क्या ‘स्त्री-विरोधी समाज’ बना देने के ‘अपराधबोध के प्रायश्चित’ के लिए मनाया जाता है महिला दिवस?

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महिलाओं की हर समस्या का एक हल, 33 फीसदी नहीं बल्कि 50 फीसदी आरक्षण

हरिगोविंद विश्वकर्मा
हर साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाकर महिलाओं को ख़ुश करने की कोशिश की जाती है। दरअसल, जो कुछ किया जाता है, वह मुद्दे से ध्यान हटाने की कवायद होती है। यह वैसी ही प्रैक्टिस है, जैसे, कभी राष्ट्रपति, कभी प्रधानमंत्री तो कभी लोकसभा अध्यक्ष पद पर किसी महिला को बिठाकर मान लिया जाता है कि देश में नारी सशक्तिकरण यानी वूमैन इम्पॉवरमेंट हो गया। जो लोग धूमधाम से महिला दिवस मनाते हैं, उनमें ज़्यादातर लोग महिलाओं का हक़ मारते हैं। चूंकि महिलाओं का हक़ मारना यानी उनके साथ पक्षपात एक सामाजिक अपराध है। लिहाज़ा, उसी सामाजिक अपराध का प्रायश्चित करने के लिए ही स्त्री विरोधी-समाज महिला दिवस मनाता है। कम से कम भारत जैसे उदार देश में समाज को ऐसा बनाना चाहिए था, जिससे महिला सशक्तिकरण दिवस मनाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सचमुच समाज के पैरोकार महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के पक्षधर हैं? क्या वे सचमुच महिलाओं का उत्थान चाहते हैं? अगर हां, तो वे सभी प्रावधान किए जाने चाहिए जो सही मायने में स्त्री को बराबरी के मुकाम तक पहुंचाते हैं। इस क्रम में सबसे ज़रूरी है कि पहले असली समस्या को जानने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि, जिस तरह से स्त्रियों की समस्याओं को हल करने की कोशिश की जा रही है, उससे पता चलता है कि किसी को असली समस्या की जानकारी ही नहीं है। ज़ाहिर है कि जब बीमारी के नेचर का सही पता नहीं चलेगा, तो दवा अंदाज़ से दी जाएगी, जिससे ठीक होने की बजाय कभी-कभार मरीज़ की मौत तक हो जाती है। यही भारत में सनातन काल से हो रहा है। पहले समाज को पुरुष प्रधान बनाया गया और अब उसे स्त्री विरोधी जामा पहना दिया गया है।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपवाद नहीं हैं। सात-आठ साल के कार्यकाल में जब विधायिका में महिलाओं को आरक्षण देने का क़ानून शर्तिया बनाया जा सकता था, तब मौजूदा मोदी सरकार ने उस बिल को अपने एजेंडे से ही बाहर कर दिया। बहरहाल, महिला आरक्षण विषय पर अलग से विस्तार से लिखने की ज़रूरत है। यहां तो महिलाओं की असली समस्या बताने की कोशिश की जा रही है। वस्तुतः घर के बाहर महिलाओं की बहुत कम विज़िबिलिटी होती है। यही सबसे बड़ी समस्या या प्रॉब्लम है। घर के बाहर महिलाएं दिखती ही नहीं, दिखती भी हैं तो नाममात्र की संख्या में दिखती हैं। सड़कों, रेलवे स्टेशनों और दफ़्तरों में उनकी प्रज़ेंस बहुत कम होती है। मुंबई और दिल्ली जैसे डेवलप्ड सिटीज़ में भी महिलाओं की विज़िबिलिटी दस-पंद्रह फ़ीसदी से ज़्यादा नहीं है। देश के बाक़ी हिस्सों में तो हालत भयावह है। महिलाओं की बहुत कम संख्या देखकर पुरुष उन्हें कमज़ोर मान लेते हैं और जो बाहर निकलती हैं उनके साथ मनमानी करने का दुस्साहस करने लगते हैं।

