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यह कांग्रेस के समय का भारत नहीं, अब कोई थप्पड़ मारेगा तो भारत जबड़ा तोड़ देगाः योगी

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  • उप्र के मुख्यमंत्री लोकसभा चुनाव-2024 के लिए दूसरी बार महाराष्ट्र के चुनावी समर में उतरे
  • एम योगी ने महाराष्ट्र के सोलापुर में भाजपा उम्मीदवार श्रीराम सतपुते के लिए की जनसभा
  • हिंदुओं को अपमानित करने के लिए कांग्रेस ने दिया हिंदू आतंकवाद शब्दः योगी
  • जातीय जनगणना का झुनझुना पकड़ाकर हिंदुओं को लड़ाना चाहती है कांग्रेस
  • कांग्रेस बाबा साहेब का अपमान करती है और मोदी उनके बनाए संविधान की पूजा

सोलापुर। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बुधवार को कहा कि अब कोई दुश्मन देश भारत की सीमा में अतिक्रमण नहीं कर सकता। नक्सलवाद, आतंकवाद समाप्त हो गया। अब पटाखा फूटने पर पाकिस्तान सफाई देता है कि मेरा हाथ नहीं है, क्योंकि उसे पता है कि नया भारत किसी को छेड़ता नहीं, लेकिन छेड़ने वाले को छोड़ता भी नहीं। यह कांग्रेस के समय का भारत नहीं है कि कोई थप्पड़ मारता था तो कहते थे कि रुक जाओ, कहीं माहौल खराब न हो जाए। अब कोई थप्पड़ मारेगा तो नया भारत जोरदार घूसे से उसका जबड़ा तोड़ने की ताकत रखता है।

योगी आदित्यनाथ ने बुधवार को सोलापुर लोकसभा क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी श्रीराम सतपुते के पक्ष में जनसभा को संबोधित करते हुए यह विचार व्यक्ति किया। सीएम योगी दूसरी बार महाराष्ट्र के चुनावी रण में उतरे हैं। सीएम ने कहा कि हिंदुओं को अपमानित करने के लिए इन लोगों ने क्या कुछ नहीं किया। यह वही कांग्रेस है, जिसने राम के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा किया था और हिंदुओं को अपमानित करने के लिए यूपीए सरकार में हिंदू आतंकवाद का शब्द भी दिया था। सीएम ने लोगों से पूछा कि हिंदू आतंकवादी होता है क्या। देश के तत्कालीन गृह मंत्री के परिवार के लोग खूनी पंजे से चुनाव लड़ने आए हैं। आपको उनसे सावधान रहना है। इन लोगों ने यह भी कहा था कि मालेगांव विस्फोट में योगी आदित्यनाथ का भी नाम होगा। हम सीबीआई रेड कराएंगे। हमने कहा कि प्रमाण के साथ भेजना।

सीएम ने आरोप लगाया कि कांग्रेस गुमराह करने के लिए जातीय जनगणना का झुनझुना पकड़ाया है। इसके माध्यम से यह हिंदू जातियों को लड़ाएंगे और जब आरक्षण का मुद्दा इनके मुद्दे से अलग हो जाएगा। हिंदू लड़ने लग जाएगा तो आपके हक को मुसलमानों को देंगे। फिर भारत के इस्लामीकरण-तालीबानीकरण की रूपरेखा कांग्रेस तैयार कर देगी। मजहब के आधार पर फिर से बंटवारा नहीं होने देना है। सीएम योगी ने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की पावन जन्मभूमि से आया हूं। रामजन्मभूमि आंदोलन में महाराष्ट्र के भाजपा व शिवसेना कार्यकर्ताओं ने भी बढ़चढ़ कर भाग लिया और सफलता अर्जित की। पीएम मोदी के प्रयास व सभी के सहयोग से अयोध्या में प्रभु श्रीराम का भव्य मंदिर बन गया है। यह मंदिर भव्य भारत के राष्ट्र मंदिर का चित्रण प्रस्तुत करता है। राम मंदिर इस बात का संकेत है कि हम एकजुट होकर कार्य करेंगे तो सिद्धि जरूर प्राप्त होगी।

सीएम ने कहा कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर कांग्रेस के लोग नहीं बना पाते। वे कहते थे कि राम हुए ही नहीं। जब राम मंदिर का फैसला हो रहा था तो कहते थे कि खून की नदियां बहेंगी। मैंने कहा कि यूपी में हम हैं, मच्छर भी नहीं मरने वाला। यूपी में सात वर्ष में दंगा-कर्फ्यू तक नहीं लगा। यूपी में राम मंदिर बना है तो माफिया का राम नाम सत्य भी हो रहा है। सीएम योगी ने कहा कि दस वर्ष तक बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के संविधान की पूजा, महात्मा फुले के सामाजिक न्याय को अंगीकार, सावित्री बाई फुले के महिला सशक्तिकरण के अभियान और बाला साहब ठाकरे के हिंदुत्व की प्रचंड ज्वाला को बढ़ाते हुए पीएम मोदी ने जो शंखनाद किया है, उसका परिणाम है कि 140 करोड़ भारतवासियों का दुनिया में सम्मान बढ़ा है। इनके विचारों की प्रेरणा पीएम मोदी के एक-एक कार्यों में झलकती है।

सीएम ने पूछा कि मोदी जी ने सबका साथ, सबका विकास का नारा दिया। इसमें संविधान बदलने की बात कहां आती है। मोदी जी भीमराव आंबेडकर के संविधान की पूजा करते हैं। जब नया संसद बन रहा था तो मोदी जी संविधान को सिर पर लेकर जा रहे थे और कह रहे थे कि भारत का सबसे पवित्र ग्रंथ यही है, लेकिन कांग्रेस के लोगों ने भीमराव आंबेडकर का खूब अपमान किया। सीएम ने अपील की कि जिन्होंने राम मंदिर के मार्ग पर रोड़े अटकाए और हिंदुओं को आतंकवादी कहा, उन्हें कतई वोट नहीं देना है। पूरा देश कह रहा है कि जो राम को लाए हैं, हम उनको लाएंगे। सीएम ने आश्वासन दिया कि जैसा परिवर्तन यूपी में दिखा है, वैसा ही परिवर्तन देश में भाजपा सरकारों में देखने को मिलेगा।

इस अवसर पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले, सोलापुर के सांसद जय सिद्धेश्वर महास्वामी, विधायक सुभाष देशमुख, विजय देशमुख, सचिन कल्याण शेट्टी, मंत्री चंद्रकांत दादा पाटिल, महाराषट्र सरकार के मंत्री व शिवसेना के उपनेता गुलाब राव पाटिल, भाजपा जिलाध्यक्ष नरेंद्र काले, लोकसभा संयोजक विक्रम देशमुख आदि मौजूद रहे।

काया में लघु, असर में बृहद

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हंगल साहब, जरा हँस दीजिए
डॉ. मधुबाला शुक्ल

‘हंगल साहब, जरा हँस दीजिए’ हरि मृदुल जी का पहला कहानी संग्रह है। इस कहानी संग्रह में लघु-बृहद मिलाकर कुल 20 कहानियों का समावेश है। हर कहानी पाठकों के हृदय को झकझोरती हुई नजर आती है, पाठकों को सोचने पर मजबूर करती है। हर एक कहानी व्यक्ति के जीवन से कहीं न कहीं जुड़ी हुई है।

हरि मृदुल जी का जन्म उत्तराखंड के बगोटी गाँव में हुआ तो जाहिर सी बात है कि उनकी कहानियों में उत्तराखंड का उल्लेख मिलना स्वाभाविक है। उत्तराखंड की भूमि से, गाँव से, नाते रिश्तेदारों से और दोस्तों से जुड़ी हुई कहानियों का समावेश इस संग्रह में है। वहीं दूसरी और रोजी-रोटी की तलाश में महानगर की जीवन शैली का यथार्थता परक सदृश्य विवरण भी है।

संग्रह की पहली कहानी ‘अर्जन्या’ आपातकाल के दृश्य को विवेचित करती है। जिसमें तानाशाही सत्ता का शिकार अर्जुन राम का जबरन नसबंदी करवा देना सत्ता के जुल्म की कहानी कहता है। ‘कुत्ते दिन’ कहानी प्रिंट मीडिया और दृश्य मीडिया से गुम हो रहे खबरों की कहानी है। जहाँ वर्तमान समय में प्राइवेट चैनल्स अपनी-अपनी टीआरपी बढ़ाने की होड़ में लगे हैं। सभी बड़े न्यूज चैनलों का स्तर गिरता जा रहा है। खबरों को चटपटा, मसालेदार बनाकर दर्शकों के समक्ष परोसा जा रहा है। खबरों के नाम पर परोसी जा रही इसी विकृत मानसिकता को कहानी के माध्यम से चित्रित किया गया है। और इससे एक सामान्य व्यक्ति आहत होते हुए भी कुछ न कर सकने में असमर्थ है। जिसका विस्तृत विवरण इस कहानी में देखा जा सकता है।

‘पटरी पर गाड़ी’ कहानी जुलाई 2005 की दास्तान कहती नजर आती है। उस साल को कोई भी मुंबईकर नहीं भुला सकता। इस बाढ़ से संबंधित कोई न कोई कहानी प्रत्येक मुंबइकर से जुड़ी होगी। न जाने कितने जानमाल की हानि हुई, इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है। हाँ, सरकारी आँकड़े जरूर सामने आए परंतु उसमें कितनी सत्यता है, ये सभी मुंबईकर जानते हैं। लेखक ने बड़ी साफगोई से सत्यता के साथ दिल दहला देने वाली कहानी को लिपिबद्ध किया है। मैं ये दावे से कह सकती हूँ कि बिना आँखें नम किए हुए कोई भी इसे पूरी तरह पढ़ लें। वहीं ‘आलू’ कहानी में एक पिता अपने छोटे से बच्चे को यह समझा पाने में असमर्थ है कि पंद्रह रुपए वेफर के पैकेट में पाँच रूपए की हवा, पाँच रूपए का चमकीला रैपर और सिर्फ पाँच रुपए का ही वेफर मिलता है। बाजार में लूट मचा रही इन ब्रांडेड कंपनियों की तरफ लेखक ने इशारा किया है जो उपभोक्ताओं को बेवकूफ बना रही हैं। और सबसे बड़ी बात यह उपभोक्ता भलीभाँति जानते हैं कि वे बेवकूफ बनाए जा रहे हैं, परंतु उदारीकरण के इस दौर में वे कब तक इससे अछूते रह सकते हैं।

