा दिया जाए। चार मालगाड़ियां पर्याप्त होंगी। उनका इस्तेमाल सीज़न में किया जाए। जब भी यात्री बढ़ें और रेलगाड़ियां  कम पड़ने लगे तो तुरंत मालगाड़ी को सेवा में प्रस्तुत कर दिया जाए।

होली, दिवाली, छठ पूजा में इन मालगाड़ियों को रवाना कर देनी चाहिए। जितने लोग जाना चाहे जाएं। बस मालगाड़ी में थोड़ा परिवर्तन कर दिया जाए। हर डिब्बे जगह-जगह होल बना दिया जाए। ताकि प्राकृतिक हवा डिब्बे में भरपूर आए। डिब्बे में सीट की जगह सोने के लिए उसमें डारमेट्री की तरह रैक बना दिया जाए। उन रैक में यात्रियों को सुला दिया जाए। उनका मुंह होल की ओर कर दिया जाए। हर यात्री को हवा खींचने के लिए एक-एक पाइप दे दी जाए ताकि पाइप से सांस लेते रहे और मरे न। बस पाइप से सांस लेते हुए जिंदा घर पहुंच जाएं।

यूपी-बिहार के लोगों की एक ख़ासियत है। वे बड़े संतोषी होते हैं। किसी चीज़ की डिमांड नहीं करते। जो मिल जाए वहीं सिरोधार्य। कमोबेश यही ख़ासियत यूपी-बिहार के रेल यात्रियों में होती है। वे किसी चीज़ के लिए शिकायत नहीं करते। जो सुविधा रेलवे देता है। उसे सिरोधार्य कर लेते हैं। जो नहीं देता उसकी शिकायत नहीं करते। स्लीपर कोच में पंखा नहीं चल रहा है। तब भी शिकायत नहीं करते। एसी कोच में एसी नहीं चल रहा है। उसकी भी शिकायत नहीं करेंगे। बस चुपचाप यात्रा करते हैं। फिर इन दिनों माहौल राममय है। राममय माहौल में भक्त भी राममय हो गए हैं। जब राम के बारे में सोचने लगते हैं तो न गर्मी लगती है न थकान। कई लोग राम नाम जपते हुए खड़े-खड़े ही यात्रा करते हुए घर पहुंच जाते हैं। तो यूपी-बिहार के रेल यात्रियों की उदारता का भरपूर लाभ रेलवे को लेना चाहिए और यात्रियों के लिए तुरंत मालगाड़ी चलानी चाहिए।

यूटी बिहार जाने वाली गाड़ियों में यात्री किस मुसीबत से चढ़ते हैं, LIVE वीडियो

जौनपुर को भी ‘नोएडा’ की तरह विकसित करने की मोदी सरकार की योजना (Modi government’s plan to develop Jaunpur like ‘Noida’)

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कार्य-योजना तैयार करने में जुटे हैं केंद्र और राज्य सरकार के कई विभाग

अरविन्द उपाध्याय

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी का कायाकल्प करने का बाद अब धार्मिक नगरी के 100 किलोमीटर के दायरे में आने वाले जौनपुर समेत समस्त पूर्वांचल विकास की मुख्य धारा में लाने की योजना पर काम कर रहे हैं। पूर्वांचल में भाजपा की मजबूती पर उनका ख़ास फोकस है।

वाराणसी को केंद्र में रखते हुए पूर्वांचल के विकास की योजना पर करीब एक साल से मंथन चल रहा है। प्रधानमंत्री चाहते हैं कि कोलकाता और नई दिल्ली के बीचो-बीच दिल्ली एनसीआर की तर्ज पर एक औद्योगिक क्षेत्र विकसित हो जो अत्यंत पिछड़े हुए पूर्वांचल के विकास को गति दे सके। प्रारंभ में वाराणसी और उसके अगल-बगल की 100 किलो- मीटर परिधि में आने वाले क्षेत्र को लिया जाना है। अमूल डेयरी प्लांट इसी योजना की एक कड़ी है।

