महिला क्यों बताए कि वह विवाहित है या नहीं – डॉ. प्रतिमा गोंड

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सजना-सँवरना स्त्री का हक लेकिन सुंदर दिखने का दबाव डालना सांस्कृतिक हिंसा

संवाददाता
वाराणसी, महिलाओं के नाम से पहले ‘कुमारी’ या ‘श्रीमती’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल की अनिवार्यता को सांस्कृतिक हिंसा बताकर उस पर पाबंदी लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाली महिला अधिकार की मुखर पैरोकार और काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में समाजशास्त्र पढ़ाने वाली सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रतिमा गोंड (Dr Pratima) ने देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा अपनी याचिका खारिज करने के फैसले से पूर्ण असहमति जताई है। वह स्पष्ट रूप से माननी हैं कि किसी महिला के नाम के आगे कुमारी या श्रीमती जैसे शब्द लिखने के लिए उस पर किसी भी तरह का दबाव डालना सांस्कृतिक हिंसा की कैटेगरी में आता है।

सदियों पुरानी परंपराओं के नाम पर स्त्री पर तरह-तरह की बंदिश लगाने का पुरजोर विरोध करने वाली डॉ. प्रतिमा गोंड ने सवाल किया है कि स्त्रियाँ अपने नाम के आगे वैवाहिक स्थिति को सूचित करने वाले कुमारी या श्रीमती जैसे शब्द भला क्यों लगाएं? उन्होंने कहा कि किसी महिला के किसी फोरम पर ‘कुमारी’ या ‘श्रीमती’ लिखने का आग्रह सांस्कृतिक हिंसा की श्रेणी में आता है, भले ही ऐसा आग्रह किसी अदालत ने की है। इस बारे में सविस्तार अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि कोई महिला यह क्यों बताए कि वह विवाहित है या विवाहित नहीं है।

मौजूदा समाज को स्त्री विरोधी समाज करार देते हुए मशहूर नारीवादी विचारक डॉ. प्रतिमा गोंड ने कहा कि पितृसत्ता स्त्री की यौन-गतिविधि को नियंत्रित करने के क्रम में उसकी परवरिश इस तरह से करती है कि भय उसके अवचेतन का हिस्सा बना रहे। घर लौटने में जरा सी देर हो जाने पर स्त्री डर जाती है और यह डर उस पर थोपे गए सोशल कंडीशनिंग की वजह से होता है। लोकोपवाद को लेकर अतिशय सजगता भी सहज-स्वाभाविक नहीं वरन पितृसत्ता द्वारा सायास निर्मित की गई होती है। बुद्धिसंगत स्टैंड लेने वाली स्त्रियाँ भी बहुत हद तक अपने अवचेतन से परिचालित होती हैं, जिसका निर्माण पुरुष-वर्चस्व वाली वैचारिकी के द्वारा किया गया होता है। स्त्री की सोशल कंडीशनिंग परिवार और समाज दोनों के ही द्वारा की जाती है।

डॉ. प्रतिमा गोंड ने कहा कि हमारे समाज में मनुष्य-विरोधी, तर्क-विरोधी प्रतिगामी विचारों के अनुसार स्त्री को चलने के लिए बाध्य करने हेतु पितृसत्ता सांस्कृतियों उपायों का सहारा लेती है। भारतीय संविधान उच्चतर मानवीय मूल्यों की स्थापना करता है लेकिन समाज उसके अनुसार चलने की बजाय मध्ययुगीन प्रतिगामी मूल्यों से संचालित होता है। लोकतांत्रिक तरीके से समाज को स्त्री-गरिमा के प्रति सजग-सचेत बनाने की हामी प्रतिमा गोंड का मानना है कि ऐसा समाज बनाने के लिए संघर्ष करने की आवश्यकता है जहाँ पर स्त्री को अपने जेंडर के कारण अलग से सचेत होने की आवश्यकता नहीं रहे।

