डायबिटीज क्यों है लाइलाज बीमारी? कैसे पाएं इससे छुटकारा?

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पिछले कुछ साल से डायबिटीज़ भारत ही नहीं पूरी दुनिया में संकट बनकर उभरा है। फ़िलहाल, विश्व में क़रीब 35 करोड़ लोग डायबिटीज़ से पीड़ित हैं। भारत की हेल्थ मिनिस्ट्री के मुताबिक, डायबिटिक रोगियों की संख्या के मामले में भारत 6.3 करोड़ डायबिटीज़ के रोगियों के साथ दूसरे नंबर पर है। इससे ज़्यादा मामले केवल चीन में हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भविष्यवाणी की है कि आने वाले 15 साल में डायबिटीज़ इंसानी मौत का सातवां सबसे बड़ा कारण बन जाएगा।

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मानव के ख़ून में शुगर या चीनी अथवा ग्लूकोज़ की मात्रा के निश्चित सीमा पार करने की अवस्था ही डायबिटीज़ यानी मधुमेह कहलाती है। दरअसल, शरीर में ग्लूकोज़ का प्रोडक्शन लगातार होता रहता है। शरीर ग्लूकोज़ प्रोडक्शन के अनुपात में ही ग्लूकोज़ ख़र्च भी करता है। ख़र्च करने का मतलब ग्लूकोज़ को ऊर्जा में बदलना होता है। किसी कारणवश ग्लूकोज़ से जब ऊर्जा बनने वाली प्रक्रिया मंद पड़ने लगता है या ठीक से काम नहीं करती, तब ख़ून में ग्लूकोज़ की मात्रा बढ़ने लगती है। मतलब, ग्लूकोज़ बनता तो है, परंतु ख़र्च नहीं होता। लिहाज़ा, ख़ून में उसका स्तार बड़ी तेज़ी से बढ़ने लगता है। शूगर की मात्रा बहुत ज़्यादा हो जाने पर आदमी डायबिटिक क़रार दे दिया जाता है। शूगर की अधिकता के चलते ही डायबिटीज़ को इसीलिए चीनी की बीमारी भी कहते हैं। डायबिटीज़ की बीमारी बेहद ख़तरनाक़ बीमारी मानी जाती है।

दरअसल, कभी-कभार पाचन तंत्र में गड़बड़ी से भोजन पचाने वाले एंजाइम बनने प्रकिया धीमी हो जाती हैं, जिसके कारण एंजाइम कम बनने लगता है। अपर्याप्त एंजाइम का असर शरीर में इंसुलिन के निर्माण पर पड़ता है। यानी इंसुलिनी की मात्रा कम होने लगती है। इंसुलिन ही ग्लूकोज़ को सेल्स में पुश करता है, जहां ग्लूकोज़ ऊर्जा में कन्वर्ट होता है। इंसुलिन की मात्रा कम होने से ग्लूकोज़ से ऊर्जा बनने की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है। मेडिकल की भाषा में ग्लूकोज़ की निर्धारित मात्रा से ज़्यादा हो जाना ही डायबिटीज़ की अवस्था को न्यौता देती है।

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वस्तुतः डायबिटिक मरीज़ के ख़ून में कोलेस्ट्रॉल और फ़ैट कंपोनेंट्स ऐबनॉर्मल हो जाते हैं। इसके चलते नर्व्स में बदलाव होने लगते हैं, जिसका सीधा असर मरीज़ों की आंखकिडनीदिल और दिमाग़ जैसे महत्वपूर्ण अंगों पर पड़ने लगता है। इसीलिए डायबिटीज़ के मरीज़ के इन अंगों के डैमेज होने की आशंका हमेशा बराबर बनी रहती है। कहने का मतलब, एक बार आप डायबिटीज़ के शिकार हुए तो आप कभी भी दिल की नर्व में ब्लॉकेज से हार्ट अटैक के चपेटे में आ सकते हैं। इसी तरह अगर नर्वस सिस्टम पर असर पड़ा तो आपको ब्रेन हेमरेज हो सकता है। ब्लड प्रेशर बढ़ने या अचानक कम हो जाने का शरीर के दूसरे अंगों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। डायबिटीज़ का असर आपकी आंख पर भी पड़ सकता है। आपके आंख की रेटीना ख़राब हो सकता है। इसी तरह अगर शरीर में शुगर लेवल कंट्रोल नहीं हुआ तो आपकी किडनी भी डैमेज हो सकती है।  