‘ई कौन नगरिया’ कहानी महानगर के संघर्ष को चित्रित करती नजर आती है। अपने सपनों को पूरा करने के लिए भिन्न-भिन्न राज्यों से, कस्बों से लोग महानगरों में आते हैं। परंतु कितने ही लोग हैं जो अपने ख्वाबों को पूरा कर पाते हैं..? कुछ साल संघर्ष करते हुए हाथ-पैर मारते हैं और सफलता न मिलने पर वापस लौट जाते हैं। कुछ लोग यहीं रहकर अपनी सफलता की प्रतीक्षा करते हैं। वैश्वीकरण के दौर में जब केबल के द्वारा प्राइवेट चैनलों ने हमारे घरों में जबरन घुसपैठ की और हमने उन्हें अपना पैर मजबूती के साथ जमाने का मौका भी दिया। उसका जो प्रभाव हमारी भारतीय संस्कृति पर, लोगों पर पड़ा, उसका विस्तृत विवेचन ‘धनुष-बाण’ कहानी में लेखक ने किया है। वर्तमान समय में इसका बिगड़ा हुआ स्वरूप हमारे समक्ष है।

पिता ही वह व्यक्ति है जो परिवार को प्यार और सहयोग प्रदान करता है। साथ ही, वह परिवार की रक्षा भी करता है। उसकी पत्नी उसकी ताकत, उसका साहस होती है। जब तक पत्नी उसके साथ है, तब तक समस्याओं का निवारण उस तक पहुँचने से पहले ही हो जाता है। ‘मैं पिता को देख रहा था’ एक ऐसी ही कहानी है जो अपनी पत्नी के चले जाने के बाद, करीने से, सहेजकर रखी गई वस्तुओं को एकटक देखते हुए उन वस्तुओं से, उन पशुओं से, चूल्हे के पास, जिस-जिस स्थान पर उसकी पत्नी बैठती थी वो उन सबसे बातें करता दिखाई देता है और इस पिता को देख रहा होता है उसका… बालक… ‘पैंतीस साल बाद, पाँच दोस्त’ कहानी पाँच दोस्तों की है। उदयभानु-दरोगा, भोलानाथ-प्रोफेसर, रविशंकर-वकील, रघु-रिक्शावाला, कौशल किशोर-ज्योतिषी और इनके एक साथ मिलने का सूत्र है, मीडिया हाउस में काम करने वाला मीडियाकर्मी दोस्त। जिसने फेसबुक के जरिए दोस्तों को ढूंढकर उनसे मिलने की योजना बनाई। जो अपने इन पाँचों दोस्तों से मिलकर अपने स्कूली जीवन को याद करना चाहता है। सारे मित्र मिलते तो हैं परंतु अपने-अपने औधे का रौब झाड़ते हुए, अपने को एक-दूसरे से बेहतर बताते हुए। लेखक ने कहानी के माध्यम से संकेत किया है, किस तरह बचपन की दोस्ती बड़े होने पर दम तोड़ देती है।

‘घोंघा’ कहानी बहुत छोटी होने के बावजूद भी पाठकों पर अपना प्रभाव छोड़ने से नहीं चूकती। जो यह दर्शाती है कि महानगर में रहने वाले लोग किस तरह महानगर की दौड़-भाग में सिर्फ अपने-आप में सिमटते जा रहे हैं, स्वार्थी होते जा रहे हैं। किस तरह मनुष्य धीरे-धीरे घोंघे के रूप में परिवर्तित होता जा रहा है। ‘कन्हैया’ कहानी में एक युवक इस तरह बांसुरी बजाता हुआ सबको सम्मोहित कर रहा है जिस तरह से कभी कृष्ण ने अपनी बांसुरी की धुन पर लोगों को सम्मोहित किया था। वह व्यक्ति बांसुरी बजाते-बजाते चला जा है और उसके पीछे-पीछे लोगों की भीड़ भी चल रही है। युवा पत्रकार के पूछने पर वह अपना नाम आरिफ बताता है, साथ में ये भी जानकारी देता है कि वह बचपन से ही वह बांसुरी बजा रहा है, इतना ही नहीं नाटकों में उसने कृष्ण की भूमिका भी निभाई है। उसने ‘गीता’ और ‘कुरान’ दोनों ग्रंथों को पढ़ा है। उसका यह मानना है कि जितना वह मुस्लिम है उतना ही वह हिंदू भी है। और इसी कारण मुस्लिम संगठन से उसे धमकियाँ मिलती हैं और हिंदू संगठन के लोग उस पर शक करते हैं। उसकी तहजीब कोई धर्म नहीं है बल्कि उसकी तहजीब तो सिर्फ और सिर्फ हिंदुस्तानी है। वर्तमान समय में यह कहानी बहुत ही प्रासंगिक है। धर्म के नाम पर किस तरह लोग एक-दूसरे का गला काटते आएँ हैं और काट रहे हैं। ऐसे में इस तरह की कहानी का पढ़ा जाना और लिखा जाना अतिआवश्यक है।

‘आमा’, ‘पीतल के गिलास’, ‘पानी में पानी’, ‘ढेंचू’, ‘बाघ’, ‘बिल्ली’ जैसी कहानियाँ पहाड़ी जीवन और सोई हुई मानवीय संवेदनाओं को जागृत करती और औरत के दुःख और बेबसी की कहानियाँ हैं। वहीं दूसरी ओर पत्रकार की भूमिका में लेखक ने सिने जगत का निरिक्षण भी बड़ी बारीकी से किया है- जिसका स्वरूप हमें, ‘हंगल साहब, ज़रा हँस तो दीजिए’, ‘पृथ्वी में शशि’, ‘कपिल शर्मा की हँसी’, और ‘लता मंगेशकर की चोटी’ जैसी कहानियों में दिखाई देता है।

कवि, कहानीकार, पत्रकार की भूमिका में हरि मृदुल जी ने अपने कालखंड को बड़ी साफ़गोई के साथ प्रस्तुत किया है। उनके कलम की धार इसी तरह सदा बनी रहे।
कहानी संग्रह- हंगल साहब, ज़रा हँस तो दीजिए
लेखक- हरि मृदुल
प्रकाशक- आधार प्रकाशन
पृष्ठ – 110
मूल्य – ₹150

रीमा राय सिंह के काव्य संग्रह ‘अक्षर तूलिका’ पर परिचर्चा

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संवाददाता

मुंबई, चित्रनगरी संवाद मंच मुंबई के साहित्यिक परिचर्चा में वरिष्ठ कथाकार सूरज प्रकाश, निर्देशक राजशेखर व्यास और गीतकार देवमणि पांडेय की उपस्थिति में कवयित्री रीमा राय सिंह के काव्य संग्रह ‘अक्षर तूलिका’ पर परिचर्चा हुई। पहले सत्र में सृजन संवाद कार्यक्रम में साहित्य और सिनेमा के रिश्तों पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई और अंत में कुछ चुनिंदा कवियों का काव्यपाठ भी हुआ।

गोरेगांव पश्चिम के केशव गोरे हाल में रविवार की शाम हुए साप्ताहिक प्रोग्राम में अपनी कविताओं का जिक्र करते हुए रीमा राय ने कहा, “जीवन में जब मौन प्रस्फुटित होता है तो शब्द का आकार लेता है और वे शब्द जब भावों के मोतियों के रूप में संकलित होतें है तब कविता का जन्म होता है। ‘अक्षरतूलिका’ ऐसे भावों को समेटती विविध प्रकार की कविताओं का वह संकलन है जिसे मैंने अपने दैनिक जीवन में महसूस किया।”

रीमा राय ने कहा, “एक स्त्री के रूप में घर और घर से बाहर होने वाली घटनाओं और उस पर विविध प्रकार प्रतिक्रियाएं एक रचनाकार के रूप में जाने अनजाने मुझे भी आंदोलित करती रहती हैं जिसे मैंने मानवीय सम्वेदनाओं के आधार पर एक भावनात्मक स्वरुप प्रदान करने का एक प्रयास किया है। इस किताब की कविताएँ उन मनोभाओं पर आधारित है जिन्होनें मेरे अपने जीवन और मेरे आस-पास की होने वाली परिस्थितियों के आधार पर मुझे लिखने के लिए प्रेरित किया।”

अक्षर तूलिका की कविताएं छंद मुक्त और सरल भाषा में हैं। पाठक इनमें मौजूद वेदनाओं, संवेदनाओं, खामोशियों और रुसवाइयों जैसे भावों से रूबरू हो सकते हैं। किताब में सूरज प्रकाश, डॉ प्रमोद कुश ’तन्हा’ और डॉ रोशनी किरण की टिप्पणियां हैं। इस परिचर्चा में डॉ वर्षा महेश, डॉ पूजा अलापुरिया, सविता दत्त और राजीव मिश्र ने हिस्सा लिया। इस मौके पर रीमा राय सिंह ने अपने कविता संग्रह की कुछ कविताओं का पाठ भी किया, जिसे बौद्धिक वर्ग के श्रोताओं ने खूब सराहा।

पहले सत्र में चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई के सृजन संवाद कार्यक्रम में साहित्य और सिनेमा के रिश्तों पर महत्वपूर्ण चर्चा हुई। कार्यक्रम में प्रस्तावना पेश करते हुए कथाकार सूरज प्रकाश ने चर्चा के लिए कुछ मुद्दे सामने रखे। उन्होंने कहा कि साहित्य को सिनेमा में तब्दील करते समय क्या चुनौतियां आती हैं इस पर विचार की ज़रूरत है। साहित्य पर आधारित फ़िल्म की सफलता और असफलता के मानदंड क्या हैं? एक ही कथाकार मन्नू भंडारी की कहानी पर ‘रजनीगंधा’ फ़िल्म कामयाब होती है और उन्हीं की कथा ‘आपका बंटी’ पर आधारित फ़िल्म क्यों फ्लाप हो जाती है, इस पर चर्चा की आवश्यकता है।

सुप्रसिद्ध लेखक संपादक, निर्माता निर्देशक एवं दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक राजशेखर व्यास ने कहा कि जब कोई साहित्यकार अपनी कृति फ़िल्म निर्माण के लिए किसी फ़िल्मकार को देता है तो उसे भूल जाना चाहिए कि इस पर मेरा कोई हक़ है। जब साहित्य पर फ़िल्म बनती है तो उस पर निर्देशक का अधिकार हो जाता है। सिनेमा निर्देशक का माध्यम है। इसलिए निर्देशक सिनेमाई ज़रूरत के अनुसार साहित्यिक कृति में मनचाहा बदलाव कर सकता है।

