सुप्रीम कोर्ट की नुपूर शर्मा को नसीहत, तसलीम अहमद रहमानी पर मौन

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हरिगोविंद विश्वकर्मा

भारतीय जनता पार्टी की प्रवक्ता रही नुपूर शर्मा एक बार फिर चर्चा में हैं। वैसे चर्चा में तो वह महीने भर से रही हैं, लेकिन बीच में केंद्र सरकार द्वारा अग्निपथ की घोषणा और महाराष्ट्र में राजनीतिक उठा-पटक के चलते कुछ दिन के लिए वह नेपथ्य में चली गई थीं, लेकिन देश की सबसे बड़ी अदालत ने राजस्थान के उदयपुर में मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा की गई वीभत्स हत्या और देश भर में मुसलमानों द्वारा की गई हिंसा के लिए सीधे नुपूर शर्मा को ज़िम्मेदार ठहरा कर उन्हें एक बार फिर से सुर्ख़ियों में ला दिया। नुपूर को देश से माफ़ी मांगने की सलाह देते हुए सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला ने कहा कि नुपूर के बयान से देश की लोगों की भावनाओं को ठेस लगी है।

सुप्रीम कोर्ट के इस विवादास्पद फ़ैसले से लोग हैरान हैं। विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष आलोक कुमार द टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में देश की सबसे बड़ी अदालत की इस तरह की टिप्पणी पर घोर आश्चर्य व्यक्त किया है। क़ानून के जानकारों का भी कहना है कि दोनों जजों की इस विवादास्पद टिप्पणी से देश में धर्मांधता को बढ़ावा मिल सकता है। कट्टरपंथी समझेंगे कि देश की सबसे बड़ी अदालत उनके पाशविक कृत्य को कथित तौर स्वाभाविक प्रतिक्रिया मान कर उचित ठहरा रही है। देश का एक बहुत बड़ा तबक़ा समझ नहीं पा रहा है कि उदयपुर में दर्जी की गला रेत कर हत्या मोहम्मद रियाज़ और मोहम्मद गौस नाम के दो धर्मांध व्यक्तियों ने की तो उसके लिए नुपूर कैसे ज़िम्मेदार हो गईं।

बेंच की ओर से की गईं सख़्त टिप्पणियों पर गऊ महासभा के नेता अजय गौतम की ओर से मुख्य न्यायाधीश एनवी रमण को लेटर पीटिशन भेजी गई है। इसमें सीजेआई से जस्टिस सूर्यकांत द्वारा की गई टिप्पणियों को वापस लेने का निर्देश देने की मांग की गई है। अजय गौतम ने तर्क दिया है “ऐसा किसी कोर्ट में साबित नहीं हुआ है कि नूपुर शर्मा द्वारा दिया गया बयान ग़लत है।” याचिकाकर्ता का तर्क है, “नुपूर शर्मा ने जो भी बयान दिया था वह सूचना दस्तावेज़ों में दर्ज़ हैं और इस्लाम धर्म के आलिमों और समाज द्वारा स्वीकृत हैं। ऐसे में नुपूर शर्मा ने कोई अपराध नहीं किया है।” बात भी सही है, नुपूर शर्मा ने जो कुछ भी कहा वह दस्तावेज़ों में उपलब्ध है।

नुपूर शर्मा की याचिका पर सुनवाई के दौरान जज ग़ुस्से में तल्ख़ टिप्पणी की। बेंच को जब बताया गया कि नुपुर शर्मा की जान को खतरा है। इसलिए उनके ख़िलाफ़ देश भर में दर्ज़ मामले को दिल्ली में ट्रांसफर कर दिया जाए। इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने पलट कर सवाल किया, “आपको ख़तरा है या राष्ट्र की सुरक्षा के लिए आप ख़तरा बन गई हैं? और दिल्ली पुलिस ने क्या किया है? कृपया हमें अपना मुंह खोलने के लिए मजबूर न करें। जब आपने शिकायत की, तो व्यक्ति को गिरफ़्तार कर लिया गया। लेकिन आपके ख़िलाफ़ एफ़आईआर होने पर भी आपको टच नहीं किया गया। पुलिस ने आपके ख़िलाफ़ कर्रवाई करने की हिम्मत नहीं की। इससे आप समझ लीजिए कि आपका कितना दबदबा है।”