आत्म-धर्माभिमानिता यानि कि सेल्फ-राइटिअसनेस के प्रसंग की चर्चा करते हुए डॉ. प्रतिमा गोंड ने कहा कि इसका कारण और परिणाम दोनों ही भय है। मसलन, मुस्लिमों को लेकर व्यापक समाज में भय का वातावरण बनाया गया है, जिस कारण से लोग उनसे नफरत करते हैं। जहाँ भय होता है, वहाँ तर्क-विवेक पंगु हो जाता है। स्त्रियों के आत्म-धर्माभिमानी होने यानि कभी भी अपनी गलती नहीं मानने की प्रवृत्ति के संदर्भ में भी उन्होंने यही बात कही।

अपनी बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा, “स्त्री को चूंकि अपने बच्चों का लालन-पालन करना होता है और वे प्रायः अपने पति की संपत्ति और उसके रुपये-पैसों पर निर्भर होती हैं, इसलिए उनमें अपने पति को लेकर बड़ा पजेस्सिवनेस होता है। पति का ध्यान किसी दूसरी स्त्री की तरफ जाने से आर्थिक असुरक्षाबोध भी जुड़ा होता है, इसलिए भी स्त्रियाँ प्रायः घेरेबंदी करती हैं। इस घेरेबंदी के विरोध में तर्क देते हुए प्रतिमा गोंड कहती हैं कि इससे निजता का हनन होता है, जो कि बर्बरता की निशानी है। मनुष्य अपने दिमाग में चल रही हलचलों को कई बार अपने तक सीमित रखना चाहता है। अपने प्रेम, अपनी नफरत और अपनी फैंटेसी को चर्चा का विषय नहीं बनाना चाहता। लेकिन पजेस्सिवनेस की भावना व्यक्ति की निजता का हनन करती है और मनुष्य को लोकतांत्रिक नहीं रहने देती। पजेस्सिवनेस की भावना का मूल स्रोत तो दुर्लभता है, साथ रहने के अवसर अगर विरल होंगे-कम होंगे तो असुरक्षाबोध रहेगा।”

डॉ. प्रतिमा गोंड ने आगे कहा कि रोजी-रोटी, आवास-चिकित्सा और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत प्रश्नों के इर्दगिर्द प्रश्न खड़ा करने और तुलनात्मक रूप से कम महत्व के प्रश्नों पर सापेक्षिक रूप से अधिक बल देने के प्रच्छन्न सवाल पर उन्होंने कहा कि समाज-व्यवस्था में अपनी अवस्थिति के हिसाब से भी कई बार सक्रियता दिखाई जाती है। परंपरागत रूप से शोषित-उत्पीड़त समाज का एक हिस्सा ऐसा भी है, जिनकी भौतिक जरूरतें पूरी होने लगी हैं तो वे अब अपनी मानवीय गरिमा और उच्चतर नैतिक-सांस्कृतिक मूल्यों के लिए क्यों न लड़ें?

बीएचयू की सहायक प्रोफेसर ने कहा कि पितृसत्ता द्वारा की जाने वाली सोशल कंडीशनिंग से पुरुष भी उतना ही त्रस्त है। स्त्री-पुरुष के बीच पार्थक्य सामंती-पितृसत्तात्मक समाज की निशानी है। कोई पुरुष जैसे ही मित्रता बोध के साथ किसी स्त्री के करीब नजर आती है तुरंत उसके चरित्र को लेकर सवाल उठने लगते हैं। सभ्यता के विकास के दौरान जब संसाधनों के असमान बँटवारे की स्थिति उत्पन्न हुई और जिनके हिस्से में अधिक संसाधन आए उन्होंने उसे अपनी संतान को हंस्तातरित करना चाहा तो स्त्री को गुलाम बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई।

डॉ. प्रतिमा गोंड ने आगे कहा कि संतानोत्पत्ति के समय स्त्री कमजोर होती है, उसे सुरक्षा की अधिक आवश्यकता होता है, संभवतः इस और दूसरे अनेक कारकों का लाभ उठाकर पुरुष ने उसे परवश बना दिया। सिर्फ बर्बर-निरंकुश ताकत के दम पर किसी को अपने अधीन रखना मुश्किल होता है इसलिए सांस्कृतिक उपायों के जरिए अपनी वैचारिकी का वर्चस्व कायम किया जाता है। पुरुष सत्ता ठीक यही काम करती आई है और स्त्रियों को भय के जरिए नानाविध रूपों से अनुकूलित करने का काम आज भी जारी है।