श्री व्यास ने अपने पिता पद्मभूषण सूर्यनारायण व्यास को याद करते हुए कहा कि उन्होंने सम्राट विक्रमादित्य और कवि कालिदास पर फ़िल्मों का निर्माण किया था और दोनों फ़िल्में कामयाब हुई थीं। सिने जगत में साहित्यकारों का आवागमन काफ़ी पुराना है। सन् 1924 में यानी मूक फ़िल्मों के ज़माने में पांडेय बेचन शर्मा उग्र मुंबई आ गए थे। उन्होंने यहां के फ़िल्मी माहौल पर संस्मरण भी लिखा। व्यास जी ने उग्र जी का रोचक संस्मरण पढ़कर सुनाया।

इस सृजन सम्वाद में फ़िल्म, गोदान, और ‘तीसरी क़सम’ से लेकर ‘शतरंज के खिलाड़ी’ तक पर बढ़िया चर्चा हुई। ‘धरोहर’ के अंतर्गत अभिनेता शैलेंद्र गौड़ ने प्रख्यात कवि राजेश जोशी की कविता ‘बच्चे काम पर जा रहे हैं’ का पाठ असरदार ढंग से किया। प्रतापगढ़ से पधारे वरिष्ठ कवि राजमूर्ति सौरभ का परिचय राजेश ऋतुपर्ण ने दिया। सौरभ ने अपनी चुनिंदा ग़ज़लें, दोहे और गीत सुनाए। उनकी रचनाओं को भरपूर सराहा गया। श्रोताओं की फरमाइश पर उन्होंने अवधी भाषा में भी काव्य पाठ किया। शायर नवीन जोशी नवा और कवि राजेश ऋतुपर्ण ने काव्य पाठ के सिलसिले को आगे बढ़ाया।

 

 

नारायण दत्त तिवारी की तरह “बायोलॉजिकल फादर” बनने की राह पर रवि किशन (Ravi Kishan on the path to becoming a “biological father” like ND Tiwari)

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रवि किशन अपर्णा सोनी और उसकी बेटी शिनोवा के साथ... फोटो साभार -डेक्कन हेराल्ड

एडवोकेट अशोक सारावगी ने कहा कि वह शिनोवा अदालत से न्याय दिलवाएंगे

अभिनेता और भाजपा सांसद रवि किशन शुक्ला कांग्रेस नेता स्वर्गीय नारायण दत्त तिवारी की तरह “बायोलॉजिकल फादर” बनने की राह पर हैं। जैसे रोहित शेखर नाम के युवक ने 2008 में अचानक एनडी तिवारी को अपना जैविक पिता बता दिया था और उसके बाद दिल्ली हाई कोर्ट के दख़ल के बाद दोनों का डीएनए टेस्ट हुआ, जिसमें तिवारी रोहित के पिता निकले, उसी तरह मुंबई के मालाड में रहने वाली शिनोवा सोनी (Shinova Soni) नाम की युवती ने रवि किशन को अपना बायोलॉजिक फादर बताया है। उसने अपने दावे की पुष्टि के लिए रवि किशन का बायोलॉजिकल टेस्ट कराने की मांग करते हुए मुंबई के सेशन कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया है। अगर शिनोवा का डीएनए रवि किशन से मिल जाता है तो उनकी भी हालत एनडी तिवारी जैसी हो जाएगी। 25 वर्षीय शिनोवा सोनी ने रवि किशन की पत्नी प्रीति शुक्ला की ओर से दर्ज कराई गई एफआईआर अपराध साबित करने की भी खुली चुनौती दी है।

रवि किशन की कथित “बायोलॉजिकल बेटी” शिनोवा ने मुंबई से सेशन कोर्ट में एडवोकेट अशोक सारावगी के माध्यम से एक याचिका दाख़िल की है। अशोक सारावगी ने कहा कि वह शिनोवा को इंसाफ़ दिलाकर रहेंगे। बहरहाल, याचिका में उसने दावा किया है कि वह रवि किशन की ही बायोजॉलिकल बेटी है। अपने दावे को साबित करने का उसके पास पर्याप्त प्रमाण भी हैं। उसने अपने दावे की पुष्टि के लिए अपना और रवि किशन का डीएनए टेस्ट कराने की भी मांग की है। इससे पहले शिनोवा सोनी ने अपनी माता अपर्णा सोनी (Aparna Soni) उर्फ ​​अपर्णा ठाकुर के साथ पिछले सोमवार को लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। पत्रकारों के सामने उसकी मां अपर्णा ने दावा किया था कि रवि किशन उनकी 25 वर्षीय बेटी शिनोवा के पिता हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि रवि किशन उनकी बेटी को अपनी बेटी के हक से वंचित कर रहे हैं।

शिनोवा के अदालत में चले जाने के बाद रवि किशन वाक़ई गंभीर विवाद में घिर गए हैं। दरअसल, अपर्णा कई साल से कहती आ रही हैं कि रवि किशन ही उनकी बेटी शिनोवा के पिता हैं। शिनोवा सोनी भी खुद को रवि किशन की बेटी बताती रही हैं। हालांकि उसने अपने फिल्मी करियर के लिए रवि किशन के नाम का इस्तेमाल नहीं किया। शिनोवा तो कोर्ट के माध्यम से डीएनए टेस्ट के लिए भी तैयार हैं। अपर्णा का कहना है कि उनके पास कई सबूत हैं, जो उनके दावे को सही साबित कर सकते हैं और उन्हें इंसाफ़ दिला सकते हैं। हालांकि रवि किशन ने सभी आरोपों को ख़ारिज़ किया है। उनकी पत्नी पत्नी प्रीति शुक्ला ने अपर्णा समेत कई लोगों के ख़िलाफ़ FIR भी दर्ज करवा दिया है। रवि किशन की पत्नी का कहना है कि एक साल से अपर्णा ने उन्हें ब्लैकमेल करती आ रही है।

प्रीति शुक्ला ने लखनऊ के हजरतगंज पुलिस स्टेशन में अपर्णा सोनी, उनके पति राजेश सोनी, बेटी शिनोवा सोनी, बेटे सौनक सोनी, वकील विवेक पांडे और यू-ट्यूबर पत्रकार खुर्शीद खान के खिलाफ FIR भी दर्ज करवाई है। सभी लोगों पर IPC की धारा 120बी, 195, 386, 388, 504 और 506 के तहत आरोप लगाए गए हैं। अपनी शिकायत में प्रीति शुक्ला ने आरोप लगाया है कि अपर्णा ने उन्हें अंडरवर्ल्ड की धमकी दी थी। प्रीति शुक्ला ने दावा किया कि अपर्णा ने उनसे कहती है, “अगर तुम बात नहीं मानोगी तो मैं तुम्हारे पति को झूठे बलात्कार के मामले में फंसा दूंगी।” एफआईआर में अपर्णा द्वारा 20 करोड़ रुपए हफ्ता मांगने का भी जिक्र किया गया है। ऐसी ही शिकायत प्रीति शुक्ला ने मुंबई में भी दर्ज कराई गई है। अपनी शिकायत में उन्होंने चिंता व्यक्त की है कि अपर्णा की हरकतों का उद्देश्य उन्हें और उनके पति, जो गोरखपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं, को बदनाम करके चुनाव को प्रभावित करना है।

रवि किशन अपर्णा सोनी और उसकी बेटी शिनोवा के साथ…

उधर, अपर्णा सोनी उर्फ अपर्णा ठाकुर ने 20 करोड़ रुपए की अलग ही कहानी बताई है। उन्होंने कहा है कि उन्होंने रवि किशन से उनकी ही बेटी के भरण-पोषण के लिए 20 करोड़ की मांग करते हुए 12 मई 2023 को ही विधिवत अपने वकील के माध्यम से लीगल नोटिस भेजा था। उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने 10 महीने पहले अपने मुंबई के वकील के माध्यम से रवि किशन को कानूनी नोटिस भेजा था, जिसमें उन्होंने अपनी बेटी की शिक्षा, शादी और उसके ख़ुशहाल भविष्य के लिए 20 करोड़ रुपए की मांग की थी, लेकिन उन्हें अब तक नोटिस का कोई जवाब नहीं मिला है। अपर्णा ने अपने वकील के ज़रिए रवि किशन को उनके सांसद नई दिल्ली के आवास के साथ-साथ मुंबई के अंधेरी और गोरेगांव के फ्लैट वाले पते पर इस नोटिस को भेजा था।

लीगल नोटिस के मुताबिक रवि किशन के मोबाइल नंबर और मेल आईडी पर भी इस लीगल नोटिस की कॉपी भेज दी गई थी। अपर्णा की तरफ से रवि किशन को भेजी गई 8 पेज की लीगल नोटिस में रवि किशन और अपर्णा सोनी के संबंधों के बारे में विस्तार से लिखा गया है। रवि किशन और अपर्णा सोनी की लव स्टोरी एकदम फिल्मी है। दरअसल, रवि किशन और अपर्णा सोनी एक दूसरे के संपर्क में वर्ष 1995 में आए। तब रवि किशन फिल्म उद्योग में अपना स्थान बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। तब रवि किशन के पास न तो नेम था न फेम और न ही अपना घर। उनकी शादी हो गई थी, लेकिन पत्नी गांव में रहती थी। लकेिन उन्होंने कभी यह नहीं बताया कि वह शादीशुदा हैं। अपर्णा सोनी तब पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करके पत्रकारिता कर रही थी। लिहाज़ा, पहली मुलाक़ात के बाद दोनों एक दूसरे के प्रति स्वाभाविक रूप से आकृष्ट हो गए।

रवि किशन अपर्णा सोनी और उसकी बेटी शिनोवा के साथ…

देखने में बेहद ख़ूबसूरत अपर्णा से मुलाकात के बाद पहली नज़र में ही रवि किशन उन्हें दिल दे बैठे। उन्होंने दूसरी ही मुलाकात में अपर्णा को प्रपोज कर दिया था। इसके वे दोनों रिलेशनशिप में आ गए थे और उनका रिश्ता पूरी तरह परवान चढ़ गया। रवि किशन ने खुद को कुंवारा बताते हुए अपर्णा की मां के सामने शादी का प्रस्ताव भी रख दिया। अपर्णा की मां ने ख़ुश हुई कि उनकी बेटी का घर बस जाएगा। उसे अच्छा और प्यार करने वाला लड़का मिल गया है। उन्होंने तय कर लिया कि यथाशीघ्र अपर्णा की रवि किशन से शादी करवा देंगी। लिहाज़ा, अपर्णा की मां के मालाड के समाधान अपार्टमेंट के फ्लैट में रवि किशन और अपर्णा साथ-साथ रहने लगे। अपर्णा 1996 में रवि किशन के साथ परिणय सूत्र में बंध गई थी। वह रवि किशन के नाम का सिंदूर और मंगलसूत्र पहनती थीं। इसी दौरान वह प्रेग्नेंट भी हो गई। 19 अक्टूबर 1998 को बेटी शिनोवा का जन्म हुआ। साथ में रहते हुए रवि किशन अपर्णा को अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से अपनी पत्नी के रूप में मिलवाते थे।

