द मोस्ट वॉन्टेड डॉन – एपिसोड – 8 – जब पुलिस को मिला ‘शोले’ से सुराग (The Most Wanted Don – Episode – 8 – When The Police Get A Clue From ‘Sholay’)

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हरिगोविंद विश्वकर्मा
क्या कोई फ़िल्म भी किसी समस्या का समाधान सुझा सकती है? यह सवाल अटपटा ज़रूर है लेकिन है शत-प्रतिशत सही। जी हां, मुंबई के अपराध-जगत के शहंशाह रहे पठानों के लिए ‘शोले’ फ़िल्म बहुत अशुभ साबित हुई। दरअसल, ‘शोले’ का डायलॉग ‘लोहा-लोहे को काटता है’, मुंबई पुलिस के लिए पठानों को क़ाबू में करने का मंत्र बन गया। यह मंत्र कालांतर में इतना कारगर और मारक निकला कि दस साल में ही पठान गिरोह ही नेस्ताबूद हो गया।

बुज़ुर्ग पत्रकार और उर्दू दैनिक ‘अवधनामा’ के संपादक खलील जाहिद, जो पहले उर्दू साप्ताहिक ‘अख़बार-ए-आलम’ निकालते थे, बताते हैं, सत्तर और अस्सी के दशक के बीच दक्षिण मुंबई में पठान गिरोह के गुंडे बेक़ाबू हो चुके थे। इस सिरदर्द से पुलिस ख़ासी परेशान थी। पठानों के अत्याचार से जनता और व्यापारी भी तंग आ चुके थे। गुंडे पुलिस के भी कंट्रोल में ही नहीं थे। रोज़ाना किसी न किसी को पीटते रहते थे। अयूब ख़ान तब सबसे ख़तरनाक गुंडा माना जाता था। वह अनगिनत लोगों को मौत के घाट उतार चुका था। करीम लाला का वह सबसे ख़तरनाक सुपारी किलर था। जब भी वह कहीं दिख जाता था तो यह मान लिया जाता था कि कोई बड़ा गेम होने वाला है।

उन दिनों डोंगरी पुलिस स्टेशन में सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर रणबीर सिंह लीखा तैनात थे। वह बहुत तेज़-तर्रार अफ़सर मान जाते थे। इसके बावजूद, हत्या, अपहरण, बलात्कार, मारपीट और लूटपाट के मामले दिन भर थाने में आते रहते थे। हर शिकायतकर्ता पठान गिरोह के गुंडों का नाम लेता था। लोग बताते थे कि उनके साथ पठान के लोगों ने मारपीट की है या उनको बुरी तरह पीटा है। फ़िलहाल, लीखा पुलिस स्टेशन में बैठे कुछ सोच रहे थे। हेड कॉन्स्टेबल दिलीप माने घंटे भर में मारपीट की तीसरी रिपोर्ट लिख रहा था। एक बेकरी कारोबारी को आसिफ़ ख़ान नाम के पठान गुंडे ने बुरी तरह पीटा था। नाक-मुंह से खून निकल रहा था। कारोबारी का ग़ुनाह इतना था कि आसिफ़ के सूती पैसे का ब्याज देने में दो दिन देरी कर दी थी। उन दिनों आसिफ़ और हमीद का बड़ा ख़ौफ था। वे मज़बूर लोगों को ऊंचे सूत पर क़र्ज़ देते थे और भारी-भरकम ब्याज वसूलते थे। जो सूत देने में ना-नुकूर या देरी करता, उसकी पिटाई करते थे। करीम लाला इन सब गुंडों का पनाहगार था।

बहरहाल, लीखा केबिन में बैठे सोच रहे थे कि पठान गुंडों से कैसे निपटा जाए, तभी पत्रकार मोहम्मद इक़बाल नाटिक़ वहां पहुंचा। 35 साल का इक़बाल उत्साही जर्नलिस्ट था। उर्दू दैनिक “इन्क़लाब” से जुड़ा था। उसने 1969 में अपना उर्दू साप्ताहिक “राज़दार” शुरू किया। जेजे अस्पताल के पास बीआईटी चॉल में दफ़्तर था। वह दौर मुंबई की पत्रकारिता का शैशवकाल था। फिर भी राज़दार ठीकठाक और रेगुलर निकल रहा था। यह अख़बार मूलतः क्राइम वीकली था। इक़बाल की पुलिस महकमे में अच्छी पैठ थी। हर हफ़्ते कुछ न कुछ सनसनीख़ेज़ ख़बर निकाल लेता था जिससे अख़बार स्टॉल पर पहुंचते ही हाथोंहाथ उठा लिया जाता था। इक़बाल ने शिद्दत से महसूस किया कि लीखा साहब परेशान हैं। कुछ सीरियस एक्शन के बारे में सोच रहे हैं। बहरहाल, लीखा और नाटिक़ की बातचीत होने लगी, लीखा ने उसे पठानों की ज़्यादती के बारे में बताया।

