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कांग्रेस ने लगाया सेवन हिल्स अस्पताल पर अनियमितता का आरोप

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संजय निरुपम, राजेश शर्मा व संदीप वाल्मीकि के नेतृत्व में निकाला मोर्चा

शीतला प्रसाद सरोज
मुंबई। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में चल रहे निजी बड़े प्राइवेट अस्पताल मरीजों को क्लाइंट समझते हैं और इलाज के नाम पर भारी-भरकम बिल बना देते हैं। राज्य सरकार के आदेशानुसार राज्य में चलने वाले इन बड़े अस्पतालों में 20 फीसदी बेड गरीब तबके के मरीजों के लिए आरक्षित होता है, लेकिन मुनाफा कमाने के चक्कर में मानवता भूल चुके इन बड़े अस्पताल का प्रशासन गरीब तबके के मरीजों को भी कोई राहत नहीं देता है।

जहां राज्य और केंद्र में सत्ता सुख भोग रही भारतीय जनता पार्टी और उसके तमाम नेता इस जनता के हित से जुड़े इस मुद्दे पर मौन साधे हुए हैं, वहीं विपक्षी की भूमिका निभा रही कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे को लेकर एकदम से मुखर है। कांग्रेस ने अस्पतालों को चेतावनी देते हुए कहा भी है कि किसी भी बड़े अस्पताल को किसी भी कीमत पर गरीबों का हक मारने नहीं दिया जाएगा। कांग्रेस नेताओं ने आम आदमी से जुड़े इस मामले को प्रमुखता से उठाने का फैसला किया है।

इस मुद्दे पर कांग्रेस की ओर से अंधेरी (पूर्व) के मरोल मरोसी रोड स्थित पंच सितारा अस्पताल सेवन हिल्स अस्पताल के खिलाफ मंगलवार को विशाल मोर्चा निकाला गया और इस संबंध में अस्पताल प्रशासन को एक ज्ञापन भी दिया गया।  कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि सेवन हिल्स अस्पताल न तो राज्य सरकार की ओर से निर्धारित रियायत गरीब तबके के मरीजों नहीं दे रहा है और न ही गरीब तबके के मरीजों को महात्मा ज्योतिबा फुले जन आरोग्य योजना का लाभ दिया जा रहा है।

इस मौके पर पूर्व सांसद संजय निरुपम ने सेवन हिल्स अस्पताल पर कई गंभीर आरोप लगाते हुए कहा, “सेवन हिल्स हॉस्पिटल में कुल 300 बेड हैं, जिसमें से 20 फीसदी बेड मनपा के लिए आरक्षित हैं। इस हिसाब से 60 बेड अस्पताल में गरीबों के लिए होना चाहिए। लेकिन दुःख की बात एक भी बेड मनपा कोटे का गरीबों को नहीं मिल पाता। केसरिया और पीले राशन-कार्ड धारक जब अस्पताल में अपना इलाज कराने के लिए आते हैं तो उन्हें 10 रुपये की पर्ची तो फाड़ दी जाती है, लेकिन उन्हें भी बिना रियायत के भारी-भरकम बिल थमा दिया जाता है।”

मोर्चे के संयोजक और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य संदीप वाल्मीकि ने बताया कि इन दिनों सेवन हिल्स अस्पताल में पूरी तरह से अनियमितता का बोलबाला है। पहले इस हॉस्पिटल में ‘महात्मा ज्योतिबा फुले जन आरोग्य योजना’ के तहत गरीबों का मुफ्त में इलाज किया जाता था। लेकिन पिछले पांच साल से सेवन हिल्स अस्पताल में यह प्रावधान बंद कर दिया गया है, जिससे गरीब तबके के लोग काफी परेशान हैं। इसी मनमानी के खिलाफ आज हम लोगों ने सेवन हिल्स हास्पिटल पर मोर्चा निकाला है।

महाराष्ट्र कांग्रेस कमेटी के महासचिव और पूर्व उपमहापौर राजेश शर्मा ने कहा कि सेवन हिल्स हॉस्पिटल में जो अनियमितता प्रकाश में आई है, वह बहुत ही गंभीर किस्म का है। इस पर राज्य सरकार को फौरन ध्यान देना चाहिए। इस हॉस्पिटल में करार के अनुसार मनपा कोटे का 20 फीसदी बेड गरीब जरूरतमंदों को जरूर मिलना चाहिए, ताकि वे अपना इलाज करा सकें। आज का मोर्चा तो हॉस्पिटल प्रशासन के लिएएक चेतावनी है। अगर हॉस्पिटल में व्याप्त अनियमितता दूर नहीं की गई तो जनांदोलन होगा।

कांग्रेस के मोर्चे के प्रतिनिधिमंडल ने हॉस्पिटल प्रशासन को एक ज्ञापन दिया, जिसमें इस बात का उल्लेख किया गया है कि सेवन हिल्स हॉस्पिटल में मनपा करार के तहत 20 फीसदी आरक्षित बेड पर गरीबों का इलाज शुरू किया जाए। इसके साथ ही साथ शाम 5 बजे के बाद आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था भी शुरू की जाए और ‘महात्मा ज्योतिबा फुले जन आरोग्य योजना’ के तहत गरीबों का इस हॉस्पिटल में फिर से मुफ्त में इलाज किया जाए।

अस्पताल प्रशासन को दिए गए ज्ञापन में यह भी मांग की गई है कि हॉस्पिटल मेन गेट पर मनपा का लोगो लगा बोर्ड लगाया जाए। बोर्ड पर यह लिखा हो कि यहां पर 20 फीसदी मनपा का बेड उपलब्ध है और गरीबों का मुफ्त में इलाज किया जा रहा है। इस मोर्चे में प्रमुख रूप से कांग्रेस उत्तर-पश्चिम जिलाध्यक्ष क्लाईव डायस, अशोक देसाई, लक्ष्मण पुजारी, प्रमोद सावंत, प्रमोद शिंदे, दीपक शिंदे, पांडुरंग चौहान, जय प्रकाश यादव, फैयाज शेख, विपिन शिंदे, राजू माने और विजय शर्मा सहित बड़ी संख्या में स्थानीय लोग भी शामिल हुए।

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रावण रचित शिव तांडव स्तोत्रम् की कठिन संस्कृति को एकदम आसानी से पढ़ें और कंठस्थ भी करें…

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जटा – टवी – गलज् – जल – प्रवाह – पावित – स्थले
गलेऽव – लम्ब्य – लम्बितां – भुजङ्ग – तुङ्ग – मालिकाम्।
डमड् – डमड् – डमड् – डमन् – निनाद – वड् – डमर्वयं
चकार चण्ड – ताण्डवं – तनोतु – नः – शिवः – शिवम् ॥1॥

जटा – कटाह – सम्भ्रम – भ्रमन् – निलिम्प – निर्झरी
विलोल – वीचि – वल्लरी – विराजमान – मूर्धनि।
धगद् – धगद् – धगज् – ज्वलल् – ललाट – पट्ट – पावके
किशोर – चन्द्रशेखरे – रतिः – प्रतिक्षणं – मम ॥2॥

धरा – धरेन्द्र – नंदिनी – विलास – बन्धु – बन्धुर
स्फुरद् – दिगन्त – सन्तति – प्रमोद – मान – मानसे ।
कृपा – कटाक्ष – धोरणी – निरुद्ध – दुर्धरापदि
क्वचिद् – दिगम्बरे – मनो – विनोद – मेतु – वस्तुनि ॥3॥

जटा – भुजङ्ग – पिङ्गलस् – फुरत् – फणा – मणिप्रभा
कदम्ब – कुङ्कु – मद्रव – प्रलिप्त – दिग्व – धूमुखे ।
मदान्ध – सिन्धु – रस्फुरत् – त्वगुत्तरीय – मेदुरे
मनो – विनोद – मद्भुतं – बिभर्तु – भूत – भर्तरि ॥4॥

सहस्र – लोचन – प्रभृत्य – शेष – लेख – शेखर
प्रसून – धूलि – धोरणी – विधू – सराङ्घ्रि – पीठभूः ।
भुजङ्ग – राज – मालया – निबद्ध – जाट – जूटक
श्रियै – चिराय – जायतां – चकोर – बन्धु – शेखरः ॥5॥

ललाट – चत्व – रज्वलद् – धनञ्जय – स्फुलिङ्गभा
निपीत – पञ्च – सायकं – नमन् – निलिम्प – नायकम् ।
सुधा – मयू – खले – खया – विराजमान – शेखरं
महाकपालि – सम्पदे – शिरो – जटाल – मस्तु नः ॥6॥

कराल – भाल – पट्टिका – धगद् – धगद् – धगज् – ज्वलद्
धनञ्ज – याहुती – कृत – प्रचण्ड – पञ्च – सायके ।
धरा – धरेन्द्र – नन्दिनी – कुचाग्र – चित्र – पत्रक
प्रकल्प – नैक – शिल्पिनि – त्रिलोचने – रतिर्मम ॥7॥

नवीन – मेघ – मण्डली – निरुद्ध – दुर्धर – स्फुरत्
कुहू – निशी – थिनीतमः – प्रबन्ध – बद्ध – कन्धरः ।
निलिम्प – निर्झरी – धरस् – तनोतु – कृत्ति – सिन्धुरः
कलानिधान – बन्धुरः – श्रियं – जगद् – धुरंधरः ॥8॥

प्रफुल्ल – नील – पङ्कज – प्रपञ्च – कालिम – प्रभा
वलम्बि – कण्ठ – कन्दली – रुचि – प्रबद्ध – कन्धरम् ।
स्मरच् – छिदं – पुरच्छिदं – भवच्छिदं – मखच्छिदं
गजच् छिदांध – कच्छिदं तमन्त – कच्छिदं – भजे ॥9॥

अखर्व – सर्व – मंगला – कला – कदम्ब – मञ्जरी
रस – प्रवाह – माधुरी – विजृम्भणा – मधुव्रतम् ।
स्मरान्तकं – पुरान्तकं – भवान्तकं – मखान्तकं
गजान्त – कान्ध – कान्तकं तमन्त – कान्तकं भजे ॥10॥

जयत्व – दभ्र – विभ्रम – भ्रमद् – भुजङ्ग – मश्वसद्
विनिर्गमत् – क्रम – स्फुरत् – कराल-भाल – हव्यवाट् ।
धिमिद् – धिमिद् – धिमिद् – ध्वनन् – मृदङ्ग – तुङ्ग – मङ्गल
ध्वनि – क्रम – प्रवर्तित – प्रचण्ड – ताण्डवः शिवः ॥11॥

दृषद् – विचित्र – तल्पयोर् भुजङ्ग – मौक्ति – कस्रजोर्
गरिष्ठ – रत्न – लोष्ठयोः सुहृद् – विपक्ष – पक्षयोः ।
तृणार – विन्द – चक्षुषोः प्रजा – मही – महेन्द्रयोः
समं – प्रव्रितिक: – कदा – सदाशिवं – भजाम्यहम ॥12॥

कदा – निलिम्प – निर्झरी – निकुञ्ज – कोटरे वसन्
विमुक्त – दुर्मतिः – सदा – शिरः – स्थमञ्जलिं – वहन् ।
विमुक्त – लोल – लोचनो – ललाम – भाल – लग्नकः
शिवेति – मंत्र – मुच्चरन् – कदा – सुखी – भवाम्यहम् ॥13॥

निलिम्प – नाथ – नागरी – कदम्ब मौल – मल्लिका-
निगुम्फ – निर्भक्ष – रन्म धूष्णि – कामनोहरः ।
तनोतु – नो मनोमुदं – विनोदिनीं – महनिशं
परिश्रय – परं – पदं – तदङ्ग – जत्विषां – चयः ॥14॥

प्रचण्ड – वाडवानल – प्रभा – शुभ – प्रचारणी
महाष्ट – सिद्धि – कामिनी – जना – वहूत – जल्पना ।
विमुक्त – वाम – लोचनो – विवाह – कालिक – ध्वनिः
शिवेति – मन्त्र – भूषगो – जगज्ज – याय – जायताम् ॥15॥

इदम् हि नित्यमेव – मुक्त – मुत्त – मोत्तमं – स्तवं
पठन् – स्मरन्ब्रु – वन्नरो विशुद्धि – मेति – संततम् ।
हरे – गुरौ – सुभक्ति – माशु – याति – नान्यथा – गतिं
विमोहनं – हि – देहिनां – सुशङ्क – रस्य – चिंतनम् ॥16॥

पूजाऽवसान – समये – दश – वक्त्र – गीतं
यः – शम्भु – पूजन – परं – पठति – प्रदोषे ।
तस्य – स्थिरां – रथ – गजेन्द्र – तुरङ्ग – युक्तां
लक्ष्मीं – सदैव – सुमुखिं – प्रददाति शम्भुः ॥17॥

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आकाशवाणी के सभागृह में मुशायरे की यादगार शाम

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आकाशवाणी के एफएम रेनबो पर प्रसारण शनिवार को शाम 5 बजे 

मुंबई। भारत को जी-20 की अध्यक्षता और मेजबानी मिलने के बाद तमाम सरकारी संस्थान किसी न किसी आयोजन से अपने आपको कनेक्ट कर रहे हैं। आकाशवाणी मुंबई ने अपने आपको मुशायरे का यादगार शाम जैसे सांस्कृतिक आयोजन के माध्यम से जी-20 से कनेक्ट किया।

आकाशवाणी मुंबई की ओर से मंगलवार की शाम चर्चगेट स्थित आकाशवाणी के सभागार में मुशायरा आयोजित किया गया जिसमें शहर के नौ चुनिंदा शायरों ने अपनी-अपनी ग़ज़लें पेश करके दर्शकों का भरपूर मनोरंजन क्या। ग़ज़ल पेश करने वालों में शायर देवमणि पांडेय, नवीन जोशी नवा, सिद्धार्थ शांडिल्य, माधव नूर, पूनम विश्वकर्मा, अश्विनी मित्तल ऐश, रितिका मौर्या, विश्वदीप ज़ीस्त और ज़िशान ‘साहिर’ ने अपनी रचनाएं पेश की।

