लोरी क्वीन रही हैं लता मंगेशकर

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भारत की सुर-कोकिला को श्रद्धांजलि!

हरिगोविंद विश्वकर्मा
स्वर-साम्रागी और सुर-कोकिला कही जाने वाली भारत रत्न लता मंगेशकर लोरी क्वीन रही हैं। हिंदी सिनेमा में बोलती फिल्मों के क़रीब नौ दशक में अनगिनत लोरियाँ गई गई, लेकिन सबसे ज़्यादा अधिक लोरियां उन्हीं के स्वर में रिकॉर्ड की गई हैं। लता मंगेशकर का रविवार को 92 साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उन्हें इसी साल जनवरी महीने की शुरुआत में कोविड संक्रमित होने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

हिंदी फिल्मों में लोरी की परंपरा शुरू करने का श्रेय फिल्मों के स्वर सम्राट कुंदनलाल सहगल को दिया जाता है। 1940 में बनी ज़िंदगी फिल्म में उन्होंने पहली लोरी गाई थी। वह लोरी थी, सो जा राजकुमारी सो जा, सो जा मन बलिहारी सो जा… गीतकार केदार शर्मा के बोल को संगीतकार पंकज मलिक गजब की धुन में पिरोया है और सहगल की आवाज़ पाकर वह लोरी अगर हो गई। उस लोरी को सुनकर बच्चे ही नहीं, बल्कि बड़े-बुज़ुर्ग भी अपने सारे ग़म और सारे तनाव भूल जाते हैं और निद्रा की आग़ोश में चले जाते हैं।

हिंदी सिनेमा की तीसरी लोरी लता मंगेशकर ने गया। 1951 की फिल्म अलबेला में लता मंगेशकर ने रामचंद्र नरहर चितलकर उर्फ सी रामचंद्र के साथ अब तक की सर्वश्रेषठ लोरी धीरे से आ जा री अंखियन में निंदिया आ जा री आ जा… को स्वर दिया है। इसके बाद तो लोरी की परंपरा दिन दूनी रात चौगुनी फलने-फूलने लगी। 1950, 1960 और 1970 के तीन दशक को लोरी का स्वर्णकाल कहें तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।

1952 आई फिल्म पूनम की लोरी आई आई रात सुहानी, सुन ले ख़ुशी की कहानी, नींद की परियां आई सुलाने… को आवाज़ लता ने दी है और हसरत जयपुरी के बोल को शंकर जयकिशन ने संगीत में ढाला है। 1953 में बनी दो बीघा ज़मीन में शैलेंद्र के बोल और सलिल चौधरी की धुन पर आ जा री निंदिया तू आ जा… को लता के स्वर ने कर्णप्रिय बना दिया है। कवि प्रदीप ने एक लोरी 1954 में बाप बेटी के लिए लिखी। रोशन की धुन पर लता की गाई यह लोरी ले चल निंदिया ले चल हमें… जन जन में लोकप्रिय हुई।

उसी साल प्रदर्शित होने वाली शबाब फिल्म में शकील बदायूंनी के बोल चंदन का पलना रेशम की डोरी, झूला झुलाऊं निंदिया को तोरी… को नौशाद के संगीत और लता मंगेशकर और हेमंत कुमार के स्वर ने अविस्मरणीय बना दिया। दो आंखें बारह हाथ फिल्म में भरत व्यास की लिखी लोरी मैं गाऊं तू चुप हो जा, मैं जागू रे तू सो जा… को वसंत देसाई की धुन पर लता मंगेशकर की सुरीली आवाज मिली है। कठपुतली फिल्म में हसरत जयपुरी की लिखी सो जो सो जो मेरे राजदुलारे सो जा… को शंकर जयकिशन की धुन पर स्वर दिया है लता ने।

उसी साल प्रदर्शित फिल्म नया संसार में राजेंद्र किशन की लिखी लोरी चंदा लोरी सुनाए हवा झुलना झुलाए… को चित्रगुप्त की धुन पर लता मंगेशकर के स्वर में रिकॉर्ड किया गया तो नई राहें फिल्म में शैलेंद्र की लिखी लोरी कल के चांद आज के पसने, तुमको प्यार बहुत सा प्यार… को संगीतकार रवि की धुन पर हेमंत कुमार और लता मंगेशकर ने गाया। वर्ष की चौथी लोरी थी संतान फिल्म में हसरत की लिखी कहता है प्यार मेरा ओ मेरे लाडले तू है मेरा सहारा… थी। लता मंगेशकर की आवाज़ में इसे दत्ताराम वाडकर के संगीत निर्देशन में रिकॉर्ड किया गया। उसी साल बरखा फिल्म में राजेंद्र किशन की लोरी पूछूंगी एक दिन पिछले पहर में सोए हुए चांद तारों से… को चित्रगुप्त की धुन पर लता मंगेशकर ने गाया है।