समझा जा रहा है कि जौनपुर समेत वाराणसी के अगल-बगल स्थित जिलों में कई रेलवे स्टेशनों को अधिक सक्षम और आधुनिक बनाने की योजना इसी का हिस्सा है, जिस पर काम चल रहा है। वाराणसी में प्रस्तावित मेट्रो रेल परियोजना भी इन क्षेत्रों को आपस में जोड़ सकती है। इसके अलावा बाबतपुर में स्थित लाल बहादुर शास्त्री एयरपोर्ट का का पिछले कई वर्षों से निरंतर चल रहा विकास प्रस्तावित परियोजना का हिस्सा माना जा रहा है।

एग्रो पार्क में पैक हाउस स्थापित होने के बाद आसपास के क्षेत्रों की सब्जियां और फल विदेशों को निर्यात होने लगे हैं। हरी मिर्च और आम जैसे कृषि उत्पादों को अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में सीधे बेच कर इस क्षेत्र के कई किसानों ने अच्छा लाभ कमाया है और साथ ही वो क्षेत्रीय किसानों के लिए प्रेरणा स्रोत बने हैं। अच्छी बात यह है की वाराणसी प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होने के कारण केंद्र और राज्य के सभी संबंधित विभाग इन योजनाओं के अच्छे नतीजों के लिए काफी हद तक तत्पर रहते हैं।

जौनपुर से मात्र 28 किलोमीटर दूर वाराणसी राजमार्ग पर स्थित करखियांव एग्रो पार्क (Karkhiyaon Agro Park) के पास बहुत तेजी से स्थापित हुए अमूल डेयरी प्लांट में काम शुरू हो गया है। देश में श्वेत क्रांति‌ का अगुवा अमूल पूर्वांचल में दुग्ध एवं दुग्ध उत्पादों बढ़ाने‌ और 100 किलोमीटर की परिधि के कार्यक्षेत्र की अर्थव्यवस्था सुधारने के काम में जुट भी गया है।

करखियांव में 475 करोड़ रुपये की लागत से स्थापित अमूल डेयरी प्लांट ने डेयरी से लोगों को जोड़ कर नौकरी और व्यवसाय के नए अवसर खोले हैं। उम्मीद की जा रही है कि इससे पलायन भी रुकेगा। वर्तमान लोकसभा चुनाव में अगर इन क्षेत्रों से विकास के प्रति संजीदा सांसद निर्वाचित हुए तो मोदी सरकार की संभावित अगली पारी में अच्छी उम्मीदें की जा सकती हैं।

अमूल प्लांट स्थापित करने वाली संस्था बनास डेयरी के चेयरमैन शंकर भाई चौधरी के मुताबिक इस प्लांट के खुलने से आने वाले समय में तीन लाख लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलेगा। पशुपालकों की आय दोगुनी हो जाएगी। उचित मूल्य के साथ-साथ उन्हें कंपनी की ओर से वार्षिक बोनस भी दिया जाएगा।

अमूल का यह प्लांट वाराणसी, जौनपुर, चंदौली, भदोही,गाज़ीपुर, आज़मगढ़, मिर्ज़ापुर और आसपास के जिलों के किसानों के लिए एक बड़ा अवसर साबित होने वाला है। दूसरी तरफ क्षेत्र में तेजी से बिछाई जा रही गैस पाइपलाइनें विकसित हुए राजमार्गों के किनारे प्रस्तावित औद्योगिक कारीडोर के लिए काफी अहम साबित होने वाली हैं।

इसी वर्ष 23 फरवरी को प्रधानमंत्री के हाथों हुए उद्घाटन के बाद विधिवत शुरू होने वाले इस अमूल प्लांट की अधारशिला विधानसभा चुनाव से पहले 23 दिसंबर, 2021 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ही रखी थी। हालांकि अमूल के इस प्लांट को तैयार होने में निर्धारित समय डेढ़ वर्ष की जगह तीन वर्ष लग गये। वह भी जब निर्धारित समय पर काम पूरा न होने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय से उनकी लगातार मॉनिटरिंग होने लगी।

