यकीन मानिए, भारत ने विश्वकप जीत लिया है!

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1983 के विश्वकप में भारत की ऐतिहासिक विजय की वर्षगाँठ पर विशेष रिपोर्ट

(Special report on the anniversary of India’s historic victory of 1983 World Cup)

हरिगोविंद विश्वकर्मा
25 जून 1983, दिन शनिवार। स्थान – लंदन का लॉर्डस स्टेडियम।

सच पूछिए तो 1970 के दशक में बादशाहत कायम करने वाली क्लाइव लॉयड के नेतृत्व में वेस्टइंडीज़ टीम 1983 में अपराजेय थी। उनके पास दुनिया का सबसे भयावह गेंद फेंककर बल्लेबाज़ों के मन में ख़ौफ़ पैदा करने वाला आक्रमण था। जिनमें मैल्कम मार्शल (Malcolm Marshall), जोएल गार्नर (Joel Garner), माइकल होल्डिंग (Michael Holding) और एंडी रॉबर्ट्स (Andy Roberts) जैसे ख़तरनाक गेंदबाज शामिल थे। कैरेबियन टीम में किसी भी गेंदबाज़ की निर्ममता और क्रूरता से धुनाई करने वाले निर्मम बल्लेबाज़ थे। जिनमें विवियन रिचर्ड्स (Vivian Richards), गॉर्डन ग्रीनिज़ (Gordon Greenidge), डेसमंड हेंस (Desmond Haynes), क्लाइव लॉयड (Clive Lloyd), लैरी गोम्स (Larry Gomes) और फाउद बैकस (Faoud Bacchus) जैसे महान बल्लेबाज थे। ऐसी गेंदबाज़ी और बल्लेबाज़ी क्रिकेट के संपूर्ण इतिहास में कभी नहीं देखी गई थी। 1974 और 1979 में प्रूडेंशियल विश्वकप का ख़िताब जीतना कैरेबियन के प्रदर्शन का गवाह था। दो-दो विश्वकप जीतने वाली क्लाइव लॉयड की टीम को क्रिकेट का बेताज़ बादशाह कहा जा रहा था।

दूसरी ओर भारतीय टीम का वनडे ट्रैक रिकॉर्ड निराशाजनक। मतलब, शतरंज की बिसात पर एक तरफ़ क्रिकेट का बादशाह था तो दूसरी ओर मामूली सा प्यादा। इसके बावजूद विश्वकप शुरू होने के समय भारत के पक्ष में तीन-तीन सकारात्मक बातें थीं। पहली बात, कुछ दिन पहले वनडे मैच में भारत इसी वेस्टइंडीज़ टीम को उसकी ही सरज़मीं पर हरा चुका था। दूसरी बात, भारत तीसरे विश्वकप के अपने पहले मैच में ही विश्व चैंपियन को मात दे चुका था और, भारत के पक्ष में तीसरी बात, ऑस्ट्रेलियाई कप्तान किम ह्यूज ने विश्वकप शुरू होने से पहले कहा था कि भारत को कम आंकना भारी भूल होगी, क्योंकि मौजूदा भारतीय टीम विश्वकप जीत सकती है। लेकिन क्रिकेट के पंडितों ने भारत की दोनों जीत को महज़ तुक्का और ह्यूज के बयान को नॉन-सीरियस क़रार दिया था।

वैसे भारत का विश्वकप में जो रिकॉर्ड था, उसे देखते हुए उसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं था। इसीलिए भारतीय क्रिकेट बोर्ड के लिए टीम का फाइनल में पहुँचना ही बड़ी उपलब्धि थी। बोर्ड भी मानकर चल रहा था कि भारत फाइनल में वेस्टइंडीज़ को कतई नहीं हरा सकता। मैच की पूर्व संध्या की मीटिंग में बीसीसीआई के तत्कालीन अध्यक्ष एनकेपी साल्वे ने भारतीय टीम को शाबाशी देते हुए कहा था, “तुम लोग फाइनल में पहुँचे। यही बहुत बड़ी बात है। अब फाइनल की चिंता बिल्कुल मत करो। कल तुम लोग चाहे जीतो या हारो फाइनल में पहुँचने के लिए इनाम स्वरूप बीसीसीआई की ओर से टीम के सभी सदस्यों का 25-25 हज़ार रुपए का बोनस पुरस्कार दिया जाएगा।” उस समय 25 हज़ार रुपए बड़ी रकम मानी जाती थी। 25 हज़ार रुपए के बोनस की घोषणा से टीम के सभी खिलाड़ियो को आश्चर्य हुआ। उन्होंने इतनी बड़ी रकम की कल्पना भी नहीं की थी।

