बैंकिंग क्षेत्र: एनपीए बड़ी चुनौती (Banking Sector : NPA Is Big Challenge)

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सरोज कुमार

अर्थव्यवस्था देश की मजबूती का आधार है, और इस आधार को मजबूत बनाने में बैंक बड़ी भूमिका निभाते हैं। बैंकों का मजबूत होना अर्थव्यवस्था की एक अनिवार्य शर्त है। कुछ सालों से यह शर्त एक अनिवार्य प्रश्न भी बना हुआ है। बैंकिंग क्षेत्र में संकट के प्रश्न लगातार उठ रहे हैं, और महामारी ने इस प्रश्न को अधिक गंभीर बना दिया है। प्रश्न यह कि एक संकटग्रस्त बैंकिंग प्रणाली आसन्न चुनौतियों से कैसे निपट पाएगी?

देश के बैंकिंग क्षेत्र के सामने दो तरह की चुनौतियां हैं -आंतरिक और बाहरी। आंतरिक चुनौतियां न हों तो आधुनिक बैंकिंग की बाहरी चुनौतियों से बैंक आसानी से निपट लेंगे। लेकिन आंतरिक चुनौतियां बैंकों को परेशान कर रही हैं, खासतौर से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को। बैंकों के सामने बुरे ऋण यानी गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) की चुनौती चट्टान की तरह खड़ी है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के आंकड़े बताते हैं कि 31 मार्च, 2021 तक बैंकों की 8.34 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति एनपीए थी। दिसंबर 2021 में आई आरबीआइ की वित्तीय स्थिरता रपट कहती है अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की सकल गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (जीएनपीए) का अनुपात सितंबर 2022 तक बढ़कर 8.1 फीसद होने वाला है, जो सितंबर 2021 में 6.9 फीसद था। तनावपूर्ण परिस्थिति में यह 9.5 फीसद तक भी जा सकता है। यह चिंताजनक है।

एनपीए एक ऐसी बीमारी है, जो बैंकों को दीमक की तरह खोखला कर रही है। दिया गया कर्ज तय समय के भीतर ब्याज सहित वापस लौट आए तो बैंक अपनी आर्थिक मजबूती के बल प्रौद्योगिकीय अवसंरचना विकास और कौशल विकास जैसी आधुनिक बैंकिंग की हर चुनौतियों से निपट सकते हैं। लेकिन एक लंबे समय से ऐसा हो नहीं पा रहा है। 2008 की मंदी के दौरान शुरू हुई एनपीए की कहानी बैंकों की बलि लेने तक पहुंच गई है। पहले आठ बैंकों का विलय हुआ, अब निजीकरण की कवायद है। एनपीए के कारण बैंक सरकार की नजर में घाटे का सौदा हैं। आरबीआइ के आकड़े बताते हैं वित्त वर्ष 2008-09 से 2013-14 तक जो सकल एनपीए लगभग पांच लाख करोड़ रुपये था, वह वित्त वर्ष 2014-15 से 2019-20 तक की अवधि के दौरान बढ़कर 18.28 लाख करोड़ रुपये हो गया। एनपीए में यह उछाल लगभग 365 फीसद बैठता है।

सरकार और आरबीआइ ने इस दौरान एनपीए के समाधान के जो उपाय अपनाए, बैंकों को लाभ कम नुकसान अधिक हुए। रणनीतिक कर्ज पुनर्गठन योजना 2015, इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आइबीसी) 2016, सरकारी बैंकों के विलय और बैड बैंक की स्थापना जैसे उपायों से एनपीए के आंकड़े नीचे जरूर आए, लेकिन बैंकों को ऊंची कीमत चुकानी पड़ी। बेशक सरकार ने बैंकों के पुनर्पूंजीकरण जैसा कदम भी उठाया, लेकिन एनपीए समाधान प्रक्रिया में हुए पूंजी नुकसान के मुकाबले यह ऊंट के मुंह में जीरा ही था। वित्त वर्ष 2017-18 में 90 हजार करोड़ रुपये, 2018-19 में एक लाख छह हजार करोड़ रुपये, 2019-20 में 70 हजार करोड़ रुपये, 2020-21 में 20 हजार करोड़ रुपये और 2021-22 में 20 हजार करोड़ रुपये सरकार ने बैंकों में डाले हैं, जो एनपीए में डूबी राशि से काफी कम है।