प्लांट में उत्पादन शुरू होने के पहले से ही वाराणसी के अतिरिक्त जौनपुर, गाजीपुर, चंदौली और जौनपुर में मिल्क कलेक्शन सेंटर खोलने सहित अन्य व्यवस्थाएं प्रबंधन द्वारा की जा रही हैं। जौनपुर सहित पूर्वांचल के तकरीबन सभी जिलों में जगह-जगह खुले अमूल पार्लर पूर्वांचल को मिली अच्छी उपलब्धि की एक झलक है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। पिछले चार दशक से देश की शीर्ष पत्र-पत्रिकाओं में लिख रहे हैं।)

तरुणमित्र से साभार

कौन थे भगवान परशुराम, क्यों किया क्षत्रियों का संहार?

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परशुराम जयंती पर विशेष

हरिगोविंद विश्वकर्मा
जगत के पालनहार भगवान विष्णु, शास्त्रों के अनुसार, त्रेतायुग में वैशाख माह में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को परशुराम के रूप में पृथ्वी लोक पर अवतरित हुए थे। अक्षय तृतीया के दिन जन्म लेने के कारण ही भगवान परशुराम की शक्ति भी अक्षय थी। भार्गव वंश में जन्मे परशुराम को विष्णु के दस अवतारों में से छठा अवतार माना जाता है। वह वामन के बाद और मर्यादापुरुषोत्तम राम से पहले अवतरित हुए थे। उनका भी नाम राम था, किंतु वह शिव के परम भक्त थे।

शंकर से उन्हें कई अद्वितीय शस्त्र भी प्राप्त हुए इन्हीं में से एक था शंकर का अमोघ अस्त्र परशु। उसे फरसा या कुल्हाड़ी भी कहते हैं। यह इन्हें बहुत प्रिय था। इसलिए वह उसे हमेशा साथ रखते थे। परशु धारण करने के कारण ही इन्हें परशुराम कहा गया। शास्त्रों में उन्हें अमर माना गया है। कई ग्रंथों में परशुराम को शिव और विष्णु का संयुक्त अवतार माना जाता है। शिव से उन्होंने संहार लिया और विष्णु से उन्होंने पालक के गुण प्राप्त किए।

परशुराम भी दुर्वासा ऋषि की भांति अपने क्रोधी स्वभाव के लिए विख्यात थे। वाल्मिकि रामायण में उनके क्रोध की पराकाष्ठा का वर्णन मिलता है। वाल्मीकि रामायण के एक प्रसंग के अनुसार, प्राचीन काल में महिष्मती (वर्तमान महेश्वर) नगर के क्षत्रिय राजा कार्तवीर्य अर्जुन था। उसने सभी सिद्धियां प्राप्त कर ली थीं। उसने भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न करके वरदान स्वरूप उनसे एक सहस्त्र भुजाएं मांग ली। इससे उसका नाम कार्तवीर्य अर्जुन सहस्त्रबाहु हो गया। वह बड़ा प्रतापी तथा शूरवीर था। सहस्त्रबाहु ने परशुराम के पिता जमदग्नि से उनकी कामधेनु गाय मांगी थी। जमदग्नि के इनकार करने पर उसके सैनिक बलपूर्वक कामधेनु को अपने साथ लेकर चले गए। बाद में परशुराम को सारी घटना विदित हुई, तो वह बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने अकेले ही सहस्त्रबाहु की समस्त सेना का नाश कर दिया। पहले सहस्त्रबाहु की भी वध कर दिया।