शिनोवा का जन्म होने के बाद अपर्णा को एक दिन किसी से रवि किशन के पहले से ही शादीशुदा होने और एक बेटी का पिता होने की जानकारी मिली। भावी पति के शादीशुदा और एक बेटी का बांप होने की ख़बर से अपर्णा सोनी को बहुत बड़ा सदमा लगा। तब रवि किशन ने उन्हें अपनी पत्नी के तौर पर लोगों से उन्हें मिलवाया है। चूंकि अपर्णा भी रवि किशन से बेपनाह मोहब्बत करने लगीं थी। लिहाज़ा, उन्होंने बड़ा दिल दिखाते हुए फिल्म इंडस्ट्री में संघर्ष कर रहे रवि किशन को अपनी पत्नी प्रीति शुक्ला और बेटी रिवा किशन के साथ रहने के लिए अपना फ्लैट दे दिया। उस समय घर तो दूर रवि किशन के पास तब अपनी पत्नी और बेटी को साथ रखने की जगह भी नहीं थी। इसके बाद रवि किशन अपर्णा के गोकुल गैलेक्सी, ठाकुर कंपलेक्स, कांदिवली पूर्व, मुंबई के फ्लैट में रहने लगे। अपर्णा ने कह दिया कि वैकल्पिक इंतज़ाम होने तक वह इस घर में रह सकते हैं।

अपर्णा के भेजे 8 पेज के लीगल नोटिस का हिस्सा। साभार – सोशल मीडिया

इसी बीच अपर्णा को रवि किशन के फिल्म इंडस्ट्री की दूसरी अभिनेत्रियों के साथ रिश्तों के बारे में भी जानकारी मिली। अपर्णा बताती हैं कि ख़ुद प्रीति रवि किशन के रिश्तों से परेशान रहा करती थीं। प्रीति ने ही उन्हें रवि किशन के सारे अफेयर्स के बारे में बताया था। इसके बाद उन्हें रवि किशन के असली चरित्र के बारे में जानकारी हुई। उन्होंने यह भई महसूस किया कि धीरे-धीरे रवि किशन उनसे और उनकी बेटी से दूरी बनाते जा रहे हैं। साल 2009 के बाद रवि किशन ने ख़ुद को अपर्णा और बेटी शिनोवा से पूरी तरह से अलग कर लिया। शिनोवा का जैविक पिता होने के बावजूद उन्होंने अपनी जिम्मेदारी नहीं उठाई। अपर्णा का कहना है कि उन्होंने हमेशा झूठे वादे किए और बहानेबाज़ी करते हुए अपनी ज़िम्मेदारियों से बचते रहे। बेटी के पालन पोषण करने के लिए अपर्णा ने कई बार उनसे आर्थिक मदद मांगी, लेकिन रवि किशन ने कभी कोई मदद नहीं की। लीगल नोटिस में अक्टूबर 2018 की एक घटना का ज़िक्र है। तब रवि किशन गोरेगांव के वेस्टइन होटल में रुके थे। उन्होंने अपर्णा और शिनोवा के मिलने के लिए होटल में बुलाया।

अपर्णा बेटी ने मुलाकात के दौरान रवि किशन से शिनोवा को अपना नाम देने की गुज़ारिश की। इस पर वह भड़क गए और बेटी के साथ ने दुर्व्यवहार किया। उसे अपशब्द भी कहा। इन तमाम तथ्यों का ज़िक्र करते हुए अपर्णा के वकील की तरफ से भेजे गए नोटिस में रवि किशन से अपर्णा और बेटी शिनोवा के वन टाइम मेंटेनेंस के रूप में 20 करोड़ रुपए की मांग की गई। साथ ही कहा गया कि बेटी का जैविक पिता होने के चलते रवि किशन को उसे अपनाना होगा और अपना नाम देना होगा। यह नोटिस अपर्णा ने अपने वकील नीरज गुप्ता के माध्यम से भेजा था। अपर्णा के लखनऊ के वकील विवेक पांडे ने भी पिछले 13 मार्च 2024 को इस पूरे मामले की शिकायत केंद्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, प्रधानमंत्री और चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया से की है।

रवि किशन बेटी शिनोवा के साथ

कौन हैं शिनोवा सोनी? (Who is Shinova Soni?)
शिनोवा सोनी ने आर्ट से ग्रेजुएशन किया है। वह एक्टिंग करती है। वह कुणाल कोहली की वेब सीरीज में भी काम कर चुकी है। वह साउथ की फिल्में भी कर रही है और उसने कुछ विज्ञापनों में भी काम किया है। शिनोवा ने बताया कि जब वह 15 साल की थी, तब उसे पता चला कि रवि किशन उनके पिता हैं। शिनोवा ने कहा, “जब मुझे पता चला था कि वह मेरे पापा हैं, तो मैंने उनसे फोन पर भी बात की थी। मैंने उनसे कहा था कि मुझे आपसे मिलना है और आपको जानना है। आपसे बात करनी है। उस दौरान वह मुझसे बात भी किया करते थे। जब भी रवि किशन उससे मिलने आते थे तो वह उससे कहते थे कि वह उसके पापा हैं। वह कहते थे कि तुम मेरी बेटी हो, मैं हमेशा तुम्हारे लिए खड़ा हूं।”

शिनोवा का कहना है, “मैंने अपने पापा रवि किशन की कई सारी फिल्में भी देखी हैं। मैं अक्सर उनसे उनकी फिल्मों के बारे में बातें किया करती थी। मैं उनके काम को पसंद भी करती थी। लेकिन उन्होंने अचानक मुझे फोन करना बंद कर दिया। मुझे लगा कि शायद वह बिजी रहते होंगे। मगर जब उन्होंने मुझे एक साल तक कोई मैसेज या फोन नहीं किया, तो मुझे बहुत अजीब लगा। शिनोवा ने आगे बताया, “मेरी मां उन्हें हर 19 अक्टूबर को याद दिलाती थी कि आज आपकी बेटी का जन्मदिन है, उसे फोन कर लो। लेकिन फिर भी वह मुझे बर्थडे विश नहीं करते थे। मुझे समझ में ही नहीं आ रहा था कि वह अचानक मुझे और मॉम को इग्नोर क्यों करने लगे हैं?” शिनोवा का कहना है कि वह सिर्फ इतना चाहती है कि रवि किशन उसे स्वीकर कर लें।

रवि किशन शिनोवा के साथ…

शिनोवा का कहना है, “रवि किशन चार साल पहले तक मुझसे बातें किया करते थे। उसके बाद मुझे लगा कि वह अचानक इग्नोर कर रहे हैं। इसलिए अब मैंने अपनी मां के साथ न्याय के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटाने का फ़ैसला किया है। मैं कभी मीडिया या कोर्ट में नहीं आने वाली थी। मुझे इन सबमें अपना नाम ही नहीं घसीटना था। लेकिन उनके व्यवहार के चलते मैं उनसे बेहद नफरत करने लगी हूं। कई बार मुझे लगा कि मुझे उस इंसान से बात नहीं करनी चाहिए। मगर अब बहुत हो चुका है। अगर आप मेरे पापा हैं तो सामने आइए और मुझे स्वीकर करिए। आख़िर मेरी इन सब में क्या गलती है। मैं तो आपकी ही अंश हूं।”

शिनोवा सोनी ने यह भी कहा कि जब पानी सिर से ऊपर चला गया तो हमें लगा कि हमें कोर्ट जाना चाहिए और डीएनए टेस्ट के तहत सच को सामने लाना चाहिए। उसे रवि किशन से कुछ भी नहीं चाहिए। उसने फिल्म लाइन में भी कभी रवि किशन के नाम का कोई इस्तेमाल नहीं किया। उसे सिर्फ़ जानना है कि आख़िर रवि किशन ने उनके साथ ऐसा क्यों किया? आख़िर वह इतने झूठ क्यों बोलते रहे हैं? शिनोवा का कहना है कि वह सिर्फ़ इतना चाहती हैं कि रवि किशन स्वीकार कर लें कि वह उनकी बेटी हैं या खुद सामने आकर सच बता दें।

उज्जवला शर्मा और रोहित शेखर के साथ कांग्रेस नेता एनडी तिवारी

कुछ इसी तरह नारायण दत्त तिवारी और रोहित शेखर तिवारी की कहानी भी बड़ी दिलचस्प रही है। दरअसल, नारायण दत्त तिवारी 1990 के दशक में राजीव गांधी की हत्या के बाद पीवी अर्जुन सिंह, नरसिंह राव और शरद पवार जैसे नेताओं के साथ प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे परंतु नरसिंह राव के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद दरकिरान कर दिए गए। वर्ष 2008 में पहली बार रोहित शेखर पिता का हक पाने के लिए पहली बार दिल्ली कोर्ट में गए थे। तो अचानक पूरे देश में सनसनी फैल गई। संयोग से उस समय रोहित शेखर का मुक़दना अशोक सारावगी ही लड़ रहे थे। रोहित शेखर उन्होंने दावा किया था कि वह एनडी तिवारी और उज्ज्वला शर्मा के पुत्र हैं। लेकिन एनडी तिवारी ने दिल्ली हाईकोर्ट में इस केस को ख़ारिज़ करने की गुहार लगाई, लेकिन इसे अस्वीकार कर दिया गया।

कोर्ट ने 23 दिसंबर 2010 को एनडी तिवारी को सैंपल देने का आदेश दिया। उस पर एनडी तिवारी सुप्रीम कोर्ट चले गए, लेकिन वहां भी फैसला रोहित शेखर के पक्ष में आया। 2014 में जब ये फ़ैसला आया था तब रोहित शेखर ने कहा था, “मैं दुनिया का शायद पहला व्यक्ति हूं जिसने ख़ुद को नाजायज़ साबित करने के लिए मुकदमा लड़ा।” बहरहाल, फ़ैसला आने के कुछ ही दिनों के बाद नारायण दत्त तिवारी ने रोहित शेखर की मां उज्जवला शर्मा से शादी कर ली और रोहित शेखर को अपना जायज़ बेटा मान लिया। साल 2017 में उत्तराखंड में हुए विधानसभा चुनाव से ठीक पहले रोहित शेखर ने भाजपा की सदस्यता ले ली। रोहित की कुछ साल पहले दिल्ली में रहस्यमय परिस्थितियों मौत हो गई थी।