मानसिक तनावअसंयमित खानामोटापा और व्यायाम की कमी डायबिटीज़ की मुख्य वजहें हैं। समय पर इलाज न हो तो डायबिटीज़ ख़तरनाक हो सकता हैं।  दरअसल, ये ऐसी बीमारी नहीं है जो चंद मेडिसिन्स से चली जाए। इससे जल्दी निजात पाना तक़रीबन नामुमकिन है। हां, कुछ तरीक़ों से इस पर क़ाबू ज़रूर रख सकता है।

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डायबिटीज़ के लक्षण

डायबिटीज़ होने के लक्षण रोगी ख़ुद महसूस करने लगता है। मसलनः

थकान महसूस होनाः शुरुआत दिनों में मरीज़ को थकान-सी लगती हैं। रात भर सोने के बाद भी ऐसा लगता हैं की नींद पूरी नही हुई हैं। शरीर में कमज़ोरी सी लगती हैं।

लगातार पेशाब आनाः रोगी को बार-बार पेशाब आता हैं। शूगर पेशाब के रास्ते बाहर निकलती है। इसके चलते मूत्र त्यागने की जगह चीटियां लगने लगती हैं।

बार-बार प्यास लगनाः रोगी को बार-बार प्यास लगती हैं क्योंकि पेशाब के रास्ते से सारा पानी बाहर हो जाता हैं। जिसके चलते प्यास लगनी शुरू हो जाती हैं।

आंखें कमज़ोर होनाः मरीज़ का आंखों पर बुरा प्रभाव पड़ता हैं। शुरुआत में ही आंखों की रोशनी कम होने लगती है और रोगी को धुंधला दिखाई देने लगता है।

वज़न का कम होनाः डायबिटीज़ का इंपैक्ट वज़न पर भी पड़ता है। रोगी का वेट एकदम से कम होने लगता है। धीरो-धीरे रोगी एकदम कमज़ोर हो जाता है।

तेज़ भूख लगनाः वज़न कम होने के साथ-साथ रोगी की भूख बढ़ जाती हैं। बार-बार खाना खाने का मन रहता है। ध्यान हमेशा भोजन पर ही लगा रहता है।

घाव का जल्दी न भरनाः रोगी के शरीर पर कोई घाव लग जाए तो वो जल्दी ठीक नहीं होता है। इस बीमारी में छोटा सा घाव भी बड़ा ज़ख़्म बन सकता हैं।

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रोगी में कई और लक्षण दिखते हैं-

शरीर में खुजली होने लगती है।

पैर सुन्न पड़ने लगते हैं।

मुंह सूख जाता है।

चिंता बढ़ती है और एकाग्रता में कम होती है।

पुरुष ठीक से सेक्स नहीं कर पाते हैं।

स्त्रियों में पीरियड में गड़बड़ी या बंद होना।

डायबिटीज़ के प्रमुख तथ्य

दरअसल, आहार में कार्बोहाइड्रेट सबसे प्रमुख तत्व हैये कैलोरी और उससे पैदा होने वाली ऊर्जा का स्रोत भी है। शरीर की दो तिहाई कैलोरी कार्बोहाइड्रेट से ही मिलती है। डाइजेशन सिस्टम में पहुंचने के फ़ौरन बाद कार्बोहाइड्रेट ग्लूकोज़ के छोटे-छोटे कणों में बदलकर ख़ून में मिल जाता है। यही वजह है कि भोजन के आधे घंटे भीतर ख़ून में ग्लूकोज़ लेवल बढ़ा हुआ मिलता है और दो घंटे में सबसे अधिक लेवल तक पहुंच जाता है।

ग्लूकोज़ का इस्तेमाल केवल मस्तिष्क ही नहीं, बल्कि शरीर की तमाम सेल्स करने लगती हैं। इसके छोटी ब्लड वेसल्स के जरिए सेल्स में प्रवेश करने से ही ऊर्जा बनती है। ये प्रॉसेस दो-तीन घंटे के अंदर ख़ून में ग्लूकोज़ लेवल कम कर देता है। आमतौर पर स्वस्थ व्यक्ति के ख़ून में ग्लूकोज़ स्तर भोजन से पहले 70 से 100 और भोजन के बाद ये 120 से 140 के बीच रहता है। ग्लूकोज़ लेवल 140 से ज़्यादा होने पर रोगी डायबिटिक हो जाता है। लापरवाह लोगों में ये 500 तक जा सकता है।

