प्यार और खुशी के भव्य रंगों में रंगा ‘कुछ रंग, कुछ कहानियां’ का लोकार्पण

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संवाददाता

मुंबई। महानगर की आपा- धापी और भाग-दौड़ भरी जिंदगी के बीच मुंबई में रविवार की शाम सकून लेकर आई, जब महानगर का समूचा हिंदी साहित्य व पत्रकारिता जगत एक साथ इकट्ठा हुआ। अवसर बना प्रख्यात लेखिका व पत्रकार सुदर्शना द्विवेदी’ की पुस्तक ‘कुछ रंग, कुछ कहानियां’ के लोकार्पण का।

‘शोधावरी’ व ‘अरविंद प्रोडक्शन’ के सौजन्य से मुंबई विश्वविद्यालय के कुसुमाग्रज सभागार में हुए इस आयोजन के मुख्य अतिथि थे जाने – माने ‌सिने अभिनेता मनोज बाजपेयी। मनोज बाजपेयी ने – जिन्होंने ‘कुछ रंग, कुछ कहानियां’ के कुछ अंश भी पढ़े – कहा कि सुदर्शना जी की कहानियों में नारी की प्रधानता और उसके त्याग की पराकाष्ठा दिखाई देती है। मनोज बाजपेयी की इस जानकारी ने तो श्रोताओं को चमत्कृत कर दिया कि उन्होंने सुदर्शना जी के पुत्र सुपर्ण वर्मा की ‘सिर्फ एक बंदा ही काफी है’ और ‘फैमिली मैन’ सरीखी फिल्मों व वेब सीरीज में तो काम तो किया ही है, लेकिन सुदर्शना जी से उन्हें और गहराई से जोड़ने वाली एक दूसरी चीज है – ‘क्रिया योग’ – जिसमें उन्हीं की तरह वे और उनका परिवार भी दीक्षित है।

डॉ. नंदलाल पाठक ने सुदर्शना जी की लेखनी को ‘बहुत दमदार’ बताते हुए कहा कि वे पहले ही संग्रह में इतनी ऊंचाई पर पहुंच गई हैं। डॉ. सूर्यबाला’ ने कहा कि ‘कुछ रंग कुछ कहानियां’ में सुदर्शना जी का लिखा यह पढ़कर कि -‘जब लिखे बिना नहीं रहा जा सकता, तब जो लिखा जाता है वही रचना सही रचना होती है’ तो उसे पढ़े बगैर छोड़ा ही नहीं जा सकता था।’ राजेंद्र गौतम ने कहा, ‘सुदर्शना जी की लेखनी ने साधारण परिवेश की कहानियों को भी असाधारण बना दिया है।’ दिल्ली से विशेष रूप से आईं जयंती रंगनाथन ने बताया कि सुदर्शना जी ने मुझे न सिर्फ जीवन जीना सिखाया, बल्कि कलम पकड़ना भी मैने उन्हीं से सीखा है। यह पुस्तक रेखा बब्बल के साथ मेरी अपनी इस मां को गुरूदक्षिणा है।’ चरण शर्मा और ढब्बूजी फेम आबिद सुरती ने ‘धर्मयुग काल’ की स्मृतियां ताजा कीं। रेखा बब्बल ने उन्हें अपना फ्रेंड, फिलॉस्फर व गाइड – सब कछ बताया। नामचीन निर्माता निर्देशक हंसल मेहता, फिल्म अभिनेता मनीष वाधवा, पुष्पा भारती तथा अचला नागर ने भी उन्हें अपनी शुभकामनाएं दीं।

सुदर्शना जी ने अपने आभार भाषण में कहा कि ‘इस शहर में आए मुझे 52 साल हो गए , जिसमें से 45 साल मैं अकेली रही। लेकिन इस शहर ने मुझे बेगाना नहीं समझा। झोली से ज्यादा और आंचल भरकर यहां मुझे प्यार मिला। आज आंखें गीली हैं। दिल भरा है – इतना प्यार मैं किस तरह संभालूं!’

राजेंद्र गुप्ता, कविता गुप्ता, ममता सिंह, रश्मि रविजा और विभा रानी ने सुदर्शना जी की कहानियों के पाठ किए। कार्यक्रम का संचालन देवमणि पांडे तथा रेखा बब्बल ने किया। सुदर्शना जी के पुत्र सुपर्ण, बहू राधिका, बेटी सुकन्या और पोता अवान मंच पर उपस्थित थे। पुस्तक का कवर सुदर्शना जी के आठ वर्षीय पौत्र ‘अवान ने ही बनाया है। शुभकामना अरविंद बब्बल ने दी। आभार व्यक्त किया डॉ. हूबनाथ पांडेय ने।

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