इसके बाद प्रतिशोध की भावना के चलते कार्तवीर्य के संबंधी क्षत्रियों ने जमदग्नि का वध कर दिया। इस पर परशुराम ने 21 बार पृथ्वी को क्षत्रिय-विहीन कर दिया। हालांकि हर बार हताहत क्षत्रियों की पत्नियां जीवित रहीं और नई पीढ़ी को जन्म देती रहीं। इस नरसंहार से समंत पंचक क्षेत्र में पांच रुधिर के कुंड भर गए। क्षत्रियों के रुधिर से परशुराम ने अपने पितरों का तर्पण किया। उस समय ऋचीक साक्षात प्रकट हुए। उन्होंने परशुराम को ऐसा कार्य करने से रोका। ऋत्विजों को दक्षिणा में पृथ्वी प्रदान की। ब्राह्मणों ने कश्यप की आज्ञा से उस वेदी को खंड-खंड करके बांट लिया। अतः वे ब्राह्मण जिन्होंने वेदी को परस्पर बांट लिया था, खांडवायन कहलाए।

अंततः परशुराम ने तपस्या की ओर ध्यान लगाया। रामावतार में रामचंद्र द्वारा शिव का धनुष तोड़ने पर वह बहुत क्रोधित हुए थे। वाद-विवाद के बाद उन्होंने राम की परीक्षा लेने के लिए अपना धनुष रामचंद्र को दिया। जब राम ने धनुष पर कमान चढ़ा दिया तो परशुराम समझ गए कि राम भगवान विष्णु के अवतार हैं। इसलिए उनकी वंदना करते हुए वह तपस्या करने चले गए। तुलसीदास कृत रामचरित मानस में इस प्रसंग एक चौपाई लिखी गई है। कहि जय जय रघुकुल केतू। भुगुपति गए बनहि तप हेतू।।’

एक अन्य प्रसंग के अनुसार राम का पराक्रम सुनकर परशुराम अयोध्या गए। दशरथ ने स्वागतार्थ रामचंद्र को भेजा। उन्हें देखते ही परशुराम ने उनके पराक्रम की परीक्षा लेनी चाही। अतः उन्हें क्षत्रियसंहारक दिव्य धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए कहा। राम के ऐसा कर लेने पर उन्हें धनुष पर एक दिव्य बाण चढ़ाकर दिखाने के लिए कहा। राम ने वह बाण चढ़ाकर परशुराम के तेज़ पर छोड़ दिया। बाण उनके तेज़ को छीनकर पुनः राम के पास लौट आया। राम ने परशुराम को दिव्य दृष्टि दी। जिससे उन्होंने राम के यथार्थ स्वरूप के दर्शन किए। परशुराम एक वर्ष तक लज्जित, तेजहीन तथा अभिमानशून्य होकर तपस्या में लगे रहे। तदनंतर पितरों से प्रेरणा पाकर उन्होंने वधूसर नामक नदी के तीर्थ पर स्नान करके अपना तेज़ पुनः प्राप्त किया।

परंपराओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार क्षत्रियों के अहंकारपूर्ण दमन से विश्व को मुक्ति दिलाने के लिए भगवान विष्णु ने परशुराम के रूप में अवतार लिया था। भृगु के वंशज परशुराम राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका और भृगुवंशीय जमदग्नि के पुत्र थे। जमदग्नि के पुत्र होने के कारण ये ‘जामदग्न्य’ भी कहे जाते हैं। दरअसल, भृगु ने अपने पुत्र के विवाह के विषय में जाना तो बहुत प्रसन्न हुए तथा अपनी पुत्रवधु से वर मांगने को कहा। उनसे सत्यवती ने अपने तथा अपनी माता के लिए पुत्र जन्म की कामना की।

