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भारत में तेजी से घट रह हैं टीबी के मरीज

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विश्व क्षय रोग दिवस, 24 मार्च पर विशेष लेख

देश के लिए ख़ुशी की बात यह है कि देश में टीबी यानी ट्यूबरक्लोसिस बेसिलाई मरीज़ों की संख्या तेज़ी से घट रही है, फिर भी 2025 तक भारत को टीबी-मुक्त करने का लक्ष्य कठिन जान पड़ता है। वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘टीबी मुक्त भारत अभियान’ की शुरुआत की थी। उस वक्त उन्होंने कहा था कि दुनिया ने टीबी को खत्म करने के लिए 2030 तक समय तय किया है, लेकिन भारत ने अपने लिए यह लक्ष्य 2025 तय किया है। पिछले साल वर्ल्ड टीबी समिट में मोदी ने फिर इसी बात को दोहराया था कि ‘टीबी खत्म करने का ग्लोबल टारगेट 2030 है।

भारत फ़िलहाल साल 2025 तक टीबी खत्म करने के लक्ष्य पर काम कर रहा है। दुनिया से पांच साल पहले। इतने बड़े देश ने इतना बड़ा संकल्प अपने देशवासियों के भरोसे लिया है।’ भारत के लिए इतना बड़ा ऐलान इसलिए भी अहम है क्योंकि डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, दुनिया में सबसे ज्यादा टीबी के मरीज भारत में ही हैं। 2025 में अब साल भर का ही वक्त बचा है। ऐसे में क्या इतने कम वक्त में हजारों साल पुरानी इस बीमारी से पीछा छुड़ा पाना संभव है? आंकड़े बताते हैं कि इस लक्ष्य को पाने में भारत को अभी शायद और वक्त लग जाए।

भारत में रोज़ाना क़रीब छह हज़ार से ज़्यादा लोग टीबी की चपेट में आते हैं और एक चौथाई यानी एक हज़ार मरीज़ परलोक सिधार जाते हैं। दुनिया में लगभग 10 करोड़ लोग टीबी  से पीड़ित है। भारत हर साल लाखों लोगों की टीबी और उससे जनित बीमारियों मौत हो जाती है। यह हाल तब है जब दावा किया जाता है कि टीबी अब लाइलाज नहीं रही। जो बीमारी लाइलाज नहीं है, उससे इतने ज़्यादा लोगों की मौत हैरान करती है। टीबी के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए ही 24 मार्च को टीबी दिवस के रूप में मनाया जाता है, क्योंकि 1882 में इसी दिन जर्मन जीवाणुविज्ञानी और नोबेल पुरस्कार विजेता सर रॉबर्ट कोच ने सबसे पहले टीबी के बैक्टीरिया के बारे में बताया था।

डब्ल्यूएचओ के मुताबिक, हर साल दुनिया में टीबी के जितने मरीज सामने आते हैं, उनमें से सबसे ज्यादा मामले भारत में होते हैं। डब्ल्यूएचओ की ‘ग्लोबल ट्यूबरकुलोसिस रिपोर्ट 2023’ की मानें तो 2022 में टीबी के 27% मामले भारत में सामने आए थे। यानी, 2022 में दुनिया में मिलने वाला टीबी का हर चौथा मरीज भारतीय था। दूसरे नंबर पर इंडोनेशिया और फिर तीसरे नंबर पर चीन है। 2023 में दुनियाभर में 75 लाख से ज्यादा लोग टीबी की चपेट में आए। इस दौरान भारत में 22.3 लाख लोग टीबी से पीड़ित हुए।

भारत में टीबी मरीज़
• 2021 – 28.2 लाख
• 2022 – 24.2 लाख
• 2023 – 22.3 लाख

भारत के बाद सबसे ज्यादा 10 फ़ीसदी मरीज इंडोनेशिया और फिर 7.1 फ़ीसदी चीन में थे। इनके बाद फिलिपींस में 7 फ़ीसदी, पाकिस्तान में 5.7 फ़ीसदी, नाइजीरिया में 4.5 फ़ीसदी, बांग्लादेश में 3.6 फ़ीसदी और कॉन्गों में 3 फ़ीसदी मरीज सामने आए।

इस बीमारी को क्षय रोग और तपेदिक रोग भी कहा जाता है। टीबी आनुवांशिक रोग नहीं है। यह बीमारी कभी भी किसी को भी हो सकती है। टीबी घातक संक्रामक बीमारी है जो आमतौर पर फेफड़ों पर हमला करता है। हालांकि यह शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकती है। टीबी के बैक्टीरिया हवा के ज़रिए फैलते हैं। दरअसल, टीबी मरीज़ खांसी, छींक या किसी अन्य प्रकार से अपने बैक्टीरिया हवा में छोड़ते हैं जो आस-पास होने वाले व्यक्ति को संक्रमित करते हैं और सांस के ज़रिए उसके शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। इससे छुटकारा पाने का तरीक़ा इसका पूरा इलाज है और सही उपचार न मिल पाने से 50 फ़ीसदी से ज़्यादा लोगों की मोत हो जाती है।

क्या है टीबी?
टीबी पहले राजाओं महाराजाओं का रोग कहा जाता था, क्योंकि पहले यह बड़े लोगों को होता था। धीरे-धीरे यह ग़रीबों की बीमारी बन गई, क्योंकि संपन्न लोग तो इलाज करवा लेते हैं, लेकिन ग़रीबों को सही इलाज नहीं मिल पाता। घातक संक्रामक रोग टीबी के बैक्टीरिया ज़्यादातर फेफड़ों में ही पाए जाते हैं। लेकिन ये ख़तरनाक बैक्टीरिया आंते, मस्तिष्क, हड्डियों, जोड़ों, गुर्दे, त्वचा, दिल को ग्रसित कर सकते हैं। कह सकते हैं, टीबी बैक्टीरिया शरीर के हर अंग को प्रभावित करते हैं।

टीबी के लक्षण
• तीन-चार हफ़्ते से अधिक लगातार खांसी आना।
• बलगम के साथ खून आना
• खासतौर पर शाम को बढ़ने वाला बुखार होना।
• पूरे सीने में लगातार तेज़ दर्द होना
• मरीज़ का वज़न का घटना
• अचानक भूख में लगना बंद हो जाना
• फेफड़ों में इंफेक्शन बहुत ज़्यादा होना
• सांस लेने में काफी दिक़्क़त होना

टीबी से बचाव
• बच्चे को एक महीने का हाने से पहले टीबी का टीका लगवाना।
• खांसते या छींकते समय मुंह पर रुमाल रखना।
• मरीज़ को जगह-जगह थूकने से रोकना।
• इलाज का कोर्स पूरा करना।
• अल्कोहल और धूम्रपान से परहेज करना।
• बहुत ज़्यादा श्रम वाला काम बिल्कुल न करना

कैसे होता है टीबी संक्रमण?
टीबी रोगियों का इलाज करने वाले डॉक्टरों का कहना है कि टीबी रोगियों के कफ, छींक, खांसी, थूक और उनके सांस से बैक्टीरिया पहले वातावरण में प्रवेश करते हैं और फौरन आसपास मौजूद व्यक्ति के सांस के साथ उसके फेफड़े तक पहुंच जाते हैं। इस तरह टीबी मरीज़ों के संपर्क में आने के कारण अच्छा ख़ासा स्वस्थ आदमी भी भी आसानी से टीबी का शिकार हो जाता है। किसी टीबी मरीज़ के के कपड़े पहनने, उससे हाथ मिलाने या उसे छूने से टीबी नहीं फैलता।

डॉक्टरों का कहना है कि जब भी टीबी के बैक्टीरिया सांस के जरिए दूसरे व्यक्ति के फेफड़े तक पहुंचते हैं तब वे कई गुना बढ़ जाते हैं। टीबी के बैक्टीरिया फेफड़े को संक्रमित कर देते हैं। कभी-कभी हट्टे-कट्टे व्यक्ति का मज़बूत इम्यून सिस्टम इन्हें रोक लेता है, लेकिन ज़्यादातर मामले में ये बैक्टीरिया हावी हो जाते हैं और मरीज़ काइम्यून सिस्टम कमज़ोर कर देते हैं। टीबी का संक्रमण तीन चरणों में होता है।

प्रथम चरण: टीबी की पहली अवस्था में मरीज़ के पसलियों में दर्द होता है।त उसके हाथ-पांव अकड़ जाते हैं। उसके पूरे बदन में हल्की टूटन सी हमसूस होती है और मरीज़ को लगातार बुखार बना रहता है। इस अवस्था में मर्ज का पता लगाने के लिए स्पेशलिस्ट डॉक्टर के पास जाना चाहिए।

द्वितीय चरण: टीबी की दूसरी अवस्था में मरीज़ की आवाज़ भारी या मोटी हो जाती है। उसके पेट में दर्द होता है। इसके अलावा कमर दर्द और बुखार भी होता है। इस अवस्था में अगर मर्ज का पता लग जाए तो आसानी से इलाज हो जाता है।

तृतीय चरण: टीबी की तीसरी अवस्था में रोगी को बहुत तेज़ बुखार होता है। उसे लगातार तेज़ खांसी आती है। खांसी बहुत कष्टदायक होती है। मरीज़ को कफ के साथ खून भी आने लगता है, जिससे उसका शरीर बहुत कमज़ोर पड़ जाता है। टीबी की यह अवस्था सीरियस होती है।

कैसे कराएं जांच?
टीबी होने की आशंका होने पर जांच कराने के कई तरीक़े हैं। सबसे पहले सीने का का एक्स रे करवाते हैं। उसके बाद कफ यानी बलगम की जांच करवाने के बाद कई बार डॉक्टर स्किन के टेस्ट की भी सलाह देते हैं। आजकल टीबी का पता लगाने के लिए आधुनिक तकनीक आईजीएम से हीमोग्लोबीन का भी जांच होने लगा है। हर सरकारी अस्पतालों में सभी जांच मुफ़्त में होती है।

टीबी का ट्रीटमेंट
आजकल तो टीबी का सहज़ इलाज उपलब्ध है। डॉक्टरों का कहना है कि टीबी मरीज़ कोर्स करके इस बीमारी से पूरी तरह मुक्त हो सकते हैं। सरकारी के डॉट्स सेंटर देश भर में हैं, जहां टीबी के मुफ़्त इलाज होता है। इन केंद्रों मरीज़ को क्लिनिक में ही दवाई खिलाई जाती है, ताकि उपचार में मरीज़ की ओर से कोताही न बरती जाए। जिन्हें टीबी है, उन्हें इन केंद्रों पर ज़रूर जाना चाहिए।