सरकार की ओर से अपनाए गए उपायों के कारण मार्च 2021 तक एनपीए घटकर 8.34 लाख करोड़ रुपये हो गया। इसमें से 6,16,616 करोड़ रुपये सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का था। वित्त राज्य मंत्री डॉ. भागवत कराड की तरफ से दिसंबर 2021 में संसद में दिए गए एक लिखित जवाब के अनुसार, सितंबर 2021 में सरकारी बैंकों की 5,40,442 करोड़ रुपये की रकम एनपीए थी। यानी मार्च से सितंबर के बीच 76,174 करोड़ रुपये मूल्य के एनपीए का समाधान हुआ। इसमें से कितनी राशि बैंकों में वापस लौटी, या रिकवरी की दर क्या थी, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। यहां यह जान लेना जरूरी है कि 2014 में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की मात्र 2,24,542 करोड़ रुपये की संपत्ति एनपीए थी। बैंकों की संपत्ति का एनपीए होना बड़ा नुकसान है, लेकिन एनपीए का समाधान भी कुछ खास लाभदायक नहीं रहा है। समाधान के रास्ते मामूली राशि ही बैंकों में लौटती है। यह राशि कितनी है? वित्त राज्य मंत्री कराड के ही लिखित जवाब से इसका एक अंदाजा भर लगता है। उन्होंने दिसंबर 2021 में अपने जवाब में कहा था कि पिछले सात वित्त वर्ष के दौरान सरकारी बैंकों के 5,49,327 करोड़ रुपये एनपीए की रिकवरी हुई। लेकिन रिकवरी की दर उन्होंने नहीं बताई।

एनपीए रिकवरी दर का अंदाजा आरबीआइ की वित्तीय स्थिरता रपट से लगता है। रपट में कहा गया है कि सितंबर 2019 और सितंबर 2021 के बीच आइबीसी के तहत सुलझाए गए कॉरपोरेट ऋण के 60 मामलों में रिकवरी की औसत दर 24.7 फीसद थी। यानी इस एक चंक में बैंकों द्वारा कर्ज में दी गई रकम का 75.3 फीसद हिस्सा डूब गया। अर्थव्यवस्था की भाषा में इस नुकसान का आधुनिक नाम ’हेयरकट’ है। अब अंदाजा लगाइए कि 5,49,327 करोड़ रुपये की रिकवरी में ’हेयरकट’ कितना हुआ होगा! कई मामलों में हेयरकट का औसत 80 से 90 फीसद तक होता है। जरा सोचिए 100 रुपये खर्च कर के 10 रुपये कमाने वाला कौन-सा कारोबार चल सकता है। लेकिन बैंक चल रहे हैं, लाभ में भी हैं। लाभ में रहना उनकी मजबूरी भी है। घाटा उनके लिए दुधारी तलवार की तरह है। सरकारी बैंकों ने मौजूदा वित्त वर्ष की प्रथम तिमाही में 14,012 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ दर्ज किया। दूसरी तिमाही में लाभ बढ़कर 17,132 करोड़ रुपये हो गया। दोनों तिमाहियों का लाभ योग 31,114 करोड़ रुपये होता है, जो पिछले पूरे वित्तवर्ष (2020-21) के कुल लाभ 31,820 करोड़ रुपये के लगभग बराबर है। एचडीएफसी, आईसीआईसीआई और कोटक महिंद्रा जैसे निजी बैंकों ने भी लाभ दर्ज किए हैं। हां, एनपीए की समस्या नहीं होती तो यह लाभ कई गुना अधिक होता।

