काया में लघु, असर में बृहद

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हंगल साहब, जरा हँस दीजिए
डॉ. मधुबाला शुक्ल

‘हंगल साहब, जरा हँस दीजिए’ हरि मृदुल जी का पहला कहानी संग्रह है। इस कहानी संग्रह में लघु-बृहद मिलाकर कुल 20 कहानियों का समावेश है। हर कहानी पाठकों के हृदय को झकझोरती हुई नजर आती है, पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है। हर एक कहानी व्यक्ति के जीवन से कहीं न कहीं जुड़ी हुई है।

हरि मृदुल जी का जन्म उत्तराखंड के बगोटी गाँव में हुआ तो जाहिर सी बात है कि उनकी कहानियों में उत्तराखंड का उल्लेख मिलना स्वाभाविक है। उत्तराखंड की भूमि से, गाँव से, नाते रिश्तेदारों से और दोस्तों से जुड़ी हुई कहानियों का समावेश इस संग्रह में है। वहीं दूसरी और रोजी-रोटी की तलाश में महानगर की जीवन शैली का यथार्थता परक सदृश्य विवरण भी है।

संग्रह की पहली कहानी ‘अर्जन्या’ आपातकाल के दृश्य को विवेचित करती है। जिसमें तानाशाही सत्ता का शिकार अर्जुन राम का जबरन नसबंदी करवा देना सत्ता के जुल्म की कहानी कहता है। ‘कुत्ते दिन’ कहानी प्रिंट मीडिया और दृश्य मीडिया से गुम हो रहे खबरों की कहानी है। जहाँ वर्तमान समय में प्राइवेट चैनल्स अपनी-अपनी टीआरपी बढ़ाने की होड़ में लगे हैं। सभी बड़े न्यूज चैनलों का स्तर गिरता जा रहा है। खबरों को चटपटा, मसालेदार बनाकर दर्शकों के समक्ष परोसा जा रहा है। खबरों के नाम पर परोसी जा रही इसी विकृत मानसिकता को कहानी के माध्यम से चित्रित किया गया है। और इससे एक सामान्य व्यक्ति आहत होते हुए भी कुछ न कर सकने में असमर्थ है। जिसका विस्तृत विवरण इस कहानी में देखा जा सकता है।

‘पटरी पर गाड़ी’ कहानी जुलाई 2005 की दास्तान कहती नजर आती है। उस साल को कोई भी मुंबईकर नहीं भुला सकता। इस बाढ़ से संबंधित कोई न कोई कहानी प्रत्येक मुंबइकर से जुड़ी होगी। न जाने कितने जानमाल की हानि हुई, इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है। हाँ, सरकारी आँकड़े जरूर सामने आए परंतु उसमें कितनी सत्यता है, ये सभी मुंबईकर जानते हैं। लेखक ने बड़ी साफगोई से सत्यता के साथ दिल दहला देने वाली कहानी को लिपिबद्ध किया है। मैं ये दावे से कह सकती हूँ कि बिना आँखें नम किए हुए कोई भी इसे पूरी तरह पढ़ लें। वहीं ‘आलू’ कहानी में एक पिता अपने छोटे से बच्चे को यह समझा पाने में असमर्थ है कि पंद्रह रुपए वेफर के पैकेट में पाँच रूपए की हवा, पाँच रूपए का चमकीला रैपर और सिर्फ पाँच रुपए का ही वेफर मिलता है। बाजार में लूट मचा रही इन ब्रांडेड कंपनियों की तरफ लेखक ने इशारा किया है जो उपभोक्ताओं को बेवकूफ बना रही हैं। और सबसे बड़ी बात यह उपभोक्ता भलीभाँति जानते हैं कि वे बेवकूफ बनाए जा रहे हैं, परंतु उदारीकरण के इस दौर में वे कब तक इससे अछूते रह सकते हैं।

‘ई कौन नगरिया’ कहानी महानगर के संघर्ष को चित्रित करती नजर आती है। अपने सपनों को पूरा करने के लिए भिन्न-भिन्न राज्यों से, कस्बों से लोग महानगरों में आते हैं। परंतु कितने ही लोग हैं जो अपने ख्वाबों को पूरा कर पाते हैं..? कुछ साल संघर्ष करते हुए हाथ-पैर मारते हैं और सफलता न मिलने पर वापस लौट जाते हैं। कुछ लोग यहीं रहकर अपनी सफलता की प्रतीक्षा करते हैं। वैश्वीकरण के दौर में जब केबल के द्वारा प्राइवेट चैनलों ने हमारे घरों में जबरन घुसपैठ की और हमने उन्हें अपना पैर मजबूती के साथ जमाने का मौका भी दिया। उसका जो प्रभाव हमारी भारतीय संस्कृति पर, लोगों पर पड़ा, उसका विस्तृत विवेचन ‘धनुष-बाण’ कहानी में लेखक ने किया है। वर्तमान समय में इसका बिगड़ा हुआ स्वरूप हमारे समक्ष है।