खाना-पीना कैसा हो
डॉंक्टरों का कहना है कि टीबी के रोगदियों को हाई प्रोटीन वाले संतुलित आहार देने चाहिए। खाने में किसी तरह के परहेज की ज़रूरत नहीं है। बस उका भोजन पौष्टिकत तत्वों से भरपूर होना चाहिए। दूध, अंडे, मुर्गा, मांस, मछली में ज़्यादा प्रोटीन होता है। इसलिए मरीज़ो को भोजन में इनकी बहुतायत होनी चाहिए। मरीज़ को अखरोट, लहसुन, लौकी, हींग, आम का रस, तुलसी, देसी शक्कर, बड़ी मुनक्का और अंगूर भी देना बहुत फ़ायदेमंद साबित होते हैं। अगर सामान्य व्यक्ति को एक ग्राम प्रोटीन डाइट की सलाह दी जाती है तो टीबी के मरीज को 1।5 ग्राम प्रोटीन चाहिए।

बच्चों में टीबी
मौजूदा समय में बड़ों के साथ बच्चे भी टीबी के शिकार होने लगे हैं। बालरोग कंसल्टेंट्स का मानना है, ‘समाज में सामाजिक और आर्थिक गिरावट तो इसकी बड़ी वजह है। बदली जीवनशैली और खान-पान की वजह से भी बच्चों में टीबी की समस्या आम होती जा रही है। आजकल बच्चे जंक फूड खूब खाते हैं, जिससे उनके शरीर को पौष्टिक तत्व कम मिलते हैं, जिससे इम्यून सिस्टम भी कमजोर पड़ गई है।

अमिताभ को भी टीबी!
बॉलीवुड के सबसे लोकप्रिय अभिनेता अमिताभ बच्चन टीबी पर जागरूकता अभियान से जुडे हुए हैं। टीबी से पीड़ित लोगों को राहत दिलाने के लिए शुरू किए गए अभियान से अमिताभ को बतौर एंबैसेडर जोड़ा गया है। बिग बी ने ‘टीबी फ़्री इंडिया’ की प्रेस वार्ता में अपने एक अनुभव को साझा करते हुए बताया कि सन् 2000 में अचानक पता चला कि उन्हें टीबी है। बहराहाल इलाज से वह ठीक हो गए, लेकिन भारी मात्रा में दवाइयों की खुराक लेनी पड़ी थी। बिग बी ने कहा, “अगर टीबी मुझे हो सकती है तो किसी को भी हो सकती है। अभी भी भारत में टीबी को एक अवांछनीय बीमारी माना जाता है और लोग इससे डरते हैं।” अमिताभ ने बताया कि कैसे टीबी का रोगी आराम से काम कर सकता है, शर्त सिर्फ़ इतनी है कि दवा की गोलियां लेने में कोई कोताही न बरती जाए।

अमीरों की बीमारी
अमिताभ ने कहा, “लोग इस बीमारी से घबराते हैं, टीबी से फ़िल्मों में लोगों को मरते देखकर लोगों को असल ज़िंदगी में भी इससे डरते देखा जा सकता है, लेकिन यह लाइलाज नहीं है।” टीबी फ़्री इंडिया के आंकड़ों पर नज़र डाले तो कभी महानगरों में होने वाली यह बीमारी अब तेज़ी से मुंबई की झुग्गी बस्तियों में फैल रही है। टीबी के मरीजों के साथ होने वाले बुरे बर्ताव के बारे में अमिताभ कहते हैं, “टीबी प्रभावित लोगों के साथ दुर्भाग्यवश भेदभाव होता है, खासकर विवाहित महिलाएं इसका शिकार होती हैं, या लड़कियों को शादी के प्रस्ताव मिलने में दिक्कत होती है। अगर शादी हो गई तो घर से बाहर कर देते हैं। समाज में फैली इस कुप्रथा को हम इस अभियान से ठीक कर सकते हैं, जैसे उचित दवा से टीबी को।”

टीबी का घरेलू उपचार

लहसुन
लहसुन में सल्फुरिक एसिड होता है और इसमें एंटीबैक्‍टीरियल गुण होते हैं, जो टीबी के बैक्टीरिया और कीटाणुओं का नाशकर देता है। लहसुन इम्यून सिस्टम को बढ़ाती है। इसे भूनकर या पकाकर या फिर कच्‍चा ही खाना चाहिए। इसे खाने का तरीक़ा है कि लहुसन की 10 कलियों को एक कप दूध में उबाल लें और उबली हुई कलियों को चबाकर खा लें और ऊपर से दूध पी जाएं। ऐसा दो हफ़्ते तक करें। इस दैरान पानी ना पीएं वर्ना लहसुन असर नहीं करेगी।

आंवला
आंवला अपने सूजन विरोधी एवं ऐंटीबैक्टीरियल गुणों के लिए मशहूर है। आवला के पोषक तत्व शरीर की प्रक्रियाओं को सही ढंग ढंग से चलाने की ताक़त होती है। चार या पांच आंवले का बीज निकाल कर उनका जूस बनाकर उसमें एक चम्मच शहद मिलाकर रोज़ाना खाली पेट पीना चाहिए। टीवी के रोगी के लिए इसे अमृत माना गया है। कच्चा आंवला या उसका पाउडर भी लाभकारी होता है। यह शरीर को कई तरह के पोषण पहुंचा कर उसे मजबूती प्रदान करता है।

सहिजन
सहिजन टीबी पैदा करने वाले बैक्‍टीरिया से मुक्ति दिला सकता है। सहिजन फेफड़े की सूजन को घटाता है, जिससे संक्रमण से राहत दिलाती है। सहिजन की मुठ्ठीभर पत्‍तियां एक कप पानी में पांच मिनट तक गरम करके फिर ठंडा कर ले। उसमें नींबू, नमक और मिर्च निचोड़कर रोगी को पीने के लिए दें। इसका सेवन रोज़ाना सुबह खाली पेट करना चाहिए। इसके अलावा उबाली हुई सहिजन का रोज़ाना सेवन करने सेटीबी के बैक्टीरिया मर जाते हैं।

केला
पौषक तत्वों से परिपूर्ण केले में बहुत मात्रा में कैल्‍शियम मिलता है। कैल्शियम में टीबी के रोगियों का इम्यून सिस्टम मज़बूत करने की क्षमता होती है। एक पका कला मसलकर उसमें एक कप नारियल पानी,आधा कप दही और एक चम्मच शहद मिलाकर दिन में दो बार लेने से टीबी रोग ठीक हो जाता है। इसके अलावा कच्चे केले का जूस एक गिलास मात्रा में रोज सेवन करें। टीबी मरीज़ को एक गिलास कच्‍चे केले का जूस रोज़ाना सेवन करना चाहिए।

संतरा
फेफड़े पर संतरे का अल्कली (क्षारीय) प्रभाव फ़ायदेमंद होता है। यह इम्यून सिस्टम को बल देने वाला है। कफ सारक है याने कफ को आसानी से बाहर निकालने में मदद करता है। एक गिलास संतरे के रस में चुटकी भर नमक, एक बड़ा चम्मच शहद अच्छी तरह मिलाकर सुबह और शाम दोनों समय पीना चाहिए। इससे टीबी रोग के वायरस मर जाते हैं।

सीताफल
टीबी से छुटकारा पाने के लिए सीताफल को मैश कर लें और एक कप पानी में 25 किशमिश डालकर साथ ही सीताफल का गूदा उसमें डाल दें। उस मिश्रण को अच्छी तरह उबाल लें। पानी जल जाने का बाद इसे छान लें और इसमें इलायची पाउडर और साथ ही दो छोटे चम्‍मच चीनी मिलाएं। ठंडा होने पर इसका रोज़ाना दिन में दो बार सेवन करें। बहुत जल्दी फायदा होगा।

काली मिर्च
काली मिर्च शरीर को कई रोगों से राहत दिलाने में मदद करती हैं। यह फेफड़े की सफाई करती है और टीबी की वजह से होने वाले दर्द को दूर करती है। टीबी की बीमारी से राहत पाने के लिए काली मिर्च के 10-15 दाने को घी में फ्राई करने के बाद चुटकी भर हींग पाउडर डालकर मिक्स कर लें और ठंडा होने के बाद मिश्रण को तीन भागों में बांटकर एक घंटे के बाद इसका सेवन करें, इससे शर्तिया आराम मिलेगा।

पुदीना
पुदीना सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है इसमें ऐसे एंटी बैक्‍टीरियल गुण होते है जो शरीर को कफ से निजात दिलाने में मदद करते है। यह फेफडे़ को भी ख़राब होने से बचाता है। आधा कप गाजर के जूस में, एक चम्‍मच पुदीने का रस, दो चम्‍मच शहद और दो चम्‍मच शुद्ध सिरका मिलाएं। इस मिश्रण को तीन भाग में बांट लें और हर एक घंटे में पीएं। टीबी की बीमारी से राहत पाने के लिए पूदीना फायदेमंद साबित होता है।

ग्रीन टी
ग्रीन टी पीना हमारी सेहत के लिए फायदेमंद होता है। इसे पानी में अच्‍छी तरह से उबाल कर इसका सेवन करें। यह टीबी बीमारी पैदा करने वाले बैक्‍टीरिया का खात्‍मा करते हैं यह शरीर की इम्यून सिस्टम क्षमताओं को बढ़ाती भी है। ग्रीन टी पीने से टीबी पैदा करने वाले बैक्टीरिया का ख़तरा कम हो जाता है।

दूध
दूध पीना हमारी सेहत के लिए लाभकारी होता है, दूध से मिलने वाले कैल्शियम से इम्यून सिस्टम मजबूत बनता है और साथ ही हमारे शरीर की हड्डियों मजबूत बनती है। टीबी होने पर हड्डियों को नुकसान पहुंचाने वाले संक्रमण से बचने के लिए दूध का सेवन करना लाभकारी साबित होता है।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

भ्रष्टाचार से लड़कर हीरो बनने वाले केजरीवाल खुद भ्रष्टाचार में ही जेल गए (Kejriwal, who became a hero by fighting corruption, himself went to jail for corruption)

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हरिगोविंद विश्वकर्मा
कितनी विचित्र बात है। समाजसेवी अण्णा हज़ारे के भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जन आंदोलन के समय अरविंद केजरीवाल हीरो बने थे। वह इतने लोकप्रिय हुए कि दिल्ली की जनता ने आंख मूंद कर अभूतपूर्व बहुमत के साथ उन्हें दिल्ली के मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी। अब केजरीवाल ख़ुद भ्रष्टाचार के ही आरोप में प्रवर्तन निदेशालय द्वारा गिरफ़्तार कर लिए गए हैं। यानी कहीं न कहीं दाल में काला ज़रूर है, वरना उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से राहत ज़रूर मिलती। उनके कई मंत्रियों को जमानत देने से सुप्रीम कोर्ट खुद इनकार कर चुका है, तो कहने का मतलब उनके कार्यकाल में शराब नीति में गड़बड़ हुई है। वरना इतने ज़्यादा लोग कैसे गिरफ़्तार हो गए और जेल की हवा खा रहे है।