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डायबिटीज़ बीमारी बेहद कॉम्प्लिकेटेड होती है। बहुत लंबे समय तक डायबिटिक रहने पर मरीज़ की ब्लड कैरी करने वाली नलिकाएं नष्ट होने लगती हैं। इसका असर एंजियो-सिस्टम यानी हार्ट और न्यूरो सिस्टम पर भी होता। जो किडनी तक पहुंच जाता है। डायबिटीज़ का प्रतिकूल असर आंख के रेटिना पर भी देखा गया है।

डायबिटीज़ के प्रकार

इंसुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज़

नॉन-इंसुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज़

मालन्यूट्रिशन रिलेटेड डायबिटीज़

इंपेयर्ड ग्लूकोज़ टोलरेंस

जैस्टेशनल डायबिटीज़

सैकेंडरी डायबिटीज़

इंसुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज़

इंसुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज़ में पाचन-ग्रंथि इंसुलिन हार्मोन नहीं बना पाती जिससे ग्लूकोज़ सेल्स तक नहीं पहुंचता। इसे ज्यूविनाइल ऑनसेट डायबिटीज़’ के नाम से भी जाना जाता है। अमूमन ये किशोरावस्था में होती है। ऑटोइम्यूनिटी के कारण रोगी का वज़न कम हो जाता है। लिहाज़ा, ख़ून में ग्लूकोज़ लेवल सही रखने के लिए नियमित रूप से इंसुलिन इंजेक्शन देने पड़ते हैं।

नॉन-इंसुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज़

क़रीब नब्बे फ़ीसदी डायबिटीज़ नॉन-इंसुलिन डिपेंडेंट डायबिटीज़ होते हैं। जहां पाचन-ग्रंथि में इंसुलिन बनाता है परंतु कम मात्रा में। इससे ये बेअसर होता है या ग्लूकोज़ सेल्स में पुश नहीं कर पाता। जिससे ग्लूकोज़ की मात्रा अनियंत्रित हो जाती है। ये आनुवंशिक बीमारी है। कई परिवारों में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रहती है। वयस्कों और मोटे लोगों में जड़े जमा लेती है। अधिकतर रोगी वजन घटाकर या आहार नियंत्रित कर और औषधि लेकर इस पर क़ाबू पा लेते हैं।

मालन्यूट्रिशन रिलेटेड डायबिटीज़

भारत जैसे विकासशील देश में 15-30 आयु वर्ग के किशोर और किशोरियां आमतौर पर कुपोषण से ग्रस्त हैं। यानी उन्हें आवश्यक तत्वों और खनिज़ वाले आहार नहीं मिल पाते हैं। इससे पाचन ग्रंथि पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाती। लिहाज़ा, रोगियों को इंसुलिन के इंजेक्शन देने पड़ते हैं। रोगियों में इंसुलिन के इंजेक्शन बंद करने पर कीटोएसिडोसिस विकसित नहीं हो पाता।

इंपेयर्ड ग्लूकोज़ टोलरेंस

रोगी को 75 ग्राम ग्लूकोज़ का घोल पिलाने पर ख़ून में ग्लूकोज़ स्तर सामान्य और डायबिटीज़ के बीच हो जाए तो उस स्थिति को आईजीटी कहते हैं। इस श्रेणी के रोगी में प्रायः डायबिटीज़ के लक्षण दिखाई नहीं देते, परंतु भविष्य में डायबिटीज़ की संभावना बनी रहती है।

जैस्टेशनल डायबिटीज़

गर्भावस्था के दौरान डायबिटीज़ होने पर जैस्टेशनल डायबिटीज़ कहते हैं। गर्भावस्था में दो से तीन फ़ीसदी ऐसा होता है। गर्भावस्था में डायबिटीज़ की जटिलताएं भी बढ़ जाती हैं और भविष्य में मां और संतान को भी डायबिटिक होने की आशंका बढ़ जाती है।