जस्टिस जेबी पारदीवाला ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा था कि उदयपुर हत्याकांड समेत देश भर में जो कुछ भी हो रहा है, उसके लिए यह महिला इकलौती ज़िम्मेदार है। सबसे अहम बात या कि जजों ने पत्रकार जुबैर अहमद का ज़िक्र ते किया लेकिन दोनों में से किसी भी जज ने असली ग़ुनाहगार तसलीम अहमद रहमानी के बारे में कोई भी टिप्पणी नहीं की। कई लोगों का कहना है कि यह भी संभव है कि शायद जजों को भी नहीं पता हो कि यह तसलीम अहमद रहमानी कौन है। नहीं तो वह रहमानी के बारे में ज़रूर कुछ न कुछ कहते।

वैसे इस देश में एक हज़ार लोगों से पूछा जाए कि क्या वे तसलीम अहमद रहमानी को जानते हैं। तो यकीन मानिए बमुश्किल एकाध लोग ही उन्हें जानते होंगे। यहां तक कि जो लोग पैग़ंबर मोहम्मद साहब के ख़िलाफ़ कथित टिप्पणी के लिए नुपूर की गिरफ़्तारी की मांग कर रहे हैं, उनसे भी पूछ लीजिए तो नहीं बता पाएंगे कि तसलीम अहमद रहमानी कौन हैं। यही हिंदू धर्म की ख़ासियत है। हिंदुओं के नोटिस न लेने से रहमानी गुमनाम रह गए। लेकिन मुसलमानों ने उत्पात करके नुपूर शर्मा को विश्व स्तर पर चर्चित कर दिया।

जो नुपूर शर्मा अभी महीने भर पहले तक देश के राजनीतिक फलक पर एकदम से ग़ुमनाम थीं। जिन्हें अब तक केवल टीवी न्यूज़ देखने वाले लोग ही जानते थे। पिछले एक महीने से उनके नाम की चर्चा पूरी दुनिया में है। मतलब, उन्हें दुनिया भर के मुसलमानों ने हिंदू नेता के रूप में स्थापित कर दिया। नुपूर शर्मा सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रही हैं। हर जगह लोग पूछ रहे हैं, कि आख़िर नुपूर शर्मा कौन हैं और उन्होंने मुसलमानों के पैग़ंबर मोहम्मद साहब के बारे में ऐसा क्या कह दिया जिससे राजनीतिक भूचाल आ गया है। एक तरफ़ से सारे के सारे मुसलमान आग-बबूला हो गए हैं।

दरअसल, मई 2022 के अंतिम सप्ताह में अंग्रेज़ी टीवी न्यूज़ चैनल टाइम्स नाऊ के ऐतिहासिक गरमागरम डिबेट में दो राजनीतिक नेता एक दूसरे से भिड़ गए थे। एक हिंदू और एक मुसलमान। एक ओर उस डिबेट में बतौर भाजपा प्रवक्ता नुपूर शर्मा (Spokesperson Nupur Sharma) थीं और दूसरे पैनलिस्‍ट तसलीम अहमद रहमानी थे। सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया के नेता रहमानी दिल्ली के ओखला विधानसभा से आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्ला खान के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ चुके हैं। उन्होंने शिवलिंग और हिंदू धर्म के बारे में ऐसी बात कही जिससे नूपुर शर्मा भड़क गईं थी पैग़ंबर मुहम्मद और आयशा की शादी के बारे में कमेंट कर दिया था।