लेख – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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यादगार रहा चित्रनगरी संवाद मंच का महिला मुशायरा-कवि सम्मेलन

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मुंबई। हर सप्ताह की तरह इस बार भी रविवार की शाम ख़ुशगवार रही जब शहर की महिला शायरात और कवयित्रियों ने मशहूर कथाकार सूरज प्रकाश (Suraj Prakash) की मौजूदगी में अपनी-अपनी रचनाओं से उपस्थित लोगों का मन जीत लिया। साहित्यिक चित्रनगरी संवाद मंच की ओर से रविवार की शाम गोरेगांव (पश्चिम) के केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट (Keshav Gore Smarak Trust) हाल में किए गए कवयित्री सम्मेलन और मुशायरे में सभी महिला रचनाकारों ने बहुत उच्च स्तर की रचनाएं सुनाकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

कार्यक्रम की शुरुआत ही धमाकेदार रही जब रितिका मौर्य रीत (Ritika Reet) ने अपनी रचनाएं पढ़ी। उनकी गजल, वो करिश्मात नहीं करते हैं, जो तेरी बात नहीं करते हैं। जो खुला ले चुके हो दुनिया से, वो सवालात नहीं करते हैं। अच्छी पसंद की गई। इसके बाद आई तबस्सुम बरबेरावाला (Tabassum Berberawalla) ने भी लोगों की वाहवाही लूटी। उनकी गजल – मेरे के सांचें में ढल रहे हो तुम, ख़ुद को कितना बदल रहे हो तुम… को लोगों ने खूब सराहा।

तदुपरांत रचना पाठ करने आई पूनम विश्वकर्मा (Poonam Vishwakarma) की गजल -क्या कहूं किस मुसीबत में हूं, मैं ख़ुद अपनी अदालत में हूं। एक औरत के हूं जिस्म में, इसका मतलब हिरासत में हूं... सुनकर हाल तालियों से गूंज उठा। शायरा आशु शर्मा (Ashu Sharma) ने भी कई बेहतरीन ग़ज़ल पेश किया। उनके शेर, बाज़ इन्सां को ये पत्थर का बना देती है, सब को फ़न जीने का क़ुदरत ही सिखा देती है। परवरिश ग़म की अमीरों को ही बस है हासिल, भूख ग़म सारे ग़रीबों को भुला देती है… पर ख़ूब तालियां बजीं।

और कार्यक्रम का संचालन कर रही प्रतिमा सिन्हा (Pratima Sinha) ने भी उच्च स्तरीय गजल पढ़ी। उनकी पंक्तियां, तेरे रेशमी एहसास से मैं ख़वाब रोज़ बुना करूं, तेरी धड़कनों में गुथी हुई धुन ज़िंदगी की सुना करूँ… बहुत प्रभावशाली रहीं। शायरा जीनत एहसान कुरेशी (Shayra Zeenat Ahsaan) ने गजल के साथ साथ हास्य रचना भी सुनाई। उनकी रचना पर उन्हें ख़ूब वाहवाही मिली।

सीमा अग्रवाल (Seema Agrawal) का गीत कमला बहुत पसंद की गई। बहुत दिनो के बाद मिली हो कैसी हो कमला? पात्र महज़ बदले हैं, लेकिन सब कुछ जैसे का तैसा है, पगली, जो तब था वो रोना, अब भी वैसे का वैसा है, तेरी रामकथा का क्यों कर रावण नहीं जला… बहुत पसंद किया गया।

अंत में कवयित्री डॉ. दमयंती शर्मा (DrDamyanti Sharma) की रचना विरह व्यथित तप्त,आकुल ह्रदय पर, प्यार की बरसात बरसाओ ज़रा। पाएंगे इस जन्म में सातों जन्म, प्रेम सच्चा है तो है सौदा खरा। राधिका बन मैं तुम्हें भी जीत लूं मोहन, बांसुरी सांसों की होगी प्रीत का आधार… लोगों को बहुत पसंद आई। इस कार्यक्रम के प्रायोजक ट्यूब कट्स ऐंड शेप्स थे और इसका संचालक इंशाद फाऊंडेशन ने किया।

सहयोगी संस्था थी बज्म-ए-यारान-ए-अदब (دب Bazm e yaran e adab), सुखन सराय (SukhanSarai) और हमारी प्रथा फाउंडेशन (Hamari Pratha Foundation) का भी सहयोग मिला। कार्यक्रम की शुरुआत में गीतकार देवमणि पांडेय (Devmani Pandey) ने चित्रनगरी संवाद मंच और इंशाद फाउंडेशन (Inshaad انشاد) की उपलब्धियों की चर्चा की। अंत में नवीन जोशी नवा ने आए लोगों को धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम में शहर की प्रमुख महिला रचनाकारों सहित बौद्धिक तबके के लोग अच्छी संख्या में उपस्थित थे।

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संवेदनशील कच्चाथीवू द्वीप मुद्दे पर भारतीय नेताओं का संयम से काम लेना जरूरी

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कच्चाथीवू द्वीप के बदले वेज बैंक मिल चुका है भारत को

भारत को यह मान लेना चाहिए कि चीन हमारा पाकिस्तान से भी ख़तरनाक दुश्मन है। ऐसे हालात में जब बीजिंग हिंद महासागर क्षेत्र में अपने पांव जमाने की कोशिश कर रहा है। तब भारत को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए कि चीन को हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ाने का बहाना मिले। लेकिन तात्कालिक चुनावी लाभ लेने के चक्कर में भारतीय नेता संवेदनशील कच्चाथीवू द्वीप का मुद्दा बार-बार उठा रहे हैं और यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि कच्चाथीवू द्वीप के मुद्दे पर देश के हित से समझौता किया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत सभी भारतीय नेता, ख़ासकर तमिल नेता इसे इतना अधिक उठा रहे है कि श्रीलंका को बयान देना पड़ा कि यह मुद्दा 1974 में ही हल हो चुका है। बात सही भी है। 14वीं सही में ज्वालामुखीय विस्फोट के चलते अस्तित्व में आने वाले महज 285 हेक्टेयर में फैले निर्जन कच्चाथीवू को भारत 1974 में एक समझौते के तहत श्रीलंका को सौंप चुका है। हिंद महासागर के पाक-वे (Palk Bay) समुद्री इलाके में रामेश्वरम से 33 किलोमीटर और जाफना से 24 किलोमीटर दूर स्थित कच्चाथीवू द्वीप को मुफ़्त में श्रीलंका को नहीं दिया था बल्कि उसके एवज में भारत वेज बैंक (Wadge Bank) द्वीप ले चुका है।

कच्चाथीवू द्वीप के मुद्दे पर तमिल जनता की धार्मिक भावना को भुनाने की कोशिश में कोई भी नेता वेज बैंक का नाम नहीं ले रहा है। कोई भी नेता यह नहीं बता रहा है कि अपेक्षाकृत कन्याकुमारी के निकट वेज बैंक कच्चाथीवू द्वीप से कई गुना बड़ा है और कुल 3 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। दरअसल, कच्चाथीवू द्वीप समझौते के बाद 1976 में नई दिल्ली और कोलंबो के बीच एक और करार हुआ था। उसके बाद वेज बैंक (Wadge Bank) पर भारत का अधिकार हो गया था। वेज बैंक को कच्चाथीवू जैसे निर्जन द्वीप के मुक़ाबले अधिक सामरिक महत्व का माना जाता है।

रहस्यमयी भूतों के लिए मशहूर तमिलनाडु के धनुषकोडी द्वीप से केवल 30-32 किलोमीटर दूर स्थित कच्चाथीवू द्वीप यूं तो कई दशक से गुमनामी के गर्भ में डूबा रहता था लेकिन इधर कई साल से यह समय-समय पर सुर्खिया भी बटोरने लगा था। वैसे इस बार इसके चर्चा में आने की वजह भारतीय जनता पार्टी की तमिलनाडु इकाई के अध्यक्ष के अन्नामलाई हैं। सूचना अधिकार के तहत उन्हें जानकारी दी गई कि भारत ने 1974 में 285 एकड़ में बसे कच्चाथीवू को श्रीलंका को दे दिया था। चूंकि यह मामला चुनाव में सुर्खियों में आया है तो तमिलनाडु में कमोबेश हर नेता इसकी चर्चा कर रहा है।

दरअसल, हिंद महासागर में भारत के दक्षिणी छोर पर स्थित कच्चाथीवू द्वीप पर इंसानी बस्तियां नहीं है। 17वीं सदी तक यह द्वीप मदुरई के राजा रामनद के जमींदारी के जमींदारी का हिस्सा था। 1605 में मदुरै के नायक राजवंश ने रामनाथपुरम या रामनाद के रियासत स्थापना की थी। इसमें 69 तटीय गांव और 11 टापू शामिल किए गए थे। उनमें एक टापू कच्चाथीवू भी शामिल था। 1622 और 1635 के बीच रामनाथपुरम के संप्रभु कूथन सेतुपति द्वारा जारी एक तांबे की पट्टिका, वर्तमान श्रीलंका में थलाईमन्नार तक फैले क्षेत्र के भारतीय स्वामित्व की गवाही देती है, जिसमें कच्चाथीवू भी शामिल है, जो सेतुपति राजवंश के लिए नियमित राजस्व का एक स्रोत था।

1767 में, डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने द्वीप को पट्टे पर देने के लिए मुथुरामलिंगा सेतुपति के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, और बाद में, जब भारत में ब्रिटिश हुकूमत आई तो 1822 में, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस द्वीप को रामास्वामी सेतुपति से पट्टे पर ले लिया और यह द्वीप अंग्रेजों के अधीन हो गया। तब से यह ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने इसे मद्रास प्रेसिडेंसी के अधीन कर दिया था। उसके बाद से इस द्वीप का इस्तेमाल मुख्य तौर पर मछुआरे जाल सुखाने के लिए किया करते थे। 1921 में मछली पकड़ने के लिए भूमि के इस टुकड़े पर दावा किया और तभी से विवाद अनसुलझा रहा।

