न्यूनतम कीमत से निकलेगी अधिकतम लाभ की राह

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सरोज कुमार

कृषि प्रधान देश भारत में कृषि को किनारे रख कर अर्थव्यवस्था को आगे नहीं ले जाया जा सकता, यह बात लगभग हर किसी को समझ आ चुकी है। औद्योगीकरण की सत्तर साल की मुहिम के बाद भी देश की लगभग आधी आबादी का आज भी कृषि पर निर्भर होना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। वैश्विक तपन के आसन्न खतरे अन्न उपजाने वाले खेतों में प्रदूषण उगलने वाले उद्योगों की इजाजत अब वैसे भी नहीं देते हैं। ऐसे में कृषि क्षेत्र से ही उम्मीदें हैं। लेकिन इस क्षेत्र का स्वरूप और इसके प्रति नीतिनियंताओं की दृष्टि बदले बगैर कोई भी उम्मीद बेमानी है।

कृषि क्षेत्र में सुधार की कवायद लंबे समय से चल रही है। अभी तक कोई सार्थक स्वरूप सामने नहीं आ पाया है। या कहें कि कृषि क्षेत्र के अनुकूल कोई सुधार सोचा ही नहीं गया। जो कुछ सोचा गया, उसके केंद्र में बाजार था, और कृषि को कच्चे माल की तरह इस्तेमाल किया गया। जाहिर है ऐसे किसी सुधार से कृषि और किसानों का भला नहीं होने वाला है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, परंपरागत कृषि विकास योजना, किसान क्रेडिट कार्ड, मृदा स्वास्थ्य कार्ड, ई-नाम जैसी कई पहलें किसानों की बेहतरी के लिए की गईं, लेकिन उनका जीवन बदतर ही हुआ है। किसानों को 500 रुपये सम्माननिधि दी जाती है, उन्हें सम्मान आजतक नहीं दिया गया। मौखिक रूप से किसानों को अन्नदाता कहा जाता है, कागज पर वे आज भी अकुशल मजदूर हैं। छोटी-सी पान की दुकान चलाने वाला उद्यमी है, लेकिन किसान को यह सम्मान मयस्सर नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि किसानों के आर्थिक हालात अकुशल मजदूरों से भी बदतर हैं।

नीति आयोग के नीति पत्र ’डबलिंग फार्मर्स इनकम (Doubling Farmers’ Income)’ (रमेश चंद), 2017 के अनुसार, 22.5 फीसद किसान परिवार गरीबी रेखा के नीचे जीवन जी रहे हैं। बिहार, झारखंड, ओडिशा और मध्यप्रदेश जैसे कई राज्यों में बीपीएल किसानों की संख्या 30 से 45 फीसद तक है। अशोक दलवाई कमेटी की 2017 की एक रपट देश में प्रति किसान परिवार की औसत मासिक आय 5,843 रुपये बताती है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के परिस्थिति आंकलन सर्वेक्षण, 2019 में किसानों को खेती से होने वाली कमाई 27 रुपये प्रति दिन बताई गई है। आमदनी के इसी आंकड़े के कारण देश में प्रति किसान परिवार पर औसतन 47,000 रुपये का कर्ज है। केरल, आंध्रप्रदेश, पंजाब और तमिलनाडु में कर्ज का औसत प्रति किसान परिवार क्रमशः 2,13,600 रुपये, 1,23,400 रुपये, 1,19,500 रुपये और 1,15,900 रुपये बैठता है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) बताता है कि कर्ज के कारण 2015 से 2019 के बीच चार साल के दौरान 55,266 किसान आत्महत्या कर कर चुके हैं।

कृषि जगत की यह तस्वीर डरावनी है। और इस डरावनी तस्वीर का एक बड़ा कारण है कृषि उपज का उचित मूल्य न मिल पाना। प्राकृति आपदा के खतरे खेती पर अक्सर मंडराते रहते हैं, लेकिन उपज का उचित मूल्य न मिलना कृषि जगत पर हमेशा मंडराने वाली आपदा है। इसी आपदा का परिणाम है कि पचास फीसद से अधिक आबादी को आश्रय देने वाला क्षेत्र अर्थव्यवस्था में 20 फीसद योगदान कर रहा है, जबकि 22 फीसद के साथ उद्योग जगत का योगदान लगभग 26 फीसद है। विकास की वैश्विक परिभाषा में हालांकि उस देश को पिछड़ा माना जाता है, जहां सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कृषि का योगदान अधिक होता है। लेकिन भारत को इस पैमाने पर मापना उचित नहीं है, क्योंकि मौसम और मिट्टी इस देश को कृषि प्रधान बनाते हैं। नीतिनियंता भी अब मौसम और मिट्टी के महत्व को समझ चुके हैं। अर्थव्यवस्था में कृषि की हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिशें चल रही हैं। लेकिन उपज की कम कीमत की लंबे समय से कीमत चुका रहे किसान अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी किसानों को हिस्सेदारी देने की एक कसौटी है।

