शरीर में बन गई कोरोना को हराने वाली एंटीबॉडी, प्लाज्मा डोनेट करना संभव

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हरिगोविंद विश्वकर्मा

जो लोग नॉवेल कोरोनोवायरस यानी कोविड -19 से अनावश्यक रूप से डरे हुए हैं, उनसे मैं अपना उदाहरण देकर यह गुज़ारिश कर सकता हूं कि बिना किसी डर के सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए वे अपने घर से बाहर निकलें और काम-काज शुरू करें। ताकि ज़िंदगी को फिर से वापस पटरी पर लौटाया जा सके। मैं केंद्र सरकार और महाराष्ट्र सरकार दोनों से भी अपील करता हूं कि पांच महीने से चल रहे लॉकडाउन फौरन पूरी तरह ख़त्म करके आम जन-जीवन को बहाल कर दिया जाए। क्योंकि अगर आप डायबिटीज़, लंग (अस्थमा), लिवर, किडनी या हार्ट के मरीज़ नहीं हैं, तो आपके लिए कोरोना वायरस कोई ख़तरा ही नहीं है। सच कहें तो, आपके आगे इस चीनी वायरस की कोई औक़ात ही नहीं है। मेरी तरह आप भी कोविड-19 को आसानी से धूल चटा सकते हैं।

मैं कर सकता हूं डोनेट प्लाज़्मा

चूंकि मैं लॉकडाउन के दौरान भी लगातार घर से बाहर निकलता रहा हूं, इसलिए एहतियातन मैंने 24 जुलाई 2020 की सुबह अपना एंटीबॉडी टेस्ट करवाया। मेरे ब्लड के सैंपल का परीक्षण प्रायवेट लैब पीआर-एलआईवी डिगीपैथ (PR-LIV Digipath) के डॉ. आरके अग्रवाल और कंसल्टिंग पैथोलॉजिस्ट (एमडी, डीपीबी) डॉ. शिल्पा मोरेकर ने किया। उसी दिन शाम तक रिपोर्ट आ गई और मुझे बताया गया कि कोरोना वायरस से लड़ने के लिए मेरे शरीर में उपलब्ध एंटीबॉडी का लेवल 62.42 है। यह बहुत अधिक है। इसका मतलब मेरे शरीर में कोरोना को हराने वाला प्रतिरक्षा प्रोटीन बन गया है। मुझे कम से कम कोरोना वायरस से कोई ख़तरा नहीं है। लिहाज़ा, अब ठीक हो चुके आम कोरोना मरीज़ की तरह मैं भी प्लाज्मा डोनेट कर सकता हूं। चूंकि मैं रेगुलर ब्लड डोनेट करता रहा हूं, इसलिए मेरे लिए यह गुड न्यूज़ है।

 

भारी चपत से बच गया

डॉक्टर्स का यह भी कहना है कि हो सकता है, कोरोना एक्सपोज़र (किसी तरह के कोरोना संक्रमित मरीज़ के संपर्क में आने) के कारण मुझे भी कोरोना का संक्रमण हुआ हो, लेकिन मेरे शरीर में मौजूद मज़बूत प्रतिरक्षा प्रणाली के कारण मुझ पर उसके लक्षण नहीं दिखे और मैं ठीक भी हो गया। या फिर हो सकता है, लगातार बाहर निकलने से मेरे शरीर में अपने आप कोरोना से लड़ने की एंटीबॉडी विकसित हो गई। एक बात और चूंकि यह निजी परीक्षण है, इसलिए मेरा दावा अंतिम नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि कोरोना का परीक्षण न करवा कर मैंने बहुत अच्छा काम किया और जांच के 4500 रुपए बचा लिए। फिर अस्पताल में भर्ती होने से जो लाखों रुपए की चपत लगती, उससे भी बच गया। मैं मानसिक यातना से भी बच गया। कहने का मतलब, अगर आप स्वस्थ्य है तो कोरोना वायरस आपके लिए किसी तरह का ख़तरा नहीं है। इसलिए लोगों से गुज़ारिश है कि अनावश्यक रूप से कोरोना वायरस का हव्वा खड़ा न किया जाए।

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सावधानीपूर्वक बाहर निकला

जब 25 मार्च 2020 को पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा हुई तो मैं भी डर गया कि अब क्या होगा? जीवन कैसे चलेगा? कहीं आर्थिक संकट तो नहीं आ जाएगा? होम लोन की ईएमआई कैसे भरूंगा? कोरोना के आतंक के चलते 4 अप्रैल तक मैं भी घर के अंदर कैद रहा। इसके बाद न चाहते हुए मैं घर से निकलना शुरू किया, वह भी बहुत डरते-डरते। धीरे-दीरे मेरे अंदर आत्मविश्वास आने लगा और अपनी बाइक से हफ़्ते में दो बार निकलने ही लगा। हां, मास्क, सेनेटाइजर और सोशल डिस्टेंसिंग संबंधी गाइडलाइन्स का सावधानी पूर्वक पालन करता था। इसके अलावा घर में आकर सेनेटाइजर का स्प्रे पूरे शरीर पर मारता था और कपड़े साफ़ करने के लिए डाल देता था।