15 अगस्त 1947 में जब देश आजाद हो गया, तब सरकारी दस्तावेजों में कच्चाथीवू द्वीप को भारत का अभिन्न हिस्सा बताया गया। दूसरी ओर पड़ोसी देश श्रीलंका जिसे उस समय तक सिलोन कहा जाता था ने भी इस द्वीप पर अपना अधिकार जता दिया। लिहाज़ा, लंबे समय तक यह द्वीप भारत और श्रीलंका के बीच विवाद का केंद्र रहा। सीमा उल्लघंन को लेकर दोनों देशों के बीच हमेशा तनाव बना रहता था। 1974 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपने काउंटरपार्ट श्रीलंका की राष्ट्रपति श्रीमावो भंडारनायके के साथ मिलकर इस समस्या को हल करने का फैसला किया।

इसके बाद दो अहम बैठके हुई। पहली 26 जून 1974 को कोलंबो में और दूसरी 28 जून 1974 को दिल्ली में हुई। इन दोनों बैठकों में फैसला किया गया कि कच्चाथीवू द्वीप श्रीलंका के पास रहेगा। प्रसावित समझौते में कुछ शर्तें रखी गईं। मसलन, भारतीय मछुवारे अपना जाल सुखाने के लिए इस द्वीप पर आ-जा सकेंगे और इस द्वीप पर बने चर्च में भारतीय नागरिक बिना वीज़ा के जा सकेंगे। कई वार्ताओं के बाद सहमति बन गई दोनों देशों के बीच चार समुद्री सीमा समझौतों पर हस्ताक्षर किए और कच्चाथीवू द्वीप औपचारिक रूप से श्रीलंका को सौंप दिया गया।

दो साल बाद 1976 में भारत और श्रीलंका के बीच समुद्री सीमा को लेकर दो और समझौते हुए। पहले समझौते के तहत वेज बैंक पर भारत का अधिकार हो गया और दूसरे समझौते के तहत मछली पकड़ने के लिए भारतीय मछुआरे के कच्चाथीवू द्वीप और श्रीलंकाई मछआरों के वेज बैंक द्वीप पर जाने से रोक लगा दी गई। लेकिन राजनीतिक पूर्वाग्रह के तहत केवल कच्चाथीवू द्वीप की चर्चा की जाती है। कोई वेज बैंक का नाम तक नहीं लेता। जबकि वेज बैंक समुद्री जंतु और मछलियों से समृद्ध इलाका है। वहां तेल एवं गैस के बड़े भंडार मिले है।

कोई यह नहीं बताता कि जैसे भारतीय मछुआरे श्रीलंका के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन में नहीं जा सकते। उसी तरह श्रीलंका के मछुआरे इंडियन एक्सक्लूसिव अकोनॉमिक ज़ोन में नहीं आ सकते। लिहाजा, अपर्याप्त सूचना के अभाव में तमिलनाडु का मछुवारा समुदाय इस समझौते से काफी ज्यादा ख़फ़ा रहता है। इंदिरा गांधी की सरकार ने जब ये फैसला लिया था तो उस वक्त तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एम करूणानिधि ने केंद्र सरकार के इस फैसले पर ऐतराज जताते हुए भारतीय द्वीप को श्रीलंका को सौंपने के फ़ैसले का ज़ोरदार विरोध किया।

1983 में लंका में गृहयुद्ध के छिड़ने के बाद से, यह द्वीप भारतीय तमिल मछुआरों और सिंहली-प्रभुत्व वाली लंकाई नौसेना के बीच लड़ाई का युद्धक्षेत्र बन गया, जिससे आकस्मिक क्रॉसिंग के कारण भारतीयों की आजीविका, संपत्ति और जीवन का भारी नुकसान हुआ। यही वजह थी कि आपातकाल के बाद 1991 में तमिलनाडु विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया गया। उस प्रस्ताव में 1974 के इंदिरा गांधी-श्रीमावो भंडारनायके समझौते को रद करने और कच्चाथीवू द्वीप को पुनः भारत का हिस्सा बनाने की मांग की गई।

2008 में, तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने भी सुप्रीम कोर्ट से समझौते को रद करने की मांग की थी। सरकार ने दावा किया था कि कच्चाथीवू को श्रीलंका को सौंपना असंवैधानिक था। तर्क दिया गया कि केंद्र बिना संविधान संसोधन के देश की जमीन दूसरे देश को नहीं दे सकता। साल 2011 में जब वह मुख्यमंत्री बनीं तो विधानसभा में प्रस्ताव भी पारित करवाया। लेकिन साल 2014 में उनकी याचिका पर जवाब देते हुए अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा था कि कच्चाथीवू द्वीप एक करार के तहत श्रीलंका को दिया जा चुका है। अब वह इंटरनेशनल बाउंड्री का हिस्सा है। कच्चाथीवू द्वीप को वापिस लेना हैं तो भारत को श्रीलंका से युद्ध लड़ना होगा।

मई 2022 में भी मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने चेन्नई में प्रधानमंत्री की उपस्थिति में कच्चाथीवू द्वीप को श्रीलंका से वापस लेने की मांग की थी। स्टालिन ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे के साथ कच्चाथीवू द्वीप के मुद्दे को उठाने इस द्वीप को पुनः प्राप्त करने की मांग की गई। स्टालिन के पत्र में कहा कि यह द्वीप ऐतिहासिक रूप से भारत का हिस्सा है, और तमिलनाडु के मछुआरे पारंपरिक रूप से इस द्वीप के आसपास के पानी में मछली पकड़ते रहे हैं।

यह बात भी सच है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय संधि को एक पक्ष निरस्त नहीं कर सकता। निश्चित तौर पर, इस संधि को भारत की गारंटी के तौर पर देखा जाना चाहिए। लिहाज़ा, भारत इस संधि से मुकर नहीं सकता। भारतीय नेताओं ने कच्चाथीवू द्वीप को अपना बताने की कोशिश जारी रखी तो इससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में उसकी छवि खराब होगी। इससे दोनों देशों के संबंधों पर बुरा असर पड़ेगा। इससे श्रीलंका में भारत विरोधी भावनाएं उग्र होंगी। चीन इसका सीधा लाभ लेने की कोशिश करेगा। वैसे भी बीजींग श्रीलंका पर तरह-तरह के दवाब और डोरे डालता रहा है। इसलिए कच्चाथीवू द्वीप विवाद को अधिक हवा देना भारत के हित में नहीं होगा।

यह भी सही बात है कि श्रीलंका की नौसेना सीमा का उल्लंघन करने पर अक्सर भारतीय मछुआरों पर गोलियां चला देती है और उनकी नौकाओं को जब्त कर लेती है, क्योंकि भारतीय मछुआरों के सीमा पर गहरे समुद्र में जाकर आधुनिक मशीनों से मछलियां पकड़ने से श्रीलंकाई मछुआरों को नुकसान होता है। वैसे मछुआरों की समस्या को हल करने के लिए दोनों देशों ने 2016 में संयुक्त कार्यदल भी गठित किया था, लेकिन यह कारगर नहीं साबित हुआ। इसलिए इस मसले का स्थायी हल निकालने की पहल भारत को बड़े भाई की भूमिका निभानी पड़ेगी। यह ध्यान में रखना पड़ेगा कि चीन के बहकावे में मालदीव और नेपाल जैसे देश पहले ही आ चुके हैं। इसलिए श्रीलंका जैसे पड़ोसी का हमारा घनिष्ट सहयोगी बना रहना समय की मांग है।

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लेख – हरिगोविंद विश्वकर्मा

एक था मुख्तार अंसारी

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योगी-काल में पहले मुन्ना बजरंगी, विकास दुबे, अतीक अहमद और अब मुख़्तार सुभान अंसारी का अंत

संसार में शहंशाह कोई नहीं, बस समय शहंशाह होता है। कहा जाता है कि अगर समय आपके साथ है तो आप शहंशाह है, लेकिन अगर समय आपके साथ नहीं है तो आपकी कोई औक़ात नहीं है। जो समय आपको राजा बनाता है, वही आपको रंक भी बना देता है। यही चरितार्थ हुआ पहले मुन्ना बजरंगी के साथ। उसके बाद विकास दुबे और अतीक अहमद के साथ और 28 मार्च 2024 को अपराध की दुनिया के बेताज़ बादशाह मुख़्तार सुभान अंसारी के साथ। समय उसके साथ नहीं थी। इसीलिए वह शायद ज़िंदगी में सबसे लाचार था।

जी हां, तकरीबन तीन दशक तक शहंशाह की तरह अपराध का एक छत्र साम्राज्य कायम करने वाले मुख्तार अंसारी बृहस्पतिवार की रात उत्तर प्रदेश के रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज, बांदा में एक स्ट्रैचर पर निर्जीव पड़ा था। वह मुख्तार अंसारी नहीं था, बल्कि उसका शव था। अलग अलग जिलों के थानों में दर्ज कुल 65 मुकदमे में आरोपी मुख्तार अनगिनत लोगों को असमय मौत की नींद सुला दिया था। लेकिन माफिया डॉन आज खुद चिर निद्रा में सो गया।

चार दशक तक अपराध की बादशाहत कायम करने वाले माफिया डॉन मुख्तार अंसारी की बांदा जेल में हार्ट अटैक से मौत हो गई। अस्पताल के बांदा मेडिकल बुलेटिन में बताया गया कि बांदा जेल में तबीयत बिगड़ने के बाद मुख्तार को मेडिकल कॉलेज अस्पताल लाया गया, जहां इलाज के दौरान डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। वैसे भले ही आधिकारिक तौर पर कहा जा रहा है कि डॉन की मौत इलाज के दौरान हुई। लेकिन जेल सूत्रों का कहना है कि उसकी मौत जेल में ही हो गई थी।

दरअसल, नियति मुख्तार को खींचकर बांदा ले आई थी, क्योंकि पहले वह पंजाब की रोपड़ जेल में बंद था। दरअसल, उसे एक मुक़दमे की सुनवाई के लिए रोपड़ से वापस बांदा जेल में शिफ्ट किया गया था। विकास दुबे के इन्काउंटर के बाद मुख़ातर डर गया। यूपी में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बन जाने के बाद मुख्तार यूपी में वापस नहीं आना चाहता था। उसे डर था कि योगी उसका इन्काउंटर करवा देंगे।

वैसे उसे यूपी वापस लाने के लिए यूपी सरकार को काफी मशक्कत करनी पड़ी थी। पंजाब और यूपी सरकार के बीच खींचतान चली थी। अंततः उत्तर प्रदेश सरकार ने मामला सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। देश की सबसे बड़ी अदालत ने सुनवाई के बाद मुख्तार को यूपी शिफ्ट करने का फरमान सुना दिया। इसके बाद 7 अप्रैल 2021 को भारी सुरक्षा इंतजामों के बीच मुख्तार अंसारी को पंजाब के रोपड़ से हरियाणा के रास्ते आगरा, इटावा और औरैया होते हुए बांदा जेल पहुंचा दिया गया।