इतना ही नहीं 2013 में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जन आंदोलन के दौरान और आम आदमी पार्टी का गठन करते समय केजरीवाल ने खुद ‘एक व्यक्ति एक पद’ का भी नारा दिया था। वह कहते थे एक व्यक्ति दो पद अपने पास नहीं रखेगा। लेकिन खुद दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के बाद भी आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा बने रहे। आप के गठन के बाद से ही वही पार्टी के प्रमुख है। इसीलिए अब उनके और मनीष सिसोदिया के जेल जाने के बाद भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है कि दिल्ली सरकार और आप का नेतृत्व कौन करेगा, क्योंकि पार्टी में मनीष और अरविंद के बाद किसी की वरीयता ही निर्धारित नहीं है।

सवाल यह भी उठता है कि अगर केजरीवाल वाक़ई पाक-साफ़ थे। दिल्ली शराब घोटाले में उनकी कोई भूमिका नहीं थी तो उन्हें प्रवर्तन निदेशालय के पहले ही समन पर उसके पास सीना तानकर चले जाना चाहिए था और दूध का दूध पानी का पानी कर देना चाहिए था। कहावत भी है कि सांच को आंच नहीं। बैशक अगर ईमानदार होने के बावजूद उन्हें ईडी परेशान करती तो ज़ाहिर तौर पर देश की न्यायपालिका उनके समर्थन में खड़ी रहती, लेकिन केजरीवाल ने ऐसा नहीं किया। ईडी के सवालों का सामना करने की बजाय वह इधर-उधर करते रहे। अब जब उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से कोई राहत नहीं मिली तो प्रवर्तन निदेशालय ने उन्हें उनके घऱ से उठा लिया।

जिस आदमी ने पहले भ्रष्टाचार से लड़ने का भ्रम पैदा किया, बाद में उसका भी भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जाना बहुत दुखद है। अरविंद केजरीवाल ने जो हथकंडे अपनाए उससे भारतीय लोकतंत्र का बहुत नुकसान हुआ। उन्होंने सत्ता पाने के लिए भ्रष्टाचार को टूल के रूप में इस्तेमाल किया और देश के दो राज्यों में सत्ता हथिया ली। अरविंद केजरीवाल का चाहे जो हो, अब भविष्य में अगर कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ खड़ा होगा तो जनता उस पर यकीन नहीं करेगी। मतलब भविष्य में कोई भ्रष्टाचार से लड़ने की बात करेगा तो लोग हंसेगे और मान लेंगे कि यह आदमी मूर्ख बना रहा है। इसका मतलब यह भी है कि भारतीय राजनीति और लोकतंत्र में ईमानदारी की बात कोई नहीं करेगा, क्योंकि हमाम में सब नंगे हैं।

आज कांग्रेस भ्रष्टाचार करने और ग़ल़त अल्पसंख्यक तुष्टीकरण की नीति की सज़ा भुगतती हुई राष्ट्रीय राजनीति से बड़ी तेज़ी से दूर होती और बुद्धिजीवियों का मानना है, “विकल्प के अभाव में भारतीय जनता पार्टी मनमानी कर रही है। इलेक्टोरल बॉन्ड के नाम पर खुले आम फिरौती ली जा रही है। भाजपा के सामने विपक्ष बौना हो गया है। कोई विकल्प नहीं दिख रहा है। ऐसे में एक ऐसी पार्टी की शिद्दत से दरकार महसूस की जा रही है, जो वाक़ई भ्रष्टाचार से लड़ती और देश भक्त होती।” और वह पार्टी भाजपा और कांग्रेस का विकल्प बनती, लेकिन इस तरह का कोई विकल्प दूर-दूर क्या बहुत दूर तक नहीं दिख रही है। इसका यह भी मतलब है कि 10 प्रतिशत सत्ता वर्ग देश के 90 प्रतिशत संसाधन पर क़ब्ज़ा बरक़रार रखेगा। आम आदमी लाचारी से अनैतिक कार्य होते देखता रहेगा और कर कुछ नहीं पाएगा।

बहरहाल, अब आम आदमी पार्टी आरोप लगा सकती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इशारे पर प्रवर्तन निदेशालय ने केजरीवाल को गिरफ़्तार किया है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि केजरीवाल ईडी के समन के बावजूद जांच एजेंसी के सामने पेश नहीं हो रहे थे। वह नाटक पर नाटक करते रहे। बृहस्पतिवार को भी दिन भर ड्रामा होता रहा और दिल्ली हाईकोर्ट से कोई राहत न मिलने के बाद प्रवर्तन निदेशालय ने केजरीवाल को गिरफ़्तार कर लिया। इस तरह जो आदमी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जन आंदोलन के समय हीरो बना था वह ख़ुद कथित तौर पर भ्रष्टाचार करके जीरो बन गया।

शायद लोगों को याद होगा 2013 में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ पूरे देश में आक्रोश के चलते अचानक जननायक बन गए अरविंद केजरीवाल स्टिंग ऑपरेशन पर ख़ूब ज़ोर देते थे। वह बेबाक कहते थे, “कोई ग़लत कर रहा हो तो उसका स्टिंग कर लो और उस स्टिंग को पब्लिक कर दो।“ 2013 में दिल्ली का मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वह कहते रहे, “जो रिश्वत मांगे, उसकी आवाज़ रिकॉर्ड कर लो और मेरे पास भेज दो, मैं उसे फ़ौरन जेल भेज दूंगा।“ सत्ता मिलने के बाद वही स्टिंग ऑपरेशन आम आदमी पार्टी के गले की हड्डी बन गया, क्योंकि स्टिंग ऑपरेशन के चलते पहले अरविंद खुद बेनक़ाब हुए और अब उनकी पार्टी के आदर्शवादी नेता एक-एक करके एक्सपोज़ हो रहे हैं। अगर कहें कि केजरीवाल की महत्वकांक्षा ने आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय पार्टी बनने की संभावना को ही ख़त्म कर दिया।

क्या कोई शिक्षण संस्थान देश के खिलाफ खड़ा हो सकता है? यही सवाल उठाती है फिल्म JNU

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यह देश इस बात का गवाह रहा है कि दिल्ली का प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान जेएनयू यानी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में अलग तरह है माहौल रहता है। बेशक अपनी स्थापना के बाद से इस संस्थान ने एक से बढ़कर एक प्रतिभाओं को आगे लाने का काम किया है, लेकिन यह संस्थान पिछले एक दशक से विरोध प्रदर्शन और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों का केंद्र रहा और यहां का बौद्धिक तबका देश हित को तिलांजलि देकर अलगाववाद और आतंकवाद समर्थन करता रहा है। फिल्म JNU में इसी सवाल को देश के समक्ष लाने की कोशिश की गई है।

उर्वशी रौतेला, रवि किशन और पीयूष मिश्रा स्टारर फ़िल्म जेएनयू : जहांगीर नेशनल यूनिवर्सिटी (JNU : Jahangir National University) अपने एनाउन्समेंट के बाद से ही सुर्ख़ियों में हैं। फ़िल्म के पोस्टर के रिलीज होते ही इंटरनेट पर यूजर्स कमेंट करने लगे थे। आज फ़िल्म का पहला वीडियो टीज़र जारी कर दिया गया। फ़िल्म जेएनयू राष्ट्रवाद, वैचारिक सक्रियता और छात्र आंदोलनों के मुद्दों पर चर्चा और बहस पर आधारित एक रोमांचक फ़िल्म हैं। फ़िल्म राष्ट्रवाद और शैक्षणिक संस्थानों में व्याप्त राजनीति की बात करती हैं।

जेएनयू के इस टीज़र वीडियो में फिल्म की कहानी का मूल प्लॉट दिखाई देते हैं, टीज़र के पहले दृश्य में संवाद सुनाई देता हैं कि जेएनयू के छात्र/छात्रा अपने क्लासरूम में कम और समाचारों की सुर्ख़ियों में ज़्यादा पाए जाते हैं। तो क्या जेएनयू राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का केंद्र हैं? इस टीज़र के आखिरी हिस्से में छात्र नेता का संवाद हैं, “यहाँ के मगरमच्छ हम हैं। इसलिए हमारे साथ रहने में समझदारी हैं क्योंकि जेएनयू में सरकार हमारी हैं।”

वैसे फिल्म के एक संवाद को टीज़र का हिस्सा बनाना समझ से परे हैं, जिसमें पुलिस अफ़सर का क़िरदार निभा रहे रवि किशन कहते हैं, “पाकिस्तान का वीज़ा मिलना आसान हैं लेकिन जेएनयू का वीज़ा मिलना मुश्किल नहीं।” यहां निर्माता-निर्देशक यह भूल गए हैं कि जेएनयू एक शिक्षण संस्थान है। कोई देश नहीं। इस संस्थान में प्रदेश के लिए परीक्षा होती है। जो उस परीक्षा को पास करता है, उसे ही यहां का वीज़ा मिलता है। इस कमज़ोर संवाद को छोड़ दें तो पूरा टीज़र आकर्षक है।

यूनिवर्सिटी के भीतरी हिस्से में विरोध प्रदर्शन के दृश्य, आपराधिक साजिश और राजद्रोह के आरोप और आतंकवाद समर्थन करते हुए कुछ युवाओं का समूह बहुत ही गहरे सवाल खड़े करता हैं। यूनिवर्सिटी के अंदर दो पार्टी के नेता सत्ता के लिए निरंतर संघर्ष के पृष्ठभूमि में जेएनयू की आंतरिक कार्यप्रणाली संदेह से भरी हुई लगती हैं और गहरे सवाल खड़े करती हैं.