इस तरह के सामाजिक ताने-बाने में स्त्री पुरुष की बराबरी कतई नहीं कर सकती है, क्योंकि मौजूदा सेटअप ही स्त्री को सेकेंड सेक्स यानी दोयम दर्जें के नागरिक का दर्जा देता है। सभ्यता के विकास के बाद, जब से मौजूदा सामाजिक ताना-बाना प्रचलन में आया है, तब से स्त्री दोयम दर्जे की ही नागरिक रही है। बॉलीवुड अभिनेत्रियों या शहरों की लड़कियों को जींस-टीशर्ट या स्कर्ट में देखकर कुछ क्षण के लिए ख़ुश हुआ जा सकता है कि महिलाएं पुरुषों की बराबरी कर रही हैं लेकिन सच यह है कि स्त्री कभी पुरुष की बराबरी कर ही नहीं पाई। यह सच स्त्रियों से बेहतर और कोई नहीं समझ सकता है।

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स्त्री-विरोधी मानसिकता ही स्त्री को बराबरी का दर्जा देने भी नहीं देती है। लिहाजा, ज़रूरत उन प्रावधानों पर अमल करने की है जो सही मायने में स्त्री को बराबरी के मुकाम तक लाते हैं। इसके लिए शुरुआत घर से करनी होगी। क्या लोग अपने घर में स्त्रियों या लड़कियों को बराबरी का दर्जा देते हैं? क्या घर में बेटे-बेटी में फ़र्क नहीं करते हैं? भारत में विकसित परिवारों में भी स्त्री के साथ खुला पक्षपात किया जाता है, उसे एहसास दिलाया जाता है कि वह दोयम दर्जे की नागरिक है। ऐसे में आर्थिक मजबूरी झेल रहे ग़रीब तबके, पिछड़े वर्ग और दूर-दराज़ के शैक्षणिक रूप से पिछड़े समाज में स्त्री की क्या पोज़िशन होती होगी, यह सहज समझा जा सकता है।

इस धरती पर स्त्री और पुरुष नैसर्गिक रूप से एक दूसरे के पूरक हैं। स्त्री-पुरुष के बराबर योगदान से ही इस सृष्टि का अस्तित्व लाखों साल से कायम है। इसका मतलब यह कि समाज के निर्माण में स्त्री और पुरुष दोनों का बराबर योगदान है। यानी प्राकृतिक रूप से स्त्री-पुरुष दोनों बराबर हैं। दोनों की जनसंख्या भी कमोबेश बराबर है। फिर हर जगह पुरुष ही क्यों दिखते हैं। महिलाओं की संख्या पुरुषों के बराबर क्यों नहीं होती है। कहने का मतलब, अगर लोग सचमुच महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के हिमायती हैं तो सबसे पहले राजनीतिक दलों के अलावा केंद्र और राज्य सरकार में हर जगह 50 फ़ीसदी पद महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिया जाना चाहिए। हर सरकार में महिला-मंत्रियों की तादाद पुरुष-मंत्रियों के बराबर होनी चाहिए। मतलब विधायिका में महिला आरक्षण 33 फ़ीसदी नहीं, बल्कि 50 फ़ीसदी होनी चाहिए। हर जगह 50 फ़ीसदी पद महिलाओं के लिए सुनिश्चित होनी चाहिए। इस तरह संसद में 790 सदस्यों (लोकसभा-545 और राज्यसभा-245) में से किसी भी सूरत में 395 सदस्य महिलाएं होनी ही चाहिए।

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सबसे अहम बात यह कि महिला उत्थान के नाम पर हर जगह लाभार्थी के रूप में गांधी, पवार, बादल, पटनायक या मुलायम जैसे उन परिवारों की महिलाएं तरक़्क़ी करती दिखती हैं, जिनका परिवार पहले से ही ताकतवर है। ताकतवर परिवार से आने वाली महिलाएं वस्तुतः अपने घर के पुरुषों यानी अपने पति, पिता, ससुर या बेटे की पुरुष प्रधान सोच को ही रिप्रज़ेंट करती हैं। लिहाज़ा, महिला रिज़र्वेशन का लाभ आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े यानी ग़रीब, अशिक्षित, देहाती, आदिवासी, दलित, पिछड़े वर्ग और मुस्लिम जमात की महिलाओं को भी देना सुनिश्चित करना चाहिए। यह सुनिश्चत करना चाहिए का महिलाओं के विकास में जातीय असंतुलन नहीं होना चाहिए।

न्यायपालिका में आधे जज और आधे एडवोकेट महिलाएं ही होनी चाहिए। फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट में 32 जज हैं, उनमें केवल चार ही महिला जज हैं। सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या सीधे 400 कर देनी जानी चाहिए और उनमें 200 जज महिलाएं बनाई जानी। इसी तरह हाईकोर्ट और निचली अदालतों में जजों की संख्या सीधे 16 गुना बढ़ा देनी चाहिए और महिला-पुरुष जजों की संख्या बराबर होनी चाहिए। इसी तरह ब्यूरोक्रेसी और पुलिस में भी हर साल छात्र-छात्राओं को चयन समान संख्या में होनी चाहिए।

