नो मैरिज प्लीज! मुझे किसी और पुरुष से प्यार हो जाए तो..

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सुषमा मौर्या

पूजा शाह। ख़ूबसूरत, स्मार्ट और सेल्फ़-डिपेंडेंट। बहुत कामयाब महिला। एक निजी बैंक में बहुत बड़ी अफ़सर। उसका अपना घर। अपनी कार। घर में ऐशो-आराम की हर वस्तु मयस्सर है। यहां तक कि बॉयफ्रेंड भी है। उसके साथ चार साल से वह लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in relationship) में रह रही है। पूजा अपने पार्टनर विनय गुप्ता के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में बहुत ख़ुश है। विनय भी एक मल्टीनेशनल कंपनी में ऊंचे ओहदे पर है। चार साल लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के बाद अब वह इस रिश्ते को नाम देना चाहता है, इसलिए कई बार पूजा से शादी के लिए इकरार कर चुका है।

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पूजा के माता पिता भी कई बार उससे शादी के लिए कह चुके हैं। वे चाहते हैं कि उनकी बेटी अब तो सेटल्ड हो जाए। लेकिन पूजा किसी भी तरह के कमिटमेंट के लिए तैयार नहीं है। कमिटमेंट के लिए उसके इनकार के पीछे भी बड़ी वजह है। पूजा बड़ी शिद्दत से मानती रही है कि इंसान की ज़िंदगी में परमानेंट कुछ भी नहीं होता है। यहां तक कि न तो हमारी मोहब्बत परमानेंट होती है और न ही हमारी पसंद और न शादी। आज हमें जो पसंद आ रहा है, मुमकिन है कल पसंद न आए। ऐसे में कमिटमेंट इंसान के लिए बोझ बन सकता है, क्योंकि इससे ज़िंदगी बंध जाएगी। तब इसान ज़िंदगी को जीता नहीं बल्कि उसे मजबूरी में ढोता है।

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अब ऐसे में वह अपने बॉयफ्रेंड विनय के साथ परिणय सूत्र में बंधे तो कैसे बंधे। यही वजह है कि वह उसे हर बार मना कर देती है। वस्तुतः पूजा अपने अतीत में बहुत कुछ ऐसा छोड़ आई है कि उसके बाद वह किसी भी तरह के बंधन में बंधना नहीं चाहती है। वह तलाकशुदा कामकाजी महिला है। उसे विनय से पहले अमित से प्यार हो गया था। उसकी दीवानी हो गई थी वह। टूटकर चाहने लगी थी उसे। अमित भी उसके बिना अधूरा सा, व्याकुल सा रहता था। इसीलिए उनका प्यार परवान चढ़ गया। उनके रिश्ते को दोनों के परिवार की सहमति मिल गई और दोनों परिणय सूत्र में बंध गए।

पूजा को जिस तरह के हमसफ़र की दरकार थी, वे सारे गुण अमित में मौजूद थे। इसीलिए दोनों ज़िंदगी को भरपूर जी रहे थे। उन दोनों की लाइफ़ फूलों की सेज बन गई थी। अमित उसका बहुत ख्याल रखता। पूजा भी उसकी दीवानी थी, उसके साथ बहुत ख़ुश थी। वीकडे में काम करते और वीकेन्ड में मुंबई के बाहर निकल जाया करते थे। वे एक दूसरे के साथ थे और दो साल पलक झपकते गुज़र गए। उनके जीवन में ख़ुशियां ही ख़ुशियां थीं। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। उन्हें ज़िंदगी से कुछ और नहीं चाहिए थी। वे दोनों अपना बच्चा प्लान करने लगे थे।

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इस बीच वह हो गया जो नहीं होना चाहिए था। एक दोस्त की बर्थडे थी। उसमें पूजा और विनय गुप्ता दोनों आमंत्रित थे। विनय इतना हैंडसम दिख रहा था कि लगता था कि उसके व्यक्तित्व में जादू है। उसकी सम्मोहन भरी मुस्कान। उसका बात करने का नफीस अंदाज़। पार्टी की हर लड़की उस पर फ्लैट हो रही थी। पूजा लाख कोशिश कर रही थी कि उसकी ओर न देखे। उसने कई बार अपनी नज़रों को समझाया भी, पर उसकी नज़रें थीं कि क़ाबू से बाहर हो गईं। बस क्या था वह उससे जाकर मिली ही नहीं, बल्कि शेकहैंड भी कर लिया। शेकहैंड के बाद कब उसने विनय को हग कर लिया पता ही न चला। विनय के मधुर स्पर्श ने उसके पूरे व्यक्तित्व को झकझोर कर रख दिया।