दरअसल, मऊ में दंगा भड़काने के मामले में मुख्तार ने गाजीपुर पुलिस के सामने सरेंडर किया था। और तभी से वो जेल में था। पहले उसे गाजीपुर जेल में रखा गया, फिर वहां से मधुरा जेल भेजा दिया गया। उसके बाद मथुरा जेल से आगरा जेल और आगरा से बांदा जेल भेज दिया गया था। उसके बाद मुख्तार को बाहर आना नसीब नहीं हुआ।

गाजीपुर जिले के मोहम्मदाबाद में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिवार के दंपति सुबहानउल्लाह अंसारी और बेगम राबिया के घर में एक बच्चे का जन्म हुआ। उन्होंने बच्चे का नाम मुख्तार रखा। उर्दू में मुख्तार का अर्थ होता है अपनी इच्छा के अनुसार काम करने में स्वतंत्र व्यक्ति। उस समय गाजीपुर में अंसारी परिवार की बड़ी प्रतिष्ठा थी। परिवार राजनीतिक खानदान का था। मुख़्तार के दादा डॉ मुख़्तार अहमद अंसारी स्वतंत्रता सेनानी थे।

डॉ मुख़्तार अहमद अंसारी गांधी के सहयोगी और देशभक्त थे। वह 1926-27 में कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। मुख़्तार के नाना ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को 1947 की लड़ाई में शहादत के लिए महावीर चक्र से नवाज़ा गया था। मुख्तार के पिता सुबहानउल्लाह अंसारी गाजीपुर में अपनी साफ सुधरी छवि के साथ राजनीति में सक्रिय रहे थे। पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी रिश्ते में मुख़्तार अंसारी के चाचा लगते थे।

वैसे नौबदार मूछों वाला मुख्तार अंसारी माफिया कैसे बन गया, इसकी लंबी कहानी है। मुख्तार भले ही इस दुनिया से चल बसा हो, लेकिन मऊ और उसके आसपास के इलाके में मुख्तार अंसारी की तुती बोलती थी। एक वक्त ऐसा भी था जब पूरा सुबा मुख्तार के नाम से कांपता था। दरअसल, मुख़्तार और बृजेश सिंह जैसे अपराधियों का उदय गोरखपुर के दो कुख्यात अपराधी हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र शाही की दुश्मनी के चलते हुआ।

हरिशंकर के दो शार्प शूटर साहेब सिंह और मटनू सिंह थे। मटनू की गाजीपुर जेल के पास हत्या हो गई। तो उसके भाई साधु सिंह हरिशंकर के लिए काम करने लगा। उसी जिले का मुख़्तार साधु सिंह का साथी बन गया। मुख़्तार को अपराध में अच्छा स्कोप दिखा। बहरहाल साधू सिंह ने 1984 में ज़मीन विवाद में बृजेश सिंह के पिता की हत्या कर दी। साधू का मित्र होने के कारण मुख़्तार बृजेश के निशाने पर आ गया। दोनों एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हो गए।

धीरे-धीरे ठेकेदारी, खनन, स्क्रैप, शराब, रेलवे ठेकेदारी में मुख्तार का दबबदा हो गया। इसी के दम पर उसने अपनी सल्तनत खड़ी कर ली थी। कहा जाता है कि वह अगर अमीरों से लूटता था, तो गरीबों में बांटता भी था। ऐसा मऊ के लोग कहते हैं कि सिर्फ दबंगई ही नहीं बल्कि बतौर विधायक मुख्तार अंसारी ने अपने इलाके में बहुत काम किया था। सड़कों, पुलों, अस्पतालों और स्कूल-कॉलेजों पर यह रॉबिनहुड अपनी विधायक निधी से 20 गुना ज्यादा पैसा खर्च करता था।

उसका सियासी सफ़र 1996 में शुरू हुआ, जब वह बहुजन समाज पार्टी (BSP) के टिकट पर जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचा। उसके बाद वह 2002, 2007, 2012 और फिर 2017 में भी मऊ से जीत हासिल करके विधान सभा पहुंचा। वह बीजेपी को छोड़कर उत्तर प्रदेश की हर बड़ी पार्टी में शामिल रहा। मुख्तार अंसारी 24 साल तक लगातार यूपी की विधानसभा पहुंचता रहा। आखिरी 3 चुनाव उसने देश की अलग-अलग जेलों में बंद रहते हुए जीते। सियासी ढाल ने मुख्तार को जुर्म की दुनिया का सबसे खरा चेहरा बना दिया और हर संगठित अपराध में उसकी जड़ें गहरी होती चली गईं।

सियासी अदावत से ही मुख्तार का नाम बड़ा हुआ। वर्ष 2002 ने मुख्तार की जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया। इसी साल भाजपा विधायक कृष्णानंद राय ने अंसारी परिवार के पास साल 1985 से रही मोहम्मदाबाद विधानसभा सीट छीन ली थी। कृष्णानंद विधायक के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा नहीं पाए और तीन साल बाद यानी साल 2005 में उनकी मुख़्तार के शूटर मुन्ना बजरंगी ने दिन-दहाड़े हत्या कर दी।

कृष्णानंद एक कार्यक्रम का उद्घाटन करके लौट रहे थे। तभी मुन्ना बजरंगी ने उनकी गाड़ी को चारों तरफ से घेर कर अंधाधुंध फायरिंग कर दी। हमलावरों ने AK-47 से तकरीबन 500 गोलियां चलाई और कृष्णानंद समेत गाड़ी में मौजूद सभी सातों लोग मारे गए। बाद में इस केस की जांच सीबीआई ने की। कृष्णानंद की पत्नी अलका राय की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केस 2013 में गाजीपुर से दिल्ली ट्रांसफर कर दिया। लेकिन मुख्तार ने गवाहों पर दबाव बनाया और सभी मुकर गए। लिहाज़ा, मामला नतीजे पर न पहुंच सका।

2019 में दिल्ली की स्पेशल अदालत ने फैसला सुनाते कहा कि अगर गवाहों को ट्रायल के दौरान विटनेस प्रोटेक्सान स्कीम 2018 का लाभ मिलता तो नतीजा कुछ और हो सकता था। गवाहों के मुकरने से मुख्तार बरी हो गया। मुख्तार भले ही जेल में रहा, लेकिन उसका गैंग हमेशा सक्रिय रहा। लेकिन योगी आदित्यनाथ की सरकार आने के बाद उसके बुरे दिन शुरू हो गए।

मुख्तार अंसारी के खिलाफ कुल 65 केस दर्ज है। अकेले उत्तर प्रदेश में उस पर 52 केस दर्ज हैं। योगी सरकार की कोशिश 15 केस में उसे जल्द सजा दिलाने की थी। यूपी सरकार अब तक अंसारी और उसके गैंग की सैकड़ों करोड़ों की संपत्ति को या तो ध्वस्त कर चुकी है या फिर जब्त मुख्तार गैंग की अवैध और बेनामी संपत्तियों की लगातार पहचान की जा रही है। मुख्तार गैंग के अब तक करीब 100 अभियुक्त गिरफ्तार किए जा चुके हैं, जिनमें 75 मुर्गों पर गैंगेस्टर एक्ट में कार्रवाई हो चुकी है। कुल मिलाकर मुख्तार अंसारी योगी सरकार के टारगेट पर था।

मुख्तार अंसारी का खौफ इस कदर छाया हुआ था कि लोग डर के साए में जी रहे थे और सरकारें एकदम चुप्पी साधे रखती थी। जब मऊ में सड़कों पर मुख्तार का काफिला निकलता था तो लोग खुद-ब-खुद किनारे हो जाते थे। तब गोरख पीठ के संन्यासी और सांसद योगी आदित्यनाथ ने मुख्तार को खुली चुनौती दी। इसलिए जब मऊ में दंगा (Mau Riots) हुआ तो दंगा पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए योगी निकल पड़े थे। जिस गाड़ी में योगी बैठे थे, उस पर पत्थर फेंके गए। योगी का आरोप था कि ये सब मुख्तार ने कराया था।

इस वाकए का जिक्र करते हुए योगी सदन में भावुक भी हो गए थे। लेकिन वक्त का पासा ऐसा पलटा कि आज उत्तर प्रदेश की बागडोर योगी आदित्यानाथ (Yogi Adityanath) के हाथों में आ गई। अपराध की दुनिया का बड़ा अपराधी व्हीलचेयर पर बैठकर अपनी जान की दुआई दे रहा था। मुख्तार को पिछले 18 महीने में 8 मामलो में सजा मिल चुकी थी, उसके खिलाफ अलग अलग जिलों के थानों में कुल 65 मुकदमे दर्ज थे। वह 18 वर्षो से मुख्तार अंसारी जेल में बंद था।

मुख्तार ने अंतिम बार 2017 में मऊ सीट से विधानसभा चुनाव लड़ा था। इस चुनाव के दौरान नामांकन में दाखिल किए गए शपथपत्रों के अनुसार देश की अलग-अलग अदालतों में मुख्तार अंसारी के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, दंगे भड़काने, आपराधिक साजिश रचने, आपराधिक धमकियां देने, संपत्ति हड़पने और धोखाधड़ी करने के साथ ही सरकारी काम में बाधा डालने समेत कुल 65 मुकदमें दर्ज थे।

हालांकि बीते दिनों ही उसे करीब 36 साल पुराने गाजीपुर के फर्जी शस्त्र लाइसेंस मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। विशेष न्यायाधीश (एमपी-एमएलए कोर्ट) अवनीश गौतम की अदालत ने मुख्तार अंसारी को सजा सुनाई थी। इसी अदालत ने ही 5 जून 2023 को अवधेश राय हत्याकांड में मुख्तार अंसारी को उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

मुख्तार को अब तक सात मामलों में सजा मिल चुकी है। जबकि आठवें मामले में दोषी करार दिया गया है। जिस मामले में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। उसमें उनपर आरोप था कि दस जून 1987 को दोनाली कारतूसी बंदूक के लाइसेंस के लिए जिला मजिस्ट्रेट के यहां प्रार्थना पत्र दिया गया था। जिलाधिकारी एवं पुलिस अधीक्षक के फर्जी हस्ताक्षर से संस्तुति प्राप्त कर शस्त्र लाइसेंस प्राप्त कर लिया गया था। इस मामले पर स्थानीय लोग बताते हैं कि यही उनके खिलाफ दर्ज किया गया पहला मामला था।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

Building Resilience for a Changing Climate

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Climate resilience refers to the capacity of individuals, communities, ecosystems, and societies to withstand, adapt to, and recover from the impacts of climate change while maintaining essential functions and structures. It encompasses a broad spectrum of factors, including physical, social, economic, and environmental dimensions, and emphasizes the ability to anticipate, prepare for, and respond to changing climatic conditions and extreme weather events.