शायर देवमणि पांडेय ने कार्यक्रम का संचालन किया। मुशायरा दो चरण में हुआ और सभी शायरों ने दो-दो बार अपनी रचनाएँ पेश की। देवमणि पांडेय, नवीन जोशी नवा, सिद्धार्थ शांडिल्य, अश्विनी मित्तल ऐश, रितिका मौर्या, विश्वदीप ज़ीस्त और ज़िशान ‘साहिर’ ने अपनी-अपनी रचनाएं तहत में पेश की। माधव नूर और पूनम विश्वकर्मा ने तहत और तरन्नुम में ग़ज़लें पेश की। कार्यक्रम के आरंभ में उद्घोषक जी श्याम ने शायरों का परिचय दिया और कार्यक्रम प्रमुख अनिता पटेल ने स्वागत किया।

इस अवसर पर अभियांत्रिकी उपमहानिदेशक बाबूराजन के के, अधीक्षक अभियंता एमएस मेहता और प्रसार भारती के कई प्रमुख अधिकारियों ने अपनी मौजूदगी से आयोजन की गरिमा बढ़ाई। आकाशवाणी के फ़ेसबुक पेज़ और यू ट्यूब पर इस मुशायरे का लाइव प्रसारण किया गया। आकाशवाणी के एफएम रेनबो पर शनिवार 5 अगस्त को शाम 5 बजे यह मुशायरा प्रसारित किया गया।

सहकारिता को सरकारिता से चुनौती

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सरोज कुमार

सहकारिता का सीधा अर्थ साथ मिलकर लोकतांत्रिक तरीके से काम करना है। शासन में नहीं, आत्मानुशासन में। सहकार समाज का हमेशा से आधार रहा है। स्वराज, स्वावलंबन और समृद्धि का समयसिद्ध उपकरण। आजादी के बाद सहकारिता को सार्वजनिक, निजी के मध्य अर्थव्यवस्था का तीसरा क्षेत्र माना गया, पंचवर्षीय योजना का अभिन्न अंग बनाया गया। सहकारिता आंदोलन तेजी से आगे बढ़ा। समय के साथ जैसे-जैसे सहकारिता में सरकारिता घुसती गई, आंदोलन अवरुद्ध होता गया।

सहकारिता आंदोलन आज निजी-सरकारी दो पाटों के बीच पिस रहा है। एक तरफ अकुशल प्रबंधन के कारण यह निजी क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहा, तो दूसरी तरफ सरकारी नियंत्रणकारी कदम इसे निस्तेज कर रहे। सहकारिता यानी सरकार से मुक्त। लेकिन आज पूरा सहकारी क्षेत्र किसी न किसी रूप में सरकारी नियंत्रण में है। यह सहकारिता के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न है।

नियंत्रण सत्ता का स्वभाव है। सरकारें नियंत्रण के लिए कानून बनाती हैं। तर्क दिया जाता है व्यवस्था की सफलता-विफलता के लिए सरकारें जवाबदेह ठहराई जाती हैं। फिर वे चुस्त नियम-कानून क्यों न बनाएं। सभी सरकारों ने समय-समय पर ऐसे कदम उठाए हैं। मौजूदा सरकार भी। बैंक नियमन अधिनियम,1949 में संशोधन, बहु-राज्य सहकारी समिति (संशोधन) विधेयक,2022 और अलग सहकारिता मंत्रालय मौजूदा सरकार के सहकारिता क्षेत्र को खास तोहफे हैं।

सहकारिता इसके पहले तक कृषि मंत्रालय के अधीन एक विभाग था। अलग सहकारिता मंत्रालय के गठन से साफ है सरकार यहां कुछ खास करना चाहती है। अब सरकार जो करेगी, वह सरकारी ही होगा, सहकारी नहीं। आलोचकों को सरकार की नियत पर संदेह है। वे अलग सहकारिता मंत्रालय को संघीय ढांचे पर केंद्र का हमला मानते हैं, क्योंकि सहकारिता राज्य का विषय है।

अब जरा एक नजर उन कानूनों पर, जिनके जरिए समय-समय पर सहकारिता आंदोलन पर नियंत्रण करने की कोशिशें की गईं। सहकारिता को सरकारी निगरानी में लाने के लिए पहली बार 1904 में ’सहकारी क्रेडिट सोसायटी अधिनियम’ पारित किया गया। 2011 तक 5300 सहकारी समितियां अस्तित्व में आ गईं। 1912 में इस अधिनियम में आवश्यक संशोधन किए गए। नए कानून का नाम ’सहकारी समिति अधिनियम’ हो गया। सहकारिता के विस्तार के लिए खुली धरती, खुला आसमान था, हौंसलों की उड़ान भी थी।

सहकारी समितियों की संख्या बढ़ती गई। इसी बीच केंद्र और राज्यों के अधिकारों को निर्धारित करने वाला ’चेल्म्सफोर्ड सुधार अधिनियम, 1919’ पारित हुआ, और सहकारी समितियां राज्य का विषय बन गईं। इस दौरान ऐसी सहकारी समितियां भी बन गई थीं, जिनमें एक से अधिक राज्यों के सदस्य शामिल थे। अब इन समितियों से निपटने के लिए 1942 में ’बहु-इकाई सहकारी समिति अधिनियम’ पारित करना पड़ा। इसमें 1984 में सुधार किया गया और ’बहु-राज्य सहकारी समिति (एमएससीएस) अधिनियम’ अस्तित्व में आया।

साल 2002 में अधिनियम में फिर संशोधन किया गया। यह आदर्श अधिनियम था। अब एक बार फिर एमएससीएस अधिनियम में संशोधन की तैयारी है। बहु-राज्य सहकारी समिति (संशोधन) विधेयक-2022 संसद के मानसून सत्र में पारित होना है।

नए विधेयक के प्रावधान नए सहकारिता मंत्रालय की मंशा को स्पष्ट कर देते हैं। एक प्रमुख प्रावधान है कि कोई भी सहकारी समिति किसी भी बहु-राज्य सहकारी समिति में अपना विलय कर सकती है। मौजूदा अधिनियम में किसी एमएससीएस के ही दूसरी एमएससीएस में विलय का प्रावधान है। राज्य सहकारी समितियों को केंद्र की निगरानी में लाने का यह एक रास्ता लगता है। विधेयक सात दिसंबर, 2022 को लोकसभा में पेश किया गया था। विपक्ष की आपत्ति के बाद इसे संसद की एक संयुक्त समिति को सौंप दिया गया।

समिति ने अपनी रपट 15 मार्च, 2023 को लोकसभा को सौंप दी है, जिसमें विधेयक के लगभग सभी प्रावधानों को स्वीकृति दी गई है। विधेयक के कानून बनने के बाद एमएससीएस के चुनाव के लिए एक केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण भी होगा और वित्तीय पारदर्शिता के लिए लोकपाल भी। सरकार इस संशोधन विधेयक को सहकारिता के लिए रूपांतरकारी बताती है, जबकि आलोचक नियंत्रणकारी। यहां सवाल सरकार की सोच पर नहीं, विधेयक के स्वरूप पर है, जो कहीं से सहकारी नहीं है। जरूरत सहकारी अधिनियमों की है। जैसे 2003 का उत्पादक कंपनी अधिनियम आज भी सहकारी उद्यमों के लिए सहकारी बना हुआ है।

सहकारिता में सरकारिता के अफसाने और भी हैं। सितंबर 2020 में ’बैंकिंग नियमन (संशोधन) अधिनियम-2020’ पारित हुआ, और 1482 शहरी सहकारी बैंक और 58 बहु-राज्य सहकारी बैंक सीधे भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) की निगरानी में आ गए। इस संशोधन के लिए सरकार के पास एक मजबूत तर्क था – 2019 का पंजाब एंड महाराष्ट्र सहकारी (पीएमसी) बैंक धोखाधड़ी मामला। मगर तथ्य यह भी है कि थाने खुलने से अपराध कम नहीं होते। केंद्र के इस कदम पर भी सवाल उठे। आरबीआइ के जरिए राज्य सहकारी बैंकों पर नियंत्रण की मंशा के सवाल। अधिनियम के खिलाफ उच्च न्यायालयों में मुकदमें हुए। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर फिलहाल सभी मुकदमों की सुनवाई मद्रास उच्च न्यायालय कर रहा है।

दिसंबर 2011 में 97वें संविधान संशोधन के जरिए भी सहकारी समितियों के प्रबंधन को चुस्त-दुरुस्त करने की कोशिश की गई थी। गुजरात उच्च न्यायालय ने नए जोड़े गए खंड 9बी के पूरे हिस्से को 22 अप्रैल, 2013 को निरस्त कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने 2021 में गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले पर मुहर लगा दी। सहकारिता संविधान की 7वीं अनुसूची के तहत राज्य का विषय है, लिहाजा संबंधित कानून में संसद के जरिए किसी बदलाव से पहले देश की 50 फीसद राज्य विधानसभाओं की स्वीकृति आवश्यक है। सर्वोच्च न्यायालय ने हालांकि एमएससीएस से संबंधित संशोधनों को लागू करने की स्वीकृति दे दी। देश में फिलहाल 1500 से अधिक एमएससीएस हैं।

न्यायालय के इस फैसले से सरकार सचेत हो गई लगता है। उसने देशभर की प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों (पीएसीएस) को एक कानून से संचालित करने का नया तरीका ढूढ़ निकाला है। एक बाय-लॉज (उपनियम) तैयार किया गया और सुझाव के लिए उसे सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भेज दिया गया। सहकारिता मंत्री अमित शाह ने पिछले दिनों 17वें सहकारिता महासम्मेलन में कहा कि कुल 26 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इस उपनियम को स्वीकृति दे दी है।

देश के 85 फीसद पीएसीएस इस साल सितंबर के बाद से एक कानून से संचालित होने लगेंगे। सरकार का मानना है अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग कानून होने से पीएसीएस सम्यक रूप से प्रभावी प्रदर्शन नहीं कर पा रहे। देश में अभी 85,000 पीएसीएस हैं। अगले तीन सालों में हर ग्राम पंचायत में एक पीएसीएस स्थापित करने की योजना है। एक कानून की बात सुनने में अच्छी लगती है। लेकिन राज्यों की भिन्न-भिन्न भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक और जलवायु स्थितियों के लिहाज से यह अव्यवहारिक है। यदि उत्तर प्रदेश के नियम, उत्तराखंड या पूर्वोत्तर राज्यों में लागू किए जाएं तो क्या परिणाम होंगे? यह सहकारिता पर सरकारिता थोपने से ज्यादा कुछ नहीं है।

यह सच है आज के समय में नियम-कानून विहीन व्यवस्था का संचालन कठिन है, भले ही वह सहकारिता क्यों न हो। लेकिन सच यह भी है कि कोई व्यवस्था तभी सहकारिता कहलाएगी, जब संबंधित नियम-कानून और कार्यपद्धति सहकारी हों। वरना इतिहास कानूनों के विकास का बनेगा, सहकारिता के विकास का नहीं। हालांकि, सरकारिता की बढ़ती जकड़न का एक अर्थ यह भी है कि कहीं न कहीं सहकारी भाव और भूमिकाएं अभी बची हुई हैं। जरूरत उनके संरक्षण और संवर्धन की है। भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ (एनसीयूआई) को इस भूमिका में गिना जा सकता है।

अमूल, नेफेड, इफको, क्रिभको, लिज्जत पापड़, केंद्रीय सहकारी भंडार जैसे नाम सहकारिता के उज्ज्वल उदाहरण हैं। बुरी हालत में भी कृषि ऋण वितरण में लगभग 29 फीसद, उर्वरक वितरण में 35 फीसद, उर्वरक उत्पादन में 25 फीसद, चीनी उत्पादन में 35 फीसद, दूध खरीद, बिक्री और उत्पादन में लगभग 15 फीसद, गेहूं खरीद में 13 फीसद, और धान खरीद में 20 फीसद सहकारिता क्षेत्र की हिस्सेदारी है। लगभग साढे़ आठ लाख सहकारी समितियां देश में काम कर रही हैं। लगभग 13 करोड़ लोग सीधे तौर पर उनसे संबद्ध हैं। यदि सरकार, समाज और प्रबंधन शुद्ध सहकार की भूमिका में आ जाएं तो सहकारिता आंदोलन अर्थव्यवस्था की धुरी बन सकता है।

(वरिष्ठ पत्रकार सरोज कुमार इन दिनों स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)

इसे भी पढ़ें – ज्योति मौर्या प्रकरण – समाज का स्त्रीविरोधी चेहरा बेनकाब

ज्योति मौर्या प्रकरण – समाज का स्त्रीविरोधी चेहरा बेनकाब (Jyoti Maurya Episode – The Anti-Feminist Face Of The Society Exposed)