उर्वशी रौतेला, सिद्धार्थ बोडके, रवि किशन, पीयूष मिश्रा, विजय राज, रश्मि देसाई और सोनाली सैगल जैसी प्रतिभाओं वाले कलाकार, जेएनयू के राजनीतिक विरोधाभास और के भीतर विभिन्न गुटों का प्रतिनिधित्व करने वाले विविध प्रकार के किरदारों में नज़र आते हैं।

निर्माता प्रतिमा दत्ता ने कहा कि फ़िल्म जेएनयू राष्ट्रवाद, सक्रियता और हमारे देश के भविष्य को आकार देने में छात्रों की भूमिका के बारे में महत्वपूर्ण बातचीत को एक बहुत ही मनोरंजक और सिनेमाई अन्दाज़ में दर्शकों के समक्ष उपस्थित करेगी। यह एक विवादास्पद फ़िल्म नहीं हैं यह एक जरूरी फ़िल्म हैं।

अभिनेत्री उर्वशी रौतेला ने कहा कि फ़िल्म जेएनयू का हिस्सा बनना मेरे लिए ज्ञानवर्धक अनुभव रहा है। मेरा किरदार छात्र सक्रियता और लचीलेपन की भावना को प्रस्तुत करता है, और मेरा मानना है कि यह फिल्म कैंपस राजनीति की जटिलताओं और युवा आवाजों की ताकत पर प्रकाश डालेगी। यह फिल्म निर्माता की जिम्मेदारी है कि वह दिखाये कि किसी शैक्षणिक संस्थान में विवादास्पद घटनाओं की वास्तविकता क्या है, लेकिन किसी भी धार्मिक या समुदाय की भावनाओं को ठेस न पहुंचाएं।

हमारी फिल्म आज के युवाओं और एक विचारधारा के दोनों हिस्सों को दिखाती है जो गलत प्रभाव में आ जाते हैं, फ़िल्म जेएनयू यूनिवर्सिटी में होने वाले हास्य, गीत और कॉलेज के यादगार पलों को मनोरंजन के साथ एक कथानक को प्रस्तुत करती हैं न कि सांप्रदायिक मुद्दों को प्रचारित करने के लिए एक विवादित फ़िल्म के रूप में।

महाकाल मूवीज प्राइवेट लिमिटेड के बैनर तले निर्मित फ़िल्म जहांगीर नेशनल यूनिवर्सिटी (जेएनयू) की निर्मात्री प्रतिमा दत्ता और निर्देशक विनय शर्मा हैं फ़िल्म में उर्वशी और रवि के अलावा पीयूष मिश्रा, सिद्धार्थ बोडके, विजय राज, रश्मि देसाई, अतुल पांडे, सोनाली सेगल जैसे प्रतिभाशाली अभिनेता हैं। फिल्म 5 अप्रैल 2024 को सिनेमा में रिलीज़ होगी।

फ़िल्म जेएनयू : जहांगीर नेशनल यूनिवर्सिटी का टीज़र

तीसरे विश्वयुद्ध के बाद बचे लोग लगे थे उम्मीदों को जीवित रखने की कोशिश में…

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पर्यावरण को समर्पित कालजयी उपन्यास “प्रोफेसर वायुमंडल” का विमोचन

यद्यपि तीसरा विश्व युद्ध समाप्त हो चुका था, लेकिन पृथ्वी 47 अभी ज़िंदा बच गई थी। वह बुरी तरह तड़प रही थी, क्योंकि उसका अंग-अंग ज़ख़्मी था और प्रदूषण खुद उसे निगलने की कोशिश कर रहा था। पृथ्वी का समस्त जल दूषित हो गया था। पेड़ जल चुके थे और उस ऑक्सीजनरहित हवा में सांस लेना बड़ा मुश्किल था। हर तरफ़ केवल गंदगी का अंबार लगा हुआ था। हां, जो लोग धरती के इस अब तक के सबसे बड़े विनाश के बाद भी किसी तरह बच गए थे, वे लोग अब अपनी उम्मीदों को जीवित रखने की कोशिश कर रहे थे।

लेकिन पहले ही अपनी अंधी धार्मिक भावनाओं और अपने तथाकथित राष्ट्रवाद के लिए हमारे ख़ूबसूरत नक्षत्र को ध्वस्त कर देने वाले दुनिया के शीर्ष शासक, अब भी धन हासिल करने, बदला लेने और अपनी शक्ति को पहले जैसे ही बरकरार रखने के लिए अपनी गंदी राजनीति का खेल खेल रहे थे। इन सबके बीच अपने आपको शांति का दूत मानने वाला प्रदूषा अब प्रदूषण को ही अहम टूल के रूप में इस्तेमाल करके दुनिया के पुनर्निर्माण का संकल्प ले चुका था। वह अद्भुत चरीक़े से आगे बढ़ रहा था।

उसे इस कार्य के लिए प्रदूषण की देवी मिआस्मा से चमत्कारिक शक्तियां मिल गई थीं, किंतु चूंकि यह नैतिक मार्ग कतई नहीं था, इसलिए प्रोफ़ेसर को उसे छोड़ना ही था। हां, दो पुराने दोस्त, जो तृतीय विश्वयुद्ध में प्राचीनतम के लिए महासैनिक थे, जिन्होंने अपने देश के लिए भीषण लड़ाइयां लड़ीं थीं, आज एक-दूसरे के सामने शत्रु बनकर खड़े हुए थे। फ़िलहाल, पृथ्वी 47 अपनी नवीनतम तबाही से उबरने का हर संभव प्रयास कर ही रही थी, लेकिन वह एक बार फिर ख़तरे में पड़ने वाली थी, पर इस बार वो ख़तरा उसे नष्ट करने या उसे बचाने को लेकर उत्पन्न नहीं होने वाला था, बल्कि उसे पुनर्निर्मित करने को लेकर होने वाला था।

यह पंक्तियां हिंदी में लिखे गए अद्भुत फैंटेसी उपन्यास “प्रोफेसर वायुमंडल” से उद्धृत की गई हैं। जो प्रदूषण की भयावहता को दर्शाता है। इस असाधारण उपन्यास को स्वतंत्र फ़िल्ममेकर अभिषेक ब्रह्मचारी ने लिखा है। उपन्यास का विमोचन वाराणसी के मशहूर डीएवी पीजी कालेज के राजनीति शास्त्र के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. दीनानाथ सिंह के कर-कमलों से हुआ। विमोचन समारोह बीएचयू के अंतर-विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र के सभागार में हुआ। इस अवसर पर काशी हिंदू विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय के प्रो. सुनील कुमार सिंह और आईयूसीटीई, बीएचयू के निदेशक प्रो. प्रेम नारायण सिंह समेत बड़ी संख्या में अध्येता, विद्यार्थी और बुद्धिजीवी मौजूद थे।

प्रो. दीनानाथ सिंह ने ब्रह्मचारी की प्रशंसा करते हुए कहा, “लेखक जब सोचता है तो संवेदना होती है, तरंग उठता है, और तब रचना होती है और रचना एक बड़ा मनोभाव है। प्रोफ़ेसर वायुमंडल में वही मनोभाव प्रकृति के प्रति चिंता के रूप में व्यक्त होता है।” प्रो. सुनील कुमार सिंह ने कहा, “लेखक कई सारी विशिष्टताओं से स्वयं भरा हुआ होता है और उसका असर प्रोफ़ेसर वायुमंडल में भी दिखता है।” उन्होंने अच्छे कथानक लिखने प्रयास के लिए लेखक और पुस्तक की बेहतर गुणवत्ता के लिए प्रकाशक को साधुवाद दिया।

विमोचन समारोह की अध्यक्ष करते हुए प्रो. प्रेम नारायण सिंह ने मंच पर उपस्थित अतिथियों को रुद्राक्ष की माला और अंगवस्त्र देकर सम्मान्नित किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि प्रोफ़ेसर वायुमंडल एक अलग किस्म की रचना प्रतीत होती है। यह उपन्यास ब्रह्मचारी के बड़े चाचा बीएचयू के पूर्व वित्त अधिकारी दिवंगत श्यामबाबू पटेल को समर्पित है। श्यामबाबू ख़ुद प्रकृतिवादी इंसान थे और अपने संपूर्ण को पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया था।

इस समारोह में एलबी पटेल, बीएचयू के पूर्व संपदा अधिकारी, बीएचयू के विधि संकाय के प्रो. रजनीश कुमार पटेल, बीएचयू के संयुक्त कुलसचिव संजय कुमार, बीएचयू के शिक्षा संकाय के डॉ पंकज सिंह, उषा पटेल, आभा श्याम, पूर्णिमा रजनीश, मीरा पटेल, गायक एवं अभिनेता युगल किशोर सिंह, बनारस फ़िल्म फेस्टिवल के संस्थापक रणवीर सिंह, खुला आसमान संस्था की संस्थापक रोली सिंह रघुवंशी, होप कंसल्टेंट के संस्थापक दीपेंद्र चौबे, गुप्तचर विभाग के पूर्व डिप्टी एसपी आरपी सिंह, डॉक्टर सुमन यादव और अभिनेता नवीन चंद्रा उपस्थित रहे। इसका अलावा समारोह में राधेश्याम सिंह, परशुराम सिंह, रवींद्र सिंह, वीरेंद्र बरनवाल, कपिल कुमार, गौरव सिंह, विशाल सिंह, अभिनव पटेल, राजीव पांडेय, अविरल श्याम, करण राणा और अभिनेता नवीन चंद्रा एवं राज वर्धन सिंह ने भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। कार्यक्रम का संचालन अभिनेता-लेखक उमेश भाटिया ने किया और राहुल यादव ने उसे अपने कैमरे में क़ैद किया।

अस्तित्व प्रकाशन के द्वारा प्रकाशित प्रोफ़ेसर वायुमंडल की कहानी पृथ्वी 47 नामक काल्पनिक ग्रह में घटे तीसरे विश्वयुद्ध के बाद के जीवन को दर्शाती है, और पर्यावरण के महत्व और प्रदूषण के प्रकोप पर प्रकाश डालते हुए कथानक के मुख्य चरित्रों के आपसी संघर्ष के माध्यम से हमें भविष्य में घटने वाली संभावित घटनाओं के प्रति सचेत भी करती है। प्रोफ़ेसर वायुमंडल अमेज़न, फ्लिपकार्ट, बीएसपीकार्ट, अस्तित्व प्रकाशन स्टोर, किंडल, गूगल प्ले आदि समेत अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध है।

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बीएचयू के प्रो. वशिष्ठ अनूप के ग़ज़ल संग्रह ‘बारूद के बिस्तर पर’ का विमोचन

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  • हिंदी ग़ज़ल ने 50 साल में ही कथ्य व अभिव्यंजना से अलग पहचान बनाई – प्रो. अजय तिवारी
  • मेरी गज़लें चुनौतियों से रूबरू होकर उनसे सीधी रचनात्मक मुठभेड़ करती हैं – प्रो. वशिष्ठ अनूप
  • अमीर खुसरो से लेकर कबीर तक की रचनाओं में भी हिंदी ग़ज़लों का स्वरूप – प्रो. सूरज पालीवाल
  • राजनीतिक, आर्थिक, सूचना, तकनीकी परिवर्तन भी ग़ज़ल संग्रह की पृष्ठभूमि में है – प्रो. सुमन जैन

वाराणसीः दिल्ली विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के प्रोफेसर अजय तिवारी का कहना है कि हालांकि हिंदी ग़ज़ल की यात्रा केवल पांच दशक पुरानी है, लेकिन हिंदी ग़ज़ल ने इन 50 सालों के सफर में ही अपनी कथ्यात्मकता तथा विशिष्ट अभिव्यंजना से एक अलग पहचान बनाई है, आज की परिस्थितियों, बदलते जीवन मूल्यों और पारंपरिक संबंधों को हिंदी ग़ज़ल ने बड़ी ही खूबसूरती से दर्शाया है।