At its core, climate resilience involves building adaptive capacity and reducing vulnerability to climate-related risks and hazards. This may involve implementing measures to enhance infrastructure resilience, diversifying livelihoods, preserving ecosystems, improving access to essential services such as healthcare and clean water, and fostering social cohesion and community networks. Additionally, promoting equitable and inclusive approaches to resilience-building is essential to ensure that marginalized groups, including women, children, the elderly, and those living in poverty, are not disproportionately affected by climate impacts.

Ultimately, climate resilience is about fostering sustainable development pathways that enable individuals and communities to thrive in the face of uncertainty and change. It requires a holistic and integrated approach that combines mitigation efforts to reduce greenhouse gas emissions with adaptation strategies to address the unavoidable impacts of climate change. By prioritizing resilience-building measures, societies can better safeguard lives, livelihoods, and ecosystems, both now and in the future, in the face of a rapidly changing climate.

Some examples that demonstrate the diverse ways in which individuals, communities, and ecosystems can build resilience to the impacts of climate change are shared below.

Infrastructure Resilience: In coastal regions vulnerable to sea-level rise and storm surges, communities may invest in resilient infrastructure such as seawalls, flood barriers, and elevated buildings to withstand flooding and erosion. For example, in the Netherlands, the Delta Works project has constructed a system of dams, dikes, and floodgates to protect low-lying areas from flooding, enhancing the resilience of coastal communities to rising sea levels and extreme weather events.

Agricultural Resilience: Farmers facing changing climate conditions may adopt climate-smart agricultural practices to improve resilience and ensure food security. This could include crop diversification, conservation agriculture, and the use of drought-resistant crop varieties. In Ethiopia, the Tigray region has implemented sustainable land management practices, such as terracing and agroforestry, to enhance soil fertility and water retention, mitigating the impacts of droughts and improving resilience to climate variability.

Community Resilience: Indigenous communities often possess traditional knowledge and practices that enhance their resilience to environmental changes. For instance, the Inuit communities in the Arctic have adapted their hunting and fishing practices to changing ice conditions, ensuring their food security and cultural continuity in the face of a warming climate. Additionally, community-based early warning systems and disaster preparedness initiatives can help vulnerable communities anticipate and respond to climate-related risks, reducing the impact of disasters.

Ecosystem Resilience: Restoring and protecting natural ecosystems can enhance their resilience to climate change while providing valuable ecosystem services. Mangrove restoration projects, for example, can buffer coastlines from storm surges, sequester carbon dioxide from the atmosphere, and support biodiversity. In Southeast Asia, initiatives such as the Mangrove Action Project work with local communities to replant and conserve mangrove forests, contributing to both climate adaptation and mitigation efforts.

Social Resilience: Social cohesion and community networks play a critical role in building resilience to climate change. In the aftermath of disasters, strong social ties can facilitate collective action, resource sharing, and emotional support. For example, following the devastating floods in Kerala, India, in 2018, communities came together to provide assistance to affected households, demonstrating resilience in the face of adversity and laying the groundwork for long-term recovery and adaptation efforts.

By adopting adaptive strategies, fostering collaboration, and investing in sustainable development, societies can better prepare for and respond to the challenges posed by a changing climate, ultimately creating more resilient and sustainable futures for all.

 

Women at the Forefront: Key Architects of Climate Resilience

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In the harsh grip of climate change and environmental degradation, the burden falls heavier on the shoulders of India’s women and marginalized communities. They grapple with the cruel reality of unequal access to resources, finance, and technology, leaving them stranded amidst crises with fewer lifelines to hold onto.

Women’s Plight in Climate Decision-Making
In the corridors of power and decision-making, the voices of women remain stifled and disregarded. Despite bearing the brunt of climate catastrophes, they find themselves on the periphery of discussions, their perspectives sidelined, and their needs overlooked. It’s a silent struggle against an unyielding tide of injustice.

Women as Catalysts for Change
Embedded within the fabric of the fight against climate change is a profound recognition: that the quest for environmental sustainability is intricately intertwined with the pursuit of gender equality and social justice. At its essence, this intersectionality illuminates a fundamental truth – the realization that addressing climate change cannot be divorced from advancing the rights and agency of women.

Central to this understanding is the acknowledgment that women are not only disproportionately affected by the impacts of climate change but also play a crucial role in climate resilience and mitigation efforts. Yet, despite their significant contributions, women often find themselves marginalized and disenfranchised within both environmental discourse and decision-making processes.

This disparity underscores the urgent need to weave together the threads of climate justice and gender equality, creating a tapestry of inclusivity and empowerment. It is a vision that transcends mere mitigation and adaptation strategies, encompassing a broader framework of rights, dignity, and justice for all.

Yet, within the heart of adversity, lies an untapped well of strength and resilience. Women emerge not as victims but as warriors, wielding knowledge, skills, and an indomitable spirit to confront the challenges that threaten their communities. They stand poised to lead, to innovate, and to inspire change. In the heart of every community lies the seed of change, waiting to be nurtured and unleashed. Through grassroots movements, local initiatives, and community-led interventions, women rise as beacons of hope and resilience. Their leadership transforms communities into bastions of strength, capable of withstanding the fiercest storms and forging a path towards a more sustainable future.

Coordinated Efforts for Inclusive Solutions
In this battle for survival and justice, no effort can be spared, no voice left unheard. Governments, development partners, private sectors, and civil society must unite in a symphony of solidarity and action. It’s a collective endeavour to uplift, empower, and amplify the voices of women, ensuring they are not merely passive participants but active architects of their own destiny.

Women’s Rights and Climate Justice
At the core of the struggle lies a fundamental truth: the fight against climate change is inseparable from the fight for gender equality and social justice. It’s a vision of a world where every voice is heard, every need met, and every right respected. It’s a journey towards a future where women stand shoulder to shoulder with men, as equals in the battle for a better world.

Consider the example of a rural community in India where women are primarily responsible for collecting water and fuelwood for their households. Due to climate change-induced droughts, water sources have become scarce, and forests have depleted, making these tasks increasingly arduous and time-consuming for women. As a result, they have less time to engage in income-generating activities or participate in community decision-making processes.

In this scenario, a climate justice approach would recognize the disproportionate burden placed on women due to environmental degradation and climate change impacts. It would acknowledge that women’s voices and experiences are central to understanding and addressing these challenges effectively.

To achieve climate justice in this context, policies and initiatives must prioritise women’s needs and perspectives. For instance, implementing sustainable water management practices that ensure equitable access to water for all members of the community, including women, can alleviate their workload and empower them to participate more actively in other aspects of community life.

Furthermore, addressing gender inequalities requires dismantling entrenched power structures that perpetuate women’s marginalization. This could involve promoting women’s leadership and decision-making roles in local governance bodies responsible for environmental management and disaster risk reduction. By amplifying women’s voices and ensuring their full participation in climate action, communities can foster greater equity and resilience while creating a more inclusive and sustainable world for present and future generations.

An average five crimes against women hour in Maharashtra.

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NCRB data says crimes against women increased significantly in Maharashtra

The Lingering Shadow of Patriarchal Mindsets

In Maharashtra, which is known for its progressive outlook, the dark specter of patriarchal violence against women persists despite strides in education and empowerment. While the state boasts high literacy rates and initiatives aimed at women’s advancement, numerous instances underscore the deep-rooted nature of gender-based violence. An average five crimes against women were reported every hour in Maharashtra.

As per the National Crime Records Bureau (NCRB), Maharashtra recorded 31,954 cases of crime against women in 2020. This number increased in 2021 and the state reported 39,526 cases and in 2022, this number increased to 45,331.

One alarming manifestation of patriarchal violence is acid attacks, a form of gender-based violence aimed at disfiguring and terrorizing women. Maharashtra has witnessed several horrific instances where women have been targeted with acid, often as retribution for rejecting advances or asserting their autonomy. These attacks not only cause physical trauma but also inflict lasting psychological scars, highlighting the brutality women endure in patriarchal societies.

Honour killings, albeit less prevalent in Maharashtra compared to some other regions, still occur, rooted in notions of family honor and control over women’s choices. Cases where women are murdered for marrying outside caste or religion, or for asserting their right to love and marry of their own accord, underscore the lethal consequences of patriarchal notions of familial and societal honor.

Furthermore, the state grapples with alarming rates of domestic violence, with countless women subjected to physical, emotional, and economic abuse within the confines of their homes. Despite legislative measures such as the Protection of Women from Domestic Violence Act, many women continue to suffer in silence due to social stigma, economic dependence, and lack of support systems.

These examples underscore the stark reality that patriarchal violence against women in Maharashtra transcends socio-economic barriers, affecting women across diverse backgrounds. While education and empowerment efforts have undoubtedly improved opportunities for women, they have yet to dismantle entrenched patriarchal attitudes that perpetuate violence.

Men resort to violence against women for a multitude of complex reasons deeply rooted in societal, cultural, and individual factors. At the societal level, patriarchal norms perpetuate the idea of male dominance and female subordination, creating a power dynamic where men feel entitled to control women. This sense of entitlement can manifest in violence as a means of asserting dominance and maintaining control over women’s lives and choices. Additionally, societal norms that condone or overlook violence against women contribute to a culture where such behavior is normalized or even justified.

Cultural factors also play a significant role, with traditional beliefs and customs often reinforcing gender roles and expectations. In some cultures, violence against women may be seen as a means of enforcing social order or preserving family honor. Moreover, rigid gender stereotypes that equate masculinity with aggression and dominance can pressure men to resort to violence as a way of proving their manhood or asserting their authority.

On an individual level, factors such as upbringing, psychological issues, and personal experiences can contribute to a propensity for violence. Men who have been exposed to violence in their own lives or have witnessed it in their communities may be more likely to perpetrate violence against women. Additionally, issues such as low self-esteem, insecurity, and a lack of healthy coping mechanisms can fuel feelings of anger and frustration that are expressed through violent behavior.

It’s important to recognise that there is no single explanation for why men use violence against women, as it is a complex and multifaceted issue. Addressing the root causes of gender-based violence requires a comprehensive approach that tackles underlying societal inequalities, challenges harmful cultural norms, and provides support and resources for both perpetrators and survivors. By promoting gender equality, fostering healthy relationships, and addressing the underlying factors that contribute to violence, we can work towards creating a world where all individuals are safe and respected, regardless of gender.