धीरेंद्र मजूमदार की मां – इंसानी संवेदना से रूबरू करता एक नाटक

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नाटक में उठता सवाल, वैश्विक युग में व्यक्ति की पहचान सीमित करने के प्रयास क्यों?

हरनाम सिंह और संदीप कुमार
इंसानी संवेदना असीम होती है। वह सरहद और भौतिक दूरियों से परे होती है। तभी तो सुदूर दक्षिण भारतीय मलयाली लेखिका ललिताम्बिका अतंर्जनम पूर्वी भाग बंगाल की पीड़ा पर कहानी लिखती है और उस पीड़ा को मध्यप्रदेश के दो नगरों इंदौर और भोपाल के दर्शक अपने सीने में बड़ी शिद्दत से महसूस करते हैं। यह संवेदना ही ‘धीरेंद्र मजूमदार की मां’ को नाटकों की फेहरिस्त में उच्च स्थान पर रखती है। यही वजह है कि इन दिनों रंगकर्म के क्षेत्र में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) इंदौर इकाई की प्रस्तुति यह नाटक चर्चा का विषय बना हुआ है।

नाटक “धीरेंद्र मजूमदार की मां” ने दर्शकों को आजादी की लड़ाई के अनसुने किस्से से रूबरू करवाया बल्कि यह भी बताया कि कैसे क्रांतिकारियों की सोहबत में परंपरावादी मूल्यों के साथ अपने घर परिवार में व्यस्त रहने वाली महिला की चेतना में अभूतपूर्व विकास होता है। नाटक ने अपने कथ्य के सहारे समकालीन प्रश्नों को छूते हुए दर्शकों को विचार करने पर विवश कर दिया कि वैश्विक युग में आखिरकार व्यक्ति की पहचान सीमित क्यों की जा रही है?

इंदौर के प्रेस क्लब के राजेंद्र माथुर सभागृह तथा भोपाल के रंगश्री लिटिल बैले ट्रुप नाट्यगृह में ‘धीरेंद्र मजूमदार की मां’ नाटक के मंचन को दर्शकों की भावपूर्ण प्रतिक्रिया मिली। स्वतंत्रता के 75वें वर्ष के उपलक्ष में जया मेहता व विनीत तिवारी के निर्देशन में सुप्रसिद्ध अभिनेत्री फ्लोरा बोस की एकल नाट्य प्रस्तुति को दर्शकों ने भीगे मन, नम आंखों और करतल ध्वनि से सराहा।

विनीत तिवारी द्वारा अनुवादित ललिताम्बिका अतंर्जनम की कहानी पर आधारित नाटक अतीत और वर्तमान के बीच आवाजाही करता है। यह यात्रा दर्शक को कथानक के मर्म तक पहुंचने में मददगार बनती है। भारत की आजादी की लड़ाई से प्रारंभ धीरेंद्र मजूमदार की मां शांति मजूमदार की कहानी बरास्ते बांग्लादेश के निर्माण के साथ आखिरकार भारत के एक शरणार्थी शिविर में आकर समाप्त होती है। जहां से उठे कई सवाल देश की राजनीति और वर्तमान से टकराते हैं।

धीरेंद्र मजूमदार की मां की कहानी एक जमींदार परिवार की नितांत घरेलू स्त्री के स्वतंत्रता सेनानी बनने की कहानी है। एक ऐसा परिवार जिसकी बीमार स्त्री सदस्य के इलाज के लिए पुरुष डॉक्टर की सेवा इसलिए नहीं ली जाती क्योंकि वह पर पुरुष है। भले ही रोगी महिला की मौत ही क्यों ना हो जाए। ऐसा परिवार जिसकी हवेली के बाहर 50 वर्षों तक ना निकल सकने वाली नायिका न केवल क्रांतिकारियों की साथी बनती है, अपितु सांप्रदायिक हिंसा के शमन के लिए गांधीजी का साथ देती है। यही नहीं बांग्लादेश की मुक्ति के लिए चले संग्राम में भी अपना योगदान सुनिश्चित करती है।