बीएमसी, थाने व प्रेसक्लब गया

इस दौरान तरह-तरह के पत्र देने के लिए छह बार मैं बीएमसी मुख्यालय गया। इसके अलावा बीएमसी के सभी जोन्स ऑफिस मसलन भायखला, परेल, चेंबूर, मुलुंड, अंधेरी (पूरब-पश्चिम) और कांदिवली ऑफिसों में भी गया। कई पुलिस स्टेशन्स का भी चक्कर गलाया। दो बार मुंबई प्रेस क्लब भी गया। हां, इस दौरान मैं हर जगह उचित सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखता था। केवल रास्ते में पुलिस चेक पॉइंट पर पुलिस वाले कहीं-कहीं मेरा आई कार्ड चेक करते थे। कई पुलिस वालों को आई कार्ड दूर से दिखा देता था, लेकिन कुछ पुलिस वाले उसे अपने हाथ में लेकर देखते थे। इसके अलावा 25 मार्च 2020 के बाद मैंने न तो किसी बाहरी व्यक्ति को स्पर्श किया और न ही किसी तरह से किसी के संपर्क में आया।

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आईसीएमआर का सेरो टेस्ट

अब आईसीएमआर (ICMR) यानी (इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च) की ओर से पूरे देश में सेरो सर्वे कराए जा रहे हैं। जिन से पता चल रहा है कि पूरे देश में कोरोना वायरस से सबसे अधिक सक्रमित मुंबई में क़रीब 28 फ़ीसदी नागरिकों के शरीर में ख़ुद ही कोरोना से लड़ने की एंटीबॉडी बन गई है। इनमें मैं भी शामिल हूं। इन लोगों के बारे में यह भी कहा जा रहा है कि हो सकता है, ये लोग किसी न किसी वजह से कोरोना से संक्रमित मरीज़ों के संपर्क में आए हों, और संक्रिमित हो गए हो, लेकिन मज़बूत एम्युनिटी के चलते लक्षण के न दिखने या नगण्य होने से कोरोना को टेस्ट नहीं करवाए हों और अब इनमें एंटीबॉडी के रूप में इम्युनिटी बन गई है।

सेरो सर्वे क्या है?

अब आप जान लीजिए कि सेरो सर्वे क्या है? दरअसल, सेरो सर्वे के तहत लोगों के ब्लड सैंपल लिए जाते हैं। उस ब्लड सैंपल के परीक्षण से यह पता लगाया जाता है कि कितने लोगों के शरीर में कोरोना वायरस के लिए एंटीबॉडी बन गई हैं। भारत ही नहीं दुनिया के दूसरे कई देशों में भी सेरो सर्वे हो रहे हैं। जानकारों के मुताबिक आईजीजी (igG) एक तरह की एंटीबॉडी प्रोटीन है, जो खून के अंदर पाई जाती है। सेरो सर्वे में इसी एंटीबॉडी प्रोटीन को लोगों के शरीर में खोजा जा रहा है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में सेरो सर्वे में हर 100 लोगों में 28 लोगों के शरीर में एंटीबॉडी मिल रही है। यानी मोटा-मोटी हर साढ़े तीन व्यक्ति में एक व्यक्ति कोराना के संक्रमण में आया और अब ख़तरे से एकदम बाहर है। जबकि देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सेरो सर्वे के अभी तक के नतीजों में हर पांच में से एक व्यक्ति के शरीर में एंटीबॉडी मिल रही है।

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एंटीबॉडी क्या है?

सेरो सर्वे जानने के बाद आप यह भी जान लीजिए कि एंटीबॉडी क्या होती है? वस्तुतः जब कोई वायरस हमारे शरीर पर हमला करता है, तो वह शरीर को नुकसान पहुंचाने की भरसक कोशिश करता है। ऐसे में हमारा शरीर चुपचाप नहीं बैठता, शरीर भी नैसर्गिक रूप से वायरस से लड़ने के लिए ख़ुद को तैयार करता है। इस क्रम में शरीर के अंदर कुछ प्रोटीन बनते हैं। इन प्रोटीन का आकार वाई (Y) जैसा होता है। यही जनरेटेड प्रोटीन वायरस के प्रभाव को कम कर देते हैं। इसी प्रोटीन को चिकित्सकीय भाषा में एंटीबॉडी कहा जाता है। जो कोरोना से इंसान के शरीर की प्रतिरक्षा करती है।

शरीर एंटीबॉडी होने का मतलब?

