नस्ल-ए-नौ मुम्बई – दी जेन-नेक्स्ट ऑफ शायरी’ का शानदान आयोजन

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नवीन नवा की कलम से

शनिवार 5 नवंबर 2022… यह दिन साक्षी रहेगा मुम्बई के युवाओं ने रचे काव्य के इतिहास का।

ऐसा बहुत कम होता है कि कोई कार्यक्रम उसकी पूर्व प्रसिद्धी पर खरा उतरे… और कार्यक्रम के स्तर को देख कर वह प्रसिद्धि भी कम लगे, ऐसा तो बहुत ही कम होता है… और जब प्रसिद्धी ऐसी धमाकेदार हो जैसी नस्ल-ए-नौ, मुम्बई की हुई थी तब तो ऐसा होना बहुत मुश्किल होता है…मगर मुम्बई के शायरी बॉइज़ ने यह मुश्किल अपने फ़न के कमाल से आसान कर दी। क्या स्तरीय शायरी, क्या तेवर, क्या अंदाज़…शब्दातीत!

मंच पर बैठे हुए देवमणि पांडेय, राखी कटियार, माधव बर्वे, संतोष एस सिंह, नवीन सी चतुर्वेदी, सिद्धार्थ शान्डिल्य और दर्शक-दीर्घा में बैठे हुए डॉ. देमयंती शर्मा, दीप्ति मिश्रा, अर्चना जोहरी, सतलज राहत, विशाल बाग, शिवदत्त अक्स, बनमाली चतुर्वेदी, पूनम विश्वकर्मा, रिचा सिन्हा जैसे प्रतिष्ठित रचनाकार भी युवा पीढी के कमाल को देख कर स्तंभित हो गए। इन सब वरिष्ठ रचनाकारों का नई पीढ़ी के प्रति प्रेम, इनकी दुआएँ… क्या कहूँ! इन का धन्यवाद करने के लिए मेरे शब्द छोटे पड़ जाएँगे। बस इनके सम्मान में मैं सर झुकाता हूँ।

तीन घंटे तक तालियों और वाह वाह की आवाज़ों से केशव गोरे सभागृह गूँजता रहा। मुम्बई की नयी पीढ़ी ने ज्येष्ठ रचनाकारों को यह विश्वास दिला दिया कि काव्य की जिस धरोहर को अपना जीवन दे कर इन ज्येष्ठ रचनाकारों ने सँवारा और बढ़ाया है वह एक विरासत के रूप में सक्षम हाथों में जा रही है।

काशिफ सैयद, देवरूप एम शर्मा, विक्रम शर्मा, विश्वदीप ज़ीस्त, अश्विनी मित्तल ऐश, शरजील अंसारी, विक्रम सिंह, मोइन अहमद देहलवी, अदनान शेख़, बिलाल तेघी, ज़ीशान साहीर, हसीब ज़ारिश और शिवम सोनी जैसे युवा रचनाकारों ने उस दिन प्रस्तुतियाँ नहीं दी… बल्कि धमाके किए। ऐसे धमाके जिन से युवा पीढ़ी के काव्य कौशल के बारे में अगर कुछ कुशंकाएं थीं या दूषित पूर्वग्रह थे तो उनके चीथड़े उड़ गए होंगे। यह स्थापित हो गया कि यह नयी पीढ़ी काव्य को और ऊँचाइयों पर ले जाएगी। और इस युवा पीढ़ी को प्रस्तुत किया उनके प्यारे युवा नाज़िम और शायर तनोज दधीच ने। मतलब सोने पर सुहागा। तनोज के बारे में क्या कहूँ। जाने और कितनी बार दिल जीतेंगे यह।
उस दिन कुछ और विशेष उल्लेखनीय घटनाएँ भी घटीं।

विशाल बाग युवा रचनाकारों को सुनने आए। विशाल एक बहुत ही प्रतिष्ठित और प्रसिद्ध रचनाकार हैं। ख़ास कर युवाओं के तो जैसे गले का हार हैं। उनकी उपस्थिति से वातावरण उत्साह से भर गया। उनकी ग़ज़लों की किताब “विराने तक जाना है” हाल ही में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। उस का उल्लेख हुआ। विशाल जी मंच पर आए और अपनी रचनाएँ सुना कर दर्शकों को अभिभूत कर दिया।

लेकिन यहीं पर कार्यक्रम का समापन नहीं होता। दर्शकों में सतलज राहत साहब भी तो थें। सतलज साहब किसी पहचान के मुहताज नहीं। उनकी वंशावली, उनकी शायरी सभी बहुत ऊँचे स्तर के हैं और उनकी प्रसिद्धी भी उसके अनुरूप ही है। मगर युवाओं को सुनने के लिए यह प्रतिष्ठित शायर बिल्कुल शांति से दर्शकों में आ कर बैठ गया। उनके आँखों की चमक और खिला हुआ चेहरा बयान कर रहें थे कि बच्चों ने मैदान मार लिया है। उन्हें मंच पर बुलाना बनता था। सतलज मंच पर आए और अपनी धमाकेदार रचनाओं से कार्यक्रम को अगले लेवल पर ले गए।

सतलज भाई और विशाल भाई युवा पीढ़ी के प्रतिनिधि शायर हैं। इन्होने उस दिन अपने व्यवहार से नयी पीढ़ी को कई बातें सिखाईं। और सच कहूँ तो हम सब को। पहली यह कि आप कितने भी बड़े रचनाकार हों इतने बड़े कभी नहीं होते कि औरों को सुनने ना जाएँ। दूसरी बात यह कि समय का सम्मान करना चाहिए। यह दोनों रचनाकार अगर चाहते तो लोग घंटो उन्हें सुनते रहते। मगर समय को देखते हुए इन दोनों ने अपनी बात बिल्कुल सही समय में ख़त्म की। तीसरी बात यह कि विनम्रता ही एक ऐसा ज़ेवर है जो आपको सुंदर बनाता है। इन दोनों के बड़प्पन को मेरा दिल से सलाम!

Inshaad انشاد के सह प्रायोजक राब्ता رابطہ की टीम और उनके प्रवर्तक शिवम झा ने अपनी ज़िम्मेदारी मनोयोग से निभाई। प्यारे शिवम को मुम्बई के काव्य परिवेश में इस धमाकेदार प्रथम प्रवेश के लिए हृदयतल से बधाई।
मैं इस ऐतिहासिक दिन का साक्षी हो कर धन्य हुआ।