बीएचयू जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में समाजशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में अपने अनुभवों से निकलीं कुछ बातें भी बातचीत के दौरान साझा करते हुए डॉ. प्रतिमा ने कहा कि पुनर्जागरण-प्रबोधनकालीन सीखों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि जब सारी गतिविधियों का केंद्र मनुष्य को माना जाने लगा और तर्क-विवेक के साथ ही मानववाद की प्रस्थापना हुई तो स्त्री की भी पुरुषों क समान ही मानवीय गरिमा होती है, होनी चाहिए, यह प्रश्न भी प्रस्तुत हुआ।

सौंदर्य दिखने की चर्चा करते हुए डॉ. प्रतिमा गोंड ने आगे कहा, “इंसान अच्छा दिखना चाहता है। अगर स्त्री की बात करें तो सजना-सँवरना स्त्री का हक है, लेकिन सुंदर दिखने के लिए स्त्री पर परिवार-समाज द्वारा डाला जाने वाला दबाव सांस्कृतिक हिंसा है। गौरतलब है कि प्लेखानोव बता-समझा गए हैं कि प्रकृति में रिझाने का काम नर करता है। जैसे मोर अपने पंख फैलाकर नाचता है और मोरनी को रिझाता है। केवल मानव समाज में ही रिझाने का काम स्त्रियों के जिम्मे छोड़ दिया गया है क्योंकि स्त्री पराधीन है और सांस्कृतिक हिंसा की शिकार और उससे त्रस्त है।”

डॉ. प्रतिमा गोंड ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई अपनी याचिका के खारिज होने की मुख्यधारा के मीडिया की नकारात्मक रिपोर्टिंग की आलोचना करते हुए  कहा, “मुख्यधारा के मीडिया में पुरुषवादी सोच हावी है। दरअसल, मीडिया में 90 फीसदी पत्रकार स्त्रियों को लेकर पूर्वाग्रहित हैं। वे यह सहन ही नहीं कर पाते कि आदिवासी समाज से ताल्लुक रखने वाली कोई स्वतंत्र-चेता स्त्री कायदे की बात उठाए। या थोपी गई परंपराओं का विरोध करे। इसीलिए ये लोग हमारी याचिका को सिद्धि पाने की चाहत रखने वाला करार दे रहे हैं। जबकि मेरी याचिका बहुत जेनुइन है। हम लोग सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पेटिशन दायर करने का भी विचार बना रहे हैं।

सामाजिक विज्ञान की प्रोफेसर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए कहा है कि गैरज़रूरी याचिका दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के इस हिस्से को मुख्य धारा के अखबारों ने प्रमुखता से जगह दी। इस संदर्भ में पूर्वाग्रहित लोगों को उद्धृत करना जरूरी हो जाता है कि पूर्वाग्रहत जहर समाज की नस-नस में भरा हुआ है, किसी को भी कॉर्नर करके देखो, उसके अंदर पूर्वाग्रहत छलकता है।

डॉ. प्रतिमा गोंड ने स्पष्ट रूप से कहा कि इसी तरह की याचिका अगर स्थापित महिला द्वारा दायर की गई होती तो यही मीडिया उसे हाथों-हाथ लेता और ऐसे प्रचारित करता कि देखो कितना तो आमूलगामी कदम उठाया गया है। जबकि यहाँ तो सांस्कृतिक हिंसा के पूरे संदर्भ को स्पष्ट करते हुए लोकतांत्रिक तरीके से चेतना के स्तरोन्नयन का काम किया जा रहा है। लेकिन, हैसियत पूजने वाली और माल अंधभक्ति से ग्रस्त हमारी मीडिया मुद्दे को सही परिप्रेक्ष्य में उठाने से बचते हुए स्त्रीद्वेषी रुख अपनाए हुए है।

अपनी आगे की सक्रियता के बारे में प्रतिमा गोंड का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश और लैंगिक समानता के पैरोकारों के साथ बातचीत के आलोक में हम संसद में बैठे अपने सक्षम जन प्रतिनिधियों, संस्थाओं, लोगों को पत्र लिखकर, उनसे संपर्क इत्यादि करके इस विषय पर चर्चा करने और पहलकदमी करने का आह्वान करेंगे।

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