देश में औपनिवेशिक आजादी के लिए चले जन संग्राम का परिणाम सांप्रदायिक आधार पर देश विभाजन के रूप में सामने आया। देश के बंटवारे का दंश अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को भी भुगतना पड़ा था जो विभाजन नहीं चाहते थे। ऐसे ही लोगों में धीरेंद्र मजूमदार की मां शांति मजूमदार भी थी। वह मां जिसकी चार संतानों ने अंग्रेजों से हुई लड़ाई में शहादत दी और बाकी चार ने बांग्लादेश के लिए चले मुक्ति संघर्ष में अपनी जान गंवाई। वही मां भारत में आकर शरणार्थी कहलाती है।

दो-दो अत्याचारी शासकों से पीड़ित अनेक अन्य लोगों की तरह शांति मजूमदार के सामने भी पहचान का संकट आ खड़ा हुआ कि वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं? स्वदेशी है? विदेशी है? नाटक में बड़े पर्दे पर वीडियो क्लिप के माध्यम से पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के संघर्ष, बंगाली मुसलमानों के भीषण दमन एवं शेख मुजीब उर रहमान की राजनीतिक यात्रा को बखूबी दर्शाया गया। नाटक देखने आए युवाओं को पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत के इतिहास के कालखंड को सजीव देखने का अवसर मिला।

नाटक अपनी मार्मिक कथावस्तु एवं वैचारिक आधार के साथ दर्शकों को बांधे रखता है। एकल एकांकी नाटकों में एक कलाकार एक घंटे से अधिक समय तक दर्शकों को सम्मोहित कर सके यही फ्लोरा बोस की सफलता और अभिनय क्षमता थी। वैसे भी एकल अभिनय आसान नहीं होता। सामूहिक अभिनय के मुकाबले वह जटिल होता है। कथानक को पूर्णता के साथ आगे ले जाने की जिम्मेदारी एक ही कलाकार की होती है। धाराप्रवाह संवाद अदायगी के साथ धीरेंद्र मजूमदार की मां के अंतर्द्वंद को प्रदर्शित करने में भी फ्लोरा बोस सफल रही है।

नाटक के आखिरी हिस्से में देश की समकालीन राजनीति, अल्पसंख्यकों तथा देश की विभिन्न क्षेत्रीयता वाले नागरिकों के साथ राज्य का व्यवहार सामने आया है। शाहीन बाग की दादियां हो या मुंबई में भैया कहलाने वाले उत्तर भारतीय, सबको अपने-अपने स्तर पर अपनी-अपनी पहचान के लिए जूझना पड़ रहा है। नाटक भारत के भीतर नागरिकता कानून के तहत बिना दस्तावेजों के नागरिकों को डिटेंशन कैंप की धमकियों और उसकी सच्चाई से अवगत कराता है।

नाटक के प्रारंभ में जया मेहता और विनीत तिवारी ने नाटक की पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि स्वतंत्रता के 75 वर्षों में आजादी की लड़ाई और उसके सेनानियों को याद रखने की जरूरत है, ताकि वर्तमान समस्याओं के स्त्रोत को समझा जा सके। नाटक के अंत में जया मेहता और फ्लोरा ने आजादी की लड़ाई में अपने-अपने परिवारों की भागीदारी को दर्शकों से साझा किया। सूत्रधार के रूप में विनीत तिवारी ने कहानी के कलेवर को अपनी टिप्पणियों से आसान बनाया। इंदौर भोपाल में मंच पर प्रकाश व्यवस्था की जिम्मेदारी प्रगल्भ क्षोत्रीय ने कुशलतापूर्वक निभाई।

दर्शकों की प्रतिक्रिया परिचर्चा के साथ

भोपाल में नाटक के बाद हुई चर्चा में वरिष्ठ कथाकार रमाकांत श्रीवास्तव ने नाटक की पूरी टीम को अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई दी। उन्होंने सन 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम और शेख मुजीब उर रहमान को याद करते हुए उस घटना को भी याद किया कि मुजीब की जान को खतरा था और वे यह जानते थे लेकिन उन्हें अपने देश और जनता पर पूरा भरोसा था। हालांकि इसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर गंवानी पड़ी।