सेकेंडरी डायबिटीज़

डायबिटीज़ दरअसल, जब दूसरी बीमारियों के साथ होती है तब उसे सेकेंडरी डायबिटीज़ कहते हैं। इसमें पाचन ग्रंथि नष्ट हो जाती है जिससे इंसुलिन का बनना असामान्य हो जाता है।

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डायबिटीज़ में बाक़ी इरेग्युलरटीज़

ब्लेड-प्रेशर

दिल धड़कने से ख़ून-नलिकाओं में ख़ून पंप होता है जिससे उनमें दबाव बनाता है। आमतौर पर दिल प्रति मिनट 60 से 80 बार की गति से धड़कता है। दिल की हर धड़कन के साथ ब्लड-प्रेशर बढ़ता है और कम होने पर घटता है। आसनकसरत या सोने की हालत ब्लड-प्रेशर प्रत्येक मिनट पर घट-बढ़ सकता है। अधेड़ व्यक्ति के लिए 130/80 एमएम एचजी से सामान्यतः कम ही होना चाहिए। इससे कुछ भी ऊपर हाई ब्लड-प्रेशर माना जाएगा।

हाई ब्लड-प्रेशर का अमूमन कोई लक्षण नहीं होता है। बहुत से लोगों को लंबे समय से ब्लड प्रेशर रहता है किंतु उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं होती है। इसका तनावहताशा अथवा अतिसंवेदनशीलता से संबंध नहीं होता है। शांत और आरामपसंद व्यक्ति को भी ब्लड-प्रेशर हो सकता है। हाई ब्लड-प्रेशर कंट्रोल न करने से लकवाहार्ट अटैक, हार्ट फेल या किडनी ख़राब हो सकती है।

कोलेस्ट्रोल

शरीर में हाई कोलेस्ट्रोल होने से दिल का दौरा पड़ने का ख़तरा चार गुना बढ़ जाता है। ब्लड-सर्कुलेशन में कोलेस्ट्रोल अधिक होने से नर्व्स पर मोटी लेयर जमा जमा हो जाती है। इससे नर्व्स मोटी और  कड़ी हो जाती हैं जिसमें दिल का ब्लड-सर्कुलेशन धीमा और कभी-कभी रुक जाता है। जब रुकता है तो सीने में दर्द होता है। हाई ब्लड-प्रेशर और हाई कोलेस्ट्रोल के साथ डायबिटीज़ भी हो तो पक्षाघात और दिल के दौरे का ख़तरा 16 गुना बढ़ जाता है।

साइलेंट हार्ट-अटैक

डायबिटीज़ रोगियों में हार्ट डिजीज़ कम आयु में हो सकते हैं। दूसरे अटैक का ख़तरा हमेशा बना रहता है। महिलाओं में पीरियड के पहले एस्ट्रोजन हार्मोन के कारण हार्ट डिजीज़ का ख़तरा पुरुषों की अपेक्षा कम होता है, पर डायबिटिक महिलाओं में हार्ट डिजीज़ का ख़तरा पुरुषों के बराबर होता है। हार्ट डिजीज़ का ख़तरा डायबिटीज़ की अवधि के साथ बढ़ता जाता है। इनमें हार्ट-अटैक ज़्यादा गंभीर और घातक होता है। डायबिटिक में हार्ट-अटैक आने पर छाती में दर्द नहीं होताक्योंकि दर्द का अहसास दिलाने वाला सिस्टम डैमेज्ड हो सकता है। इसे `साइलेंट हार्ट-अटैक‘ कहते हैं।

क्या करना चाहिए

चिंता और तनाव से दूर रहने की कोशिश करनी चाहिए।

तीन माह में एक बार बल्ड-शगर की जांच करवानी चाहिए

आल्पाहार और भोजन में फायबर, सब्ज़ी के साथ जौचनेगेहूंबाजरे की रोटी खानी चाहिए।

दही का अधिक सेवन और चना और गेहूं के 1:10 अनुपात के आटे की रोटी खानी चाहिए।

हल्का व्यायाम या सुबह एक घंटे वॉक करना चाहिए।।

डायबिटिक को सलाह

शूगर वाले पदार्थों का बहुत सीमित सेवन।

मोटापा कम करना और वजन नियंत्रित रखना।

सेक्स एक्टिविटीज़ में इनवॉल्व रहना।

मेडिसिन सही डाक्टर की राय से लेना।

कुछ समय नंगे पांव ज़मीन ख़ासकर ओंस पर चलना।

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डायबिटीज़ के लिए योग

डायबिटीज़ रोगियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ रही हैं। योग से डायबिटीज़ पर छुटकारा पाया जा सकता हैं। डायबिटीज़ से छुटकारा पाने के लिए आप कपालभातीअनुलोम-विलोम,  प्राणायाममद्रासन योग कर सकते हैं।