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विनय के स्पर्श के बाद उसने महसूस किया कि जीवन के सारे कमिटमेंट, सारे वादे, सारे रिश्ते रेत के महल की तरह उसकी नज़रों के सामने ढह रहे हैं। वह चाह रही है कि विनय से दूर रहे। लेकिन उससे नहीं हो पा रहा है। न चाहते हुए भी उसने विनय से दोस्ती कर ली। उनका रिश्ता दोस्ती तक ही नहीं रुका, आगे बढ़ता रहा। धीरे-धीरे वह विनय को पसंद करने लगी। वह भी विनय को अच्छी लगने लगी थी। वह जानती थी कि अमित को चीट कर रही है, लेकिन उसका वश उस पर ही नहीं थी। अब वह अमित से दूर और विनय की ओर जा रही थी। एक दिन उसने शिद्दत से महसूस किया कि उसका पति से लगाव ख़त्म हो गया है। उसे अमित की बजाय विनय अच्छा लगने लगा है। वह उसके साथ बाहर जाने लगी। एक दिन उसके फ़्लैट में भी चली गई। विनय से इतनी हिप्नोटाइज़्ड थी वह कि एकांत में मिलने पर ख़ुद को रोक नहीं सकी, और वह सब हो गया जिसे इंसान तो नहीं, हां दुनिया ज़रूर सही नहीं मानती है।

दो साल तक पूजा इस दोहरे रिश्ते से जुड़ी रही। लेकिन जब भी उसका सामना अपने पति से होता उसका मन अपराधबोध से भर जाता। फिर अमित के साथ बेड शेयर करना उसे अच्छा नहीं लगता था। उसे लगा कि वह लुका-छिपी का खेल नहीं खेल पाएगी। बस एक दिन उसने हिम्मत करके अमित को सच्चाई बता दी। यह भी कह दिया कि वह शादी के बंधन से मुक्त होना चाहती है क्योंकि अब वह विनय से प्यार करने लगी है। अमित पति ही नहीं उसका अच्छा और समझदार दोस्त भी था। उसने उसे गो अहेड कह दिया। आपसी सहमति से दोनों का तलाक हो गया। तब से पूजा विनय के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में है। लेकिन जब बात शादी की आती है तो उसे लगता है कि कहीं उसकी दूसरी शादी का अंत भी पहले की तरह न हो। वह अपने ऊपर तलाकशुदा होने का ठप्पा दोबारा नहीं लगवाना चाहती है।

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माना जाता है कि मनुष्य एक समाजिक प्राणी है। मानव समाज में रहने के लिए कुछ क़ायदे-कानून बनाए गए हैं। हर समाज अपने नागरिकों पर सामाजिक नियंत्रण रखता है। ख़ासकर स्त्री-पुरुष के संबंधों को लेकर कुछ प्रावधान किए गए हैं। विवाह भी उसी प्रावधान का एक स्वरूप है। विवाह स्त्री या पुरुष के जीवन पर अंकुश लगाए रखने और उसे ज़िम्मेदार बनाने की सामाजिक परंपरा है। बदलते वक्त के साथ विवाह का स्वरूप भी बदलता है। लिव इन रिलेशनशिप बदलते स्वरूप के गर्भ से पैदा हुआ है। कहने को लिव-इन रिलेशनशिप पश्चिम सभ्यता का हिस्सा है, लेकिन भारत के आजकल मेट्रो सिटीज़ में इसका चलन बड़ी तेज़ी से बढ़ रहा है।

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काम का बोझ, भागती दौड़ती ज़िंदगी सै पैदा हुए तनाव के चलते हर इंसान सुकून की तलाश में भटक रहा है। ऐसे में किसी से भावनात्मक लगाव होने पर उससे शादी करने से बेहतर बिना शादी के उसके साथ रहना ज़्यादा व्यवहारिक लगने लगा है। इसीलिए युवा आजकल शादी के बंधन में बंधने की बजाय लिव-इन रिलेशन को ज़्यादा तवज्जो दे रहे हैं। विवाह में जहां एक ओर कई तरह के सामाजिक, जातीय एवं धार्मिक बंधन होते हैं, वहीं लिव-इन रिलेशन तमाम बंधनों से परे है। लिव इन रिलेशन की शुरुआत ऐसे लोगों ने की थी, जो शादी की जकड़न से छुटकारा पाना चाहते थे। इस तरह दो अपोज़िट सेक्स के युवा एक दूसरे से पहले भावनात्मक और फिर शारीरिक रूप से जुड़ते हैं और बिना शर्त या कंडीशन के एक साथ एक छत के नीचे रहने लगते हैं। इसकी ख़ासियत यह होती है कि दोनों जब चाहें आपसी सहमति से अलग हो सकते हैं।

आजकल भारतीय समाज भले ही स्त्री-विरोधी लगता है, लेकिन एक समय था यह पुरुष प्रधान कहा जाता था। पुरुष प्रधान समाज में आदमी और औरत एक दूसरे से कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे। उनके उस सफर को विवाह कहा जाता था। ऊपर से विवाह साथ रहने का आदर्श तरीक़ा लगता था, लेकिन यह भी सच है कि वैवाहिक संबंधों में सबसे ज़्यादा कठिनाई का सामना और सबसे ज़्यादा कमप्रोमाइज़ एक स्त्री को ही करना पड़ता है। इसके बावजूद स्त्री को विवाह से जो सामाजिक सम्मान मिलता है, वह सम्मान लिन-इन रिलेशनशिप में नहीं मिलता। अगर लिव-इन रिलेशन के बाद पुरुष स्त्री को छोड़ देता है तो पुरुष को तो समाज स्वीकार कर लेता है, पर ऐसी महिला को स्वीकार करने में ढोंगी समाज आनाकानी करने लगता है।