प्रोफेसर अजय तिवारी ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से संबद्ध और महिला शिक्षा और सशक्तिकरण के लिए समर्पित प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान आर्य महिला पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज के सभागार में में बीएचयू के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ अनूप के ग़ज़ल संग्रह ‘बारूद के बिस्तर पर’ के विमोचन के बाद शिक्षकों और छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए यह विचार व्यक्त किए।

अपने ग़ज़ल संग्रह ‘बारूद के बिस्तर पर’ पुस्तक परिचर्चा में आर्य महिला पीजी कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ अनूप ने हिंदी ग़ज़लों की विकास यात्रा पर विस्तृत प्रकाश डाला। ‘बारूद के बिस्तर पर’ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मेरी गज़लें हमारे समय के बहुआयामी यथार्थ और अनेकानेक चुनौतियों से रूबरू होकर उनसे सीधी रचनात्मक मुठभेड़ करती हैं।

प्रो. वशिष्ठ अनूप ने कहा, “इन ग़ज़लों के एक-एक शेर में आवाम की बेचैनी दिखती है, समाज की निःसंगता दिखती हैं, आज के दौर में आदमी का अकेलापन दिखता है, रिश्तों का विखंडन दिखता है और इसके साथ-साथ सियासत के छल-प्रपंच का भी दीदार होता है। वैचारिकी इनके रेशे-रेशे में शामिल है।

इस अवसर पर नवीन एवं भाषा प्रसार विभाग, आगरा के विभागाध्यक्ष प्रो. उमापति दीक्षित ने प्रो. वशिष्ठ अनूप की रचित ग़ज़लों की भावपूर्ण प्रस्तुति देकर सभी का मन मोह लिया। प्रो. दीक्षित की प्रस्तुति की लोगों ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की।

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा, महाराष्ट्र अध्यापन करने वाले हिंदी के प्रकांड विद्वान प्रोफेसर सूरज पालीवाल का कहना है कि हालांकि हिंदी ग़ज़ल की यात्रा केवल 50 साल पुरानी है, लेकिन अमीर खुसरो से लेकर कबीर तक की रचनाओं में इसका स्वरूप दिखाई देता है।

प्रो. पालीवाल ने अपने वक्तव्य में कहा कि “हिंदी गज़ल के लिए मुख्यतः दो बातें ध्यान देने लायक हैं। पहली यह कि शेर की बाहरी बनावट तथा बुनावट, दूसरी विषयवस्तु या कथ्य पर। उन्होंने कहा कि यू तो हिंदी ग़ज़ल की यात्रा लगभग 50 साल पुरानी है, लेकिन उसका आयाम व्यापक है।

प्रो. पालीवाल ने कहा, “उर्दू ग़ज़ल शायरी की एक विधा है परंतु वही गज़ल जब हिंदी में आती है तो हाशिए की विधा बनकर रह जाती है, परंतु हिंदी ग़ज़ल को जरा संवेदनशील नजर से देखें और इत्मीनान से अध्ययन करें तो समझ में आएगा कि यह हमारे समय की सबसे सशक्त कविता है, जिसमें लय है, रवानी है, मितकथन है और दो पंक्तियों में भरपूर बात कहने की हुनरमंदी है।”

महिला महाविद्यालय के हिंदी विभाग की प्रोफेसर सुमन जैन ने समकालीन गज़ल पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समकालीन ग़ज़ल पारंपरिक ग़ज़ल की काव्य रूढ़ियों से मुक्त होने का प्रयास भी है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घटित हो रहे राजनीतिक, आर्थिक, सूचना, तकनीकी परिवर्तन भी इसकी पृष्ठभूमि में है।

इसी तरह प्रो. भावना त्रिवेदी राजनीति शास्त्र विभाग, आर्य महिला पीजी कॉलेज, ने हिंदी ग़ज़ल की विकास यात्रा पर विस्तृत प्रकाश डाला। डॉ. विवेक सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग ,काशी हिंदू विश्वविद्यालय तथा डॉ.प्रभात मिश्रा, असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

इस अवसर पर उपस्थित श्री विशाल राव तथा एम.ए. तृतीय वर्ष की छात्रा साक्षी कुमारी ने ग़ज़लों की मनमोहक प्रस्तुति देकर सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ शशिकांत दीक्षित ने किया। अतिथियों का स्वागत डॉ. मीनाक्षी मिश्रा ने तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अपर्णा पांडे ने किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ महापुरुषों के तैल चित्र पर माल्यार्पण तथा दीप प्रज्जवलन से हुआ। संगीत विभाग की छात्राओं ने कुलगीत और मंगलाचरण की प्रस्तुति दी। इस अवसर पर प्राचार्या प्रो. रचना दुबे, अन्य विभाग की शिक्षिकाएं तथा लगभग 100 छात्राएं उपस्थित थीं। कार्यक्रम का संचालन प्रो. सुचिता त्रिपाठी ने किया।

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स्त्री की चीख से निकली हैं पूनम की ग़जलें – डॉ. सोमा घोष

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"सुब्ह शब भर..." का विमोचन करते हुए (बाएं से) डॉ. सोमा घोष, गीतकार देवमणि पांडेय, प्रो. नंदलाल पाठक, आश करण अटल, नवीन जोशी नवा, पूनम विश्वकर्मा, डॉ. रामजीत विश्वकर्मा और प्रमोद कुश तनहा।

पूनम विश्वकर्मा के ग़ज़ल संग्रह “सुब्ह शब भर…” का विमोचन

मुंबई। शास्त्रीय गायिका पद्मश्री डॉ. सोमा घोष ने गीतकार पूनम विश्वकर्मा के पहले ग़ज़ल संग्रह “सुब्ह शब भर…” को अतंरराष्ट्रीय महिला सप्ताह के मौके पर महिलाओं को समर्पित करते हुए कहा कि पूनम की ग़जलें समाज में गाहे-बगाहे स्त्री के साथ होने वाले दोयम दर्जे के व्यवहार के प्रति स्त्री की चीख से निकली हैं। पूनम की लिखा एक ग़ज़ल “मैं भी इंसान हूँ ये बताया गया। पर मैं औरत हूँ ये भी सिखाया गया। ये मकाँ ख़ूबसूरत तो था पहले भी, मुझ को ला कर इसे घर बनाया गया।” को तरन्नुम में गाकर उन्होंने माहौल को पूर्णतः स्त्रीमय कर दिया।

इंशाद फाउंडेशन और चित्रनगरी संवाद मंच की ओर से गोरेगांव पश्चिम के केशल गोरे हॉल में आयोजित एक समारोह में ‘सुब्ह शब भर’ का विमोचन प्रो. नंदलाल पाठक, कथाकार सूरज प्रकाश, शास्त्रीय गायिका और भारतरत्न बिस्मिल्लाह ख़ाँ की मानस पुत्री पद्मश्री आदरणीया डॉ. सोमा घोष, गीतकार देवमणि पांडेय, नवीन जोशी नवा, सिद्धार्थ शांडिल्य, पूनम के पिता डॉ. रामजीत विश्वकर्मा और प्रमोद कुश तनहा के हाथों हुआ। दर्शक दीर्घा में मुंबई के साहित्य-जगत से जुड़े ढेर सारे नामचीन उपस्थित थे।

डॉ सोमा घोष का सम्मान करती हुईं पूनम विश्वकर्मा, साथ में खड़े हैं पूनम के पिता डॉ. रामजीत विश्वकर्मा।

डॉ. सोमा घोष ने पूनम के गजल संग्रह की खूब सराहना करते हुए कहा कि पूनम की ग़जलें में प्यार की गुप्तगू होती है। एक औरत पुरुष से जो प्यार और सम्मान की अपेक्षा रखती है, शायद उसकी वह उम्मीद पूरी नहीं होती। तो उसकी टीस उसने मन में रह जाती है। इस ग़ज़ल संग्रह की ख़ासियत यह है कि पूनम की हर गजल गाने लायक है।

महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी पूर्व अध्यक्ष प्रो. नंदलाल पाठक ने कहा कि अमूमन किसी की पहली किताब बहुत कम प्रभावशाली होती लेकिन हिंदी और भोजपुरी सिनेमा के लिए गीत लिख चुकी पूनम विश्वकर्मा का पहला ग़ज़ल संग्रह “सुब्ह शब भर…” राग और अनुराग का समन्वय और हवा का ताज़े झोंके की तरह है। उनका पहला ही ग़ज़ल संग्रह इतना दमदार होगा, किसी ने अनुमान भी नहीं किया था।

दर्शक दीर्घा में बैठे हुए (बाएं) से कमलेश पाठक, हरीश पाठक, आश करण अटल, डॉ. रामजीत विश्वकर्मा, नवीन जोशी नवा, सत्यम आनंद, जीनत कुरैशी, अर्चना जौहरी और प्रज्ञा शर्मा… दूसरी पंक्ति में बैठी हैं रोशनी किरण, डॉ दमयंती शर्मा, सविता दत्त, कमर हाजीपुरी, और आशू शर्मा

प्रो पाठक कहा कि पूनम की खूबी यह है कि उनके पास जो विषय है, वह है अथाह प्रेम है। संग्रह में विविधता में एकता की झलक दिखती है। सबसे अच्छी बात कि किताब में अच्छी भाषा का इस्तेमाल किया गया है। इस संग्रह की किताब में प्रेम झलक रहा है। उन्होंने कहा कि काव्य अथवा गजल लेखन विधा के लिए आवश्यकता, प्रतिभा, व्युत्पत्ति इन चीजों की आवश्यकता होती है। प्रतिभा की धनी पूनम के शेरों में जो परिपक्वता है,वह बिना अध्ययन और अभ्यास के संभव हो नहीं हो सकता। पूनम ने जो कुछ लिखा, वह उनका अपना और मौलिक है।

कथाकार सूरज प्रकाश समेत सभी साहित्यकारों ने भी ‘सुब्ह शब भर’ की खूब सराहना की। गीतकार और शायर देवमणि पांडेय ने गजल संग्रह ‘सुब्ह शब भर’ की समीक्षा कर कहा कि पूनम विश्वकर्मा के पिता जी का स्वप्न था कि उनके गजलों का एक संग्रह प्रकाशित हो, सो आज वह पूरा हुआ। यह उपलब्धि की बात है। उन्होंने कहा कि इस गजल संग्रह में जीवन दर्शन और मुहब्बत की खुशबू भी है, जिसे लोगों को जरूर पढ़ना चाहिए। पुस्तक परिचय इंशाद फाउंडेशन के प्रवर्तक नवीन ‘नवा’ ने दिया। उन्होंने बताया कि पुस्तक के कवर की पेंटिंग पूनम की 15 वर्षीय बेटी सौम्या विश्वकर्मा ने बनाई है, जो 10वीं की छात्रा है। कार्यक्रमका संचालन सिद्धार्थ शांडिल्य ने किया और खुद पूनम विश्वकर्मा ने कार्यक्रम में शामिल सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया।