सूर्यनमस्कार

ये योग करने से शरीर में रक्त-संचार बेहतर होता हैं। इसे एक मिनट में चार-चार बार करना चाहिये।

प्राणायाम

प्राणायाम 8 प्रकार के होते हैं जिसमें से भ्रामरी डायबिटीज़ के लिए बहुत अच्छा हैं। इससे मन, दिमाग़ और न्यूरो सिस्टम को फ़ायदा पहुंचता हैं।

मद्रासन

इस योग में जमीन पर बैठकर दायें हाथ की हथेली को नाभि पर रखे और बायें हाथ की हथेली को दाएं हाथ पर  रखे, फिर सांस बाहर निकालते हुए आगे झुककर अपनी ठोड़ी को ज़मीन पर टिकायें और धीरे-धीरे सांस अंदर की तरफ लें। इसे 2 या 3 बार करें।

मेडिटेशन

ध्यान करने से मन और दिमाग़ शांत होता हैं। मेडिटेशन रोज़ाना करने से इन्सुलिन हार्मोन में अनियमितता ठीक रहती हैं जो की मधुमेह के रोगी के लिए बहुत ज़रूरी हैं।

व्यायाम

कसरत से ख़ून में शूगर का स्तर कम होता है। इससे ग्लूकोज़ का उपयोग करने की क्षमता पैदा होती है। प्रतिघंटा छह किलोमीटर की गति से चलने पर 30 मिनट में 135 कैलोरी खर्च होती है। साइकिलिंग से लगभग 200 कैलोरी समाप्त होती है।

त्वचा की केयर

डायबिटिक को स्किन की केयर करना ज़रूरी है। ग्लूकोज़ की अधिकता से बैक्टिरिया और फफूंदी की संभावना रहती है। चूंकि ब्लड सर्कुलेशन बहुत कम होता है, अतः हानिकारक बैक्टिरिया से बचने की क्षमता शून्य के बराबर होती है। प्रीवेंटिव सेल्स इन्हें खत्म करने में सक्षम नहीं होती है। हाई ग्लूकोज़ की मात्रा से डिहाइड्रेशन होता है जिससे त्वचा सूख जाती है और खुजली होने लगती है।

रोगियों की देखभाल

डायबिटीज़ रोगियों को अपने शरीर की ख़ुद देखभाल करनी चाहिये। उन्हें चाहिए कि हल्के साबुन या हल्के गरम पानी से नियमित स्नान करें। अधिक गर्म पानी से न नहाएं और नहाने के बाद शरीर को भली प्रकार पोछें और त्वचा की सिलवटों वाले स्थान पर विशेष ध्यान दें। वहां पर अधिक नमी जमा होने की संभावना होती है। जैसा कि बगलोंउरुमूल तथा उंगलियों के बीच। इन जगहों पर अधिक नमी से फफूंदी संक्रमण की अधिकाधिक संभावना होती है। त्वचा सूखी न होने दें। जब आप सूखीखुजलीदार त्वचा को रगड़ते हैं तो आप कीटाणुओं के लिए द्वार खोल देते हैं। पर्याप्त तरल पदार्थों को लें जिससे कि त्वचा पानीदार बनी रहे।

मधुमेह की जटिल अवस्था: पैर की तीन अंगुलियों में गैंगरीन

मधुमेह की बीमारी में रक्त में ग्लूकोज़ के उच्च स्तर के कारण स्नायु खराब होने से संवेदनशीलता जाती रहती है। पैरों की नियमित जांच करेंपर्याप्त रोशनी में प्रतिदिन पैरों की नजदीकी जांच करें। देखें कि कहीं कटान और कतरनत्वचा में कटावकड़ापनफफोलेलाल धब्बे और सूजन तो नहीं है। उंगलियों के नीचे और उनके बीच देखना न भूलें। उनकी नियमित सफाई करें। हल्के साबुन से और गरम पानी से प्रतिदिन साफ करें व पैरों की उंगलियों के नाखूनों को नियमित काटते रहें। पैरों की सुरक्षा के लिए जूते पहनें।