बहरहाल, 1983 का तीसरा क्रिकेट विश्व कप आयोजन से पहले ही लिखी गई स्क्रिप्ट के अनुसार चल रहा था। जहां तीसरी बार भी कैरेबियन टीम को ही विजेता मान लिया गया था। वेस्टइंडीज़ अपने चिरपरिचित अंदाज़ में खेलते हुए फाइनल में पहुँचा तो कपिल देव की टीम ने जिम्बाब्वे तक से संघर्ष करते हुए फाइनल में जगह बनाई। एक बात और, भारतीय टीम ओपनर सुनील गावस्कर (Sunil Gavaskar), कृष्णमाचारी श्रीकांत (Krishnamachari Srikkanth) और मध्य क्रम में मोहिंदर अमरनाथ (Mohinder Amarnath), यशपाल शर्मा (Yashpal Sharma), संदीप पाटिल (Sandeep Patil) और कपिल देव (Kapil Dev) जैसे बल्लेबाज़ों और कपिल, मदन लाल (Madanlal), रोजर बिन्नी (Roger Binny) और मोहिंदर अमरनाथ के रूप में चार-चार ऑलराउंडर्स और कपिल, बलविंदर सिंह संधू (Balwinder Singh Sandhu), मदन, बिन्नी और अमरनाथ जैसे इंग्लैंड की पिचों के अनुकूल मध्यम-तेज गेंद फेंकने वाले गेंदबाज़ों की बदौलत विश्वकप में एक ताकत बनकर उभरी थी।

इसके बावजूद ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड या पाकिस्तान की बजाय भारत के फ़ाइनल में पहुँचने से वेस्टइंडीज़ रेस्ट मोड में था, क्योंकि भारत जैसी साधारण टीम ख़तरा ही नहीं थी। इस टीम को धूल चटाने के लिए ज़्यादा मेहनत भी नहीं करनी थी। यानी कैरिबियन टीम में ओवरकॉन्फिडेंस था। वैसे यह वनडे क्रिकेट इतिहास का 223वां मैच था और लॉर्ड्स के 30 हज़ार क्षमता वाले मैदान पर 24609 दर्शकों के सामने खेला जा रहा था। दर्शकों में कैरेबियन देश और भारत के नागरिक अधिक थे। अंपायरिंग की ज़िम्मेदारी दुनिया से सबसे प्रतिष्ठित और निष्पक्ष अंपायर डिकी वर्ड और बैरी मेयर के कंधों पर थी। टॉस क्लाइव लॉयड ने जीता और फील्डिंग का निर्णय लेते हुए भारत को पहले बल्लेबाज़ी का न्यौता दे दिया। अब भारत को लॉर्ड्स के स्विंग और बाउंस वाली पिच पर पैवेलियन और नर्सरी छोर से मार्शल, गार्नर, होल्डिंग और रॉबर्ट्स की चौकड़ी के स्विंग और बाउंस का सामना करना था।

वेस्टइंडीज़ की ओर से बोलिंग की शुरूआत पैवेलियन एंड से एंडी रॉबर्ट्स ने की। पहले ओवर में गावस्कर ने 1 रन बनाए। नर्सरी एंड से गार्नर का दूसरा ओवर तो भयावह था। उनकी गेंदों को मिल रहे बाउंस से गावस्कर कई बार बीट हुए लेकिन ओवर में एक रन बनाने में सफल रहे। रॉबर्ट के एक ओवर की एक तेज़ गेंद को लिटिल मास्टर शायद समझ ही नहीं पाए और बल्ला लगा दिया। गेंद बल्ले का बाहरी किनारा लेती हुए विकेट के पीछे जैफ डुजोन के दस्ताने में समा गई। बैरी मेयर को तर्जनी उठाने में ज़रा भी दिक़्क़त नहीं हुई। इस तरह तीसरे ओवर में ही महज़ 2 रन के स्कोर पर भारत ने गावस्कर के रूप में अपना सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज़ गंवा दिया। गावस्कर 12 गेंद खेलकर केवल 2 रन बनाए। इसके बाद तीसरे नंबर पर बल्लेबाज़ी करने के लिए मोहिंदर अमरनाथ मैदान में उतरे।