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हरिगोविंद विश्वकर्मा
मनुष्य दावा करता है कि वह सामाजिक प्राणी है। इसी आधार पर यह स्वयंभू सामाजिक प्राणी कहता रहा है कि पशुओं के विपरीत वह सभ्य, सहिष्णु और सहनशील है। क्षमाशील तो इतना है कि अपराधी को भी माफ़ कर देने की समृद्ध परंपरा का पालन करता है। इतना ही नहीं इसका यह भी दावा है कि यह इंसान के मौलिक अधिकारों का सम्मान करता है। लेकिन लंबे-चौड़े दावे करने वाले सभ्य प्राणियों के इस समाज की हक़ीक़त को एक स्त्री के एक क़दम ने बेनक़ाब कर दिया। जी हां, यहां बात हो रही है उत्तर प्रदेश प्रांतीय सिविल सेवा (Uttar Pradesh Provincial Civil Service) यानी पीसीएस अधिकारी ज्योति मौर्या (PCS Officer Jyoti Maurya) की, जिनके बारे में यह सभ्य पुरुष इन दिनों उनका, यानी एक स्त्री का, पक्ष जाने बिना उनके प्रति कमेंट करने में निर्ममता और असहिष्णुता की सारी सीमाएं, सारी मर्यादाएं लांघ गया है। कहना न होगा कि कमोबेश स्त्रियों से डरने वाला हर पुरुष इन दिनों पितृसत्तावादी स्टेटमेंट (patriarchal statement) दे रहा है और सोशल मीडिया समेत हर मंच पर ज्योति मौर्या को दोषी ठहरा रहा है।

वैसे तो सभ्य और सामाजिक प्राणी होने का दावा करने के बावजूद दुनिया का कमोबेश हर समाज पुरुष प्रधान ही नहीं, बल्कि स्त्री-विरोधी रहा है। लेकिन यह सभ्य समाज इस सीमा तक स्त्री-विरोधी है, यह किसी भी संवेदनशील इंसान ने कल्पना तक नहीं की थी। हर समझदार आदमी हतप्रभ है कि सामाजिक प्राणियों का यह सभ्य समाज किसी स्त्री के प्रति इतना निर्मम, असंवेदनशील और असहनशील कैसे हो सकता है। कथित तौर पर सभ्य प्राणियों का यह समाज स्त्री के प्रति कितनी नफ़रत और घृणा से भरा है, इसका उदाहरण तो देखिए कि यह समाज इस बात को हज़म ही नहीं कर पा रहा है कि कोई स्त्री अपने पति को तलाक़ देने का क़दम कैसे उठा सकती है। यानी यह मानता है कि तलाक़ देने का सर्वाधिकार केवल पुरुष का है। इस सभ्य समाज के अनुसार स्त्री को तो चरणों की दासी बनकर अपने स्वामी यानी पति की सेवा में लगे रहना चाहिए। भले पति डिज़र्व करता हो या नहीं। कोई स्त्री, चाहे वह पीसीएस ही क्यों न हो, इस परिपाटी के विरुद्ध कैसे जा सकती है।

पहली बार जब ज्योति मौर्या और आलोक मौर्या का मामला सुर्खियों में आया और लोगों को पता चला कि तलाक़ की पहल करने वाली पत्नी यानी महिला पीसीएस अधिकारी हैं और पति यानी पुरुष सफ़ाई कर्मचारी, तभी उसने ज्योति को दोषी और आलोक को बेचारा मान लिया, क्योंकि सती प्रथा के समर्थक इस समाज के अनुसार कोई पत्नी अपने पति से ऊपर की कुर्सी पर कैसे बैठ सकती है। कोई पत्नी अपने पति से ज़्यादा मशहूर और योग्य कैसे हो सकती है। कोई पत्नी पति से ज़्यादा पैसे कैसे कमा सकती है। यानी पत्नी होकर पति से ज़्यादा क़ाबिल और ज़्यादा लोकप्रिय होना, सभ्य प्राणियों के इस समाज में स्त्री का अक्षम्य अपराध है। देश में विधि का शासन न होता तो सभ्य प्राणियों का यह समाज निश्चित तौर पर ज्योति मौर्या को फ़ांसी पर लटका देता या ज़िंदा जला देता, क्योंकि पत्नी बनने वाली स्त्री को सभ्य प्राणियों के इस समाज ने नौकरानी का दर्जा दे रखा है। ऐसे में कोई नौकरानी स्वामिनी कैसे हो सकती है।

पति से ज़्यादा योग्य और ज़्यादा बुद्धिमान स्त्री अगर पीसीएस रैंक के अधिकारी पद पर आसीन है और उसका पति चौथे दर्जे का सफ़ाई कर्मचारी है, तब तो स्त्री का गुनाह कई गुना और बढ़ जाता है। इसी बिना पर सभ्य समाज ने अदालत से पहले ही ज्योति मौर्या को कठघरे में खड़ा कर दिया। ज्योति मौर्या का गुनाह यह भी है कि चरणों की दासी बनी रहने की बजाय उन्होंने अपने सफ़ाईकर्मी पति से तलाक़ के लिए अदालत का दरवाज़ा खटखटा दिया। सभ्य प्राणियों का यह समाज ज्योति मौर्या के बारे में असभ्य होकर जो मन में आ रहा है वही लिख और बोल रहा है और यह लेखन उसकी बिरादरी के लोगों को ख़ूब पसंद आ रहा है, लोग ख़ूब पढ़ भी रहे हैं। इसीलिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इन दिनों ज्योति मौर्या और आलोक मौर्या के बीच चल रहा विवाद ख़ूब ट्रेंड कर रहा है।

सोशल मीडिया तो एक अनियंत्रित प्लेटफॉर्म है। उसकी जवाबदेही अभी तक तय ही नहीं की जा सकी है, लेकिन समाज के प्रति जवाबदेह मेन स्ट्रीम मीडिया की हरकतों को देखिए। शर्म आ जाएगी। अपने को राष्ट्रीय अख़बार कहने वाले कई समाचार पत्रों ने बिना वेरीफिकेशन के यह ख़बर छाप दी कि ज्योति मौर्या के प्रकरण के प्रकाश में आने के बाद लोग सतर्क हो गए हैं। वे अपनी पत्नियों को पढ़ाना नहीं चाहते हैं और इलाहाबाद में सिविल सेवा की तैयारी कर रहीं तक़रीबन 150 महिलाओं को उनके पतियों ने घर वापस बुला लिया और चूल्हा-चौका करने को कह दिया। यह ख़बर ग़लत और बेबुनियाद है। इतना ही नहीं, कई लोग सुर्खियां बटोरने और सोशल मीडिया पर कमाई करने के लिए पढ़ाई कर रही अपनी पत्नियों से उम्र भर दासी बने रहने के हलफ़नामे पर हस्ताक्षर करवा कर उसे मेन स्ट्रीम मीडिया को भेज रहे हैं। इस तरह के कार्य को समाजविरोधी कार्य को तरजीह न देने की जगह, ख़बरों के अकाल से जूझ रहा मेन स्ट्रीम मीडिया उस हलफ़नामे को हाथों हाथ ले रहा है।

यहां सवाल यह है कि यह मान लेना कहां तक उचित है कि ज्योति मौर्या के पति आलोक मौर्या शत-प्रतिशत सच बोल रहे हैं। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि वे अपनी पत्नी का नाम ग़ैरपुरुष से जोड़ने का सामाजिक अपराध कर रहे हैं। इतना ही नहीं वे पत्नी को उसके कथित प्रेमी के साथ शारीरिक संबंध बनाते हुए रंगे हाथ पकड़ने का दावा भी कर रहे हैं। प्रथम दृष्टा इस तरह के दावे अतिरंजनापूर्ण और ग़लत होते हैं। यह फ्रस्ट्रेशन का नतीजा होता है। उनका अपनी पत्नी से विवाद लंबे समय से चल रहा है। यह मामला अदालत में विचाराधीन है, लेकिन आलोक की हरकतों से साफ़ लग रहा है कि अदालती लड़ाई में वे जब कमज़ोर पड़ने लगे तो विक्टिम कार्ड खेल दिया। आलोक अच्छी तरह जानते थे कि सभ्य प्राणियों का यह समाज वाक़ई असभ्यता की हद तक स्त्री विरोधी है और उन्हें रातोंरात पहले बेचारा बनाएगा फिर नायक बना देगा। एक ऐसा नायक जो बेचारा है और तलाक़ का दुस्साहसी पहल करने वाली अपनी शक्तिशाली पत्नी से इंसाफ़ की लड़ाई लड़ रहा है।

अगर ज्योति मौर्या और आलोक मौर्या के बयानों पर ग़ौर किया जाए तो ज्योति परिपक्व और आलोक अपरिपक्व नज़र आ रहे हैं। आम जीवन में भी हम देखते हैं कि हर पति यही कोशिश करता है कि समाज और घर में उसकी हैसियत पत्नी से अधिक हो। वह सामाजिक तौर पर पत्नी से ज़्यादा पैसे कमाए और पत्नी से ज़्यादा योग्य और बुद्धिमान माना जाए। इसीलिए जहाँ पत्नियां बीस हैं, यानी पति से ज़्यादा बुद्धिमान, योग्य और कमाने वाली हैं, वहां घर में उन्हें पति के टॉन्ट यानी ताने सहने पड़ते हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अमूमन हर पति अपनी ज़्यादा बुद्धिमान और योग्य पत्नी को राइवल मान कर उसे नीचा दिखाने की कोशिश करता रहता है। वह बात-बात पर उसे हतोत्साहित करता रहता है। यानी मानसिक तौर पर उसे टॉर्चर करता रहता है। निश्चित तौर पर ज्योति मौर्या के मामले में भी यही हुआ है। आलोक जिस तरह से पति-पत्नी के मर्यादित रिश्ते की धज्जियां उड़ा रहे हैं, उससे यह साफ़ है कि घर में शर्तिया वह अपनी पत्नी को टॉर्चर करते रहे होंगे।

सबसे बड़ी बात ज्योति मौर्या जहीन इंसान की तरह बहुत संयमित और संतुलित बयान दे रही हैं। बहुत ज़्यादा कुरेदने पर भी वह यही कह रही हैं कि यह पति और पत्नी के बीच का मामला है। वह यह भी कह रही हैं कि चूंकि प्रकरण अदालत में विचाराधीन है तो उन्हें जो भी कहना है अदालत में ही कहेंगी। लेकिन आलोक मौर्या जिस तरह का बयान दे रहे हैं, उससे साफ़ लग रहा है कि बौखलाहट में उन्होंने अपना विवेक और संयम खो दिया है और जिस स्त्री के साथ 11-12 साल एक ही छत के नीचे रहे और दो बच्चियों का बाप बने, उसी स्त्री के चरित्र की चादर वह खुद चर्र-चर्र फाड़ रहे हैं। इसमें उन्हें साथ मिल रहा है, स्त्रियों से जलने वाले कथित सभ्य प्राणियों के समाज का। सभ्य प्राणियों के समाज के पुरुष एक तरह से आलोक मौर्या के कंधे पर बंदूक रखकर समस्त स्त्रियों को निशाना साध रहे हैं।

कथित सभ्य प्राणियों का यह समाज ज्योति मौर्या और आलोक मौर्या प्रकरण को इतनी तवज्जो इसलिए भी दे रहा है ताकि वो अपने पति से ज़्यादा बुद्धिमान और योग्य स्त्रियों को चेतावनी दे सकें। ताकि भविष्य में कोई भी स्त्री ज्योति मौर्या के नक्शे क़दम पर चलना तो दूर चलने की कल्पना तक ना करें। हर स्त्री अपने मूर्ख पति की भी अनुचित हरकतों को झेलती रहे और उसके चरणों की दासी बनी रहे। पति चाहे जो भी कहे या करे, पत्नी उसे स्वामी कहती रहे और उसके बिस्तर को गर्म करती रहें, क्योंकि स्त्री को सभ्य प्राणियों का यह समाज सबला नहीं ‘अबला’ मानता है। यह स्त्री विरोधी समाज किसी भी स्त्री को सबला नहीं बनने देना चाहता। इसीलिए तो उसने मर्यादा के नाम पर स्त्री के लिए घूंघट और बुरके का प्रावधान किया है। फिर अबला के लिए तो राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त भी कह चुके हैं, -अबला तेरी यही कहानी आंचल में है दूध और आखों में पानी।

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यकीन मानिए, भारत ने विश्वकप जीत लिया है!