देश में एमएसपी की कहानी खेती के आत्मनिर्भर ढाचे के टूटने के साथ शुरू होती है। जिस शून्य बजट वाली खेती की बात आज हो रही है, वह खेती यहां पहले से होती रही है और खेती का आदर्श मॉडल भी यही है। खेती के इसी मॉडल की मदद से भारत कभी सोने की चिड़िया था। अंग्रेजों ने खेती को खत्म करने का पूरा तंत्र खड़ा किया, और आजादी की चौखट तक आते-आते भारत की खेती दम तोड़ चुकी थी। देश के 34 करोड़ लोगों के पेट भरने के लिए खाद्यान्न बाहर से मंगाने पड़े। उसी हड़बड़ी में हमने अपनी खेती को फिर से खड़ी करने के बदले विदेशी खेती के तरीके अपना लिए। अमेरिकी कृषि विज्ञानी नार्मन बोरोलॉग के ग्रीन रिवोल्यूशन का हरित क्रांति संस्करण एम.एस. स्वामीनाथन के नेतृत्व में भारत आ गया(1968)। खेती की यह व्यवस्था बाजार पर निर्भर थी। जाहिर है इससे बाजार को ही लाभ होना था। बीज, खाद, कीटनाशक, जोताई, सिंचाई, कटाई, मड़ाई हर चीज के लिए पैसे खर्चने पड़े। खेती का शून्य बजट सुरसा के मुंह की तरह बढ़ने लगा, लेकिन बाजार खाद्यान्न की लागत तक देने को तैयार नहीं था। यहीं पर लागत की भरपाई के लिए सरकार ने एमएसपी का आश्वासन दिया। निश्चित रूप से पंजाब और हरियाणा में हुए हरित क्रांति के प्रयोग से हम खाद्यान्न में फिर से आत्मनिर्भर हो गए। लेकिन देश की आत्मनिर्भर खेती बाजार की गुलाम हो गई। हरित क्रांति की हवा देश के बाकी हिस्सों में भी पहुंची, लेकिन एमएसपी हर किसान तक नहीं पहुंच पाई। शांता कुमार समिति की रपट (2015) में मात्र छह फीसद किसानों की ही पहुंच एमएसपी तक बताई गई थी। जबकि कृषि बाजार 2020 में बढ़ कर 63,506 अरब रुपये का हो गया।

कृषि और किसानों की हालत सुधारने का एकमात्र सूत्र है कि कम से कम उसे उसकी लागत लौटाई जाए। वह चाहे एमएसपी के जरिए, या सब्सिडी के रास्ते। लेकिन फिलहाल ये दोनों रास्ते बाधित हैं। सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पीपीपी) वाली परियोजनाओं में सरकार निजी उद्यमियों को लागत लौटाने की गारंटी देती है। लेकिन किसान की लागत मिट्टी में मिलने के बाद वापस लौटने की कोई गारंटी नहीं है। दुनिया के बाकी देश किसानों को लागत की भरपाई के लिए भारी सब्सिडी देते हैं। लेकिन भारत में उलटे किसानों से कर वसूला जा रहा है। जिस खाद पर पहले छह फीसद कर था, आज उस पर 12 फीसद जीएसटी वसूला जा रहा है। ट्रैक्टर और बाकी कृषि उपकरणों का भी यही हाल है। हम अक्सर अपने पड़ोसी देश चीन से मुकाबले की बात करते हैं। लेकिन चीन अपने किसानों को भारी सब्सिडी देता है। 2019 में चीन में कृषि सब्सिडी दुनिया में सबसे ज्यादा 185.9 अरब डॉलर थी। जबकि भारत में यह मात्र 11 अरब डालर रही। वहीं यूरोपीय संघ ने अपने किसानों को 101.3 अरब डॉलर, अमेरिका ने 48.9 अरब डॉलर, जापान ने 37.6 अरब डॉलर, इंडोनेशिया ने 29.4 अरब डॉलर, और यहां तक कि कोरिया ने भी 20.8 अरब डॉलर की सब्सिडी किसानों को दी।