धूम्रपान से परहेज़

धूम्रपान का सेवन करने से दिल और हार्मोन प्रभावित होने लगते हैं। धूम्रपान का सेवन न करने से आपका स्वास्थ्य तो ठीक रहेगा ही साथ ही आपकी मधुमेह की बीमारी भी कंट्रोल रही रहेंगी ।

डायबिटीज़ बीमारी में आहार

डायबिटीज़ रोगी के लिए संतुलित आहार ज़रूरी है। डायबिटीज़ जल्दी ठीक नहीं होता। कभी-कभी तो लाइफ़लांग हो सकता है इसलिए रोगी अपना विशेष ध्यान रखें। रोग पर खाने की हर चीज़ का असर होता है। लिहाज़ा, किसी भी चीज़ के सेवन से पहले जांच लेनी चाहिए कि नुकसान तो नहीं होगा।

आहार रोगी की पोषण संबंधी ज़रूरत पूरी करने वाली हो। इसमें कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम है लेकिन बाक़ी ग्रेडिएंट उचित मात्रा में हों। आहार के लिए जड़ एवं कंदमिठाइयांपुडिंग और चॉकलेटतला हुआ भोजनसूखे मेवेचीनीकेलाचीकूसीताफल जैसे फल से बचाना चाहिए।

मेथी से डायबिटीज़ नियंत्रित हो जाता है। रात को एक चम्मच मेथी का दाना एक गिलास गुनगुने पानी में भिगो दें। सुबह उठकर बिना कुल्ला किए उसे चबाकर खा लें और पानी चाय की तरह पी लें। दो-तीन महीने के अंदर डायबिटीज़ पूरी तरह नियंत्रित हो जाता है।

टमाटर के रस में काली मिर्च और नमक डालकर सुबह खाली पेट पीयें। अंकुरित सब्ज़ियों को भी अपने खाने में शामिल करें। साबूत अनाज, चना, बाजराजई, आटाफाइवर भोजन में शामिल करें।

बादाम के सेवन से भी डायबिटीज़ कंट्रोल में रहता हैं। छह बादाम शाम को पानी में भिगो दें। सुबह उसे खाएं ले। इसका अच्छा असर होता है।

मसलन, अगर आपका नूडल्स खाने का मन है तो खाएं पर उसमें हरी सब्जियां डालकर।

दिन में दो गिलास दूध जरूर पीएं क्योंकि दूध में कार्बोहायड्रेट और प्रोटीन अच्छी मात्रा में होती हैं जो की ब्लड शूगर को कंट्रोल में रखता हैं।

उच्च फाइवर वाली सब्जियों को भी अपने खाने में शामिल करें जैसे मटरसेमब्रोकली, पालक और हरे पत्तेदार सब्जियों को खाने में शामिल करेंदालों को भी इस्तेमाल में लाये क्योंकि ये ब्लड ग्लूकोज़ लेवल पर कम असर डालता है अन्य कार्बोहायड्रेटयुक्त खाद्य पदार्थो की तुलना में।

छोटे-छोटे अंतराल के बाद भोजन करें। एकदम से ज़्यादा भोजन खाने से ब्लड शूगर लेवल बढ़ जाता हैं। मिठाई का सेवन भी नहीं करना चाहिये।

फाइवर वाले फल पपीता, सेब, संतरा, नाशपाती और अमरूद का सेवन भी करना चाहिए। इसमें फाइवर अधिक मात्रा में होती हैं। आम, केले और अंगूर का सेवन कम करें क्योंकि इनमें शूगर ज़्यादा होती हैं।