हिंदू देवता के बारे में रहमानी की बेहद तल्ख़ टिप्पणी से नुपूर एकदम से आक्रोशित हो गईं और कथित तौर पर पैंगंबर मोहम्मद के बारे में उन्होंने वहीं बात कह दी जो नौवीं सदी में हदीस में लिखा गया है। जिसे मुसलमान मानते रहे हैं और जिसका हवाला कई मुसिल्म धर्मगुरु देते आ रहे हैं। इस बात को कमोबेश हर दुनिया का हर मुसलमान जानता भी है और स्वीकार भी करता है। बहरहाल, डिबेट ख़त्म हो गया। सारे गेस्ट चले गए और अपनी दिनचर्या में मशग़ूल हो गए। डिबेट सुनने वाले हिंदुओं ने रहमानी के शिवलिंग और हिंदू धर्म के बारे में दिए बयान का नोटिस ही नहीं लिया।

धार्मिक रूप से एकदम परिपक्व हो चुका हिंदू जानता है कि किसी व्यक्ति चाहे वह दूसरे धर्म, मज़हब या रिलिजन का हो, के बयान देने, फिल्म अथवा वेबसारीज़ बना देने से न तो उसके धर्म का और न ही उसके आराध्य का अपमान हो सकता है। यही वजह है कि हिंदू धर्म की खिल्ली उड़ाते हुए पीके एवं ओएमजी जैसी फिल्में और आश्रम जैसी वेब सीरीज़ बनती हैं, लेकिन ‘जियो और जीने दो’ की फिलॉसफी में यक़ीन करने वाले हिंदू समाज को फ़र्क़ ही नहीं पड़ता। हिंदुओं ने रहमानी के बयान को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानकर नज़रअंदाज़ कर दिया। इससे बेचारे तस्लीम रहमानी ग़ुमनाम रह गए। उन्हें आज भी कोई नहीं जानता।

लेकिन नुपूर के बयान पर मुसलमान चुप नहीं रहे। कुछ मुसलमानों लगा कि कोई हिंदू उनके हदीस का हवाला देकर उनके पैग़ंबर के बारे में कोई बयान कैसे दे सकता है, लिहाज़ा, जिसने भी बयान दिया है, उसने रसूल का अपमान करने की ग़ुस्ताख़ी कर दी। पत्रकार जुबैर अहमद ने तो नुपूर शर्मा के बयान की क्लिपिंग को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया। इसके बाद एक तरफ़ से हर शिक्षित-अशिक्षित और उदार-कट्टरपंथी मुसलमान सभी भूल गए कि वे इंसान भी हैं। एक तरफ़ से सभी को लगने लगा कि यह तो उनके पैंगंबर का अपमान है। देश का आम आदमी समझ नहीं पा रहा था कि इन मुसलमानों को हो क्या गया है। ये लोग तिल का ताड़ बाने पर क्यों तुले हुए हैं।

ख़ासकर कट्टरपंथी तो नुपूर शर्मा के बयान को सुनकर जैसे पागल हो गए। कोई नुपूर की हत्या करने की बात करने लगा तो कोई रेप करने की बात कहने लगा। आज़मगढ़ के शिबली कॉलेज के छात्रसंघ के अध्यक्ष अब्दुल रहमान ने सार्वजनिक तौर पर कह दिया कि पैग़ंबर के सम्मान की रक्षा करने के लिए उन्हें करोड़ों हिंदुओं का सिर क़लम करने में तनिक भी हिचकिचाहट नहीं होगी। उसके उत्तेजक बयान को सुनकर मुस्लिम छात्रों की भीड़ नारा लगाने लगी, ग़ुस्ताख़-ए-रसूल की एक ही सज़ा, सर तन से जुदा – सर तन से जुदा।