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“पठान के लड़कों ने एकदम नाक में दम कर दिया है।” लीखा अपनी कुर्सी से थोड़ी आगे की ओर झुकते हुए बोले, “मैंने इब्राहिम भाई से कहा है कि वह करीम लाला से बात करें और उनसे साफ़-साफ़ कहें कि वह अपने इन बदमाश छोकरों को संभाले।”

“करीम लाला के गुर्गे बेक़ाबू हो चुके हैं साब। ऐसे ये लोग नहीं मानने वाले। ये सबके सब अपने को शेर समझते हैं। अब तो इन्हें कोई सवा शेर ही ठीक कर सकता है।” नाटिक़ थोड़ा ठहरा और मुस्कराकर बोला, “सर शोले देखी आपने? देख लीजिए, ज़बरदस्त मूवी है। आपको उसमें समाधान भी मिल जाएगा।”

“क्या बात करते हो?” लीखा काफी उखड़ गए, “मैं गुंडों से निपटने की बात कर रहा हूं और तुम हो कि शोले फ़िल्म देखने की सलाह दे रहे हो। अरे भाई, शोले फ़िल्म का डोंगरी में होने वाली रोज़-रोज़ की मारपीट से क्या ताल्लुक है?”

“मैं सही कह रहा हूं साब!” इक़बाल ने अपनी बात पर ज़ोर दिया।

“मतलब?”

“मतलब साफ़ है। लोहे को लोहा ही काट सकता है। किसी और के बस की बात ही नहीं कि वह लोहे को काट सके। इसलिए लोहे को काटने के लिए लोहा इस्तेमाल किया जाता है।”

“मैं फिर भी नहीं समझा इक़बाल। साफ़-साफ़ कहो। पहेलियां मत बुझाओं। इन पठान लड़कों ने पुलिस के नाक में दम कर दिया है। ऊपर के अफ़सर शिकायत कर रहे हैं। मुझे इनका ट्रीटमेंट करना है।”

“आपको मैं समाधान ही तो बता रहा हूं कब से। पठान लोहा हैं, तो उनके सामने लोहा या उन्ही की तरह किसी गुंडें को खड़ा कर दीजिए। एकदम इनके समानांतर। जो उनसे लोहा ले सके। वह ज़िगरा वाला होना चाहिए। आपको न मिले तो बताना एक छोकरा है, तासीर वाला।”

“तुम किसकी बात कर रहे हो।”

“दाऊद इब्राहिम कासकर।”

“तुम्हारा मतलब इब्राहिम भाई का दूसरा वाला छोकरा। जिसने कुछ साल पहले दिन-दहाड़े डकैती की थी?”

“हां, वहीं पठानों को चैलेंज कर सकता है। हिम्मतवाला छोकरा है।”

“हां, मेरे पास इन्फ़ॉर्मेशन आई है कि उसने भी एक टोली बनाई है। लेकिन वह पठानों से क्या भिड़ेगा।”

“आज़माकर तो देखिए। हो सकता है दाऊद आपके लिए तुरुप का पत्ता साबित हो।”

बहरहाल, इतने में थाने के सामने चाय बेचने वाला बिना ऑर्डर के ही कटिंग चाय लेकर पहुंच गया। उसकी आदत थी, जब कोई लीखा से मिलने आता, वह चाय ज़रूर लेकर पहुंच जाता था। इक़बाल और लीखा साथ में चाय पीने लगे। चाय ख़त्म करके इक़बाल ने इधर-उधर की चंद और बात की और रफूचक्कर हो गया। लीखा सोचते रहे। उन्हें नाटिक़ की बात अतिरंजनापूर्ण लगी। वह दूसरी बात सोचने लगे। मगर दिमाग़ फिर घूमफिर कर उसी टॉपिक पर आ जाता था।

“कल का छोकरा दाऊद क्या खाकर दैत्य पठानों का मुक़ाबला कर पाएगा। असंभव।” उन्होंने सिर झटक दिया, “नाटिक़ भी कुछ भी बोलता है।“।

कई दिन बीत गए। सीनियर पीआई रणबीर सिंह लीखा कोई समाधान नहीं खोज पा रहे थे जिससे पठानों के आतंक से लोगों को मुक्ति दिला सकें। एक दिन वह शोले देखने थिएटर चले गए और हॉल से बाहर निकले तो समाधान मिल चुका था। नाटिक ने सही कहा था, लोहे को लोहा ही काटता सकता है।

(The Most Wanted Don अगले भाग में जारी…)

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