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1983 के विश्वकप में भारत की ऐतिहासिक विजय की वर्षगाँठ पर विशेष रिपोर्ट

(Special report on the anniversary of India’s historic victory of 1983 World Cup)

हरिगोविंद विश्वकर्मा
25 जून 1983, दिन शनिवार। स्थान – लंदन का लॉर्डस स्टेडियम।

सच पूछिए तो 1970 के दशक में बादशाहत कायम करने वाली क्लाइव लॉयड के नेतृत्व में वेस्टइंडीज़ टीम 1983 में अपराजेय थी। उनके पास दुनिया का सबसे भयावह गेंद फेंककर बल्लेबाज़ों के मन में ख़ौफ़ पैदा करने वाला आक्रमण था। जिनमें मैल्कम मार्शल (Malcolm Marshall), जोएल गार्नर (Joel Garner), माइकल होल्डिंग (Michael Holding) और एंडी रॉबर्ट्स (Andy Roberts) जैसे ख़तरनाक गेंदबाज शामिल थे। कैरेबियन टीम में किसी भी गेंदबाज़ की निर्ममता और क्रूरता से धुनाई करने वाले निर्मम बल्लेबाज़ थे। जिनमें विवियन रिचर्ड्स (Vivian Richards), गॉर्डन ग्रीनिज़ (Gordon Greenidge), डेसमंड हेंस (Desmond Haynes), क्लाइव लॉयड (Clive Lloyd), लैरी गोम्स (Larry Gomes) और फाउद बैकस (Faoud Bacchus) जैसे महान बल्लेबाज थे। ऐसी गेंदबाज़ी और बल्लेबाज़ी क्रिकेट के संपूर्ण इतिहास में कभी नहीं देखी गई थी। 1974 और 1979 में प्रूडेंशियल विश्वकप का ख़िताब जीतना कैरेबियन के प्रदर्शन का गवाह था। दो-दो विश्वकप जीतने वाली क्लाइव लॉयड की टीम को क्रिकेट का बेताज़ बादशाह कहा जा रहा था।

दूसरी ओर भारतीय टीम का वनडे ट्रैक रिकॉर्ड निराशाजनक। मतलब, शतरंज की बिसात पर एक तरफ़ क्रिकेट का बादशाह था तो दूसरी ओर मामूली सा प्यादा। इसके बावजूद विश्वकप शुरू होने के समय भारत के पक्ष में तीन-तीन सकारात्मक बातें थीं। पहली बात, कुछ दिन पहले वनडे मैच में भारत इसी वेस्टइंडीज़ टीम को उसकी ही सरज़मीं पर हरा चुका था। दूसरी बात, भारत तीसरे विश्वकप के अपने पहले मैच में ही विश्व चैंपियन को मात दे चुका था और, भारत के पक्ष में तीसरी बात, ऑस्ट्रेलियाई कप्तान किम ह्यूज ने विश्वकप शुरू होने से पहले कहा था कि भारत को कम आंकना भारी भूल होगी, क्योंकि मौजूदा भारतीय टीम विश्वकप जीत सकती है। लेकिन क्रिकेट के पंडितों ने भारत की दोनों जीत को महज़ तुक्का और ह्यूज के बयान को नॉन-सीरियस क़रार दिया था।

वैसे भारत का विश्वकप में जो रिकॉर्ड था, उसे देखते हुए उसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं था। इसीलिए भारतीय क्रिकेट बोर्ड के लिए टीम का फाइनल में पहुँचना ही बड़ी उपलब्धि थी। बोर्ड भी मानकर चल रहा था कि भारत फाइनल में वेस्टइंडीज़ को कतई नहीं हरा सकता। मैच की पूर्व संध्या की मीटिंग में बीसीसीआई के तत्कालीन अध्यक्ष एनकेपी साल्वे ने भारतीय टीम को शाबाशी देते हुए कहा था, “तुम लोग फाइनल में पहुँचे। यही बहुत बड़ी बात है। अब फाइनल की चिंता बिल्कुल मत करो। कल तुम लोग चाहे जीतो या हारो फाइनल में पहुँचने के लिए इनाम स्वरूप बीसीसीआई की ओर से टीम के सभी सदस्यों का 25-25 हज़ार रुपए का बोनस पुरस्कार दिया जाएगा।” उस समय 25 हज़ार रुपए बड़ी रकम मानी जाती थी। 25 हज़ार रुपए के बोनस की घोषणा से टीम के सभी खिलाड़ियो को आश्चर्य हुआ। उन्होंने इतनी बड़ी रकम की कल्पना भी नहीं की थी।

बहरहाल, 1983 का तीसरा क्रिकेट विश्व कप आयोजन से पहले ही लिखी गई स्क्रिप्ट के अनुसार चल रहा था। जहां तीसरी बार भी कैरेबियन टीम को ही विजेता मान लिया गया था। वेस्टइंडीज़ अपने चिरपरिचित अंदाज़ में खेलते हुए फाइनल में पहुँचा तो कपिल देव की टीम ने जिम्बाब्वे तक से संघर्ष करते हुए फाइनल में जगह बनाई। एक बात और, भारतीय टीम ओपनर सुनील गावस्कर (Sunil Gavaskar), कृष्णमाचारी श्रीकांत (Krishnamachari Srikkanth) और मध्य क्रम में मोहिंदर अमरनाथ (Mohinder Amarnath), यशपाल शर्मा (Yashpal Sharma), संदीप पाटिल (Sandeep Patil) और कपिल देव (Kapil Dev) जैसे बल्लेबाज़ों और कपिल, मदन लाल (Madanlal), रोजर बिन्नी (Roger Binny) और मोहिंदर अमरनाथ के रूप में चार-चार ऑलराउंडर्स और कपिल, बलविंदर सिंह संधू (Balwinder Singh Sandhu), मदन, बिन्नी और अमरनाथ जैसे इंग्लैंड की पिचों के अनुकूल मध्यम-तेज गेंद फेंकने वाले गेंदबाज़ों की बदौलत विश्वकप में एक ताकत बनकर उभरी थी।

इसके बावजूद ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड या पाकिस्तान की बजाय भारत के फ़ाइनल में पहुँचने से वेस्टइंडीज़ रेस्ट मोड में था, क्योंकि भारत जैसी साधारण टीम ख़तरा ही नहीं थी। इस टीम को धूल चटाने के लिए ज़्यादा मेहनत भी नहीं करनी थी। यानी कैरिबियन टीम में ओवरकॉन्फिडेंस था। वैसे यह वनडे क्रिकेट इतिहास का 223वां मैच था और लॉर्ड्स के 30 हज़ार क्षमता वाले मैदान पर 24609 दर्शकों के सामने खेला जा रहा था। दर्शकों में कैरेबियन देश और भारत के नागरिक अधिक थे। अंपायरिंग की ज़िम्मेदारी दुनिया से सबसे प्रतिष्ठित और निष्पक्ष अंपायर डिकी वर्ड और बैरी मेयर के कंधों पर थी। टॉस क्लाइव लॉयड ने जीता और फील्डिंग का निर्णय लेते हुए भारत को पहले बल्लेबाज़ी का न्यौता दे दिया। अब भारत को लॉर्ड्स के स्विंग और बाउंस वाली पिच पर पैवेलियन और नर्सरी छोर से मार्शल, गार्नर, होल्डिंग और रॉबर्ट्स की चौकड़ी के स्विंग और बाउंस का सामना करना था।

वेस्टइंडीज़ की ओर से बोलिंग की शुरूआत पैवेलियन एंड से एंडी रॉबर्ट्स ने की। पहले ओवर में गावस्कर ने 1 रन बनाए। नर्सरी एंड से गार्नर का दूसरा ओवर तो भयावह था। उनकी गेंदों को मिल रहे बाउंस से गावस्कर कई बार बीट हुए लेकिन ओवर में एक रन बनाने में सफल रहे। रॉबर्ट के एक ओवर की एक तेज़ गेंद को लिटिल मास्टर शायद समझ ही नहीं पाए और बल्ला लगा दिया। गेंद बल्ले का बाहरी किनारा लेती हुए विकेट के पीछे जैफ डुजोन के दस्ताने में समा गई। बैरी मेयर को तर्जनी उठाने में ज़रा भी दिक़्क़त नहीं हुई। इस तरह तीसरे ओवर में ही महज़ 2 रन के स्कोर पर भारत ने गावस्कर के रूप में अपना सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज़ गंवा दिया। गावस्कर 12 गेंद खेलकर केवल 2 रन बनाए। इसके बाद तीसरे नंबर पर बल्लेबाज़ी करने के लिए मोहिंदर अमरनाथ मैदान में उतरे।

मोहिंदर के आते ही श्रीकांत का कॉन्फिडेंस लेवल बढ़ गया। उन्होंने रॉबर्ट्स के ओवर की सबसे तेज़ गेंद पर सबसे तेज़ शॉट मारा और अंपायर ने दोनों हाथ उठाकर छक्के का इशारा किया। तीन रन से खाता खोलने वाले मोहिंदर समय की मांग के अनुसार धीमी बल्लेबाज़ी कर रहे थे। भारतीय टीम पर कैरेबियन गेंदबाज़ी किस तरह हावी थी कि 13 ओवर में एक विकेट पर केवल 32 रन बन सके थे। हालांकि श्रीकांत और मोहिंदर भारतीय पारी को आगे बढ़ाते रहे और दूसरे विकेट के लिए 50 रन की भागेदारी कर ली। जब लगने लगा कि श्रीकांत-अमरनाथ की जोड़ी जम रही है और टीम को अच्छी शुरुआत देगी, तभी 7 चौके और एक छक्के की मदद से 57 गेंदों पर 38 रन बनाने वाले श्रीकांत मैल्कम मार्शल की एक बेहद तेज़ इन-स्विंग गेंद को बिल्कुल भी समझ नहीं पाए और गेंद उन्हें बीट करती हुई पैड पर लगी। वह क्रीज़ के सामने थे, सो डिकी बर्ड को पगबाधा देने में ज़रा भी हिचकिचाहट नहीं हुई। इस तरह 59 के स्कोर पर भारत ने श्रीकांत का भी विकेट खो दिया।

अब मैदान में पहले मैच के हीरो यशपाल शर्मा मैदान में उतरे। अमरनाथ और यशपाल बहुत धीमी रफ़्तार से रन बना रहे थे, लेकिन संतोष की बात थी कि उन्होंने वेस्टइंडीज़ के भयावह आक्रमण के सामने अपने-अपने विकेट को बचाए रखा। 28वें ओवर की समाप्ति पर स्कोर दो विकेट पर 85 रन था। मोहिंदर 22 रन और यशपाल 9 रन बनाकर खेल रहे थे। उसी समय बोलिंग करने आए माइकल होल्डिंग ने एक तेज़ गेंद से अमरनाथ को क्लीन बोल्ड कर दिया। भारत का तीसरा विकेट 30वें ओवर में 90 रन के स्कोर पर गिरा। अगला ओवर लैरी गोम्स फेंकने आए। उनकी गेंद पर एक्स्ट्रा कवर के ऊपर से लंबा शॉट मारने के चक्कर में यशपाल 12वें खिलाड़ी के रूप में फील्डिंग कर रहे आगस्टिन लोगी को साधारण कैच दे बैठे। भारत का चौथा विकेट 92 रन पर गिर गया। भारत के चारों शीर्ष बल्लेबाज पैवेलियन लौट चुके थे और भारतीय टीम संकट में थी।

अब क्रीज़ पर भारत के दो सबसे ज़्यादा विस्फोटक बल्लेबाज संदीप पाटिल और कपिल देव बल्लेबाज़ी कर रहे थे। कपिल देव ने महज 8 गेंद में तीन चौके की मदद से ताबड़तोड़ 15 रन बना डाले। तीन ओवर में 18 रन जुड़ गए। यह जोड़ी चार-पाँच ओवर और टिक गई होती तो कहानी अलहदा होती, लेकिन गोम्स की एक गेंद पर छक्का मारने के चक्कर में कपिल देव लॉन्ग ऑन पर होल्डिंग को कैच दे बैठे। भारत ने 110 रन के स्कोर पर अपने कप्तान का विकेट खो दिया। जिम्बाब्वे के ख़िलाफ 175 रनों की ऐतिहासिक पारी खेलने वाले कपिल वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ बड़ी पारी नहीं खेल पाए। इसके बाद आए आक्रामक बल्लेबाज़ कीर्ति आज़ाद से बड़ी उम्मीद थी, लेकिन 3 गेंद खेलने वाले आज़ाद को रॉबर्ट्स ने स्क्वेयर लेग पर गारनर के हाथों कैच करा कर पैवेलियन वापस भेज दिया। आज़ाद अपना खाता भी नहीं खोल सके थे। भारत का स्कोर 111 था और छह विकेट गिर चुके थे।

अब मैदान में उतरे ऑलराउंडर माने जाने वाले रोजर बिन्नी, लेकिन संदीप पाटिल का साथ वह भी नहीं दे पाए और 8 गेंद पर 2 रन बनाकर सातवें विकेट के रूप में उन्होंने भी पैवेलियन का रास्ता नाप लिया। उनका कैच रॉबर्ट्स की गेंद पर मिड विकेट पर गारनर ने पकड़ा। उस समय भारत का स्कोर 130 रन था। पाटिल का साथ देने के लिए एक और  हरफनमौला मदन लाल मैदान में उतरे। दोनों अच्छी बल्लेबाज़ी कर रहे थे कि तभी 153 रन के स्कोर पर भारत का सबसे महत्वपूर्ण विकेट गिरा। महज़ 29 गेंद में गोम्स की गेंद पर लगाए गए एक शानदार छक्के की मदद से 27 रन बनाकर खेल रहे संदीप पाटिल को गारनर की गेंद पर मिड ऑन पर लैरी गोम्स ने लपक लिया। यह भारत का आठवाँ विकेट था। अब क्रीज़ पर मदन लाल का साथ देने के लिए विकेटकीपर-बल्लेबाज़ सैयद मुस्तफ़ा हुसैन किरमानी उतरे।

मदन लाल और किरमानी स्कोर को 161 तक लेकर गए। इसी स्कोर पर 31 गेंद पर 17 बहुमूल्य रन बनाने वाले मदन लाल को 45वें ओवर में मार्शल ने नर्सरी एंड से एक बड़ी तेज़ गेंद पर क्लीन बोल्ड कर दिया। नौवें विकेट के रूप में आउट होने वाले मदन ने अपनी पारी में गोम्स की गेंद पर एक शानदार छक्का भी जड़ा। अब क्रीज़ में किरमानी का साथ देने के लिए बलविंदर सिंह संधू उतरे। दोनों ने मार्शल और होल्डिंग की गेंदों का बहादुरी से मुक़ाबला किया। इस दौरान संधू मार्शल के बाउंसर से घायल होते-होते बचे। वह किरमानी के साथ एक-एक रन लेते रहे और स्कोर को बढ़ाते रहे। भारत का स्कोर 9 विकेट पर 183 रन पहुँच गया। जब लगने लगा कि भारत 200 के जादुई आँकड़े को पार करके वेस्टइंडीज़ के सामने चुनौती पेश कर सकता है तभी होल्डिंग ने 43 गेंद खेलकर 14 रन बनाने वाले किरमानी को बोल्ड कर दिया। इस तरह भारतीय टीम 54 ओवर में 183 रन के स्कोर पर सिमट गई। अंतिम बल्लेबाज़ के रूप में संधू एक-एक रन करके 30 गेंद पर 11 बेशक़ीमती रन बनाकर नाबाद रहे।