देश में डायबिडीज़ के सबसे बेहतरीन चिकित्सक डॉ वी मोहन के मुताबिक डायबिडीज़ के रोगी को खाने से लेकर रहन-सहन का ध्यान रखना चाहिए। खाने में थोड़ी लापरवाही भी नुकसान पंहुचा सकती है। लिहाज़ा, नियमित जांच और डॉक्टर की सलाह पर अमल रखना चाहिए। मेडिसिन समय पर लेना चाहिए और यथासंभव संयमित जीवन शैली अपनी चाहिए। प्रोटीन वाली सब्जियों और दालों को आहार में शामिल करने के अलावा नियमित  व्यायाम करना चाहिए। कुल मिलाकर अगर खुशहाल जीवन के अभिलाषी हर व्यक्ति को डायबिडीज़ को कंट्रोल में रखना चाहिए।

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डायबिटिक हैं तो भी बिंदास खाइए

आमतौर पर ये धारणा बन गई है कि सेहतमंद लोग संतुलित और स्वास्थ्यवर्धक आहार आसानी से मैनेज कर लेते हैं लेकिन डायबिटिक लोग खाने का सामान बड़ी मुश्किल से जुटा पाता है। क्या आप मानेंगे, ये धारणा तथ्यों से एकदम परे हैं। रिसर्च में साबित हो गया है कि डायबिटिक लोग भी वह सब कुछ खा सकते हैं जो आमतौर पर लोग खाते हैं। डायबिटिक होने का ये मतलब तो नहीं कि आप अपनी सारी ऊर्जा आहार की कैलोरी गिनने में ख़र्च कर दें। बीमारी को मारिए गोली और मस्ती से खाइए। ताकि देखकर लोग यही सोचे कि कौन कहता है डायबिटिक लोग ये नहीं खा सकते, डायबिटिक लोग वह नहीं खा सकते। डायबिटिक तो हर चीज़ खा रहे हैं।

वैसे शरीर की ज़रूरत के मुताबिक आहार, जिसमें हर तत्वों का समावेश हो, सबके लिए ज़रूरी है। मसलन, नाश्ता, दोपहर का भोजन और रात का भोजन क्या खाएं कि शरीर की हर आवश्यकता पूरी हो और अच्छा स्वाद भी मिल जाए।

नाश्ता

आईआईएम अहमदाबाद के मेडिकल ऑफ़िसर डॉ। किरण देसाई कहते हैं कि किसी डायबिटिक के लिए फलों का पूरा प्लेट सुबह का सर्वोत्तम नाश्ता होता है। सुबह-सबेरे सेब, आड़ू, केला और स्ट्राबेरी जैसे फल भरपेट खाना फ़ायदेमंद होता है। नमक खाने की तलब होने पर सूप लिया जा सकता है। एक बार खिचड़ी के साथ दूध भी लेने में कोई हर्ज नहीं है। इसके अलावा अन्न और फलों का मिश्रण भी एक बेहतर विकल्प माना जाता है। टोस्ट किए हुए उबले अंडे, टमाटर और ककड़ी का सलाद, अनन्नास का स्लाइस लगा ब्रेड, होलग्रेन खिचड़ी भी डायबिटिक के लिए शानदार नाश्ता हो सकता है। कहने का मतलब इतनी वेरायटी के आहार होने के बाद डायबिटिक व्यक्ति क्यों सोचे कि वह ठीक से खा नहीं सकता।

डायबटिक आदमी को लंच में डॉ। देसाई सूप या कम तेल वाले फैट-फ्री वेज करी और गेंहू की चापाती का भोजन खाने की सलाह देते हैं। डा। देसाई के शब्दों में, सूप और सलाद तो आदर्श है और ये भी अहम है कि आप इसे तैयार कैसे करते हैं। हां, इसमें ज़्यादा कैलोरी या अधिक शूगर वाले आइटम्स नहीं होने चाहिए अन्यथा सलाद खाने का मकसद ही ख़त्म हो जाएगा। चापाती पर बटर या घी नहीं लगाना चाहिए। ये सारी कवायद इसलिए है ताकि शरीर को उतनी ही कलौरी मिले जिससे शूगर नियंत्रण में रहे।

