संवेदनशील कच्चाथीवू द्वीप मुद्दे पर भारतीय नेताओं का संयम से काम लेना जरूरी

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1938

कच्चाथीवू द्वीप के बदले वेज बैंक मिल चुका है भारत को

भारत को यह मान लेना चाहिए कि चीन हमारा पाकिस्तान से भी ख़तरनाक दुश्मन है। ऐसे हालात में जब बीजिंग हिंद महासागर क्षेत्र में अपने पांव जमाने की कोशिश कर रहा है। तब भारत को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए कि चीन को हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ाने का बहाना मिले। लेकिन तात्कालिक चुनावी लाभ लेने के चक्कर में भारतीय नेता संवेदनशील कच्चाथीवू द्वीप का मुद्दा बार-बार उठा रहे हैं और यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि कच्चाथीवू द्वीप के मुद्दे पर देश के हित से समझौता किया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत सभी भारतीय नेता, ख़ासकर तमिल नेता इसे इतना अधिक उठा रहे है कि श्रीलंका को बयान देना पड़ा कि यह मुद्दा 1974 में ही हल हो चुका है। बात सही भी है। 14वीं सही में ज्वालामुखीय विस्फोट के चलते अस्तित्व में आने वाले महज 285 हेक्टेयर में फैले निर्जन कच्चाथीवू को भारत 1974 में एक समझौते के तहत श्रीलंका को सौंप चुका है। हिंद महासागर के पाक-वे (Palk Bay) समुद्री इलाके में रामेश्वरम से 33 किलोमीटर और जाफना से 24 किलोमीटर दूर स्थित कच्चाथीवू द्वीप को मुफ़्त में श्रीलंका को नहीं दिया था बल्कि उसके एवज में भारत वेज बैंक (Wadge Bank) द्वीप ले चुका है।

कच्चाथीवू द्वीप के मुद्दे पर तमिल जनता की धार्मिक भावना को भुनाने की कोशिश में कोई भी नेता वेज बैंक का नाम नहीं ले रहा है। कोई भी नेता यह नहीं बता रहा है कि अपेक्षाकृत कन्याकुमारी के निकट वेज बैंक कच्चाथीवू द्वीप से कई गुना बड़ा है और कुल 3 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। दरअसल, कच्चाथीवू द्वीप समझौते के बाद 1976 में नई दिल्ली और कोलंबो के बीच एक और करार हुआ था। उसके बाद वेज बैंक (Wadge Bank) पर भारत का अधिकार हो गया था। वेज बैंक को कच्चाथीवू जैसे निर्जन द्वीप के मुक़ाबले अधिक सामरिक महत्व का माना जाता है।

रहस्यमयी भूतों के लिए मशहूर तमिलनाडु के धनुषकोडी द्वीप से केवल 30-32 किलोमीटर दूर स्थित कच्चाथीवू द्वीप यूं तो कई दशक से गुमनामी के गर्भ में डूबा रहता था लेकिन इधर कई साल से यह समय-समय पर सुर्खिया भी बटोरने लगा था। वैसे इस बार इसके चर्चा में आने की वजह भारतीय जनता पार्टी की तमिलनाडु इकाई के अध्यक्ष के अन्नामलाई हैं। सूचना अधिकार के तहत उन्हें जानकारी दी गई कि भारत ने 1974 में 285 एकड़ में बसे कच्चाथीवू को श्रीलंका को दे दिया था। चूंकि यह मामला चुनाव में सुर्खियों में आया है तो तमिलनाडु में कमोबेश हर नेता इसकी चर्चा कर रहा है।

दरअसल, हिंद महासागर में भारत के दक्षिणी छोर पर स्थित कच्चाथीवू द्वीप पर इंसानी बस्तियां नहीं है। 17वीं सदी तक यह द्वीप मदुरई के राजा रामनद के जमींदारी के जमींदारी का हिस्सा था। 1605 में मदुरै के नायक राजवंश ने रामनाथपुरम या रामनाद के रियासत स्थापना की थी। इसमें 69 तटीय गांव और 11 टापू शामिल किए गए थे। उनमें एक टापू कच्चाथीवू भी शामिल था। 1622 और 1635 के बीच रामनाथपुरम के संप्रभु कूथन सेतुपति द्वारा जारी एक तांबे की पट्टिका, वर्तमान श्रीलंका में थलाईमन्नार तक फैले क्षेत्र के भारतीय स्वामित्व की गवाही देती है, जिसमें कच्चाथीवू भी शामिल है, जो सेतुपति राजवंश के लिए नियमित राजस्व का एक स्रोत था।