वेस्टइंडीज़ की ओर से रॉबर्ट्स, गार्नर, मार्शल, होल्डिंग और गोम्स ने क्रमश 10, 12, 11, 9.4 और 11 ओवर में 32, 24, 24, 26 और 49 रन देकर 3, 1, 2, 2 और 2 विकेट लिए। रिचर्ड्स ने केवल एक ओवर डाले और 8 रन दिए। इस तरह कैरेबियन चौकड़ी ने भारत की टीम को सस्ते में समेट दिया। भारत के 183 पर धराशायी होने के बाद इस बात की पूरी संभावना थी कि वेस्टइंडीज़ आसानी से तीसरी बार विश्वकप चैंपियन बन जाएगा। बस जीत की औपचारिकता ही बाक़ी है, जिसे डेसमंड हेंस, गॉर्डन ग्रीनिज़ और विव रिचर्ड्स ही पूरा कर देंगे। कई लोग तो अनुमान लगाने लगे कि कैरेबियन बल्लेबाज़ 30 ओवर में ही मैच समाप्त कर देंगे। सट्टा बाज़ार में भी भारतीय टीम सबसे फिसड्डी टीम थी।

बहरहाल, भारत की ओर से आक्रमण की शुरुआत पैवेलियन एंड से कपिल देव ने की। उनके सामने दुनिया की सबसे सफल और सशक्त सलामी जोड़ी थी डेसमंड हेंस और गॉर्डन ग्रीनिज़ की। कपिल के पहले ओवर में 5 रन बनाकर हेंस और ग्रीनिज़ ने अपने इरादे साफ़ कर दिए। कपिल ने नई गेंद मदन लाल या रोज़र बिन्नी की जगह संधू को थमा दी। इस तरह भारत की ओर से दूसरा ओवर संधू डालने आए। संधू ने फाइनल में ग़ज़ब की गेंदबाज़ी की। जब भारतीय क्रिकेट की लॉर्ड्स में ऐतिहासिक जीत का इतिहास लिखा जाएगा, तब बलविंदर सिंह संधू के नाम का उल्लेख ज़रूर किया जाएगा। केवल 2 साल के करियर में 8 टेस्ट और 22 एकदिवसीय मैच खेलने वाले संधू ने अपना शुरुआती ओवर कमाल का फेंका। किसी को पता नहीं था कि संधू इतिहास बनाने जा रहे हैं।

गेंदों को स्विंग कराने के लिए परिस्थितियां संधू के लिए आदर्श थीं। संधू के दूसरे ओवर की अंतिम गेंद ऑफ स्टंप के बाहर पिच हुई और ग्रीनिज़ ने इस गेंद को छोड़ने का फ़ैसला किया और बल्ला ऊपर कर लिया। उन्होंने मान लिया था कि गेंद पहली स्लिप की ओर जाएगी। लेकिन भाग्य और समय को कुछ और मंज़ूर था। गेंद हैरतअंगेज़ ढंग से स्विंग हुई और ऑफ़ स्टंप का बेल गिरा गई। ग्रीनिज़ हैरत में पड़ गए, लेकिन उनके पास पैवेलियन वापस लौटने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं था। इसके बाद तो पूरे स्टेडियम में सन्नाटा पसर गया। किसी को यक़ीन नहीं हो रहा था कि ग्रीनिज़ को संधू ने बोल्ड कर दिया। मैदान और स्टेडियम में भारत की संभावित जीत की पहली ख़ुशबू उठी, लेकिन जल्द ही ख़त्म हो गई।

तीसरे नंबर पर बल्लेबाज़ी करने उतरे विवियन रिचर्ड्स के तेवर से स्पष्ट हो गया कि उन्हें दूसरे विश्व कप फाइनल में भी शतक बनाना है। उन्होंने अपनी शैली के अनुरूप बल्लेबाज़ी शुरू की। वह तूफ़ानी ट्रेन की तरह तेज़ दौड़ रहे थे। स्कोर तेज़ी से लक्ष्य की ओर बढ़ रहा था। उनकी आक्रामक बल्लेबाज़ी के आगे भारतीय आक्रमण बिल्कुल साधारण हो गया। रिचर्ड्स हर गेंदबाज़, चाहे वह कपिल देव हों, संधू हों या फिर मदन लाल हों, सबकी धुनाई कर रहे थे। वह लगातार गेंदों को बाउंड्री रेखा के पार भेज रहे थे। इस बीच 50 रन के स्कोर पर मदन लाल ने दूसरा विकेट दिलाया। आत्मविश्वास के साथ बैटिंग कर रहे सलामी बल्लेबाज़ डेसमंड हेंस मदन की एक उठती गेंद हवा में खेल गए। कवर में मुस्तैद फील्डर बिन्नी ने अवसर को भुनाते हुए गेंद को लैंड होने से पहले ही लपक लिया। वेस्टइंडीज़ का स्कोर 11.3 ओवर में 50 रन पर दो विकेट हो गया। हेंस 33 गेंद खेल कर 13 रन बनाए।

डेसमंड हेंस का विकेट गिरने का रिचर्ड्स की बल्लेबाज़ी पर कोई भी असर नहीं दिखा। उनका क़त्लेआम जारी था। उधर हेंस के आउट होने पर क्लाइव लॉयड बल्ला लेकर मैदान में उतरे। लॉयड को देखकर दर्शक तो हैरान रह गए, क्योंकि लंबे समय से टेस्ट और वनडे में कैरेबियन टीम में टू-डाउन पर लैरी गोम्स ही मैदान में उतरते थे। लेकिन आज कप्तान पैड बाँधे उनसे पहले आ गए। शायद रिचर्ड्स और कप्तान लॉयड मैच को जल्दी ख़त्म करना चाहते थे। अब क्रीज़ में कप्तान और उपकप्तान दोनों बैटिंग कर रहे थे। अचानक मदन की एक गेंद लॉयड के दाहिने पांव में लगी और वह लंगड़ाने लगे। उनके लिए डेसमंड हेंस को रनर के रूप में मैदान में उतरना पड़ा।

अचानक एक अनोखी घटना हुई। मदन लाल ने एक गेंद ऑफ स्टंप के बाहरी ओर थोड़ा सा शॉर्ट फेंकी। कई चौके जड़ चुके रिचर्ड्स पहले ही गेंद को मिडविकेट के पीछे स्टैंड में भेजने के लिए खुद को सेट कर चुके थे। उन्होंने शुरुआत में ही टच खेल दिया। गेंद ने टॉप-एज किया और हवा में बहुत ऊपर तक चली गई। कपिल देव मिड-ऑन पर क्षेत्ररक्षण कर रहे थे। वह गेंद की ओर दौड़ने लगे, तो दर्शक ही नहीं, बल्कि भारत में टीवी पर मैच देख रहे करोड़ों लोगों की धड़कन रुक गईं। बाक़ी फील्डर्स ने कपिल देव को ही कैच पकड़ने का मौक़ा दिया। कपिल दौड़ते हुए आगे बढ़ते रहे। उनका सिर उनके दाहिने कंधे की ओर था, आँखें गेंद पर टिकी थीं। अंत में उन्होंने आराम से कैच ले लिया। कैच पकड़ने के बाद उन्होंने दोनों हाथों को हवा में लहराया। कपिल का यह शानदार प्रदर्शन था।

उस कैच ने एक महान खिलाड़ी को चकमा दे दिया। खुद काल यानी समय को पूर्ण अविश्वास हुआ। वक़्त ठहर सा गया। क्रिकेट का बादशाह धराशायी हो गया। इस एक गेंद ने भारतीय क्रिकेट की सबसे अप्रत्याशित जीत को संभव बना दिया। रिचर्ड्स पश्चाताप करते हुए पैवेलियन लौट रहे थे। दूसरे छोर पर खड़े लॉयड पहली बार नर्वस दिख रहे थे, क्योंकि स्कोर बोर्ड पर महज़ 57 रन दिख रहे थे। लक्ष्य अभी 127 रन दूर था और वेस्टइंडीज़ के तीनों धाकड़ बल्लेबाज़ पैवेलियन लौट चुके थे। अब तक हुड़दंग मचा रहे कैरेबियन देशों के दर्शकों को मानों साँप सूँघ गया। लॉयड का साथ देने के लिए गोम्स क्रीज़ में पहुँच चुके थे। स्कोर में 9 रन और जुड़े थे कि 66 के स्कोर पर गोम्स का कैच सुनील गावस्कर ने स्लिप में बड़ी सफ़ाई के साथ पकड़ लिया। गेंदबाज़ मदन लाल ही थे। हेंस और रिचर्ड्स के बाद गोम्स उनके तीसरे शिकार बने। मदन लाल ने मैच में अपना काम कर दिया।

बहरहाल, गोम्स के आउट होने के बाद क्लाइव लॉयड का साथ देने के लिए पैड बाँधकर फाउद बैकस मैदान में उतरे। बेकस से लॉयड देर तक बातचीत करते रहे। शायद उन्हें समझा रहे थे कि जीत के लिए लंबी साझेदारी करना समय की मांग है। लेकिन 66 रन पर चौथा विकेट गंवाने वाली कैरेबियन टीम को उसी स्कोर पर बहुत ज़ोरदार झटका लगा। कप्तान लॉयड ने मिड-ऑन पर हवा से ड्राइव किया। एक्स्ट्रा कवर में कपिल ने शानदार कैच पकड़ा। इस बार गेंदबाज रोजर बिन्नी थे। बिन्नी ने 17 गेंद पर 8 रन बनाने वाले लॉयड को पाँचवें विकेट के रूप में आउट करके वेस्टइंडीज़ के खेमे में बेचैनी पैदा कर दी। विश्व चैंपियन टीम की आधी टीम 66 के स्कोर पर पैवेलियन लौट चुकी थी। वातावरण में पहली बार भारत की जीत की ख़ुशबू दूर तक फैली, लेकिन दिल्ली अभी दूर थी, क्योंकि वेस्टइंडीज के निचले क्रम के बल्लेबाज़ भी शतकीय साझेदारी के लिए जाने जाते थे।

लॉयड के आउट होने के लिए बाद विकेट-कीपर बल्लेबाज़ जैफ़ डुजोन मैदान में उतरे। डुजोन और फाउद बैकस पर बड़ी ज़िम्मेदारी थी। दोनों की जोड़ी ने संभल कर और सावधानीपूर्वक खेलना शुरू किया। रनों की रफ़्तार थम सी गई। पहली बार भारतीय गेंदबाज़ हावी दिख रहे थे। स्कोर में 10 रन की बढ़ोतरी हुई और 76 रन पहुँच गया। उसी समय कपिल ने गेंद संधू के हवाले कर दी। संधू ने एक और शानदार इन-स्विंग गेंद फेंकी, जिसे बैकस बिल्कुल समझ नहीं पाए और गेंद बल्ले का बाहरी किनारा लेती हुई पहली स्लिप की ओर जा रही थी, लेकिन विकेट के पीछे मुस्तैद खड़े किरमानी ने डाइव मार कर गेंद को अपने दस्ताने में क़ैद कर लिया और बैकस बेबस होकर पैवेलियन लौट रहे थे। यह संधू का दूसरा विकेट था। स्कोर छह विकेट पर 76 रन हो गया। अभी लक्ष्य 107 रन दूर था और वेस्टइंडीज़ के पास केवल चार पुच्छले बल्लेबाज़ बचे थे। क्रिकेट विशेषज्ञों ने पहली बार कहा कि अगर भारतीय गेंदबाज़ इसी तरह दबाव बनाए रखें तो भारत पहली बार विश्वकप जीत भी सकता है।

बहरहाल, डुजोन का साथ देने के लिए मैलकम मार्शल मैदान में उतरे। दोनों ने ज़िम्मेदारी भरी पारी खेली और 45 रनों की भागीदारी की। इस दौरान डुजोन ने संधू की एक गेंद पर छक्का भी मारा। 33वें ओवर में वेस्टइंडीज़ ने 100 रन हुए। डुजोन और मार्शल मिलकर स्कोर को 119 रन तक लेकर गए। जैफ ने 73 गेंद खेलकर 25 रन बनाए थे कि मोहिंदर अमरनाथ की एक धीमी गेंद पर सीधे बोल्ड हो गए। कैरेबियन टीम का सातवाँ विकेट गिर गया। अब मार्शल का साथ देने के लिए रॉबर्ट्स क्रीज़ पर पहुँचे। दोनों बहुत संभल कर खेल रहे थे। तभी 124 रन के स्कोर पर मार्शल को अमरनाथ की गेंद पर गावस्कर ने कैच कर लिया। आठवाँ विकेट गिरने से वेस्टइंडीज़ की जीत की उम्मीद धुँधली पड़ने लगी। भारतीय खेमे में भरोसा होने लगा कि भारत भी विश्वकप जीत सकता है। लेकिन अभी भी रॉबर्ट्स, गारनर और होल्डिंग बचे थे, जो अंतिम क्रम में अच्छी बल्लेबाज़ी कर लेते थे।

मार्शल के आउट होने पर गारनर मैदान में उतरे। वेस्टइंडीज़ का स्कोर जब 126 रन था, तभी कपिल ने रॉबर्ट्स को एलबीडब्ल्यू कर नौवाँ कैरेबियन विकेट गिरा दिया। अब भारत और जीत के बीच गारनर और होल्डिंग में से किसी एक के विकेट की दरकार थी। मैदान में पैड बाँधकर उतरने की बारी थी अंतिम बल्लेबाज माइकल होल्डिंग की। गारनर और होल्डिंग देर तक बल्लेबाज़ी करते रहे और भारत की जीत को रोककर रखा। वे स्कोर को 140 रन तक लेकर गए। तभी अचानक कमेंटेटर चिल्ला पड़ा, -होल्डिंग एलबीडब्ल्यू आउट! बोलर वाज़ मोहिंदर अमरनाथ! एंड… एंड… एंड इंडिया वन द प्रूडेंशियल वर्ल्ड कप! एंड… एंड… इंडिया एंड कपिलदेव मेड अ हिस्ट्री। ऑफ़कोर्स इट्स इंड ऑफ़ कैरेबियन एंपायर। इट्स न्यू इरा ऑफ़ दी इंडियन क्रिकेट! भारत रूपी मामूली से प्यादे ने कुछ ऐसी चाल चली कि बादशाह वेस्टइंडीज़ चारों खाने चित हो चुका था। कह सकते हैं कि लॉर्डस मैदान पर जो हुआ वो किसी करिश्मे से कम नहीं था।