भृगु ने उन दोनों को ‘चरु’ भक्षणार्थ दिए और कहा कि ऋतुकाल के उपरांत स्नान करके सत्यवती गूलर के पेड़ और उसकी माता पीपल के पेड़ का आलिंगन करे तो दोनों को पुत्र प्राप्त होंगे। माँ-बेटी के चरु खाने में उलट-फेर हो गई। दिव्य दृष्टि से देखकर भृगु पुनः वहां पधारे तथा उन्होंन सत्यवती से कहा कि तुम्हारी माता का पुत्र क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मणोचित व्यवहार करेगा तथा तुम्हारा बेटा ब्राह्मणोचित होकर भी क्षत्रियोचित आचार-विचार वाला होगा। बहुत अनुनय-विनय करने पर भृगु ने मान लिया कि सत्यवती का बेटा ब्राह्मणोचित रहेगा किंतु पोता क्षत्रियों की तरह कार्य करने वाला होगा।

अंततः सत्यवती के पुत्र जमदग्नि मुनि हुए। उन्होंने राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका से विवाह किया। रेणुका के पाँच पुत्र रुमण्वान, सुषेण, वसु, विश्वावसु तथा परशुराम हुए। परशुराम क्षत्रियोचित वयवहार करने वाले पुत्र थे। एक बार उनकी मां रेणुका कलश लेकर जल भरने के लिए नदी पर गई थीं। वहां गंधर्व चित्ररथ अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था। रेणुका राजा चित्ररथ पर मुग्ध हो गईं। जलक्रीड़ा देखने में रेणुका इतनी तन्मय हो गई कि जल लाने में विलंब हो गया और यज्ञ का समय व्यतीत हो गया। उनके आश्रम पहुंचने पर मुनि को दिव्य ज्ञान से समस्त घटना ज्ञात हो गई।

जमदग्नि ने क्रोध के आवेश में बारी-बारी से अपने चार बेटों को मां की हत्या करने का आदेश दिया। किंतु कोई भी तैयार नहीं हुआ। जमदग्नि ने अपने चारों पुत्रों को जड़बुद्ध होने का शाप दिया। भगवान परशुराम ने तुरंत पिता की आज्ञा का पालन किया और मां रेणुका की हत्या कर दी। इससे जमदग्नि ने प्रसन्न होकर उसे वर मांगने के लिए कहा। परशुराम ने पहले वर से मां का पुनर्जीवन मांगा और फिर अपने भाइयों को क्षमा कर देने के लिए कहा। जमदग्नि ऋषि ने परशुराम को अमर होने का वरदान दिया।

असम राज्य की उत्तरी-पूर्वी सीमा में जहाँ ब्रह्मपुत्र नदी भारत में प्रवेश करती है, वहीं परशुराम कुंड है, जहां तप करके उन्होंने शिव से परशु प्राप्त किया था। वहीं पर उसे विसर्जित भी किया। परशुराम भी सात चिरंजीवियों में से एक हैं। कहते हैं कि इनका पाठ करने से दीर्घायु प्राप्त होती है। परशुराम कुंड नामक तीर्थस्थान में पाँच कुंड बने हुए हैं। परशुराम ने समस्त क्षत्रियों का संहार करके उन कुंडों की स्थापना की थी तथा अपने पितरों से वर प्राप्त किया था कि क्षत्रिय संहार के पाप से मुक्त हो जाएंगे। परशुराम ने अपने जीवनकाल में अनेक यज्ञ किए। यज्ञ करने के लिए उन्होंने बत्तीस हाथ ऊंची सोने की वेदी बनवाई थी। महर्षि कश्यप ने दक्षिण में पृथ्वी सहित उस वेदी को ले लिया तथा फिर परशुराम से पृथ्वी छोड़कर चले जाने के लिए कहा। परशुराम ने समुद्र पीछे हटाकर गिरिश्रेष्ठ महेंद्र पर निवास किया।

 

75 साल में पाकिस्तान में 14 फीसदी से घटकर 1.2 फीसदी रह गए हिंदू (Hindus in Pakistan reduced from 14 percent to 1.2 percent in 75 years)