1767 में, डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने द्वीप को पट्टे पर देने के लिए मुथुरामलिंगा सेतुपति के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, और बाद में, जब भारत में ब्रिटिश हुकूमत आई तो 1822 में, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस द्वीप को रामास्वामी सेतुपति से पट्टे पर ले लिया और यह द्वीप अंग्रेजों के अधीन हो गया। तब से यह ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसे मद्रास प्रेसिडेंसी के अधीन कर दिया था। उसके बाद से इस द्वीप का इस्तेमाल मुख्य तौर पर मछुआरे जाल सुखाने के लिए किया करते थे। 1921 में मछली पकड़ने के लिए भूमि के इस टुकड़े पर दावा किया और तभी से विवाद अनसुलझा रहा।

15 अगस्त 1947 में जब देश आजाद हो गया, तब सरकारी दस्तावेजों में कच्चाथीवू द्वीप को भारत का अभिन्न हिस्सा बताया गया। दूसरी ओर पड़ोसी देश श्रीलंका जिसे उस समय तक सिलोन कहा जाता था ने भी इस द्वीप पर अपना अधिकार जता दिया। लिहाज़ा, लंबे समय तक यह द्वीप भारत और श्रीलंका के बीच विवाद का केंद्र रहा। सीमा उल्लघंन को लेकर दोनों देशों के बीच हमेशा तनाव बना रहता था। 1974 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने काउंटरपार्ट श्रीलंका की राष्ट्रपति श्रीमावो भंडारनायके के साथ मिलकर इस समस्या को हल करने का फैसला किया।

इसके बाद दो अहम बैठके हुई। पहली 26 जून 1974 को कोलंबो में और दूसरी 28 जून 1974 को दिल्ली में हुई। इन दोनों बैठकों में फैसला किया गया कि कच्चाथीवू द्वीप श्रीलंका के पास रहेगा। प्रसावित समझौते में कुछ शर्तें रखी गईं। मसलन, भारतीय मछुवारे अपना जाल सुखाने के लिए इस द्वीप पर आ-जा सकेंगे और इस द्वीप पर बने चर्च में भारतीय नागरिक बिना वीज़ा के जा सकेंगे। कई वार्ताओं के बाद सहमति बन गई दोनों देशों के बीच चार समुद्री सीमा समझौतों पर हस्ताक्षर किए और कच्चाथीवू द्वीप औपचारिक रूप से श्रीलंका को सौंप दिया गया।

दो साल बाद 1976 में भारत और श्रीलंका के बीच समुद्री सीमा को लेकर दो और समझौते हुए। पहले समझौते के तहत वेज बैंक पर भारत का अधिकार हो गया और दूसरे समझौते के तहत मछली पकड़ने के लिए भारतीय मछुआरे के कच्चाथीवू द्वीप और श्रीलंकाई मछआरों के वेज बैंक द्वीप पर जाने से रोक लगा दी गई। लेकिन राजनीतिक पूर्वाग्रह के तहत केवल कच्चाथीवू द्वीप की चर्चा की जाती है। कोई वेज बैंक का नाम तक नहीं लेता। जबकि वेज बैंक समुद्री जंतु और मछलियों से समृद्ध इलाका है। वहां तेल एवं गैस के बड़े भंडार मिले है।

कोई यह नहीं बताता कि जैसे भारतीय मछुआरे श्रीलंका के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन में नहीं जा सकते। उसी तरह श्रीलंका के मछुआरे इंडियन एक्सक्लूसिव अकोनॉमिक ज़ोन में नहीं आ सकते। लिहाजा, अपर्याप्त सूचना के अभाव में तमिलनाडु का मछुवारा समुदाय इस समझौते से काफी ज्यादा ख़फ़ा रहता है। इंदिरा गांधी की सरकार ने जब ये फैसला लिया था तो उस वक्त तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एम करूणानिधि ने केंद्र सरकार के इस फैसले पर ऐतराज जताते हुए भारतीय द्वीप को श्रीलंका को सौंपने के फ़ैसले का ज़ोरदार विरोध किया।