जैसे ही अमरनाथ ने होल्डिंग को आउट किया कपिल देव भागे-भागे पैवेलियन पहुँचे और वहाँ बैठे लोगों से पूछा, “क्या यह सच है? क्या यह सच है कि हमने बाहुबली वेस्टइंडीज़ हो फिर हरा दिया? क्या यह सच है कि भारत ने क्रिकेट का विश्वकप जीत लिया है।” “यस… यस…” पैवेलियन में बैठे एक क्रिकेट अधिकारी ने कहा, “इट्स ट्रू। आपने और आपके लड़कों ने इतिहास बना दिया है। यकीन मानिए, भारत ने विश्व कप जीत लिया है!” लॉर्ड्स के मैदान पर तिरंगा लिए भारतीय दर्शक दौड़ रहे थे।

जनता की लाचारी, स्थायी भाव में बेरोजगारी

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सरोज कुमार

भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में नौ रसों के नौ स्थायी भावों का जिक्र है। अब 10वां स्थायी भाव अर्थशास्त्र से जुड़ता दिख रहा है। बेरोजगारी का स्थायी भाव। कोई अवस्था लंबी अवधि तक बनी रहे तो उसके प्रति आस्था पैदा होने लगती है। आस्था धीरे-धीरे स्थायी हो जाती है। एक सीमा बाद दर्द का अहसास न होना, इसी प्रक्रिया का परिणाम है। बेरोजगारी के साथ भी कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी का स्थायी भाव अच्छा संकेत नहीं है।

वित्त वर्ष 2022-23 के दौरान मासिक औसत बेरोजगारी दर 7.6 फीसद के उच्चस्तर पर बनी रही। लेकिन कहीं से कोई खास चीख-पुकार सुनाई नहीं दी। शायद बेरोजगारी का अहसास जाता रहा! यह मानव मन में बेरोजगारी के स्थायी हो जाने का संकेत है। बेरोजगारी का स्थायी भाव अस्थिरता है। यानी बेरोजगारी जितना स्थायी होगी, अस्थिरता उतनी ही बढ़ती जाएगी। अस्थिरता क्या कुछ करती है, बताने की जरूरत नहीं।

मनोभावों के बदलने से आंकड़े नहीं बदलते। अलबत्ता आंकड़े मनोभावों को बदल देते हैं। बेरोजगारी का सवाल आंकड़ों से आगे का है, और मानव मन आज इसी सवाल में उलझ कर रह गया है। बेरोजगारी के आंकड़े इतने भारी हो चले हैं कि अब इन्हें न तो मानव मन ढो पाने की स्थिति में है, और न अर्थव्यवस्था ही। दोनों की हालत पतली है।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनॉमी (सीएमआइई) के अनुसार, बीते वित्त वर्ष में उपभोक्ता मनोभाव सूचकांक की औसत मासिक वृद्धि दर 2.68 फीसद रही। इस धीमी वृद्धि दर का परिणाम है कि उपभोक्ता मनोभाव सूचकांक महामारी से पूर्व के स्तर पर आजतक नहीं पहुंच पाया। मौजूदा वित्त वर्ष के अंत तक भी उस स्तर पर पहुंचने की संभावना कम है।

महामारी से ठीक पहले फरवरी 2020 में उपभोक्ता मनोभाव सूचकांक 105.3 पर था, जो मार्च 2023 में 89.18 पर दर्ज किया गया। मानसून पर संभावित अल नीनो प्रभाव और निजी निवेश में अनवरत सुस्ती के मद्देनजर मौजूदा वित्त वर्ष में भी उपभोक्ता मनोभाव सूचकांक का यही हाल रहने वाला है।

उपभोक्ता मनोभाव का ऊपर उठना आमदनी पर निर्भर करता है, और ऊंची बेरोजगारी दर इसकी संभावना को धूमिल कर देती है। जाहिर है, इसका असर अर्थव्यवस्था पर होगा, और अर्थव्यवस्था का असर मानव जीवन पर, सामाजिक ताने-बाने पर। बीते वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में विकास दर घटकर 4.4 फीसद रह गई।

हालांकि चौथी तिमाही में सेवा क्षेत्र ने संभाल लिया और विकास दर 6.1 फीसद दर्ज की गई। लेकिन पूरे वित्त वर्ष का विकास दर अनुमान से अधिक यानी 7.2 फीसद रहने के बावजूद वित्त वर्ष 2021-22 के 9.1 फीसद से काफी कम है। वैश्विक मंदी की आशंकाओं के बीच मौजूदा वित्त वर्ष का परिदृश्य भी सुखद नहीं है। वैश्विक वित्तीय एजेंसियों ने वित्त वर्ष 2023-24 के लिए भारत की वृद्धि दर के अनुमान घटा दिए हैं। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) ने 6.1 फीसद के अपने अनुमान को घटाकर 5.90 फीसद कर दिया।

विश्व बैंक ने 6.6 फीसद के अनुमान को घटाकर 6.3 फीसद, और एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) ने अपने अनुमान को 7.2 फीसद से घटाकर 6.4 फीसद कर दिया है। नोमुरा के अनुसार, भारत की वृद्धि दर मौजूदा वित्त वर्ष में 5.3 फीसद रहनी है। बेशक, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) ने मौजूदा वित्त वर्ष की अपनी पहली नीतिगत समीक्षा में विकास दर अनुमान को 6.4 फीसद से बढ़ाकर 6.5 फीसद किया है। लेकिन विशेषज्ञों की नजर में यह अति आशावादी आंकड़ा है, जहां तक पहुंच पाना कठिन है।

बेरोजगारी दर के आंकड़े दो प्रवृत्तियों से प्रभावित होते हैं- श्रमिक भागीदारी दर और रोजगार सृजन। श्रम बाजार में श्रमिकों की भागीदारी बढ़ गई और उसके अनुसार रोजगार सृजन नहीं हुआ तो बेरोजगारी दर ऊंची दिखेगी। रोजगार सृजन नहीं भी हुआ, मगर श्रमिक भागीदारी घट गई तो बेरोजगारी दर नीचे दिखेगी। लेकिन यहां तो श्रमिक भागीदार घटने के बाद भी बेरोजगारी दर बढ़ रही है।

इसे सुन सकते हैं – बीएचयू कुलगीत – मधुर मनोहर अतीव सुंदर ये सर्वविद्या की राजधानी

सीएमआइई के अनुसार, मार्च 2023 में श्रमिक भागीदारी दर घटकर 39.8 फीसद रह गई, जो फरवरी 2023 में 39.9 फीसद थी। लेकिन बेरोजगारी दर फरवरी के 7.5 फीसद से बढ़कर मार्च में 7.8 फीसद हो गई। हां, अप्रैल 2023 में श्रमिक भागीदारी दर और बेरोजगारी दर दोनों में वृद्धि हुई। श्रमिक भागीदारी दर मार्च 2023 के 39.8 फीसद से बढ़कर अप्रैल 2023 में 41.98 फीसद दर्ज की गई, और बेरोजगारी दर फरवरी 2023 के 7.8 फीसद से बढ़कर मार्च 2023 में 8.11 फीसद हो गई।

अप्रैल 2023 की श्रमिक भागीदारी दर पिछले तीन सालों में सर्वाधिक रही है। महामारी की शुरुआत यानी मार्च 2020 में श्रमिक भागीदारी दर 41.9 फीसद थी, और तब बेरोजगारी दर 8.74 फीसद। उसके बाद से श्रमिक भागीदारी दर लगातार 41 फीसद से नीचे रही है। रोजगार बाजार की बुरी हालत के बावजूद अप्रैल 2023 में श्रमिक भागीदारी दर में वृद्धि इस बात का भी संकेत है कि श्रमिकों के भीतर बेरोजगारी के प्रति आस्था अब हिलने लगी है, और स्थायी भाव (अस्थिरता) उमड़ने लगा है।

सवाल उठता है आखिर बेरोजगारी की समस्या स्थायी क्यों होती जा रही है? और इसका समाधान क्या है? आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद से भारत का सार्वजनिक क्षेत्र लगातार सिमट रहा है। ऐसे में रोजगार पैदा करने का दारोमदार निजी क्षेत्र पर है। निजी क्षेत्र मुनाफे के लिए काम करता है। निवेश तभी करता है, जब मुनाफे के साथ लागत की वापसी का भरोसा हो। मुनाफा तभी होगा, जब बाजार में मांग हो। मांग तब होगी, जब लोगों की जेब में पैसे हों। बाजार में आज मांग की स्थिति मंद हो चली है।

मांग पर पहली बड़ी मार नोटबंदी और जीएसटी के कारण पड़ी। रही सही कसर महामारी ने पूरी की। अर्थव्यवस्था में 30 फीसद और रोजगार में 40 फीसद की हिस्सेदारी रखने वाले एमएसएमई क्षेत्र की इकाइयों पर ताले लगने लगे। सरकार की तरफ से फरवरी 2023 में राज्यसभा में एक प्रश्न के जवाब में दिए गए आंकड़े के अनुसार, वित्त वर्ष 2019-20 से लेकर वित्त वर्ष 2022-23 तक 17,452 से अधिक एमएसएमई इकाइयां बंद हो गईं। सर्वाधिक 10,655 इकाइयां अकेले 2022-23 में बंद हुईं। सरकार ने मौजूदा वित्त वर्ष के बजट में एमएसएमई क्षेत्र के लिए 22,140 करोड़ रुपये का आवंटन किया है, जिसका परिणाम आना अभी बाकी है।

रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण आपूर्ति श्रृंखला बाधित हुई तो महंगाई चरम पर पहुंच गई। मांग को नीचे लाने में इसका भी बड़ा योगदान है। मांग न होने से विनिर्माण क्षेत्र अपनी मौजूदा स्थापित क्षमता का भी इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है। नई क्षमता जोड़ना तो दूर की बात। ऐसे में नौकरियों की सृजन प्रक्रिया पर विराम-सा लग गया है। भारत में रोजगार मुहैया कराने के लिहाज से कृषि क्षेत्र महत्वपूर्ण है। अर्थव्यवस्था का यह इकलौता क्षेत्र है, जो घाटे के बावजूद बंद नहीं होता। यहां श्रमशक्ति का लगभग 45-50 फीसद हिस्सा रोजगार पाता है।

हां, कृषि क्षेत्र में ज्यादातर रोजगार मौसमी होते हैं। फिर भी इस क्षेत्र को अधिक प्रोत्साहन और समर्थन दिया जाए तो भारत की बेरोजगारी की समस्या काफी हद तक सुलझ सकती है। सरकार के लिए यह प्राथमिकता का क्षेत्र होना चाहिए। लेकिन स्थिति इसके उलट है। मौजूदा वित्त वर्ष के बजट में कृषि क्षेत्र का आवंटन घटा कर कुल बजट का 2.7 फीसद कर दिया गया, जबकि 2022-23 में यह आवंटन कुल बजट का 3.36 फीसद था। धनराशि के मामले में हालांकि आवंटन पिछले वित्त वर्ष के संशोधित अनुमान के मुकाबले 4.7 फीसद अधिक है। लेकिन पिछले वित्त वर्ष के बजटीय प्रस्ताव से सात फीसद कम।

दूसरी तरफ कुल श्रमशक्ति के लगभग 12 फीसद हिस्से को रोजगार देने वाले विनिर्माण क्षेत्र के लिए सभी सुविधाएं सुलभ हैं। वर्ष 2016 में आइबीसी कानून लाया गया, सितंबर 2019 में कॉरपोरेट कर 30 फीसद से घटाकर 22 फीसद किया गया, और महामारी के बीच उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआइ) योजना लाई गई। मौजूदा वित्त वर्ष के बजट में पूंजीगत निवेश का आवंटन बढ़ाकर 10 लाख करोड़ रुपये किया गया तो उसका एक बड़ा हिस्सा परोक्ष रूप से बड़ी कंपनियों को मदद पहुंचाने के लिए है। निजी क्षेत्र फिर भी नौकरियां पैदा नहीं कर पा रहा। नीतिनियंताओं को अपनी इस नीतिगत विफलता पर नए सिरे से मंथन करना चाहिए, और रोजगार पैदा करने वाले क्षेत्रों को समर्थन देकर बेरोजगारी की समस्या का स्थायी समाधान खोजना चाहिए।

(वरिष्ठ पत्रकार सरोज कुमार इन दिनों स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)

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चीर-हरण के समय द्रौपदी की कृष्ण ने कोई सहायता नहीं की – डॉ. बोधिसत्व

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चित्रा सावंत
मुंबई, बहुचर्चित किताब ‘महाभारत यथार्थ कथा’ के लेखक डॉ बोधिसत्व ने महाभारत कथा का हवाला देते हुए कहा कि जुए में जब युधिष्ठिर द्रौपदी को हार गए तो दुर्योधन द्रौपदी को दासी बना कर छोड़ दिया था लेकिन उसके मित्र कर्ण ने कहा कि नहीं मित्र इसे हम सबके सामने निर्वस्त्र करने का आदेश दो। इसके बाद दुर्योधन द्रौपदी को वस्त्रहीन करने का आदेश दिया और चीर-हरण की घटना हुई जो अंततः महायुद्ध की वजह बनी।