एटीबॉडी टेस्ट से जुड़े एक डॉक्टर का कहना है, “दरअसल, सेरो सर्वे से यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि कोरोना केस में देश में कितने लोगों के शरीर में एंटीबॉडी बन गई है। कई लोग ऐसे भी हैं, जो गाहे-बगाहे कोरोना वायरस से इंफेक्टेड हुए, लेकिन एसिंप्टोमेटिक रहे यानी उनमें कोरोना का कोई लक्षण नहीं दिखा। उनके शरीर ने नैसर्गिक रूप से ख़ुद वायरस से लड़ाई लड़ी और उसे हरा भी दिया यानी उनके शरीर में एंटीबॉडी बनने लगी है। सेरो सर्वे से ऐसे लोगों के बारे में भी जानकारी मिल रही है।”

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धारावी में 44.9 फीसदी लोगों में एंटीबॉडी

दरअसल, दिल्ली में भले पांच लोगों में से केवल एक के शरीर में कोरोना वायरस को हराने की एंडीबॉडी बनी हो, लेकिन मुंबई इस मामले में बहुत आगे है। यहां कंटेनमेंट जोन्स में एंटीबॉडी बनने का यह प्रतिशत 40 से भी ऊपर है। यानी हर सवा दो व्यक्तियों में एक व्यक्ति कोरोना को हराने का दमखम रखता है। यह प्रतिशत मुलुंड में 45.7 फ़ीसदी है तो एक समय कोरोना का हब रहे धारावी और वरली में यह 44.9 फ़ीसदी है। इसी तरह एक अन्य कंटेनमेंट जोन तिलकनगर में यह 43.4 प्रतिशत है।

इस नतीजे का मतलब?

नेशनल सेंटर फॉर डिजीज़ कंट्रोल (NCDC) के निदेशक एसके सिंह ने एक निजी चैनल से बात करते हुए कहा कि 21,387 लोगों का रेंडम सैंपल लिए गए। इनमें से तक़रीबन 23 फीसदी लोग संक्रमित पाए गए हैं। दिल्ली की आबादी लगभग 2.2 करोड़ मानी जाती है। इस हिसाब से क़रीब 46 लाख लोग दिल्ली में ऐसे हैं, जो कभी न कभी कोरोना संक्रमित हुए, लेकिन उनमें लक्षण या तो सिंप्टोमेटिक रहा या फिर एसिंप्टोमेटिक। लिहज़ा, उन्होंने कोई टेस्ट नहीं करवाया और कोरोना से ठीक ङी हो गए।

एंटीबॉडी ही लड़ेगी कोरोना से

मुंबई और दिल्ली समेत पूरे देश में सेरो टेस्ट करने वाले प्रायवेट लैबोरेटरी थायरोकेर (Thyrocare) के प्रबंध निदेशक अरोकास्वामी वेलुमनी कहते हैं कि पूरे देश में उनके लैब ने एंटीबॉडी टेस्ट के लिए 75000 लोगों के ब्लड सैंपल लिए और उनमें 17 फ़ीसदी लोगों के शरीर में एंटीबॉडी मौजूद पाया गया। लोगों के शरीर में एंटीबॉडी की मौजूदगी से पता चलता है कि कोरोना संक्रमण के पांच महीने बाद अब हालात बेहतर हो रहे हैं, क्योंकि वायरस के ख़िलाफ़ केवल और केवल एंटीबॉडी ही काम करेगी। जिन लोगों ने वायरस के संपर्क के माध्यम से या दूसरे कारणों से अपने अंदर एंटीबॉडी विकसित कर ली है, वे लोग सेफ़ ज़ोन में है।

उम्मीद की किरण

ऐसे समय जब कोरोना को लेकर भयावह आंकड़े पेश करके आम आदमी को डराया जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि भारत में कोरोना भारी तबाही मचाएगा, क्योंकि रोज़ाना कोरोना संक्रमण के 50 हज़ार केस और एक हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत की ख़बर मीडिया चला रही है। यानी मीडिया और सरकार मिलकर कोरोना का हव्वा खड़ा कर रहे हैं। इसके चलते लोगों के सामने कोरोना से मरने का तो नहीं, पोस्टकोरोना तंगी के कारण मरने का संकट ज़रूर खड़ा हो गया है, क्योंकि सरकारी कर्मचारियों और बहुत बड़ी कंपनियों को छोड़ दें, तो बाक़ी जगह काम करने वालों को आधी या 30 फ़ीसदी और कहीं-कहीं कोई वेतन नहीं मिल रहा है। करोड़ों लोगों की रोज़ा-रोटी छिन चुकी है। ऐसे में मेरा अनुभव और एंडीबॉडी परीक्षण देश के लोगों और सरकार के लिए उम्मीद की किरण बन सकती है। कम से कम बर्बाद हो रही अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करने का संकेतक तो हो ही सकती है।

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