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हरिगोविंद विश्वकर्मा
भारतीय होने के नाते हम अपनी ‘गंगा-जमुनी संस्कृति’ और ‘जीयो और जीने दो’ के दर्शन पर गर्व कर सकते हैं। नफ़रत की राजनीति करने वाले चंद भ्रमित लोगों को अगर छोड़ दें तो भारत ही नहीं बल्कि दुनिया में कहीं भी रहने वाले अधिकांश हिंदू इसी जीवन-दर्शन का पालन करते हैं। वे उसी के अनुसार अपना जीवन जीते हैं, लेकिन पड़ोस के इस्लामिक देश पाकिस्तान हालत बहुत दयनीय है। ख़ासकर ग़ैर-मुस्लिम लोगों के लिए तो पाकिस्तान सबसे भयावह जगह है। आज़ादी से पूर्व जनगणना में वहां हिंदुओँ आबादी 14 फ़ीसदी थी, लेकिन पिछले 75 साल में हिंदू आबादी घटती हुई केवल 19 लाख 60 हज़ार यानी देश की आबादी का 1.2 प्रतिशत रह गई है।

सन् 1947 में बंटवारे के दौरान संपन्न उच्च और मध्यम वर्ग के हिंदू भारत आ गए थे। लेकिन ग़रीब वहीं रह गए। उन्हें आज दोयम दर्जे का नागरिक बनकर जीना पड़ रहा है। आए दिन हिंदुओं लड़कियों को कट्टरपंथी उठा ले जाते हैं, जबरन धर्म-परिवर्तन करवा कर निकाह कर लेते हैं, लेकिन सरकार या पुलिस कोई एक्शन नहीं लेती। वहां हिंदुओं का शोषण और धर्म-परिवर्तन आम है। इससे वहां हिंदुओं की तादाद काफी तेज़ी से कम हो रही है।

अगर भारत पाकिस्तान की तुलना करें तो हिंदू बाहुल्य भारत में मुसलमानों को हिंदुओं की तरह ही बराबरी का अधिकार है। पर मुस्लिम बाहुल्य पाकिस्तान में हिंदुओं को कोई अधिकार नहीं हैं। भारत में मुस्लिम आबादी लगातार हिंदुओं से भी ज़्यादा प्रतिशत बढ़ रही है। पर पड़ोस में मुस्लिमों की आबादी बढ़ रही है, लेकिन हिंदुओं की आबादी लगातार घटती जा रही है। यह खुलासा दुनिया भर में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को प्रमुखता से उठाने वाले लंदन (ब्रिटेन) के सामाजिक संगठन माइनॉरिटी राइट्स ग्रुप (MRG) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है।

पाकिस्तान कहता है कि हिंदुओं की आबादी 2.14 फ़ीसदी है। माइनॉरिटी राइट्स ग्रुप की रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में हिंदुओं की संख्या घटकर 19.60 लाख रह गई है। यह देश की आबादी का महज 1.2 फ़ीसदी है। वैसे वहां की 2023 की जनगणना में आबादी 2017 के 20.76 करोड़ से बढ़कर 2023 में 24.15 करोड़ हो गई। पाकिस्तान में हिंदुओं की अलग जनगणना नहीं होती, सो आधिकारिक तौर पर हिंदुओं की आबादी की जानकारी किसी को नहीं, लेकिन गैर-सरकारी एजेंसियों के आकलन के अनुसार 2017 से पहले वहां हिंदू आबादी 22 लाख यानी कुल आबादी का 1.6 फ़ीसदी थी, लेकिन 2017 की जनगणना में हिंदुओं की संख्या 0.4 फ़ीसदी और गिर गई।