1983 में लंका में गृहयुद्ध के छिड़ने के बाद से, यह द्वीप भारतीय तमिल मछुआरों और सिंहली-प्रभुत्व वाली लंकाई नौसेना के बीच लड़ाई का युद्धक्षेत्र बन गया, जिससे आकस्मिक क्रॉसिंग के कारण भारतीयों की आजीविका, संपत्ति और जीवन का भारी नुकसान हुआ। यही वजह थी कि आपातकाल के बाद 1991 में तमिलनाडु विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया गया। उस प्रस्ताव में 1974 के इंदिरा गांधी-श्रीमावो भंडारनायके समझौते को रद करने और कच्चाथीवू द्वीप को पुनः भारत का हिस्सा बनाने की मांग की गई।

2008 में, तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने भी सुप्रीम कोर्ट से समझौते को रद करने की मांग की थी। सरकार ने दावा किया था कि कच्चाथीवू को श्रीलंका को सौंपना असंवैधानिक था। तर्क दिया गया कि केंद्र बिना संविधान संसोधन के देश की जमीन दूसरे देश को नहीं दे सकता। साल 2011 में जब वह मुख्यमंत्री बनीं तो विधानसभा में प्रस्ताव भी पारित करवाया। लेकिन साल 2014 में उनकी याचिका पर जवाब देते हुए अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा था कि कच्चाथीवू द्वीप एक करार के तहत श्रीलंका को दिया जा चुका है। अब वह इंटरनेशनल बाउंड्री का हिस्सा है। कच्चाथीवू द्वीप को वापिस लेना हैं तो भारत को श्रीलंका से युद्ध लड़ना होगा।

मई 2022 में भी मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने चेन्नई में प्रधानमंत्री की उपस्थिति में कच्चाथीवू द्वीप को श्रीलंका से वापस लेने की मांग की थी। स्टालिन ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे के साथ कच्चाथीवू द्वीप के मुद्दे को उठाने इस द्वीप को पुनः प्राप्त करने की मांग की गई। स्टालिन के पत्र में कहा कि यह द्वीप ऐतिहासिक रूप से भारत का हिस्सा है, और तमिलनाडु के मछुआरे पारंपरिक रूप से इस द्वीप के आसपास के पानी में मछली पकड़ते रहे हैं।

यह बात भी सच है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय संधि को एक पक्ष निरस्त नहीं कर सकता। निश्चित तौर पर, इस संधि को भारत की गारंटी के तौर पर देखा जाना चाहिए। लिहाज़ा, भारत इस संधि से मुकर नहीं सकता। भारतीय नेताओं ने कच्चाथीवू द्वीप को अपना बताने की कोशिश जारी रखी तो इससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में उसकी छवि खराब होगी। इससे दोनों देशों के संबंधों पर बुरा असर पड़ेगा। इससे श्रीलंका में भारत विरोधी भावनाएं उग्र होंगी। चीन इसका सीधा लाभ लेने की कोशिश करेगा। वैसे भी बीजींग श्रीलंका पर तरह-तरह के दवाब और डोरे डालता रहा है। इसलिए कच्चाथीवू द्वीप विवाद को अधिक हवा देना भारत के हित में नहीं होगा।

यह भी सही बात है कि श्रीलंका की नौसेना सीमा का उल्लंघन करने पर अक्सर भारतीय मछुआरों पर गोलियां चला देती है और उनकी नौकाओं को जब्त कर लेती है, क्योंकि भारतीय मछुआरों के सीमा पर गहरे समुद्र में जाकर आधुनिक मशीनों से मछलियां पकड़ने से श्रीलंकाई मछुआरों को नुकसान होता है। वैसे मछुआरों की समस्या को हल करने के लिए दोनों देशों ने 2016 में संयुक्त कार्यदल भी गठित किया था, लेकिन यह कारगर नहीं साबित हुआ। इसलिए इस मसले का स्थायी हल निकालने की पहल भारत को बड़े भाई की भूमिका निभानी पड़ेगी। यह ध्यान में रखना पड़ेगा कि चीन के बहकावे में मालदीव और नेपाल जैसे देश पहले ही आ चुके हैं। इसलिए श्रीलंका जैसे पड़ोसी का हमारा घनिष्ट सहयोगी बना रहना समय की मांग है।

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लेख – हरिगोविंद विश्वकर्मा