चित्रनगरी संवाद मंच मुंबई की ओर से रविवार की शाम मृणालताई हाल, केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट, गोरेगांव में आयोजित सृजन संवाद कार्यक्रम में वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से हाल में ही प्रकाशित अपनी किताब ‘महाभारत यथार्थ कथा’ का परिचय देते हुए डॉ बोधिसत्व ने शुरू में ही इस धारणा को भ्रम क़रार दिया कि घर में महाभारत रखने से गृह कलह नहीं होती है। उन्होंने कहा कि महाभारत एक वृहत ग्रंथ है। लिहाजा, इसे पढ़ते समय पाठक में धीरज और विवेक होना बहुत ज़रूरी है।

चीर-हरण प्रसंग की चर्चा करते हुए डॉ बोधिसत्व ने कहा कि चीर-हरण के बाद जब पांडव जंगल में चले गए तो एक दिन वहां कृष्ण उनसे मिलने आए। द्रौपदी से कृष्ण ने कहा कि उन्हें तो पता ही नहीं था कि जुआ या चीर-हरण की घटना हो रही है। अन्यथा मैं जुआ नहीं होने देता। चाहे बलपूर्वक ही उसे रोकना पड़ता। जब जुए या चीर-हरण की कृष्ण को खबर ही नहीं थी, इसका मतलब बहुचर्चित धारावाहिक महाभारत में चीर-हरण या वस्त्रवृद्धि की घटना चिपकाई हुई लगती है।

डॉ बोधिसत्व ने कहा कि जब जुए की घटना हुई तो उस समय कृष्ण बहुत दूर द्वारकापुरी में थे। उन्हें पूरी घटना की जानकारी भी बहुत देर से मिली। इससे स्पष्ट है कि धारावाहिक महाभारत में कृष्ण के द्रौपदी के लाज की रक्षा करने के प्रसंग को अतिरंजनापूर्ण है। उन्होंने इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि महाभारत के कई व्याख्याकारों ने मूल कहानी पर परदा डाल दिया। उन्होंने मूल कथा के हवाले से श्रीकृष्ण के गीता ज्ञान के बारे में कुछ रोचक बातें बताईं। उन्होंने पांडव के व्यक्तित्व का आकलन मूल महाभारत में वर्णित यथार्थ के साथ किया और बताया कि कई मानवीय कमज़ोरियों वाले उद्दंड कर्ण को कैसे नायक बनाया गया।

डॉ बोधिसत्व बताया कि वासुदेव शरण अग्रवाल की पुस्तक ‘भारत सावित्री’ पढ़ने के बाद महाभारत को दुबारा पढ़ने की इच्छा हुई और उन्होंने महाभारत पर लिखी गई तक़रीबन हर किताब का अध्ययन किया। इस कार्यक्रम में उन्होंने बड़े आत्मविश्वास और विनम्रता के साथ श्रोताओं के सवालों के जवाब दिया। डॉ बोधिसत्व ने बताया कि उनकी किताब का यह पहला भाग है। महाभारत यथार्थ कथा के अभी दो भाग और प्रकाशित होंगे।

कार्यक्रम का संचालन कर रहे शायर देवमणि पांडेय ने महाभारत के संवाद लेखक डॉ राही मासूम रज़ा से अपनी मुलाकात का हवाला देते हुए कहा कि रज़ा साहब ने स्वीकार किया कि कर्ण को जानबूझ कर महिमामंडित किया गया, जबकि वास्तविक महाभारत में उसका किरदार वाकई खलनायक जैसा है। देवमणि पांडेय के अनुसार रजा ने बताया था कि महाभारत धारावाहिक बनाते समय कई घटनाएं जोड़ी-घटाई गईं।

प्रतिष्ठित लेखक राजशेखर व्यास ने परिचर्चा के दौरान बताया कि जनमानस में कैसे सुयोधन को दुर्योधन और सुशासन को दुशासन बनाया गया। उनके अनुसार महाभारत में वेद, पुराण और उपनिषद सबका निचोड़ शामिल है। यह ज्ञान लोगों तक न पहुंचे इसलिए एक साज़िश के तहत यह दुष्प्रचार किया गया कि महाभारत घर में रखने से लड़ाई झगड़े होते हैं। चर्चा को पूर्णता पर पहुंचाते हुए उन्होंने कहा कि महाभारत में भारत समाया हुआ है।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में कई किताबें लिख चुकी कवयित्री शशि पुरवार ने अपनी रचना यात्रा का परिचय दिया। शशि पुरवार के गीत नवगीत संग्रह ‘भीड़ का हिस्सा नहीं’ को महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ने इसी साल संत नामदेव स्वर्ण पदक पुरस्कार से सम्मानित किया। अपने इस संकलन से कुछ चुनिंदा रचनाएं सुना कर शशि पुरवार ने समर्थ रचनाकार होने का परिचय दिया।

कार्यक्रम में आभा बोधिसत्व, सूर्यांश व्यास, डॉ दमयंती शर्मा, डॉ रोशनी किरण, सविता दत्त, नवीन कुमार भास्कर, प्रदीप गुप्ता, नरोत्तम शर्मा, देवदत्त देव, राजेश ऋतुपर्ण, सुधाकर पांडेय, जवाहर लाल निर्झर, ताज मोहम्मद सिद्दीक़ी, रासबिहारी पांडेय, अभिजीत सिंह, संजय गुप्ता, आकाश ठाकुर, गोविंद सिंह राजपूत, मोहन जोशी, सुषमा गुप्ता, सुरभि मिश्र आदि समेते कई रचनाकार और साहित्य प्रेमी मौजूद थे।

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मुस्लिम महिलाओं की बेबसी को बयां करता उपन्यास ‘सलाम बॉम्बे व्हाया वर्सोवा डोंगरी’

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अपने ढाई हज़ार के सफ़र के दौरान पहले बॉम्बे फिर बंबई और बंबई से मुंबई बनी मायानगरी अपनी ख़ूबियों और विसंगतियों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर रही है, लेकिन युवा पत्रकार और कवि-लेखक सारंग उपाध्याय ने इस शहर की विसंगतियों को भी मोहब्बत के चश्मे से देखा है। लेखक ने अपने पहले उपन्यास ‘सलाम बॉम्बे व्हाया वर्सोवा डोंगरी’ में मुंबई के आदि बाशिदों कोलियों की कहानी गढ़ी है और कोली समाज के साथ-साथ देश की आर्थिक राजधानी में हुए बदलावों और विषमताओं को प्रेम-कहानी के माध्यम से ख़ूबसूरती से काग़ज़ के कैनवास पर उकेरा है। लफ़्ज़ों एवं अल्फ़ाज़ों के चयन और बेहतरीन कला-शिल्प के चलते उनकी लेखन-शैली अपने आप में अद्भुत लगती है।

सारंग उपाध्याय (Sarang Upadhyay) का उपन्यास ‘सलाम बॉम्बे व्हाया वर्सोवा डोंगरी (Salaam Bombay Via Versova Dongri)’ मूलरूप से प्रेम कथा पर आधारित उपन्यास है। यह उपन्यास मालेगाँव की अरफ़ाना और कोली बस्ती वर्सोवा मुंबई के आलम मोहम्मद ख़ाँ उर्फ़ जालना और उन दोनों की बेटी सायरा और राघव कुमार यादव उर्फ़ रघु की प्रेम कहानी है। कहने का तात्पर्य उपन्यास दो पीढ़ियों की दास्तान-ए-मोहब्बत अपने आप में समेटे हुए है। यह उपन्यास इस्लाम की विसंगतियों के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं की शौहर की दूसरी बीवी यानी सौतन को झेलने की बेबसी को भी बख़ूबी बयां करता है।

कथित तौर पर चार-चार शादियों का मज़हबी हक़ रखने वाला मुस्लिम पुरुष कितना निरंकुश है। यह उपन्यास के चरित्र जालना के ग़ुस्से में बोली गई बात से स्पष्ट हो जाता है। जो अपनी बीवी अरफ़ाना को बुरी तरह पीटने के बाद कहता है, “हरामज़ादी, रंडी, कुतिया! शरम कर बेहया, दूसरा निकाह ही किया है करमजली ज़नाना, कोई गुनाह नहीं किया है मैंने। अरे मुसलमान मर्द चार बीवियाँ रख सकता है, इसमें कुछ हर्ज़ नहीं, कोई कसूर नहीं..! दूसरी बीवी रखना मेरा हक़ है। औरतों और मर्दों के फ़ासले को समझ, हरामज़ादी..!”

अपने शौहर से बेइंतहां मोहब्बत करने वाली अरफ़ाना उसकी बेवफ़ाई और बेरुखी से इस कदर टूट जाती है कि उसका अपने मज़हब की अमानवीय परंपराओं से पूरी तरह मोहभंग हो जाता है। वह कहती है, “अल्लाह क़सम सायरा, बिरादरी और मज़हब ने औरतों के हक़ों को कितना मारा है, इसे तो ख़ुदा ही जानता है।” थोड़ी देर बाद ही अपनी बेटी को हिदायत देते हुए अरफ़ाना कहती है, “तू अपनी मर्ज़ी से, अपनी पसंद के मर्द से निकाह करना। ऐसे मर्द के साए से भी दूर रहना जो धोखेबाज़ हो और बीवी से बेइमानी करता हो।”

अरफ़ाना शरिया क़ानून के तहत मुस्लिम पुरुषों को एक से अधिक विवाह करने की व्यवस्था पर अफ़सोस जताते हुए कहती है, “किसी हिंदू मर्द से निकाह पढ़ती तो दुनिया ख़ुशहाल होती मेरी। कम-से-कम यहाँ-वहाँ मुँह तो नहीं मारते और मारते भी हैं तो बीवी और हक़ के नाम पर घर में तो नहीं उठा लाते। …चार निकाह की दुहाई दे रहा है तेरा बाप… ग़लती कर गई मैं तो। यदि भाग गई होती उस हिंदू लड़के के साथ तो यह मुँह न देखना होता। वह प्यार से ही रखता और रंडी के पास मुँह भी मारता तो उसकी औक़ात में रखकर घर तो न उठा लाता।”

इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने पति के दूसरे निकाह के बाद मुस्लिम महिला की बग़ावत और अपने हक़ के प्रति सजगता भी दिखाया गया है। जब पिटती हुई अरफ़ाना अचानक उठती है और लगातार हाथ चला रहे जालना पर उसने पलट वार किया और उसकी टोपी उछाल दी, बनियान फाड़ दी, उसे धक्का देकर झिंझोड़ दिया और पास ही पड़ा नाव का चप्पू उठाकर जालना पर तान दिया। इसके बाद कहती है, “अब हाथ न उठाना जालना, वरना तेरा सिर खोल दूँगी मैं। और देखती हूँ तू कैसे लेकर आता है उस रंडी, हरामज़ादी को यहाँ।” उसके बाद शौहर जालना को चुनौती देते हुए कहती है, “यदि हिम्मत है तो यहाँ से निकालकर दिखा मुझे।” ऐसा तेवर मुस्लिम महिलाएँ आम तौर पर नहीं दिखा पातीं क्योंकि उन्हें अपने समाज और अपने ही लोगों से सहयोग नहीं मिलता।

सारंग ने अरफ़ाना और जालना के संवादों के बहाने इस्लाम की बहुविवाह जैसी कुरीतियों का बेबाकी से ज़िक्र किया है। धार्मिक कुरीतियों पर कलम चलाने में भारतीय बुद्धिजीवी और फिल्मकार डबल स्टैंडर्ड अपनाते रहे हैं। हिंदू धर्म की विसंगतियों पर तो वे करारा प्रहार करते हैं, लेकिन जब बात जब इस्लाम की कुरीतियों पर कलम चलाने या रूपहले परदे पर दिखाने की बात आती है तो बड़ी साफ़गोई से निकल जाते हैं। यहाँ लेखक ने न केवल इस्लाम में बेटियों की अहमियत को बहुत बारीक़ी को समझाया और उसे भी लिखने की हिम्मत भी जुटाई। और, साथ ही, समाज के उस चेहरे को भी दिखाने की कोशिश की है, जहाँ पितृसत्ता आज भी हावी है। यही बात सारंग को असाधारण लेखकों की फ़ेहरिस्त में ला खड़ा करती है।

सारंग उपाध्याय ने अरफ़ाना और जालना के ज़रिए 1986 के दशक के बहुचर्चित शाहबानो की अदालती लड़ाई की ज़िक्र किया है। जब आउटडेटेड ट्रिपल तलाक़ की शिकार शाहबानो को सुप्रीम कोर्ट से इंसाफ़ मिलता है, लेकिन इस्लामिक कट्टरपंथों के समक्ष घुटने टेकते हुए राजीव गांधी की प्रचंड बहुमत वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को बदलते हुए संविधान में संशोधन करके एक लाचार मुस्लिम महिला के हाथ से इंसाफ़ छीन लिया था। इसीलिए दक्षिणपंथी लोग तर्क देते हैं कि 2018 में नरेद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने ट्रिपल तलाक़ विरोधी क़ानून को बनाकर कांग्रेस की उसी भूल का सुधार किया।

लेखक ने शाहबानो के अलावा इस उपन्यास में अयोध्या के विवादित ढाँचे को गिराए जाने के बाद मुंबई में दो चरण में हुए दंगे और उसके बाद 1993 और 2006 के विस्फोट जैसी ऐतिहासिक घटनाओं को भी समेटा है। उपन्यास को पढ़ते हुए ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि लेखक दरअसल, उस कालखंड की कहानी लिख रहा है, जिस कालखंड में उसका जन्म हुआ था। उपन्यास पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे लेखक ने उस दौर की कहानी को लिख रहा है जिसमें वह खुद जिया है। उपन्यास के चारों प्रमुख चरित्रों कि अपनी दुनिया है। यहाँ लेखक ने साहित्य के समाज का दर्पण होने के कथन को साबित किया है।