एमआईएम के लोकसभा सदस्य इम्तियाज़ ज़लील ने नुपूर को चौराहे पर फांसी पर चढ़ाने की मांग कर दी। कल्पना कीजिए, जो व्यक्ति कभी एनडीटीवी जैसे न्यूज़ चैनल का पत्रकार रहा हो, वह इतना धर्मांध है। उसके मन में इतना ज़हर भरा है, तो वह कितना निष्पक्ष पत्रकार रहा होगा? जो एक महिला को चौराहे पर खुलेआम फ़ांसी देने की पैरवी कर रहा है, इसका मतलब वह इंसान है ही नहीं। वह इंसान के रूप में असामाजिक तत्व है, जिसकी देश के संविधान में कोई आस्था नहीं। ज़लील की ही तरह ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन के अध्यक्ष ‎असदुद्दीन ओवैसी भी नुपूर के ख़िलाफ़ ज़हर उगल रहे हैं। इससे तो यही लगा कि एक तरफ से सारे मुसलमान इस मुद्दे पर आपा खो बैठे और पूरे देश में दंगा-फ़साद करने लगे।

कट्टरपंथी तो कट्टरपंथी, अपने को बुद्धिजीवी कहने वाले मुसलमान भी ग़ुस्से में नज़र आए। इस्लामिक मुल्कों की भी भृकुटी तन गई। सभी लोग भारत को आँख तरेरने लगे। भारत में निर्मित सामान का बहिष्कार कर दिया। इससे भारत सरकार बैकफुट पर आ गई। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता को सफ़ाई देते हुए कहना पड़ा कि नुपूर शर्मा का बयान भारत सरकार का बयान नहीं है। राजनीतिक टीकाकारों का स्पष्ट कहना है कि नुपूर के विरोध के मुद्दे पर सभी मुस्लिम नेता तालिबान के किरदार में आ गए हैं। लोग नुपूर का गला रेतने जैसी पाशविक बात कर रहे हैं। सब भूल गए हैं कि दुनिया सभ्य हो चुकी है। हर जगह विधि का शासन है।

उदयपुर में तो दो वहशी दरिंदों ने नुपूर शर्मा के समर्थन में सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखने वाले दर्जी कन्हैया लाल साहू का धोखे से गला ही काट दिया। स्वतंत्र भारत में संभवतः यह सबसे वीभत्स एव दिल दहला देने वाली वारदात है। वीभत्स हत्या करने के अपने कृत्य को ग्लोरिफाई करने के लिए हत्यारों का वीडियो बनना और उसे सोशल मीडिया पर शेयर करना एकदम से दरिंदगी है। उदयपुर की दरिंदगी से इस्लाम की अवमानना हो रही है। दुनिया के कोने-कोने में यह संदेश जा रहा है कि इस्लाम के अनुयायी सहिष्णु नहीं हैं। इससे उदारवादी और शांतिप्रिय मुसलमानों का बड़ा नुक़सान हो रहा है।

दुनिया में एक बड़ा तबक़ा जिहाद, आतंकवाद, लगा काटने की प्रवृत्त और कट्टरता से आजिज़ आ चुका है। ऐसे लोग मानने लगे हैं कि इस्लाम से जिहाद को अलग करने की ज़रूरत है। इस्लाम से जिहाद और काफ़िर की अवधारणा का ख़त्म न की गई तो आतंकवाद और बढ़ेगा। ऐसे लोग नुपूर का खुला समर्थन कर रहे हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के कमेंट से नुपूर की मुसीबत बढ़ गई है। लोग कह रहे हैं कि विवादास्पद टिप्पणी से जजों ने मान लिया कि भड़काऊ बयान के बाद हिंसा या हत्या अवश्यसंभावी है। यह तो देश की सबसे बड़ी अदालत का इस्लामी कट्टरपंथ को बढ़ावा देने जैसा रिमार्क है। अब कट्टरपंथी हिंसा करने को न्यायोचित ठहरा कप कह सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने भी नुपूर को दोषी माना है। इससे नुपूर के जीवन के लिए ख़तरा और बढ़ गया है।

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