अपहरण मामले में पूर्व सांसद धनंजय सिंह को 7 वर्ष कारावास

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लाइन बाजार थाना क्षेत्र के अपहरण मामले में धनंजय के साथ संतोष विक्रम को भी सजा व आर्थिक ज़ुर्माना

किसी ने सच कहा कि जिस दिन भारत की न्यायपालिका अपना काम ईमानदारी और विवेकपूर्वक करने लगेगी, उसी दिन से अपराधी ही नहीं, बल्कि सफ़ेदपोश अपराधी भी लोकसभा-विधानसभा-जिलापंचायत जैसी जनता की पंचायतों की जगह जेल की चारदीवारी के पीछे जाने लगेंगे। जौनपुर की अदालत ने ऐसा ही फ़ैसला सुनाया और नमामि गंगे के प्रोजेक्ट मैनेजर अभिनव सिंघल का अपहरण कराने, रंगदारी मांगने, षड्यंत्र तथा गालियां और धमकी देने के मामले में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले बाहुबली नेता धनंजय राजदेव सिंह को 7 साल की सज़ा सुनाते हुए जेल भेज दिया।

दो बार विधायक और एक बार सांसद रहा धनंजय सिंह पर हत्या, हत्या का प्रयास, अपहरण और हफ़्ता वसूली के 24 से ज़्यादा आपराधिक मामले दर्ज थे। जब से भारतीय जनता पार्टी ने मुंबई के उत्तर भारतीय नेता कृपाशंकर सिंह को जौनपुर लोकसभा से उम्मीदवार बनाने की घोषणा की थी, तभी से धनंजय सिंह उनकी राह में सबसे बड़ी बाधा था। लेकिन धनंजय के जेल चले जाने से कृपाशंकर निश्चित रूप से राहत महसूस करते होंगे। अब उनकी सीधी लड़ाई बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार से होगी। अगर समाजवादी पार्टी ने भी किसी को उम्मीदवार बना दिया और धनंजय की तीसरी पत्नी श्रीकला रेड्डी चुनाव मैदान में उतर गई तो मुक़ाबला चतुष्कोणीय हो जाएगा और कृपाशंकर तब मज़बूत प्रत्याशी हो सकते हैं।

साम, दाम, दंड, भेद की चाणक्य नीति पर राजनीति करने वाला आपराधिक पृष्ठभूमि का धनंजय सिंह लोकसभा में दूसरी बार पहुंचने के लिए कुछ भी करने पर उतारू था। अंग्रेजी कहावत पोएटिक जस्टिस के अनुसार अब अपने ही कर्मों की सज़ा भुगतते हुए धनंजय जौनपुर जेल पहुंच गया है। अदालत ने उसे सोमवार को ही दोषी क़रार दिया था और तभी पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया था। अब वह कम से कम लोकसभा चुनाव तक तो जेल प्रवास पर ही रहेगा। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने कहा है कि धनंजय सिंह की सही जगह जेल ही है।

यहां बताना बहुत ज़रूरी है कि कुछ साल पहले जब ख़बर आने लगी कि अपराधी मुन्ना बजरंगी भी जौनपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहता है तो जुलाई 2018 में, मुन्ना बजरंगी की पत्नी सीमा सिंह के अनुसार, धनंजय सिंह ने उसकी बागपत जेल में हत्या करवा दी। मज़ेदार बात यह है कि सीमा सिंह की शिकायत की पुलिस अभी तक जांच ही कर रही है और योगी आदित्यनाथ के कड़क शासन में भी धनंजय पर अभी तक कोई मुक़दमा दायर नहीं हुआ था।

अगर धनंजय सिंह के जीवन सफ़र पर नज़र दौड़ाएं तो अपराध से उसका चोली-दामन का संबंध दिखता है। धनंजय सिंह का जन्म मूल रूप से जौनपुर के सिकरारा थाना क्षेत्र के बनसफा गांव के कलकत्ता में रहने वाले राजपूत परिवार में 16 जुलाई 1975 को हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा भी उसकी कोलकाता में ही हुई। धनंजय सिंह का परिवार 1990 से पहले ही जौनपुर के बनसफा गांव वापस आ गया। उसके बाद धनंजय ने तिलक धारी (टीडी) कॉलेज में एडमिशन ले लिया। लेकिन उसी साल उसका नाम पहली बार पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हो गया।

जौनपुर के महर्षि विद्या मंदिर स्कूल के अध्यापक गोविंद उनियाल की हत्या कर दी गई और हत्यारों की सूची में धनंजय सिंह का भी नाम आया, जब वह 15 साल का था और दसवीं कक्षा का छात्र था। हालांकि पुलिस को उसके ख़िलाफ़ कोई ठोस सबूत नहीं मिला। लेकिन उसका अपराध से नाता छूटा नहीं। वह किशोरावस्था में ही अपराध में इस तरह लिप्त हो गया कि 12वीं कक्षी की बोर्ड परीक्षा उसने हिरासत के दौरान दी। बाद में उसने लखनऊ विश्वविद्यालय में अध्ययन किया और राजनीति विज्ञान में मास्टर की डिग्री प्राप्त की। लखनऊ प्रवास के दौरान भी धनंजय आपराधिक गतिविधियों में शामिल रहा।

लखनऊ विश्वविद्यालय में तो उसने ऐसी दबंगई की कि लोग उसके नाम से भी कांपने लगते थे। छात्र राजनीति में ही उसके नाम की धूम मच चुकी थी। उसने विश्वविद्यालय में ठाकुरों का गुट बना लिया था। इसमें धनंजय सिंह के अलावा अभय सिंह और बबलू सिंह जैसे ख़तरनाक अपराधी भी शामिल थे। इस गुट का खासा दबदबा था। आए दिन हिंसा, लड़ाई झगड़े के मामले इस गुट के नाम जुड़ते जा रहे थे। धनंजय की अपराध फाइल में अपराधों की संख्या बढ़ती रही। 1990 के मध्य के दशक तक धनंजय कुख्यात अपराधी बन चुका था। उसे जौनपुर का डॉन कहा जाने लगा था।

धनंजय सिंह ने अभय सिंह के साथ मिलकर रेलवे ठेकेदारी में हाथ आजमाना शुरू किया। उस वक्त रेलवे ठेकेदारी में पूर्वांचल के माफिया अजीत सिंह का बड़ा नाम हुआ करता था। वह नहीं चाहता था कि रेलवे ठेकेदारी में धनंजय की एंट्री हो। इसके बावजूद उसने अजीत सिंह को भी पीछे धकेल दिया। तब पूर्वांचल में माफिया और रेलवे ठेकेदारी का कारोबार ही पैसे का ज़रिया होता था। धीरे-धीरे धनंजय ने अभय के साथ मिलकर रेलवे ठेकेदारी से पैसा कमाना शुरू कर दिया। 1997 तक उसका गुट बेहद मजबूत बन गया था लेकिन इसी दौरान लोक निर्माण विभाग के इंजीनियर गोपाल शरण श्रीवास्तव की हत्या में उसका नाम आ गया।

दरअसल, कुछ अज्ञात बाइक सवार बदमाशों ने गोपाल शरण की दिन दहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस हत्या के आरोप के बाद धनंजय को भूमिगत हो गया। पुलिस ने उसके ऊपर 50 हज़ार रुपए का इनाम भी घोषित कर दिया। तब तक उस पर कई और आपराधिक केस दर्ज हो चुके थे। एक समय ऐसा भी आया जब अभय उस पर भारी पड़ने लगा। एक तरफ अभय रेलवे ठेकेदारी से ठाकुर गैंग जमकर उगाही कर रहा था, तो दूसरी तरफ धनंजय पुलिस से बचता फिर रहा था। ऐसे में उगाही का सारा पैसा अभय के पास आने लगा। इसी बात को लेकर कुछ समय बाद दोनों में तकरार शुरू हो गई। दोस्ती पैसे के बंटवारे को लेकर दुश्मनी में बदल गई।

गोपाल शरण की हत्या के आरोप के बाद धनंजय सिंह पुलिस से बचता फिर रहा था। इसी दौरान पुलिस को सूचना मिली कि उसका गिरोह जौनपुर-मिर्जापुर रोड पर भदौही और औराई के बीच मोरवा नदीं के पास स्थित एक पेट्रोल पंप को लूटने वाला है। पुलिस के अनुसार उसकी पूरी टीम घटनास्थल पर पहुंच गई। दोनों तरफ से कई राउंड गोलियां चली और एनकाउंटर में चार अपराधी मार गए। ख़बर आई कि धनंजय भी मुठभेड़ में मार दिया गया। पुलिस ने हत्या, हत्या की कोशिश, लूटपाट, किडनैपिंग, मारपीट जैसे दर्जनों मामलों में वांछित धनंजय की फाइल बंद कर दी।

इस घटना को चार महीने बीते थे कि किसी ने धनंजय सिंह को ज़िंदा देख लिया। बाद में उसने खुद पुलिस के सामने आत्मसमर्पण पर दिया। उसको ज़िंदा देखकर उत्तर प्रदेश पुलिस के होश उड़ गए। दरअसल, वह पूरा एनकाउंटर ही फर्जी था। पुलिस वालों ने आपसी खुन्नस निकालने के लिए निर्दोष लोगों की पकड़कर गोली मार दी थी। झूठे दावे करने के लिए 34 पुलिस अधिकारियों पर मामले दर्ज किए गए। कई ससपेंड हुए और उन पर लंबे समय तक केस भी चला। बहरहाल, एनकाउंटर एपिसोड के बाद धनंजय सिंह दबदबा और बढ़ गया। वह इलेक्शन मैटेरियल बन गया।

धनंजय के राजनीति में प्रवेश की भी रोचक कहानी है। 1990 और 2000 के दशक में जौनपुर में विनोद सिंह नाटे नाम के दबंग बाहुबली नेता थे। उन्हें मुन्ना बजरंगी का भी गुरु कहा जाता था। वह मुन्ना बजरंगी की सहायता से जौनपुर की रारी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहते थे। उन्होंने रारी क्षेत्र से जीतने के लिए काफ़ी मेहनत भी की थी। लेकिन एक सड़क हादसे में उनकी आकस्मिक मौत हो गई। बस क्या था, धनंजय विनोद सिंह नाटे को अपना गुरु कहने लगा और उनकी तस्वीर को सीने से लगाकर उसने राजनीतिक फ़सल काट ली। 2002 में वह रारी से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरा और विधायक बन गया।

