Home Views

Views

Thoughts, comment and analysis

आध्यात्मिक चेतना के अग्रदूत महर्षि अरविंद घोष

0
5 दिसंबर को पुण्यतिथि पर विशेष भारत देश में एक से बढ़कर एक क्रांतिकारी हुए, जिन्होंने भारत को आजाद कराने में अपनी अहम भूमिका निभाई।...

अंग्रेजों के आगमन के समय तक देश का नाम न तो भारत था और...

0
हरिगोविंद विश्वकर्मा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जबसे जी-20 के शिखर सम्मेलन के लिए ‘प्रेसिडेंट ऑफ भारत’ शब्दावली का प्रयोग किया है, तब से पूरे देश...

ज्योति मौर्या प्रकरण – समाज का स्त्रीविरोधी चेहरा बेनकाब (Jyoti Maurya Episode – The...

0
हरिगोविंद विश्वकर्मा मनुष्य दावा करता है कि वह सामाजिक प्राणी है। इसी आधार पर यह स्वयंभू सामाजिक प्राणी कहता रहा है कि पशुओं के विपरीत...

स्रिची अंतरदृष्टी बदलणे गरजेचे आहे

0
अंतिम समयी शिव प्रभू अवतरले या अवनीवरी। ज्ञानामृताचा कलश स्थापिला स्रीच्या मंगल शिरी। जाग जाग तु नारी आणि घे सतीचे वाण। शिवशक्ती बनुनी करावे विश्वाचे कल्याण। जसे फुलांमध्ये...

निर्वाचन आयोग ने शिवसेना के संविधान को अलोकतांत्रिक क्यों कहा?

0
हरिगोविंद विश्वकर्मा कभी हिंदू हृदय सम्राट के रूप दुनिया भर में लोकप्रिय बालासाहेब ठाकरे के परिवार और उनके वंशजीय उत्तराधिकारियों के लिए शुक्रवार का दिन...

स्मृति: लेनिन – औद्योगिक क्रांति और विश्व युद्ध के बाद बीसवीं सदी की नस्लें...

0
डॉ. वंदना चौबे मुक्तिबोध पूछते हैं- ‘क्या करूँ/ कहाँ जाऊं/ दिल्ली या उज्जैन’ इस बेचैनी में गति है, तनाव है लेकिन नामवर सिंह ने निर्मल वर्मा...

देश में समान नागरिक संहिता की दस्तक

0
हरिगोविंद विश्वकर्मा जब से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि भारतीय जनता पार्टी सभी लोकतांत्रिक चर्चाओं और बहसों के पूरा होने के...

भ्रामक स्थितियों से गुज़र रहे हैं देश के कई मार्क्सवादी विचारक

0
वीके सिंह की किताब ‘ह्यूगो चावेज़ और वेनेज़ुएला की बोलीवरी क्रांति’ समय की मांग डॉ वंदना चौबे जहाँ पूंजीवाद अपने संकट के दौर में बर्बर हमले...

नागरिकों में चेतनाविहीनता की स्थिति बहुत खतरनाक

0
विद्यानंद चौधरी समाज में जब एक समुदाय की नागरिकता पर हमला होता है और बहुमत इसका समर्थन करता है तो वह खुद अपनी नागरिकता हारने...

पूंजीवादी लोकतंत्र की झंडाबरदार कविता कृष्णन का असली चेहरा

0
नरेंद्र कुमार क्या भूतपूर्व कामरेड कविता कृष्णन कभी मार्क्सवादी लेनिनवादी थीं? या वह शुरू से ही उत्तर आधुनिकतावादी दृष्टिकोण से लैस उदारवादियों की तरह वर्ग...