एनपीए का खेल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ अधिक है। क्योंकि हर जोखिम में इन्हें ही जूझना होता है। इस खेल में बैंक कंगाल हो रहे हैं, और खेल के खिलाड़ी मालामाल। दिक्कत यह कि सरकार अब सुधार के बहाने बैंकों से पीछा छुड़ाने की जुगत में है। वह जनता के जमा पैसों की जवाबदेही से खुद को अलग कर लेना चाहती है। बैंकों के विलय के बाद निजीकरण की बात कुछ ऐसी ही है। निजीकरण सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के सामने एक नई चुनौती है। सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में अपनी हिस्सेदारी 51 फीसद से घटाकर 26 फीसद करने के लिए संविधान संशोधन चाहती है। नीति आयोग दो बैंकों और एक बीमा कंपनी के निजीकरण की सिफारिश पहले ही कर चुका है। सवाल उठता है यदि बैंकों का प्रबंधन नीजी हाथों में गया तो अर्थव्यवस्था की दिशा क्या होगी। जोखिम भरे वातावरण में आर्थिक चुनौतियों से निपटने में जो मदद सरकारी बैंकों ने की है, क्या निजी बैंक वह कर पाएंगे? यहां एक तर्क यह है कि सभी सरकारी बैंक निजी हाथों में नहीं जाएंगे। लेकिन निजीकरण का कानून बन जाने के बाद यह तर्क कबतक टिका रहेगा? यदि बैंक निजी हो गए तो क्या देश में बैंकिंग सेवा की पहुंच का मौजूदा मॉडल भी बचा रह पाएगा? फिलहाल 12 सरकारी बैंक 86,887 शाखाओं के जरिए और 22 निजी बैंक 28,118 शाखाओं के साथ लगभग 80 फीसद लोगों तक सेवाएं पहुंचा रहे हैं। निजी बैंकों के डूबने के भी खतरे हैं। यस बैंक और लक्ष्मी विलास बैंक की कहानी अधिक पुरानी नहीं है। यस बैंक को उबारने भारतीय स्टेट बैंक को ही हाथ लगाना पड़ा था।

बैंकों का राष्ट्रीयकरण इन्हीं तमाम चिंताओं के कारण किया गया था। आरबीआइ की 2006 और 2008 के बीच आई एक रपट बताती है कि आजादी के बाद 1947 से 1955 के बीच बैंक 361 बार डूबे थे, और उनमें जमा जनता की गाढ़ी कमाई भी डूब गई थी। बैंकों की ये डूबाऊं सुविधा भी बंबई, कलकत्ता, मद्रास और दिल्ली जैसे बड़े शहरों में ही सुलभ थी। आमजन तक बैंकिंग सेवा पहुंचाने के लिए सरकार ने 1955 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया एक्ट बनाया, और इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया का राष्ट्रीयकरण कर दिया। भारतीय स्टेट बैंक अस्तित्व में आया। इसके बावजूद 1970 के दशक तक बैंकों में जमा कुल 44 फीसद पैसा और बैंकों द्वारा दिए गए 60 फीसद कर्ज सिर्फ पांच शहरों तक सीमित थे -बंबई, कलकत्ता, दिल्ली, मद्रास और अहमदाबाद। अब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 19 जुलाई, 1969 को एक अध्यादेश के जरिए 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया, 1970 में अध्यादेश कानून बन गया। 1980 में छह और बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया।

आज भारतीय बैंकिंग प्रणाली में 12 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, 22 निजी बैंक, 46 विदेशी बैंक, 56 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, 1485 शहरी सहकारी बैंक, और 96,000 ग्रामीण सहकारी बैंक के अलावा सहकारी क्रेडिट संस्थान काम कर रहे हैं। कुल 213,145 एटीएम हैं। इसके बावजूद आवश्यकता के अनुरूप कर्ज सुलभ नहीं है। अकेले एमएसएमई क्षेत्र के लिए 25.8 लाख करोड़ रुपये कर्ज की कमी है। आबादी और अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ आगे मांग बढ़ने ही वाली है। बैंकिंग सुधार की दिशा इसी तरफ होनी चाहिए। आधुनिक बैंकिंग की जरूरतें पूरी करने के लिए 2018 में अपनाए गए ’एनहेंस्ड एक्सेस एंड सर्विस एक्सेलेंस (ईएएसई)-1.0’ सुधार एजेंडे के बाद सातों दिन 24 घंटे बैंकिंग सेवा के लिए अगस्त 2021 में शुरू हुआ इसका चौथा संस्करण ईएएसई-4.0 स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि आधुनिक डिजिटल युग में भी भारत की एक बहुत बड़ी आबादी परंपरागत बैंकिंग पर ही भरोसा करती है। बैंकिंग क्षेत्र की यह सबसे बड़ी चुनौती है।

(वरिष्ठ पत्रकार सरोज कुमार इन दिनों स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)

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