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बहरहाल, जिस कार्य को हमारे समाज को आगे बढ़कर करना चाहिए था, उसे बहुत बाद में सप्रीम कोर्ट ने किया। देश की सबसे बड़ी अदालत ने लिव-इन रिलेशन को संवैधानिक मान्यता प्रदान की। फैसला दक्षिण की अभिनेत्री ख़ुशबू के ख़िलाफ़ दर्ज 22 अपराधिक मामलों पर सुनवाई के दौरान आया। खुशबू ने विवाह के पहले लिन-इन रिलेशनशिप या स्त्री-पुरुष के शारीरिक संबंधों को जायज ठहराया था, परंतु समाज के ठेकेदारों को उसकी बात रास नहीं आई और उन्होनें उसके ख़िलाफ़ मुकदमा दर्ज करा दिया। अपने फ़ैसले में कोर्ट ने कहा कि वयस्क व्यक्ति अपनी मर्जी से किसी के साथ रह सकता है। लिव-इन रिलेशन को घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 की धारा 2 ( एफ) के तहत रखा गया है। जिसके अंतर्गत शादीशुदा महिला को जो अधिकार प्राप्त है वही अधिकार लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला को दिया गया है।

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सुप्रीम कोर्ट ने भले लिव-इन रिलेशन को क़ानून का जामा पहना दिया है लेकिन, बिना विवाह के किसी स्त्री का पुरुष के साथ एक छत के नीचे रहना समाज के लगे नहीं उतरा है। इसीलिए लिव-इन रिलेशन का मुद्दा हरदम चर्चा का विषय बना रहता है। इससे एक बात तो साफ़ हो गई है। हां, इसमें इतना बदलाव ज़रूर आया है कि पहले लोग इस तरह के रिश्ते को एकदम ग़लत मानकर सिरे से ख़ारिज़ कर दिया करते थे। परंतु आज उसी समाज का एक तबका कहने लगा है कि अगर आप किसी से भावनात्मक रूप से जुड़े/जुड़ी हैं तो आप उसके साथ बिना विवाह के भी अगर वह भी तैयार हो तो, एक साथ एक छत के नीचे रह सकते/सकती हैं। समाज का दूसरा तबका जो ऐसे संबंधों से इत्तिफाक नहीं रखता है। वह इसे निजी नहीं बल्कि सामाज और पारिवार से जोड़ता है। शादी में लड़का और लडकी के साथ-साथ दो परिवारों की भी सहमति होती है। भारत में शुरू से प्रेम-संबंध और अंतरजातीय विवाह को भी गलत समझा जाता था। तब शादी से पहले यौन संबंध की तो कल्पना भी नहीं की जाती थी।

लिव-इन रिलेशन व्यक्ति को शादी से पहले या बिना शादी के शारीरिक संबंध की आज़ादी देता है। यही वजह है कि इन दिनों इसका चलन बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है। यहां पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और मुलायम सिंह यादव का उदाहरण देना समीचीन होगा। वाजपेयी अपनी महिला मित्र राजकुमारी कौल से शादी तो नहीं कर पाए, लेकिन उनके साथ अंतिम समय तक रहे। राजकुमारी का निधन वाजपेयी के आवास पर हुआ। इसी तरह मुलायम सिंह साधना गुप्ता के साथ लंबे समय तक लिव-इन रिलेशन में रहे। परंतु अपनी पहली पत्नी मालती की मौत के बाद साधना से शादी कर ली और 2007 में आय से अधिक संपत्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट में दायर हलफ़नामे में स्वीकार किया साधना उनकी पत्नी और प्रतीक उनका बेटा है।

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वैसे लिव-इन रिलेशन ही क्यों, इंसान के लिए कोई भी रिश्ता निभाना उतना आसान नहीं होता, जितना ऊपर से दिखता है। इसलिए आजकल सलाह दी जाती है कि हर रिश्ते में आपको अपने हक और अधिकार के बारे में सारी बातें पता होनी चाहिए। ताकि आगे चलकर आपको किसी भी कठिनाई का सामना ना करना पड़े। जहां तक लिव-इन रिलेशन की बात है तो यह रिश्ता दो खुले विचारधारा वाले लोगों का होता है। इन संबंधों पर ख़ासतौर पर बच्चों के अधिकारों को लेकर सख़्त कानून बनाने और उस पर अमल करवाने की सख़्त जरूरत है। साथ ही लिव-इन रिलेशन को समाज की सहमति भी जरूरी है क्योंकि समाज की सहमति के बिना कोई भी रिश्ता अधूरा है, क्योंकि रहना तो हमें उसी समाज में है। इसीलिए लिव-इन रिलेशन को लेकर समाज के नज़रिए में बदलाव की पहल होनी चाहिए।

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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