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पुलिस बल में भी महिला और पुरुष की संख्या बराबर होनी चाहिए। यक़ीन मानिए जिस दिन पुलिस स्टेशन में महिला पुलिस की संख्या पुरुष पुलिस के बराबर हो जाएगी, उस दिन महिलाओं का 90 फ़ीसदी डर डर ख़त्म हो जाएगा। वे बिना संकोच या डर के पुलिस थाने में जा सकेंगी। इसी तरह आर्मफोर्स, बैंक, मीडिया और धार्मिक संस्थानों में आधी स्ट्रेंथ महिलाओं की होनी ही चाहिए। स्कूल-कॉलेज और यूनिवर्सिटीज़ में 50 प्रतिशत पोस्ट महिलाओं को दिए जाने चाहिए। आख़िर महिलाएं घर में क्यों बैठें? वे काम पर क्यों न जाएं? यदि 50 फ़ीसदी महिलाएं काम पर जाएंगी तो घर के बाहर उनकी विज़िबिलिटी पुरुषों के बराबर होगी। यानी हर जगह जितने पुरुष दिखेंगे, उतनी ही महिलाएं भी। इससे महिलाओं का मोरॉल बुस्टअप होगा। उनके अंदर आत्मविश्वास पैदा होगा।

जब गली, सड़क, बस, ट्रेन, प्लेन, दफ़्तर, थाने, कोर्ट और स्कूल-कॉलेज यानी हर जगह में महिलाओं की संख्या और उनकी मौजूदगी पुरुषों के बराबर होगी तो पुरुष की ज़ुर्रत नहीं कि महिला को बुरी नज़र से देखने का दुस्साहस करे। वस्तुतः महिलाओं की कम संख्या ही लंपट पुरुषों को प्रोत्साहित करती हैं। सो महिलाओं को अबला या कमज़ोर होने से बचाना है तो उन्हें इम्पॉवर करना ही एकमात्र विकल्प है। जिस दिन केंद्र और राज्य सरकार, लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, न्यापालिका, कार्यपालिका, पुलिस, बैंक, शिक्षण-संस्थानों नें पुरुषों का वर्चस्व ख़त्म हो जाएगा और महिलाएं बराबर की संख्या में मौजूद रहेंगी, उस दिन हालात एकदम बदल जाएंगे।

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जब लड़कियों को लड़कों की तरह सरकारी और प्राइवेट नौकरी मिलने लगेगी तो उनके अंदर सेल्फ़-रिस्पेक्ट पैदा होगा। वे अपने को “पराश्रित” और “वस्तु” समझने की मानसिकता से बाहर निकल जाएंगी। वे पति या पिता रूपी पुरुष पर निर्भर नहीं रहेंगी, बल्कि करियर पर निर्भर रहेंगी। सही मायने में स्वावलंबी होंगी। तब वे माता-पिता पर बोझ कतई नहीं होंगी। तब प्रेगनेंसी के दौरान सेक्स-डिटरमिनेशन टेस्ट की परंपरा अपने आप ख़त्म हो जाएगी। घर में लड़की के जन्म पर उसी तरह ख़ुशी मनाई जाएगी जैसे पुत्र जन्म पर मनाया जाता है। लोग केवल पुत्र की कामना नहीं, बल्कि लड़की की भी कामना करने लगेंगे। यक़ीन मानिए, तब देश में हर कोने में 1000 लड़कों के मुक़ाबले 1000 लड़कियां ही पैदा होंगी। समाज संतुलित और ख़ुशहाल होगा। जहां हर काम स्त्री-पुरुष दोनों कर सकेंगे।

अगर विज़िबिलिटी की इस समस्या को हल कर लिया गया यानी महिलाओं की प्रज़ेंस 50 फ़ीसदी कर ली गई तो महिलाओं की ही नहीं, बल्कि मानव समाज की 99 फ़ीसदी समस्याएं ख़ुद-ब-ख़ुद हल हो जाएंगी। इसके बाद महिला दिवस मनाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। महिलाएं बिना किसी क़ानून के सही-सलामत और महफ़ूज़ रहेंगी।

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(नोट- 8 मार्च 2022 को अपडेटेड)