फिल्म चिराग कहां रोशनी कहां में गीतकार-संगीतकार रवि ने लता से गवाकर लोरी टिमटिम करते तारे ये कहते हैं सारे… को अविस्मरणीय बना दिया है। इस लोरी को सुनते-सुनते हम इतने खो जाते हैं कि अवचेतन में चले जाते हैं। 1961 में रिलीज़ फिल्म प्यार की प्यास में भरत व्यास ने चंदा ढले पंखा झले मैया तुम्हारी, फूलों पे सो जा मेरी राजकुमारी… के रूप में असाधारण लोरी लिखी है। लता मंगेशकर की आवाज़ में वसंत देसाई ने इसका यादगार संगीत बनाकर इसे कर्णप्रिय बना दिया है। उसी साल फिल्म चार दीवारी में शैलेंद्र की लिखी नींद परी लोरी गाए, मां झुलाए पालना, सो जा मेरे ललना मीठे-मीठे सपनों में… सलिल चौधरी की धुन और लता मंगेशकर की आवाज़ पाकर यादगार बन गई है।

1963 में बहूरानी में सी रामचंद्र की धुन पर रूपहले परदे पर नायिका माला सिन्हा लता मंगेशकर के स्वर में साहिर लुधियानवी की लिखी लोरी मैं जागूं सारी रैन सजन तुम सो जाओ… गाकर अपने प्रियतम को सुलाती है। उस वर्ष की दूसरी लोरी दूर के ओ चंदा आ मेरी बांहो में आ… को एक दिल सौ अफ़साने फिल्म के लिए शैलेंद्र ने लिखी, जिसे शंकर जयकिशन की धुन पर लता मंगेशकर ने गाया है। फिल्म मुझे जीने दो में साहिर लुधियानवी की लिखी तेरे बचपन को जवानी की दुआ देती हूं… इस साल की चौथी लोरी थी, जिसे जयदेव के संगीत निर्देशन में लता मंगेशकर ने अपनी जादुई आवाज़ दी है।

अगले साल यानी 1964 में भारतीय सिनेमा की सबसे अधिक कर्णप्रिय लोरियों में से एक आई। शंकर जयकिशन के संगीत निर्देशन तैयार फिल्म बेटी बेटे में लता मंगेशकर और मोहम्मद रफ़ी की गाई और शैलेंद्र की लिखी लोरी आज कल में ढल गया, दिन हुआ तमाम, तू भी सो जा सो गई, रंग भरी ये शाम… आज भी जब रेडियो या कहीं और बजती है तो लोग सब कुछ भूलकर उसी में खो से जाते हैं।

1965 में प्रदर्शित फिल्म खानदान की लता के स्वर में रिकॉर्ड लोरी तुम्ही मेरे मंदिर तुम्ही मेरी पूजा, तुम्हीं देवता हो तुम्हीं देवता हो… को कौन भूल सकता है। यह गाना सुनते समय आज भी आंखें बंद हो जाती हैं। उसी साल सिनेमाघरों में आई रिश्ते नाते फिल्म के लिए हसरत जयपुरी की लिखी लोरी आ री निंदिया की परी मेरी गुड़िया को सुला, चांद के पलने में मेरी मैना को झुला… को लता मंगेशकर से गवाकर संतीकार मदन मोहन ने इसे अमरता प्रदान कर दी।

उसी वर्ष आई फिल्म आख़िरी ख़त में क़ैफ़ी आज़मी की लिखी और लता मंगेशकर की गाई कर्णप्रिय लोरी मेरे चंदा मेरे नन्हें तुझे अपने सीने से कैसे लगाऊं… जिसे खैय्याम ने अपनी धुन से संवारा, काफी पसंद की गई। इस लोरी को लोग आज भी मन से सुनते हैं। 1967 में मेरा मुन्ना फिल्म के लिए क़मर जलालाबादी की लिखी लोरी सो जा लाडले, सो जा लाडले सो जा रे सो जा… को कल्याणजी आनंदजी की धुन पर लता मंगेशकर ने गाया है। उसी साल बनी फिल्म भक्त प्रह्लाद की पीबी श्रीनिवास और एस जानकी की गई लोरी नज़र ना लगे लगे नज़र ना… बड़ी कर्णप्रिय है। प्यारोलाल संतोषी के बोल को एस राजेशवरराव ने धुन में ढाला है।