उपन्यास को पढ़ते समय वर्सोवा, डोंगरी, अंधेरी, जोगेश्वरी, चर्चगेट, भाऊचा धक्का और कोलाबा के मच्छी बाज़ारों का इस तरह ज़िक्र किया गया है जैसे लेखक ने ख़ुद उनके बीच रहने और कोलियों के साथ जीवन जाने के बाद ही इस कथानक को उपन्यास का रूप दिया है। इससे यह उपन्यास यथार्थ की कसौटी पर खरा उतरता है। उपन्यास के चरित्रों की दुनिया देश में हो रही घटनाओं से कैसे प्रभावित होती हैं, या कैसे चरित्रों की ज़िंदगी में यू-टर्न आता हैं, उसे सरल भाषा में काग़ज़ पर उतारना इतना आसान भी नहीं था।

लेखक ने इस उपन्यास को दादर के प्लेटफॉर्म पर रघु और सायरा के चुहलबाज़ी से शुरू किया और वही प्लेटफॉर्म पर ही दोनों के प्रेम का समापन होता है। वैसे इन दोनों की प्रेम कहानी काफी सस्पेंस से भरी हुई है। हर क्षण जिस तरह से कहानी बदली है, वह तेज़ी से उपन्यास को पढ़ने के लिए विवश करती है। पाठक सोचता रहता है कि कहानी का दुखांत होगा या सुखांत। लेकिन यहाँ फिल्मी स्टाइल में लेखक ने उपन्यास को सुखांत देकर पाठकों को पठनोपरांत होने वाले अवसाद से बचा लेता है।

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महिला क्यों बताए कि वह विवाहित है या नहीं – डॉ. प्रतिमा गोंड

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सजना-सँवरना स्त्री का हक लेकिन सुंदर दिखने का दबाव डालना सांस्कृतिक हिंसा

संवाददाता
वाराणसी, महिलाओं के नाम से पहले ‘कुमारी’ या ‘श्रीमती’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल की अनिवार्यता को सांस्कृतिक हिंसा बताकर उस पर पाबंदी लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाली महिला अधिकार की मुखर पैरोकार और काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में समाजशास्त्र पढ़ाने वाली सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रतिमा गोंड (Dr Pratima) ने देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा अपनी याचिका खारिज करने के फैसले से पूर्ण असहमति जताई है। वह स्पष्ट रूप से माननी हैं कि किसी महिला के नाम के आगे कुमारी या श्रीमती जैसे शब्द लिखने के लिए उस पर किसी भी तरह का दबाव डालना सांस्कृतिक हिंसा की कैटेगरी में आता है।

सदियों पुरानी परंपराओं के नाम पर स्त्री पर तरह-तरह की बंदिश लगाने का पुरजोर विरोध करने वाली डॉ. प्रतिमा गोंड ने सवाल किया है कि स्त्रियाँ अपने नाम के आगे वैवाहिक स्थिति को सूचित करने वाले कुमारी या श्रीमती जैसे शब्द भला क्यों लगाएं? उन्होंने कहा कि किसी महिला के किसी फोरम पर ‘कुमारी’ या ‘श्रीमती’ लिखने का आग्रह सांस्कृतिक हिंसा की श्रेणी में आता है, भले ही ऐसा आग्रह किसी अदालत ने की है। इस बारे में सविस्तार अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि कोई महिला यह क्यों बताए कि वह विवाहित है या विवाहित नहीं है।

मौजूदा समाज को स्त्री विरोधी समाज करार देते हुए मशहूर नारीवादी विचारक डॉ. प्रतिमा गोंड ने कहा कि पितृसत्ता स्त्री की यौन-गतिविधि को नियंत्रित करने के क्रम में उसकी परवरिश इस तरह से करती है कि भय उसके अवचेतन का हिस्सा बना रहे। घर लौटने में जरा सी देर हो जाने पर स्त्री डर जाती है और यह डर उस पर थोपे गए सोशल कंडीशनिंग की वजह से होता है। लोकोपवाद को लेकर अतिशय सजगता भी सहज-स्वाभाविक नहीं वरन पितृसत्ता द्वारा सायास निर्मित की गई होती है। बुद्धिसंगत स्टैंड लेने वाली स्त्रियाँ भी बहुत हद तक अपने अवचेतन से परिचालित होती हैं, जिसका निर्माण पुरुष-वर्चस्व वाली वैचारिकी के द्वारा किया गया होता है। स्त्री की सोशल कंडीशनिंग परिवार और समाज दोनों के ही द्वारा की जाती है।

डॉ. प्रतिमा गोंड ने कहा कि हमारे समाज में मनुष्य-विरोधी, तर्क-विरोधी प्रतिगामी विचारों के अनुसार स्त्री को चलने के लिए बाध्य करने हेतु पितृसत्ता सांस्कृतियों उपायों का सहारा लेती है। भारतीय संविधान उच्चतर मानवीय मूल्यों की स्थापना करता है लेकिन समाज उसके अनुसार चलने की बजाय मध्ययुगीन प्रतिगामी मूल्यों से संचालित होता है। लोकतांत्रिक तरीके से समाज को स्त्री-गरिमा के प्रति सजग-सचेत बनाने की हामी प्रतिमा गोंड का मानना है कि ऐसा समाज बनाने के लिए संघर्ष करने की आवश्यकता है जहाँ पर स्त्री को अपने जेंडर के कारण अलग से सचेत होने की आवश्यकता नहीं रहे।

आत्म-धर्माभिमानिता यानि कि सेल्फ-राइटिअसनेस के प्रसंग की चर्चा करते हुए डॉ. प्रतिमा गोंड ने कहा कि इसका कारण और परिणाम दोनों ही भय है। मसलन, मुस्लिमों को लेकर व्यापक समाज में भय का वातावरण बनाया गया है, जिस कारण से लोग उनसे नफरत करते हैं। जहाँ भय होता है, वहाँ तर्क-विवेक पंगु हो जाता है। स्त्रियों के आत्म-धर्माभिमानी होने यानि कभी भी अपनी गलती नहीं मानने की प्रवृत्ति के संदर्भ में भी उन्होंने यही बात कही।

अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा, “स्त्री को चूंकि अपने बच्चों का लालन-पालन करना होता है और वे प्रायः अपने पति की संपत्ति और उसके रुपये-पैसों पर निर्भर होती हैं, इसलिए उनमें अपने पति को लेकर बड़ा पजेस्सिवनेस होता है। पति का ध्यान किसी दूसरी स्त्री की तरफ जाने से आर्थिक असुरक्षाबोध भी जुड़ा होता है, इसलिए भी स्त्रियाँ प्रायः घेरेबंदी करती हैं। इस घेरेबंदी के विरोध में तर्क देते हुए प्रतिमा गोंड कहती हैं कि इससे निजता का हनन होता है, जो कि बर्बरता की निशानी है। मनुष्य अपने दिमाग में चल रही हलचलों को कई बार अपने तक सीमित रखना चाहता है। अपने प्रेम, अपनी नफरत और अपनी फैंटेसी को चर्चा का विषय नहीं बनाना चाहता। लेकिन पजेस्सिवनेस की भावना व्यक्ति की निजता का हनन करती है और मनुष्य को लोकतांत्रिक नहीं रहने देती। पजेस्सिवनेस की भावना का मूल स्रोत तो दुर्लभता है, साथ रहने के अवसर अगर विरल होंगे-कम होंगे तो असुरक्षाबोध रहेगा।”

डॉ. प्रतिमा गोंड ने आगे कहा कि रोजी-रोटी, आवास-चिकित्सा और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत प्रश्नों के इर्दगिर्द प्रश्न खड़ा करने और तुलनात्मक रूप से कम महत्व के प्रश्नों पर सापेक्षिक रूप से अधिक बल देने के प्रच्छन्न सवाल पर उन्होंने कहा कि समाज-व्यवस्था में अपनी अवस्थिति के हिसाब से भी कई बार सक्रियता दिखाई जाती है। परंपरागत रूप से शोषित-उत्पीड़त समाज का एक हिस्सा ऐसा भी है, जिनकी भौतिक जरूरतें पूरी होने लगी हैं तो वे अब अपनी मानवीय गरिमा और उच्चतर नैतिक-सांस्कृतिक मूल्यों के लिए क्यों न लड़ें?

बीएचयू की सहायक प्रोफेसर ने कहा कि पितृसत्ता द्वारा की जाने वाली सोशल कंडीशनिंग से पुरुष भी उतना ही त्रस्त है। स्त्री-पुरुष के बीच पार्थक्य सामंती-पितृसत्तात्मक समाज की निशानी है। कोई पुरुष जैसे ही मित्रता बोध के साथ किसी स्त्री के करीब नजर आती है तुरंत उसके चरित्र को लेकर सवाल उठने लगते हैं। सभ्यता के विकास के दौरान जब संसाधनों के असमान बँटवारे की स्थिति उत्पन्न हुई और जिनके हिस्से में अधिक संसाधन आए उन्होंने उसे अपनी संतान को हंस्तातरित करना चाहा तो स्त्री को गुलाम बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई।

डॉ. प्रतिमा गोंड ने आगे कहा कि संतानोत्पत्ति के समय स्त्री कमजोर होती है, उसे सुरक्षा की अधिक आवश्यकता होता है, संभवतः इस और दूसरे अनेक कारकों का लाभ उठाकर पुरुष ने उसे परवश बना दिया। सिर्फ बर्बर-निरंकुश ताकत के दम पर किसी को अपने अधीन रखना मुश्किल होता है इसलिए सांस्कृतिक उपायों के जरिए अपनी वैचारिकी का वर्चस्व कायम किया जाता है। पुरुष सत्ता ठीक यही काम करती आई है और स्त्रियों को भय के जरिए नानाविध रूपों से अनुकूलित करने का काम आज भी जारी है।

बीएचयू जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में समाजशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में अपने अनुभवों से निकलीं कुछ बातें भी बातचीत के दौरान साझा करते हुए डॉ. प्रतिमा ने कहा कि पुनर्जागरण-प्रबोधनकालीन सीखों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जब सारी गतिविधियों का केंद्र मनुष्य को माना जाने लगा और तर्क-विवेक के साथ ही मानववाद की प्रस्थापना हुई तो स्त्री की भी पुरुषों क समान ही मानवीय गरिमा होती है, होनी चाहिए, यह प्रश्न भी प्रस्तुत हुआ।

सौंदर्य दिखने की चर्चा करते हुए डॉ. प्रतिमा गोंड ने आगे कहा, “इंसान अच्छा दिखना चाहता है। अगर स्त्री की बात करें तो सजना-सँवरना स्त्री का हक है, लेकिन सुंदर दिखने के लिए स्त्री पर परिवार-समाज द्वारा डाला जाने वाला दबाव सांस्कृतिक हिंसा है। गौरतलब है कि प्लेखानोव बता-समझा गए हैं कि प्रकृति में रिझाने का काम नर करता है। जैसे मोर अपने पंख फैलाकर नाचता है और मोरनी को रिझाता है। केवल मानव समाज में ही रिझाने का काम स्त्रियों के जिम्मे छोड़ दिया गया है क्योंकि स्त्री पराधीन है और सांस्कृतिक हिंसा की शिकार और उससे त्रस्त है।”

डॉ. प्रतिमा गोंड ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई अपनी याचिका के खारिज होने की मुख्यधारा के मीडिया की नकारात्मक रिपोर्टिंग की आलोचना करते हुए  कहा, “मुख्यधारा के मीडिया में पुरुषवादी सोच हावी है। दरअसल, मीडिया में 90 फीसदी पत्रकार स्त्रियों को लेकर पूर्वाग्रहित हैं। वे यह सहन ही नहीं कर पाते कि आदिवासी समाज से ताल्लुक रखने वाली कोई स्वतंत्र-चेता स्त्री कायदे की बात उठाए। या थोपी गई परंपराओं का विरोध करे। इसीलिए ये लोग हमारी याचिका को सिद्धि पाने की चाहत रखने वाला करार दे रहे हैं। जबकि मेरी याचिका बहुत जेनुइन है। हम लोग सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पेटिशन दायर करने का भी विचार बना रहे हैं।

सामाजिक विज्ञान की प्रोफेसर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए कहा है कि गैरज़रूरी याचिका दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के इस हिस्से को मुख्य धारा के अखबारों ने प्रमुखता से जगह दी। इस संदर्भ में पूर्वाग्रहित लोगों को उद्धृत करना जरूरी हो जाता है कि पूर्वाग्रहत जहर समाज की नस-नस में भरा हुआ है, किसी को भी कॉर्नर करके देखो, उसके अंदर पूर्वाग्रहत छलकता है।

डॉ. प्रतिमा गोंड ने स्पष्ट रूप से कहा कि इसी तरह की याचिका अगर स्थापित महिला द्वारा दायर की गई होती तो यही मीडिया उसे हाथों-हाथ लेता और ऐसे प्रचारित करता कि देखो कितना तो आमूलगामी कदम उठाया गया है। जबकि यहाँ तो सांस्कृतिक हिंसा के पूरे संदर्भ को स्पष्ट करते हुए लोकतांत्रिक तरीके से चेतना के स्तरोन्नयन का काम किया जा रहा है। लेकिन, हैसियत पूजने वाली और माल अंधभक्ति से ग्रस्त हमारी मीडिया मुद्दे को सही परिप्रेक्ष्य में उठाने से बचते हुए स्त्रीद्वेषी रुख अपनाए हुए है।

अपनी आगे की सक्रियता के बारे में प्रतिमा गोंड का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश और लैंगिक समानता के पैरोकारों के साथ बातचीत के आलोक में हम संसद में बैठे अपने सक्षम जन प्रतिनिधियों, संस्थाओं, लोगों को पत्र लिखकर, उनसे संपर्क इत्यादि करके इस विषय पर चर्चा करने और पहलकदमी करने का आह्वान करेंगे।

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