लंच

लंच में आप चिकन-राइस सूप ले सकते हैं। चिकन-राइस सूप बनाने के लिए 250 ग्राम चिकन के एकदम छोटे टुकड़े, आधा कप कतरी हुई सलाद की पत्तियां, आधा कप कच्चा चावल, एक छोटा प्यार चार टुकड़े में, चौकोर कटा एक कप गाजर, एक कप कटा हुआ शिमला मिर्च और तेज़ पत्ता और चुटकी भर मिर्च ले लें। चिकन के साथ सलाद की पत्तियों, प्याज, दो चुटकी नमक और तेज पत्ता मिलाकर उसे हल्की आंच में एक घंटे तक पका लें। चिकन के शोरबे को छानकर दूसरे बर्तन में रख दें और चिकन के टुकड़े को दूसरी साफ फ्लेट में रखकर उसमें से हड़ियां निकाल दें। इसके बाद शोरबे को चिकन के छोटे चुकड़े में मिला दें और उसमें चावल, शिमला मिर्च और गाजर मिला दें और पैन में रखकर 30 से 40 मिनट या तब तक पकाएं जब तक चावल एकदम से पक न जाए।

डिनर

फ्रूट-फ्यूज़न आप ख़ुद बना सकते हैं। इसके लिए एक कप ताजा कटा हुआ अंगूर, एक कप ताजा चार टुकड़े किया हुआ स्ट्राबेरी, एक कप ताजा महीन कटा हुआ आड़ू, आधा कप ब्राउन शूगर और दो कप कम फैट वाली दही ले लें। अंगूर, स्ट्राबेरी और आड़ू को मिला कर उन पर नमक छिड़क दें और उसके ऊपर दही डालकर फ्रीज में रख दें। दो घंटे बाद उसे निकाल लें और आइस्क्रीम के बॉउल में रखकर खाएं।

इसके बावजूद हर किसी का दायित्व होता है कि संतुलित और स्वास्थ्यवर्धक भोजन ले और तंदरुस्त रहे। आप भूखे मत रहिए और बहुत ज़्यादा खाइए भी मत कि बदहज़मी हो जाए। याद रखिए, सारी बीमारियों का जन्म पेट से होता है। अगर आपका हाज़मा सही तो कोई बीमारी आपके आसपास नहीं आ सकती।

 

तेज़ दिल की धड़कन प्यार नहीं डायबिटीज़ के लक्षण

अगर आपका दिल थोड़ा तेज़ धड़क रहा है, तब ये कतई मत समझिए कि आपको किसी से प्यार हो गया है। इसीलिए, आपका दिल धड़क रहा है। ये किसी प्यार-व्यार के कारण नहीं बल्कि आपके शरीर में होने वाले बदलावों के कराण हो रहा है। ये बदलाव ख़तरनाक भी हो सकते हैं। एक रिसर्च में खुलासा हुआ है कि जिसका दिल ज़्यादा तोज़ धड़क रहा है, भविष्य में उस पर डायबिटीज़ का अटैक हो सकता है। लिहाज़ा, आप भी दिल की धड़कन को प्यार से बिल्कुल न जोड़ें और फौरन डॉक्टर के पास जाएं और ज़रूरी सावधानी बरते ताकि आप नये ज़माने की इस बीमारी से दूर रहें।

दरअसल, अमेरिकी की पेनसिल्वेनिया स्टेट यूनीवर्सिटी के रिसर्चर्स पिछले चार साल से तेज दिल की धड़कन के परिणामों पर रिसर्च कर रहे हैं। रिसर्च टीम अब तक एक लाख लोगों के दिल की धड़कन का आकलन कर चुकी है। इसी शोध में ये पता चला है कि जिन लोगों के दिल की धड़कनें तेज होती हैंउनमें डायबिटीज़ का ख़तरा अपेक्षाकृत ज़्यादा होता है। निष्कर्षो में बताया गया है कि दिल की हर 10 ज़्यादा धड़कन डायबिटीज़ का जोखिम 23 फीसदी बढ़ा देती हैं। पेन-स्टेट यूनिवर्सिटी के न्यूट्रिशनल साइंस के असोसिएट प्रोफेसर ज़ियांग गाओ ने रिसर्च की अगुआई की है। प्रो गाओ ने साफ़-साफ़ कहा कि तेज हृदय गति वाले लोगों में डायबिटीज़ का ख़तरा ज़्यादा पाया गया है। ये निष्कर्ष चेताता है कि हृदय दर मापने के साधन व्यक्ति में डायबिटीज़ के भावी उच्च जोखिम का पता लगा सकते हैं।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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