इस तरह धनंजय का राजनीतिक सफ़र शुरू हो गया। इस दौरान उसके कई नए दोस्त भी बन, तो कई नए दुश्मन भी बने। विधायक निर्वाचित होने के चंद महीनों बाद ही उसका अपने पुराने दोस्त अभय सिंह से सामना हो गया। अभय तब तक उसका दुश्मन बन चुका था। 5 अक्टूबर 2002 को धनंजय बनारस का काफिला बनारस से गुज़र रहा था। अभय ने वाराणसी के नदेसर में स्थित टकसाल सिनेमा के पास काफिले पर फायरिंग करवा दी। इस घटना में धनंजय के चार साथी घायल हो गए।

वर्ष 2007 में धनंजय ने फिर से एक बार रारी से ही विधान सभा चुनाव जीत लिया। इस बार वह निषाद पार्टी से विधायक बना था लेकिन उसकी नज़र दिल्ली की लोकसभा पर थी। उसने इसी दौरान बीएसपी का दामन थाम लिया और 2009 लोकसभा चुनाव के लिए जौनपुर से पर्चा भरा। मायावती की लोकप्रियता के चलते उसने यहां भी जीत का परचम लहरा दिया। वह सांसद बन गया लेकिन दो साल बाद 2011 में मायावती से खटपट के बाद उसे बीएसपी से हकाल दिया गया। इसके बाद 2014 और 2019 में धनंजय सिंह ने चुनावे लड़ा लेकिन फिर उसे जीत हासिल नहीं हुई।

धनंजय सिंह किसी न किसी खबर को लेकर हमेशा चर्चा में रहा। वह अफने निजी जीवन से लेकर आपराधिक मामलों में अक्सर विरोधियों के निशाने पर रहा। उसकी तीनों शादियां भी हमेशा ही खबरों में रहीं। उसकी पहली शादी 12 दिसंबर 2006 को मीनू सिंह से हुई। लेकिन शादी के सिर्फ़ 9 महीने बाद सितंबर 2007 में मीनू की लखनऊ के घर में रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई। कहा जाता है कि मीनू ने आत्महत्या कर ली थी। उस मामले में भी लीपापोती हुई।

धनंजय सिंह ने दो साल बाद वर्ष साल 2009 में जागृति सिंह से शादी कर ली। पेश से डेंटिस्ट डॉ. जागृति सिंह मूलतः गोरखपुर कि रहने वाली थी। उसके पिता उमा शंकर सिंह परियोजना निदेशक के पद पर कार्यरत थे। वह ज्यादातर समय नोएडा में रहती थी। वहीं एक निजी अस्पताल में प्रैक्टिस करती थी। उसका जौनपुर जाना बहुत कम होता है। जागृति ने 2012 में मल्हनी विधान (रारी विधान सभा) से चुनाव भी लड़ा था लेकिन वह समाजवादी पार्टी के पारसनाथ यादव से हार गईं। 2013 में जागृति सिंह पर दिल्ली में घरेलू नौकरों से मारपीट और नौकरानी की पीट-पीटकर हत्या करने का आरोप लगा था। इस केस में सबूत मिटाने के आपोर में धनंजय की भी गिरफ्तारी हुई थी। बाद में जागृति और धनंजय के रिश्ते में खटास आ गई। दोनों ने तलाक ले लिया। दोनों का एक बेटा भी है, जो उदिल्ली में रहता है।

वर्ष 2017 के विधान सभा चुनाव में पारिवारिक विवाद से नाराज़ मुलायम सिंह चुनाव प्रचार के लिए सिर्फ़ दो जगह गए थे। जिनमें से एक था जौनपुर का मल्हनी विधानसभा क्षेत्र। यहां सपा प्रत्याशी बाहुबली नेता पारसनाथ यादव के पक्ष में प्रचार करते हुए उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा, ‘मैं पारस के लिए आया हूं, आप लोग इन्हें जिताइए।‘ इसके बाद पूरा समीकरण ही पलट गया। जो सीट धनंजय के क़ब्ज़े में दिख रही थी वहां से पारसनाथ यादव विधायक चुन लिए गए।

वर्ष 2017 में एक बार फिर धनंजय सिंह ने शादी की। हैदराबाद की हाइप्रोफाइल बिजनेस फैमिली से ताल्लुक रखने वाली श्रीकला रेड्डी उसकी तीसरी पत्नी हैं। अभी कुछ साल पहले ही श्रीकला रेड्डी ने जौनपुर से पंचायत चुनाव में अपना नाम दाखिल करवाया था जिसमें उसने जीत भी हासिल की। बेहद महंगी और लग्जरी कारों का शौकीन धनंजय को बेहद अमीर नेताओं की श्रेणी में शुमार माना जाता है। कई बड़ी कारों के अलावा, फार्म हाउस, प्लॉट और मकान उसके नाम हैं। उसकी अरबों की संपत्ति है। अगर इनकी चल-अचल संपत्ति को मिला लिया जाए तो उसको अरबपति कहना गलत नहीं होगा।

धनजंय सिंह से जुड़ा एक और विवाद काफी सुर्खियों में रहा था। कई अपराधिक मामलों में लिप्त होने के बावजूद धनंजय सिंह लंबे समय Y श्रेणी की सुरक्षा लिए हुए, उनके साथ हमेशा चार गनर मौजूद रहते थे। इस मामले में उनके खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर हुई और हाईकोर्ट ने इस मामले में कड़ी टिप्पणी की थी, जिसके बाद 2018 में प्रदेश पुलिस ने धनंजय सिंह को मिली ‘वाई-सेक्योरिटी’ हटा ली। बहरहाल, अदालत द्वारा 7 साल की सज़ा पाने के बाद धनंजय का राजनैतिक भविष्य अंधकार में है।

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परमाणु ऊर्जा नेट-ज़ीरो में अपना बहुमूल्य योगदान दे सकती है – डॉ अनिल काकोडकर

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क्लाइमेट चेंज और न्यूक्लियर पावर की भूमिका पर आधारित पुस्तक का विमोचन

संवाददाता
मुंबई, विश्व प्रसिद्ध परमाणु वैज्ञानिक एवं परमाणु ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ अनिल काकोडकर का कहना है कि आने वाले समय में परमाणु ऊर्जा से बनने वाली बिजली स्वच्छ, हरित, सुरक्षित और किफायती विकल्प साबित हो सकती है और वर्ष 2070 तक कार्बन उत्सर्जन को कम करके नेट-ज़ीरो में अपना बहुमूल्य योगदान दे सकती है।

डॉ काकोडकर मंगलवार की शाम मुंबई स्थित नेडरू सेंटर में डॉ अरुण नायक, डॉ सम्यक मुनोत और एमेरेट्स प्रोफेसर ज्येष्ठराज वी. जोशी द्वारा लिखी गयी “क्लाइमेट चेंज, क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन एनर्जी ऑप्शन्स एंड रिलेवेंस ऑफ न्यूक्लियर पावर” का विमोचन के बाद हुई गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। वैज्ञानिकों को संबोधित करते हुए डॉ काकोडकर ने परमाणु ऊर्जा के खूबियों के बारे में विस्तार से अपनी बात रखी। इस पुस्तक का विमोचन देश के विद्यार्थियों एवं युवाओं में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से देश भर में 28 फरवरी को मनाए जाने वाले राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के अवसर पर किया गया।

कार्यक्रम का आयोजन एक सादे समारोह में किया गया जहां परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष, डॉ ए. के. मोहंती, बी ए आर सी के निदेशक डॉ विवेक भसीन एवं नीति आयोग के सदस्य डॉ वी. के. सारस्वत ने अपने संदेश के जरिये अपनी शुभकामनाएँ पेषित की। साथ ही इस अवसर पर ए ई आर बी के पूर्व अध्यक्ष एस एस बजाज, आई सी टी, मुंबई के एमिरेट्स प्रो. एम. एम. शर्मा, सहित विभिन्न क्षेत्रों से आए हुए अन्य गणमान्य अतिथि भी मौजूद थे।

इस पुस्तक के माध्यम से वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ रहे जलवायु परिवर्तन के मद्देनज़र ऊर्जा के स्वच्छ, हरित और सुरक्षित विकल्पों की संभावनाओं पर प्रकाश डाला गया है। खास तौर पर विश्व में ग्लोबल वार्मिंग के चलते वातावरण में प्रतिकूल प्रभाव को कम करने में परमाणु ऊर्जा की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में विस्तार से चर्चा की गयी है।

अपनी पुस्तक के विमोचन के उपलक्ष्य में परमाणु ऊर्जा विभाग में प्रमुख (एनसीपीडब्ल्यू) एवं लेखक डॉ अरुण नायक ने आने वाले समय में विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में अपने जीवन काल को पूर्ण कर चुके कोयले पर आधारित विद्युत सन्यंत्रों के स्थान पर छोटे और मॉड्यूलर (एसएमआर प्रकार के) न्यूक्लियर रिएक्टरों की स्थापना एवं उनकी भूमिका पर चर्चा की।

पुस्तक के वरिष्ठ सह-लेखक एवं एचबीएनआई के एमेरिटस पोफेसर ज्येष्ठराज बी जोशी ने बताया कि किस तरह से आज विश्व स्तर पर भारत स्वच्छ ऊर्जा तकनीक के क्षेत्र में एक ग्लोबल लीडर के रूप में आगे बढ़ रहा है और आने वाले समय में भारत विश्व के प्रमुख विकसित देशों के पायदान पर अग्रणी होगा। साथ ही इस पुस्तक के सबसे युवा लेखक डॉ सम्यक ने बताया कि आने वाले समय में हमारे देश की युवा पीढ़ी किस तरह से परमाणु ऊर्जा को एक बेहतर विकल्प के रूप में देखेगी और इसके विकास में अपना योगदान देगी।

इस पुस्तक के माध्यम से पाठकों को बहुत ही रोचक तरीके से पलाइमेट चेंज के प्रभाव, ग्लोबल वार्मिंग के दुष्परिणाम एवं परमाणु ऊर्जा के रूप में विद्युत के स्वच्छ और सुरक्षित विकल्प के बारे में प्रयास किया गया है। इसके अलावा इस पुस्तक के माध्यम से देश भर में परमाणु ऊर्जा के पति जन-जागरूकता को बढ़ाने का भी प्रयास किया जाएगा। यह पुस्तक पाठकों के लिए विभिन्न साइट्स एवं ई-कॉमर्स पोर्टल्स पर उपलब्ध होगी जिसे सुंदरम पब्लिकेशन्स द्वारा प्रकाशित किया गया है।