1971 में मेरे अपने फिल्म में गुलज़ार के बोल रोज़ अकेली आए, रोज़ अकेली जाए चांद कटोरा लिए भिखारिन… को सलिल चौधरी ने संगीत से संवारा और लता ने इसे अपना स्वर देकर इसे अच्छी लोरी की श्रेणी में जगह दिलाई। उसी साल लाखों में एक फिल्म में आनंद बक्शी की लिखी लोरी चंदा ओ चंदा चंदा ओ चंदा कितने चुराई तेरी निंदिया… को राहुलदेव बर्मन की धुन पर लता मंगेशकर और किशोर ने अपने स्वर दिए हैं।

उसी साल मन मंदिर फिल्म में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की धुन पर लता और मुकेश ने ऐ मेरी आंखों के पहले रंगीन सपने मासूम सपने… जैसी शानदार लोरी को अपना स्वर दिया। 1972 में बनी अनुराग फिल्म एक अच्छी लोरी, मेरा राज बेटा बूझे एक पहली सोए जग जागे रात अकेली थी… है। सचिनदेव बर्मन के संगीत निर्देशन में लता ने इस लोरी को गाया है। 1974 में कुंवारा बाप फिल्म में मज़रूह सुल्तानपुरी की लिखी और राजेश रोशन के संगीत में तैयार चर्चित लोरी आ री आ जा निंदिया तू ले चल कहीं… को लता-किशोर और महबूब ने अपने स्वर दिए हैं। उस साल बेनाम फिल्म में भी एक लोरी एक दिन हंसाना एक दिन रुलाना… को मज़रूह की लिखी है। इसे राहुलदेव बर्मन की धुन पर लता मंगेशकर ने गाया है।

1975 में लता ने खैय्याम के संगीत निर्देशन में मेरे घर आई नन्ही परी… गाया। फिल्म कभी कभी की यह मधुर लोरी भी काफी सराही गई। अगले साल यानी 1977 में तीन लोरियां सुनने को मिलीं। मुक्ति फिल्म में राहुलदेव बर्मन की धुन पर आनंद बख्शी के बोल लल्ला लल्ला लोरी दूध की कटोरी… को लता ने एक बार फिर अपना स्वर देकर यादगार बना दिया। इस लोरी को मुकेश के स्वर में भी रिकॉर्ड किया गया है।

1978 प्रदर्शित त्रिशूल फिल्म में साहिर सुधियानवी की लिखा लोरी तू मेरे साथ रहेगा मुन्ने ताकि तू जान सके… को खैय्याम के संगीत निर्देशन में लता मंगेशकर ने अपनी आवाज़ दी है। अगले वर्ष तीन लोरियां सुनने को मिलीं। पहली मान अपमान फिल्म में भरत व्यास की लिखी और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की धुन पर लता के सुर में रिकॉर्ड आ जा री आ आ निंदिया नन्हीं सी आंखों में आ चुपके से आ, चोरी से आ… थी। 1980 रिलीज़ अपने पराए फिल्म में योगेश ने एक लोरी हलके-हलके आई चलके, बोली निंदिया रानी चुपके-चुपके क्या सोचे रे… लिखी, जिसे बप्पी लहड़ी की धुन पर लता ने गाया है। 1970 के दशक के गुज़रते गुज़रते लोरी का क्रेज़ सिनेमा में कम होने लगा। इसीलिए 1980 के दशक में लोरी की परंपरा प्रतीक मात्र बनने लगी।

सागर सरहदी ने 1985 में लोरी नाम से फिल्म ही बना डाली। लता-खैय्याम, बशीर नवाज़ -आ जा निंदिया आ जा, नैनन बीच समा जा, अमृत रस बरसा जा, पवन झुलाए पलना… खैय्याम की धुन पर लता की गाई लोरी आ जा निंदिया आ जा नैनन के बीच समा जा… ने लोकप्रियता के नए आयाम स्थापित किए थे। उसी साल लता की आवाज़ और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की धुन पर अनजान की लिखी संजोग फिल्म के गाने -जू जू जू, जू जू जू, यशोदा का नंनदलाला, बृज का उजाला है… को भी जानकार लोरी की फेहरिस्त में रखते हैं।

संगीत प्रेमियों को अगली लोरी के लिए छह साल इंतज़ार करना पड़ा। यश चोपड़ा की 1991 में बनी फिल्म लम्हे में लोरी गुडिया रानी निंदिया रानी… है। शिव हरि के संगीत निर्देशन में लता मंगेशकर ने इसे गाया है। इसके बाद से फिल्मों में लोरी का प्रचलन थम सा गया। हालांकि लोरी आमतौर पर बच्चों को सुलाने के लिए मान ली गई, लेकिन मुंबई की फिल्मों में कई बार नायिका नायक को अथवा नायक नायिका को लोरी गाकर सुलाते रहे हैं। इसके बाद लगा कि लोरियों की परंपरा हिंदी सिनेमा से ख़त्म हो गई।

हरिगोविंद विश्वकर्मा

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