पिता ही वह व्यक्ति है जो परिवार को प्यार और सहयोग प्रदान करता है। साथ ही, वह परिवार की रक्षा भी करता है। उसकी पत्नी उसकी ताकत, उसका साहस होती है। जब तक पत्नी उसके साथ है, तब तक समस्याओं का निवारण उस तक पहुँचने से पहले ही हो जाता है। ‘मैं पिता को देख रहा था’ एक ऐसी ही कहानी है जो अपनी पत्नी के चले जाने के बाद, करीने से, सहेजकर रखी गई वस्तुओं को एकटक देखते हुए उन वस्तुओं से, उन पशुओं से, चूल्हे के पास, जिस-जिस स्थान पर उसकी पत्नी बैठती थी वो उन सबसे बातें करता दिखाई देता है और इस पिता को देख रहा होता है उसका… बालक… ‘पैंतीस साल बाद, पाँच दोस्त’ कहानी पाँच दोस्तों की है। उदयभानु-दरोगा, भोलानाथ-प्रोफेसर, रविशंकर-वकील, रघु-रिक्शावाला, कौशल किशोर-ज्योतिषी और इनके एक साथ मिलने का सूत्र है, मीडिया हाउस में काम करने वाला मीडियाकर्मी दोस्त। जिसने फेसबुक के जरिए दोस्तों को ढूंढकर उनसे मिलने की योजना बनाई। जो अपने इन पाँचों दोस्तों से मिलकर अपने स्कूली जीवन को याद करना चाहता है। सारे मित्र मिलते तो हैं परंतु अपने-अपने औधे का रौब झाड़ते हुए, अपने को एक-दूसरे से बेहतर बताते हुए। लेखक ने कहानी के माध्यम से संकेत किया है, किस तरह बचपन की दोस्ती बड़े होने पर दम तोड़ देती है।

‘घोंघा’ कहानी बहुत छोटी होने के बावजूद भी पाठकों पर अपना प्रभाव छोड़ने से नहीं चूकती। जो यह दर्शाती है कि महानगर में रहने वाले लोग किस तरह महानगर की दौड़-भाग में सिर्फ अपने-आप में सिमटते जा रहे हैं, स्वार्थी होते जा रहे हैं। किस तरह मनुष्य धीरे-धीरे घोंघे के रूप में परिवर्तित होता जा रहा है। ‘कन्हैया’ कहानी में एक युवक इस तरह बांसुरी बजाता हुआ सबको सम्मोहित कर रहा है जिस तरह से कभी कृष्ण ने अपनी बांसुरी की धुन पर लोगों को सम्मोहित किया था। वह व्यक्ति बांसुरी बजाते-बजाते चला जा है और उसके पीछे-पीछे लोगों की भीड़ भी चल रही है। युवा पत्रकार के पूछने पर वह अपना नाम आरिफ बताता है, साथ में ये भी जानकारी देता है कि वह बचपन से ही वह बांसुरी बजा रहा है, इतना ही नहीं नाटकों में उसने कृष्ण की भूमिका भी निभाई है। उसने ‘गीता’ और ‘कुरान’ दोनों ग्रंथों को पढ़ा है। उसका यह मानना है कि जितना वह मुस्लिम है उतना ही वह हिंदू भी है। और इसी कारण मुस्लिम संगठन से उसे धमकियाँ मिलती हैं और हिंदू संगठन के लोग उस पर शक करते हैं। उसकी तहजीब कोई धर्म नहीं है बल्कि उसकी तहजीब तो सिर्फ और सिर्फ हिंदुस्तानी है। वर्तमान समय में यह कहानी बहुत ही प्रासंगिक है। धर्म के नाम पर किस तरह लोग एक-दूसरे का गला काटते आएँ हैं और काट रहे हैं। ऐसे में इस तरह की कहानी का पढ़ा जाना और लिखा जाना अतिआवश्यक है।

‘आमा’, ‘पीतल के गिलास’, ‘पानी में पानी’, ‘ढेंचू’, ‘बाघ’, ‘बिल्ली’ जैसी कहानियाँ पहाड़ी जीवन और सोई हुई मानवीय संवेदनाओं को जागृत करती और औरत के दुःख और बेबसी की कहानियाँ हैं। वहीं दूसरी ओर पत्रकार की भूमिका में लेखक ने सिने जगत का निरिक्षण भी बड़ी बारीकी से किया है- जिसका स्वरूप हमें, ‘हंगल साहब, ज़रा हँस तो दीजिए’, ‘पृथ्वी में शशि’, ‘कपिल शर्मा की हँसी’, और ‘लता मंगेशकर की चोटी’ जैसी कहानियों में दिखाई देता है।

कवि, कहानीकार, पत्रकार की भूमिका में हरि मृदुल जी ने अपने कालखंड को बड़ी साफ़गोई के साथ प्रस्तुत किया है। उनके कलम की धार इसी तरह सदा बनी रहे।
कहानी संग्रह- हंगल साहब, ज़रा हँस तो दीजिए
लेखक- हरि मृदुल
प्रकाशक- आधार प्रकाशन
पृष्ठ – 110
मूल्य – ₹150