ऐ गम-ए-ज़िंदगी कुछ तो दे मशवरा… एक तरफ उसका घर, एक तरफ…

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लंबे समय से बीमार चल रहे थे पंकज उधास

चिट्ठी आई है, चिट्ठी आई है… गाकर हर देशभक्त को वतन की याद दिलाने वाले गजल गायक पंकज उधास का 72 वर्ष की उम्र में मुंबई में निधन हो गया। उनकी पुत्री नायाब ने बताया कि वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे और उन्होंने आज सुबह 11 बजे ब्रीच कैंडी अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके स्वर में रिकॉर्ड गजल ‘चांदी जैसा रंग है तेरा, सोने जैसे बाल…’ गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था। पंकज उधास की ग़ज़लें प्यार, नशा और शराब की बात करती थी। शराब पर उन्होंने अनगिनत ग़ज़ल गए।

17 मई 1951 को गुजरात के जेतपुर में केशुभाई उधास और जीतूबेन उधास के घर में जन्मे पंकज अपने तीन भाइयों में सबसे छोटे थे। उनके सबसे बड़े भाई मनहर उधास ने बॉलीवुड फिल्मों में हिंदी पार्श्व गायक के रूप में कुछ सफलता हासिल की। उनके दूसरे बड़े भाई निर्मल उधास भी प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक थे। वैसे परिवार में गायन शुरू करने वाले तीन भाइयों में से वह पहले थे। उन्होंने सर बीपीटीआई भावनगर से पढ़ाई की थी। बाद में उनका परिवार मुंबई चला गया आया और पंकज ने मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज में पढ़ाई की।

उधास का परिवार राजकोट के पास चरखड़ी नामक कस्बे का रहने वाला था और जमींदार (पारंपरिक जमींदार) था। उनके दादा गाँव के पहले स्नातक थे और भावनगर राज्य के दीवान बने थे। उनके पिता, केशुभाई उधास, एक सरकारी कर्मचारी थे और उनकी मुलाकात प्रसिद्ध वीणा वादक अब्दुल करीम खान से हुई थी, जिन्होंने उन्हें दिलरुबा बजाना सिखाया था। जब उधास बच्चे थे, तो उनके पिता दिलरुबा, एक तार वाला वाद्ययंत्र बजाते थे। उनकी और उनके भाइयों की संगीत में रुचि देखकर उनके पिता ने उनका दाखिला राजकोट की संगीत अकादमी में करा दिया। उधास ने शुरुआत में तबला सीखने के लिए खुद को नामांकित किया लेकिन बाद में गुलाम कादिर खान साहब से हिंदुस्तानी गायन शास्त्रीय संगीत सीखना शुरू किया।

बाद में उधास मुंबई में ग्वालियर घराने के गायक नवरंग नागपुरकर के संरक्षण में प्रशिक्षण लिया। चार साल बाद वह राजकोट में संगीत नाट्य अकादमी में शामिल हो गए और तबला बजाने की बारीकियां सीखीं। उसके बाद, उन्होंने विल्सन कॉलेज और सेंट जेवियर्स कॉलेज, मुंबई से विज्ञान स्नातक की डिग्री हासिल की और मास्टर नवरंग के संरक्षण में भारतीय शास्त्रीय गायन संगीत में प्रशिक्षण शुरू किया।

पंकज उधास भारतीय ग़ज़ल और पार्श्व गायक थे जो हिंदी सिनेमा और भारतीय पॉप में अपने काम के लिए जाने जाते थे। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1980 में आहट नामक एक ग़ज़ल एल्बम के रिलीज़ के साथ की और उसके बाद 1981 में मुकरार, 1982 में तरन्नुम, 1983 में महफ़िल, 1984 में रॉयल अल्बर्ट हॉल में पंकज उधास लाइव, 1985 में नायाब और 1986 में आफरीन जैसी कई हिट फ़िल्में रिकॉर्ड कीं। ग़ज़ल गायक के रूप में उनकी सफलता के बाद, उन्हें महेश भट्ट की एक फिल्म , नाम में अभिनय करने और गाने के लिए आमंत्रित किया गया। उधास को 1986 की फिल्म नाम में गाने से प्रसिद्धि मिली, जिसमें उनका गाना “चिट्ठी आई है” (पत्र आ गया है) तुरंत हिट हो गया। इसके बाद उन्होंने कई हिंदी फिल्मों के लिए पार्श्वगायन किया।

पंकज उधास कैंसर रोगियों और थैलेसीमिक बच्चों के लिए मदद के लिए अक्सर कंसर्ट करते थे। दुनिया भर में एल्बम और लाइव कॉन्सर्ट ने उन्हें एक गायक के रूप में प्रसिद्धि दिलाई। 2006 में पंकज उधास को ग़ज़ल गायन की कला में उनके योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम 29 मार्च 2006 को नई दिल्ली में अलंकरण समारोह में उनको पद्मश्री प्रदान किया था। उसी साल उन्हें “हसरत” के लिए “2005 का सर्वश्रेष्ठ ग़ज़ल एल्बम” के रूप में कोलकाता में प्रतिष्ठित “कलाकार” पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

उधास का पहला गाना फिल्म “कामना” में था, जो उषा खन्ना द्वारा संगीतबद्ध और नक्श लायलपुरी द्वारा लिखा गया था, यह फिल्म फ्लॉप रही लेकिन उनके गायन को बहुत सराहा गया। इसके बाद, उधास ने ग़ज़लों में रुचि विकसित की और ग़ज़ल गायक के रूप में अपना करियर बनाने के लिए उर्दू सीखी। उन्होंने कनाडा और अमेरिका में ग़ज़ल संगीत कार्यक्रम करते हुए दस महीने बिताए और नए जोश और आत्मविश्वास के साथ भारत लौट आए। उनका पहला ग़ज़ल एल्बम, आहट, 1980 में रिलीज़ हुआ था। यहीं से उन्हें सफलता मिलनी शुरू हुई और 2011 तक उन्होंने पचास से अधिक एल्बम और सैकड़ों संकलन एल्बम जारी किए हैं। 1986 में, उधास को फिल्म नाम में अभिनय करने का एक और मौका मिला, जिससे उन्हें प्रसिद्धि मिली। 1990 में, उन्होंने फिल्म घायल के लिए लता मंगेशकर के साथ मधुर युगल गीत “महिया तेरी कसम” गाया। इस गाने ने जबरदस्त लोकप्रियता हासिल की।

1994 में उधास ने साधना सरगम ​​के साथ फिल्म मोहरा का उल्लेखनीय गीत, “ना कजरे की धार” गाया, जो बहुत लोकप्रिय भी हुआ। उन्होंने पार्श्व गायक के रूप में काम करना जारी रखा और साजन, ये दिल्लगी, नाम और फिर तेरी कहानी याद आई जैसी फिल्मों में कुछ ऑन-स्क्रीन उपस्थिति दर्ज की। दिसंबर 1987 में म्यूजिक इंडिया द्वारा लॉन्च किया गया उनका एल्बम शगुफ्ता भारत में कॉम्पैक्ट डिस्क पर रिलीज़ होने वाला पहला एल्बम था। बाद में, उधास ने सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन पर आदाब आरज़ है नामक एक प्रतिभा खोज टेलीविजन कार्यक्रम शुरू किया। मशहूर अभिनेता जॉन अब्राहम उधास को अपना गुरु कहते थे।

पंकज उधास की गाई कुछ ग़ज़लें जो बहुत लोकप्रिय हुईं

सबको मालूम है मैं शराबी नहीं
फिर भी कोई पिलायें तो मैं क्या करूँ
सिर्फ़ इक बार नज़रों से नज़रें मिलें
और कसम टूट जाये तो मैं क्या करूँ

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न समझो कि हम पी गए पीते-पीते,
कि थोड़ा सा हम जी गए पीते-पीते

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ऐ गम-ए-ज़िंदगी कुछ तो दे मशवरा
एक तरफ उसका घर, एक तरफ मयकदा

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शराब चीज़ ही ऐसी है ना छोड़ी जाए
ये मेरे यार के जैसी है ना छोड़ी जाए

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ये इंतज़ार ग़लत हैं के शाम हो जाए
जो हो सके तो अभी दौर-ए-जाम हो जाए

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निकलो न बेनक़ाब ज़माना खराब है
और उसपे ये शबाब, ज़मान खराब है

प्रस्तुति – हरिगोविंद विश्वकर्मा

राजेश रेड्डी को ‘निराला सृजन सम्मान’ व पूनम विश्वकर्मा को ‘दुष्यंत स्मृति सम्मान’

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मुंबई, आदित्य बिरला उद्योग समूह की कला एवं कलाकारों को प्रोत्साहित करने वाले संस्थान आईएनटी आदित्य बिरला सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स की ओर से आयोजित हिंदी मुशायरा कार्यक्रम में महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और कालजयी ग़ज़लो दुश्यंत कुमार के नाम पर शुरू किए गए ‘निराला सृजन सम्मान’ और ‘दुष्यंत स्मृति सम्मान’ क्रमशः इस साल मशहूर ग़ज़लगो राजेश रेड्डी और शायरा पूनम विश्वकर्मा को दिए गए।

बुधवार की शाम दक्षिण मुंबई के चौपाटी स्थित भारतीय विद्या भवन के सभागृह में आईएनटी आदित्य बिरला सेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स की प्रमुख श्रीमती राजश्री बिरला के दोनों हाथों पुरस्कार प्रदान किए गए। दिग्गज राजेश रेड्डी साहित्य में योगदान के लिए 51 हजार रुपए, प्रशस्ति पत्र और ट्रॉफी देकर सम्मानित किए गए, वहीं उभरती कलाकार के तौर पर शायरा पूनम विश्वकर्मा को 21 हजार रुपए, प्रशस्ति पत्र और ट्रॉफी देकर प्रदान की गई। इस अवसर पर पूनम ने अपने ग़ज़ल संग्रह ‘सुब्ह शब भर…’ की एक प्रति राजश्री बिरला को भेंट की।

इस हिंदी मुशायरे में सम्मानमूर्तियों के अलावा मशहूर गीतकार शकील आज़मी, देवमणि पांडेय, माधव बर्वे (नूर) और भूमिका जैन ने शिरकत की। इस मुशायरे में ग़ज़लें सुनने के लिए श्रोताओं में नवीन जोशी नवा, सिद्धार्थ शांडिल्य, शेखर अस्तित्व, उदयन ठक्कर, हेमेन शाह, हितेंद्र आनंदपरा और डॉ प्रकाश कोठारी, हुतोची वाड़िया, अवनि मुले, कथाकार अलका अग्रवाल, गायिका शैलेश श्रीवास्तव और कवयित्री अनिता भार्गव जैसे गणमान्य लोगों समेत बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी सभागृह में मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन देवमणि पांडेय ने किया।

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