वरिष्ठ कवि-कथाकार कुमार अंबुज ने कहा कि यह नाटक धीरेंदु मजूमदार की मां के संघर्षों कहानी है और यह नाटक बार-बार मैक्सिम गोर्की के उपन्यास ‘मां’ और महाश्वेता देवी के ‘हजार चौरासी की मां’ की याद दिलाता है। नाटक को मार्मिकता से भरी प्रस्तुति करार देते हुए कहा कि उसके साथ ही यह नाटक युद्ध और विस्थापन तथा बदलाव की एक पूरी प्रक्रिया को अपने आप में समेटे हुए है जो समाज के सामने कई प्रश्न खड़े करता है।

कवि अनिल करमेले ने कहा कि ‘धीरेंद्र मजूमदार की मां’ अपना संदेश देने में पूरी तरह सफल रहा है। देश में स्त्रियों, दलितों और अल्पसंख्यकों के लिए जिस प्रकार जगह कम होती जा रही है उस पीड़ा को भी नाटक सामने रख पाता है। उन्होंने कहा कि यह जरूरी समय है जब हमें अपने समाज को संविधान के अनुरूप बनाना होगा।

युवा पत्रकार और कवि पूजा सिंह ने कहा कि नाटक भले ही अपने आप में एक बड़े राजनैतिक और सामाजिक परिदृश्य को समेटे हुए है लेकिन फ्लोरा बोस का अभिनय इतना प्रभावशाली है कि पूरे समय हमारे देश काल की कई मांएं- मसलन नजीब की मां और रोहित वेमुला की मां भी हमें याद आती रही। उन्होंने कहा कि क्रांतिकारियों के जीवन संघर्ष, शांति मजूमदार में आए क्रांतिकारी बदलाव के जिक्र के साथ नाटक बंधुत्व और स्वतंत्रता समेत तमाम जीवन मूल्यों की महत्ता भी बताता है।

इनके अलावा नगीन तनवीर, संध्या शैली समेत अनेक अन्य प्रबुद्ध दर्शकों ने अपनी प्रतिक्रिया दी। उज्जैन के शशि भूषण ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि यह नाटक इतिहास के साथ वर्तमान राजनीति और मनुष्यता का मिलाजुला स्वरूप प्रस्तुत करता है। नाटक दर्शकों को रस मग्न करने के साथ प्रश्न विद्ध भी करता है। नाटक देखते ऐसा लगा कि हम हम निरे दर्शक नहीं किसी बड़े जन आंदोलन का हिस्सा हैं।

पर्यावरण प्रेमी सामाजिक कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह ने कहा कि ‘धीरेंद्र मजूमदार की मां’ से कई ऐतिहासिक जानकारियां मिली। अपने समय में प्रतिष्ठित रायबहादुर परिवार के सदस्यों ने आजादी की लड़ाई में जो कुर्बानियां दी वे अभूतपूर्व थी। बावजूद इसके नागरिकता के लिए प्रमाण मांगना शर्मनाक है।

अनूपपुर के विजेंद्र सोनी के अलावा हरनाम सिंह, मेघा गोस्वामी, अतिरिक्त जिला न्यायाधीश राजेश अग्रवाल, गोपाल यादव, करुणा सोनी, दीपाली चौरसिया ने भी कहा कि नाटक आजादी के आंदोलन से लेकर नागरिकता और पहचान के सवालों से टकराता है। नाटक के अंत में जिंदगी ने एक दिन कहा कि तुम उठो… तुम उठो… जन गीत प्रेरित करता है।

नाट्य प्रस्तुति में सारिका श्रीवास्तव, शर्मिष्ठा बनर्जी, प्रमोद बागड़ी, अशोक दुबे, गुलरेज खान, तौफीक मुबारक, असद सिद्दीकी, उजान बनर्जी, कत्यूषा बनर्जी, साजिद खान, वंशिका मिश्रा, ताहिर मिर्जा, फैजान शेख, ताशिव पटेल, रविशंकर, शिवम शुक्ला, प्रगल्भ श्रोत्रिय ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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