वैसे पाकिस्तान में जनगणना हमेशा संदिग्ध रही है। फिर भी 2017 की जनगणना में मुस्लिम आबादी 96.2 प्रतिशत थी। जबकि हिंदुओं की कुल आबादी 1.2 प्रतिशत थी। 96 फ़ीसदी हिंदू आबादी बहुत अधिक पिछड़ा वर्ग माने जाने वाले सिंध प्रांत के ग्रामीण हिस्सों में रहती है। सिंध प्रांत के उमरकोट जिले में हिंदुओं का प्रतिशत सबसे अधिक 52.2 फीसदी है, जबकि थारपारकर जिले में 7,14,698 आबादी के साथ सबसे अधिक हिंदू हैं। पाकिस्तान हिंदू काउंसिल के प्रमुख डॉ. रमेश कुमार वेंकवाणी का कहना है कि पाकिस्तान में हिंदुओं की गणना ठीक से नहीं हो पाती। अगर जनगणना सही हो तो हिंदू आबादी ज़्यादा मिलेगी।

सन् 2023 की जनगणना से पहले पाकिस्तान के राष्ट्रीय डेटाबेस और पंजीकरण प्राधिकरण के नवीनतम (सन् 2018) आंकड़ों के अनुसार, देश में 19.6 लाख हिंदू थे। स्वतंत्रता के समय पाकिस्तान में लगभग 23 फ़ीसदी हिंदू थे। पश्चिमी पाकिस्तान, मौजूदा पाकिस्तान,में 14 फ़ीसदी हिंदू थे जबकि पूर्वी पाकिस्तान जो अब बांग्लादेश है, में हिंदू जनसंख्या 28.4 फ़ीसदी थी। वहां चुनाव में अल्पसंख्यक सबसे कम मतदान करते हैं। उनके लिए सारे शासक या तो सांपनाथ है या फिर नागनाथ हैं। वहां अल्पसंख्यकों को उतना अवसर नहीं मिलता जितना बहुसंख्यकों को। इसीलिए हिंदुओं में आमतौर पर शिक्षा, रोज़गार और सामाजिक उन्नति तक समान पहुंच का अभाव है।

माइनॉरिटी राइट्स ग्रुप के मुसाबिक भारत और पाकिस्तान के बीच तनावपूर्ण राजनीतिक संबंधों का असर हिंदुओं पर हमले के रूप में दिखता है। इसके चलते पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश जैसे देशों में इस्लामिक कट्टरवाद और उग्रवाद में वृद्धि हुई और हिंदू ही हिंसा और शोषण से सबसे अधिक शिकार हुए। पाकिस्तान के हिंदू अक्सर भारत में मुसलमानों के अधिकारों के उल्लंघन के परिणामस्वरूप उत्पन्न हिंदू-विरोधी भावनाओं के शिकार होते हैं।

6 दिसंबर 1992 के बाद पाकिस्तान और बांग्लादेश में भयावह परिणाम देखने को मिले थे। विवादास्पद ढांचे को विध्वंस के बाद वहां मुसलमानों ने अपना ग़ुस्सा हिंदुओं और उनकी संपत्तियों पर निकाला था। हिंदुओं पर बड़े अत्याचार किए गए। एक अनुमान के मुताबिक 6 से 8 दिसंबर 1992 के बीच लगभग 120 हिंदू मंदिरों को ज़मीदोज़ कर दिए गए थे।

पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग के अनुसार, 1998 के दौरान हिंदुओं पर अत्याचार के बेहिसाब मामले प्रकाश में आए। हिंदू महिलाओं का अपहरण किया गया। उनके साथ बलात्कार किया ग। और इतना ही नहीं जबरन उनका धर्म परिवर्तन करवा कर उन्हें मुसलमान बनाया गया। प्रकट, स्टेट-स्पॉन्सर्ड भेदभाव और दमन के कारण, पाकिस्तान के हिंदू अपने मौलिक मानवाधिकारों से वंचित हैं। हिंदू ‘अवांछित’ और भारत के जासूस माने जाते हैं। इसी का हवाला देते हुए भारत में भाजपा सरकार संविधान संशोधन क़ानून से पड़ोसी देशों के मुसलमानों को अलग रखा है।

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