एमएसपी किसी उपज की न्यूनतम कीमत है, जिसे सरकार तय करती है। फिलहाल 23 फसलें एमएसपी के दायरे में हैं। हर उत्पादक, निर्माता अपने उत्पाद को अधिकतम लाभ पर बेचने की उम्मीद करता है, लेकिन किसान को अपनी उपज की न्यूनतम कीमत भी क्यों नहीं उपलब्ध है, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। ऑर्गनाइजेशन फॉर इकॉनॉमिक को-आपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) और इंडियन कौंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकॉनॉमिक रिलेशंस (आइसीआरआइईआर) की ओर से 2018 में किए गए एक अध्ययन (रिव्यू ऑफ एग्रिकल्चरल पॉलिसीज इन इंडिया) से पता चला है कि फसलों की खरीद एमएसपी के नीचे होने के कारण 2017-18 की दर के हिसाब से देश के किसानों को हर साल 2.65 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। इस हिसाब से साल 2000 से 2016 तक यानी 17 सालों के दौरान हुए नुकसान का कुल आंकड़ा 45 लाख करोड़ रुपये बैठता है। एमएसपी की मौजूदा गणना के हिसाब से नुकसान की रकम पचास लाख करोड़ से ऊपर जाती है। अब इतना बड़ा नुकसान सहने वाला किसान भला कैसे जिंदा रह सकता है। घाटे में जाने पर निजी उद्यम बंद हो जाते हैं, सरकारी उपक्रम बेच दिए जाते हैं। लेकिन किसान घाटे की खेती से भी चिपका हुआ है तो इसलिए कि इसे बंद करने का विकल्प नहीं है। ऐसे में बाजार के क्रूर पंजे से किसान को बचाने के लिए एमएसपी का कवच जरूरी है।

एमएसपी की गारंटी से सिर्फ किसानों की स्थिति नहीं सुधरेगी, बल्कि बाजार को भी बल मिलेगा। देश की अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार मिलेगी। फर्ज कीजिए 45 लाख करोड़ रुपये लगभग साढ़े नौ करोड़ किसान परिवारों में पहुंचे होते तो क्या कुछ नहीं हो जाता। सबसे पहले आर्थिक असमानता घटती, बाजार में मांग बढ़ती, नौकरियां तैयार होतीं और अंत में अर्थव्यवस्था मजबूत होती। लेकिन यह पैसा किसानों के पास न जाकर चंद कारोबारियों की तिजोरी में कैद हो गया, जो मांग के अनुसार ही निवेश करते हैं। एमएसपी की गारंटी से खेती की लागत भी घटेगी, और शून्य बजट वाली खेती की ओर लौटने की राह तैयार होगी। न्यूनतम कीमत की गारंटी हो जाने से किसान फसल चक्रण अपनाएंगे। इससे खेतों की उर्वरता लौटेगी तो रासायनिक खाद और कीटनाशक का इस्तेमाल भी घटेगा। पानी की खपत कम होगी। पर्यावरण स्वस्थ होगा। खेती की लागत घटेगी तो स्वाभाविक रूप से एमएसपी भी नीचे आएगी। उपभोक्ताओं को सस्ता, स्वास्थ्यकर खाद्यान्न मिलेगा। स्वास्थ्य खर्च घटेगा। यानी एमएसपी तमाम समस्याओं का समाधान देने वाली है, हर किसी के लिए लाभकारी है, बशर्ते इसका क्रियान्वयन सही तरीके से हो जाए। बाजार के पंजे में जकड़े बेबस 85 फीसद लघु और सीमांत किसानों के लिए तो यह संजीवनी है। सभी शंकाओं, आशंकाओं को त्याग कर अब खेतों में इस संजीवनी को उगाने की जरूरत है। किसानों ने अब तक बाजार के लिए कुर्बानी दी है, समय की मांग है कि अब बाजार किसानों को हिस्सेदारी दे।

(वरिष्ठ पत्रकार सरोज कुमार इन दिनों स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)