मुस्लिम महिलाओं की बेबसी को बयां करता उपन्यास ‘सलाम बॉम्बे व्हाया वर्सोवा डोंगरी’

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अपने ढाई हज़ार के सफ़र के दौरान पहले बॉम्बे फिर बंबई और बंबई से मुंबई बनी मायानगरी अपनी ख़ूबियों और विसंगतियों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर रही है, लेकिन युवा पत्रकार और कवि-लेखक सारंग उपाध्याय ने इस शहर की विसंगतियों को भी मोहब्बत के चश्मे से देखा है। लेखक ने अपने पहले उपन्यास ‘सलाम बॉम्बे व्हाया वर्सोवा डोंगरी’ में मुंबई के आदि बाशिदों कोलियों की कहानी गढ़ी है और कोली समाज के साथ-साथ देश की आर्थिक राजधानी में हुए बदलावों और विषमताओं को प्रेम-कहानी के माध्यम से ख़ूबसूरती से काग़ज़ के कैनवास पर उकेरा है। लफ़्ज़ों एवं अल्फ़ाज़ों के चयन और बेहतरीन कला-शिल्प के चलते उनकी लेखन-शैली अपने आप में अद्भुत लगती है।

सारंग उपाध्याय (Sarang Upadhyay) का उपन्यास ‘सलाम बॉम्बे व्हाया वर्सोवा डोंगरी (Salaam Bombay Via Versova Dongri)’ मूलरूप से प्रेम कथा पर आधारित उपन्यास है। यह उपन्यास मालेगाँव की अरफ़ाना और कोली बस्ती वर्सोवा मुंबई के आलम मोहम्मद ख़ाँ उर्फ़ जालना और उन दोनों की बेटी सायरा और राघव कुमार यादव उर्फ़ रघु की प्रेम कहानी है। कहने का तात्पर्य उपन्यास दो पीढ़ियों की दास्तान-ए-मोहब्बत अपने आप में समेटे हुए है। यह उपन्यास इस्लाम की विसंगतियों के साथ-साथ मुस्लिम महिलाओं की शौहर की दूसरी बीवी यानी सौतन को झेलने की बेबसी को भी बख़ूबी बयां करता है।

कथित तौर पर चार-चार शादियों का मज़हबी हक़ रखने वाला मुस्लिम पुरुष कितना निरंकुश है। यह उपन्यास के चरित्र जालना के ग़ुस्से में बोली गई बात से स्पष्ट हो जाता है। जो अपनी बीवी अरफ़ाना को बुरी तरह पीटने के बाद कहता है, “हरामज़ादी, रंडी, कुतिया! शरम कर बेहया, दूसरा निकाह ही किया है करमजली ज़नाना, कोई गुनाह नहीं किया है मैंने। अरे मुसलमान मर्द चार बीवियाँ रख सकता है, इसमें कुछ हर्ज़ नहीं, कोई कसूर नहीं..! दूसरी बीवी रखना मेरा हक़ है। औरतों और मर्दों के फ़ासले को समझ, हरामज़ादी..!”

अपने शौहर से बेइंतहां मोहब्बत करने वाली अरफ़ाना उसकी बेवफ़ाई और बेरुखी से इस कदर टूट जाती है कि उसका अपने मज़हब की अमानवीय परंपराओं से पूरी तरह मोहभंग हो जाता है। वह कहती है, “अल्लाह क़सम सायरा, बिरादरी और मज़हब ने औरतों के हक़ों को कितना मारा है, इसे तो ख़ुदा ही जानता है।” थोड़ी देर बाद ही अपनी बेटी को हिदायत देते हुए अरफ़ाना कहती है, “तू अपनी मर्ज़ी से, अपनी पसंद के मर्द से निकाह करना। ऐसे मर्द के साए से भी दूर रहना जो धोखेबाज़ हो और बीवी से बेइमानी करता हो।”

अरफ़ाना शरिया क़ानून के तहत मुस्लिम पुरुषों को एक से अधिक विवाह करने की व्यवस्था पर अफ़सोस जताते हुए कहती है, “किसी हिंदू मर्द से निकाह पढ़ती तो दुनिया ख़ुशहाल होती मेरी। कम-से-कम यहाँ-वहाँ मुँह तो नहीं मारते और मारते भी हैं तो बीवी और हक़ के नाम पर घर में तो नहीं उठा लाते। …चार निकाह की दुहाई दे रहा है तेरा बाप… ग़लती कर गई मैं तो। यदि भाग गई होती उस हिंदू लड़के के साथ तो यह मुँह न देखना होता। वह प्यार से ही रखता और रंडी के पास मुँह भी मारता तो उसकी औक़ात में रखकर घर तो न उठा लाता।”

इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने पति के दूसरे निकाह के बाद मुस्लिम महिला की बग़ावत और अपने हक़ के प्रति सजगता भी दिखाया गया है। जब पिटती हुई अरफ़ाना अचानक उठती है और लगातार हाथ चला रहे जालना पर उसने पलट वार किया और उसकी टोपी उछाल दी, बनियान फाड़ दी, उसे धक्का देकर झिंझोड़ दिया और पास ही पड़ा नाव का चप्पू उठाकर जालना पर तान दिया। इसके बाद कहती है, “अब हाथ न उठाना जालना, वरना तेरा सिर खोल दूँगी मैं। और देखती हूँ तू कैसे लेकर आता है उस रंडी, हरामज़ादी को यहाँ।” उसके बाद शौहर जालना को चुनौती देते हुए कहती है, “यदि हिम्मत है तो यहाँ से निकालकर दिखा मुझे।” ऐसा तेवर मुस्लिम महिलाएँ आम तौर पर नहीं दिखा पातीं क्योंकि उन्हें अपने समाज और अपने ही लोगों से सहयोग नहीं मिलता।

सारंग ने अरफ़ाना और जालना के संवादों के बहाने इस्लाम की बहुविवाह जैसी कुरीतियों का बेबाकी से ज़िक्र किया है। धार्मिक कुरीतियों पर कलम चलाने में भारतीय बुद्धिजीवी और फिल्मकार डबल स्टैंडर्ड अपनाते रहे हैं। हिंदू धर्म की विसंगतियों पर तो वे करारा प्रहार करते हैं, लेकिन जब बात जब इस्लाम की कुरीतियों पर कलम चलाने या रूपहले परदे पर दिखाने की बात आती है तो बड़ी साफ़गोई से निकल जाते हैं। यहाँ लेखक ने न केवल इस्लाम में बेटियों की अहमियत को बहुत बारीक़ी को समझाया और उसे भी लिखने की हिम्मत भी जुटाई। और, साथ ही, समाज के उस चेहरे को भी दिखाने की कोशिश की है, जहाँ पितृसत्ता आज भी हावी है। यही बात सारंग को असाधारण लेखकों की फ़ेहरिस्त में ला खड़ा करती है।

सारंग उपाध्याय ने अरफ़ाना और जालना के ज़रिए 1986 के दशक के बहुचर्चित शाहबानो की अदालती लड़ाई की ज़िक्र किया है। जब आउटडेटेड ट्रिपल तलाक़ की शिकार शाहबानो को सुप्रीम कोर्ट से इंसाफ़ मिलता है, लेकिन इस्लामिक कट्टरपंथों के समक्ष घुटने टेकते हुए राजीव गांधी की प्रचंड बहुमत वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को बदलते हुए संविधान में संशोधन करके एक लाचार मुस्लिम महिला के हाथ से इंसाफ़ छीन लिया था। इसीलिए दक्षिणपंथी लोग तर्क देते हैं कि 2018 में नरेद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार ने ट्रिपल तलाक़ विरोधी क़ानून को बनाकर कांग्रेस की उसी भूल का सुधार किया।

लेखक ने शाहबानो के अलावा इस उपन्यास में अयोध्या के विवादित ढाँचे को गिराए जाने के बाद मुंबई में दो चरण में हुए दंगे और उसके बाद 1993 और 2006 के विस्फोट जैसी ऐतिहासिक घटनाओं को भी समेटा है। उपन्यास को पढ़ते हुए ऐसा बिल्कुल नहीं लगता कि लेखक दरअसल, उस कालखंड की कहानी लिख रहा है, जिस कालखंड में उसका जन्म हुआ था। उपन्यास पढ़ते हुए ऐसा लगता है जैसे लेखक ने उस दौर की कहानी को लिख रहा है जिसमें वह खुद जिया है। उपन्यास के चारों प्रमुख चरित्रों कि अपनी दुनिया है। यहाँ लेखक ने साहित्य के समाज का दर्पण होने के कथन को साबित किया है।

उपन्यास को पढ़ते समय वर्सोवा, डोंगरी, अंधेरी, जोगेश्वरी, चर्चगेट, भाऊचा धक्का और कोलाबा के मच्छी बाज़ारों का इस तरह ज़िक्र किया गया है जैसे लेखक ने ख़ुद उनके बीच रहने और कोलियों के साथ जीवन जाने के बाद ही इस कथानक को उपन्यास का रूप दिया है। इससे यह उपन्यास यथार्थ की कसौटी पर खरा उतरता है। उपन्यास के चरित्रों की दुनिया देश में हो रही घटनाओं से कैसे प्रभावित होती हैं, या कैसे चरित्रों की ज़िंदगी में यू-टर्न आता हैं, उसे सरल भाषा में काग़ज़ पर उतारना इतना आसान भी नहीं था।

लेखक ने इस उपन्यास को दादर के प्लेटफॉर्म पर रघु और सायरा के चुहलबाज़ी से शुरू किया और वही प्लेटफॉर्म पर ही दोनों के प्रेम का समापन होता है। वैसे इन दोनों की प्रेम कहानी काफी सस्पेंस से भरी हुई है। हर क्षण जिस तरह से कहानी बदली है, वह तेज़ी से उपन्यास को पढ़ने के लिए विवश करती है। पाठक सोचता रहता है कि कहानी का दुखांत होगा या सुखांत। लेकिन यहाँ फिल्मी स्टाइल में लेखक ने उपन्यास को सुखांत देकर पाठकों को पठनोपरांत होने वाले अवसाद से बचा लेता है।

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