मोहिंदर के आते ही श्रीकांत का कॉन्फिडेंस लेवल बढ़ गया। उन्होंने रॉबर्ट्स के ओवर की सबसे तेज़ गेंद पर सबसे तेज़ शॉट मारा और अंपायर ने दोनों हाथ उठाकर छक्के का इशारा किया। तीन रन से खाता खोलने वाले मोहिंदर समय की मांग के अनुसार धीमी बल्लेबाज़ी कर रहे थे। भारतीय टीम पर कैरेबियन गेंदबाज़ी किस तरह हावी थी कि 13 ओवर में एक विकेट पर केवल 32 रन बन सके थे। हालांकि श्रीकांत और मोहिंदर भारतीय पारी को आगे बढ़ाते रहे और दूसरे विकेट के लिए 50 रन की भागेदारी कर ली। जब लगने लगा कि श्रीकांत-अमरनाथ की जोड़ी जम रही है और टीम को अच्छी शुरुआत देगी, तभी 7 चौके और एक छक्के की मदद से 57 गेंदों पर 38 रन बनाने वाले श्रीकांत मैल्कम मार्शल की एक बेहद तेज़ इन-स्विंग गेंद को बिल्कुल भी समझ नहीं पाए और गेंद उन्हें बीट करती हुई पैड पर लगी। वह क्रीज़ के सामने थे, सो डिकी बर्ड को पगबाधा देने में ज़रा भी हिचकिचाहट नहीं हुई। इस तरह 59 के स्कोर पर भारत ने श्रीकांत का भी विकेट खो दिया।

अब मैदान में पहले मैच के हीरो यशपाल शर्मा मैदान में उतरे। अमरनाथ और यशपाल बहुत धीमी रफ़्तार से रन बना रहे थे, लेकिन संतोष की बात थी कि उन्होंने वेस्टइंडीज़ के भयावह आक्रमण के सामने अपने-अपने विकेट को बचाए रखा। 28वें ओवर की समाप्ति पर स्कोर दो विकेट पर 85 रन था। मोहिंदर 22 रन और यशपाल 9 रन बनाकर खेल रहे थे। उसी समय बोलिंग करने आए माइकल होल्डिंग ने एक तेज़ गेंद से अमरनाथ को क्लीन बोल्ड कर दिया। भारत का तीसरा विकेट 30वें ओवर में 90 रन के स्कोर पर गिरा। अगला ओवर लैरी गोम्स फेंकने आए। उनकी गेंद पर एक्स्ट्रा कवर के ऊपर से लंबा शॉट मारने के चक्कर में यशपाल 12वें खिलाड़ी के रूप में फील्डिंग कर रहे आगस्टिन लोगी को साधारण कैच दे बैठे। भारत का चौथा विकेट 92 रन पर गिर गया। भारत के चारों शीर्ष बल्लेबाज पैवेलियन लौट चुके थे और भारतीय टीम संकट में थी।

अब क्रीज़ पर भारत के दो सबसे ज़्यादा विस्फोटक बल्लेबाज संदीप पाटिल और कपिल देव बल्लेबाज़ी कर रहे थे। कपिल देव ने महज 8 गेंद में तीन चौके की मदद से ताबड़तोड़ 15 रन बना डाले। तीन ओवर में 18 रन जुड़ गए। यह जोड़ी चार-पाँच ओवर और टिक गई होती तो कहानी अलहदा होती, लेकिन गोम्स की एक गेंद पर छक्का मारने के चक्कर में कपिल देव लॉन्ग ऑन पर होल्डिंग को कैच दे बैठे। भारत ने 110 रन के स्कोर पर अपने कप्तान का विकेट खो दिया। जिम्बाब्वे के ख़िलाफ 175 रनों की ऐतिहासिक पारी खेलने वाले कपिल वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ बड़ी पारी नहीं खेल पाए। इसके बाद आए आक्रामक बल्लेबाज़ कीर्ति आज़ाद से बड़ी उम्मीद थी, लेकिन 3 गेंद खेलने वाले आज़ाद को रॉबर्ट्स ने स्क्वेयर लेग पर गारनर के हाथों कैच करा कर पैवेलियन वापस भेज दिया। आज़ाद अपना खाता भी नहीं खोल सके थे। भारत का स्कोर 111 था और छह विकेट गिर चुके थे।

अब मैदान में उतरे ऑलराउंडर माने जाने वाले रोजर बिन्नी, लेकिन संदीप पाटिल का साथ वह भी नहीं दे पाए और 8 गेंद पर 2 रन बनाकर सातवें विकेट के रूप में उन्होंने भी पैवेलियन का रास्ता नाप लिया। उनका कैच रॉबर्ट्स की गेंद पर मिड विकेट पर गारनर ने पकड़ा। उस समय भारत का स्कोर 130 रन था। पाटिल का साथ देने के लिए एक और  हरफनमौला मदन लाल मैदान में उतरे। दोनों अच्छी बल्लेबाज़ी कर रहे थे कि तभी 153 रन के स्कोर पर भारत का सबसे महत्वपूर्ण विकेट गिरा। महज़ 29 गेंद में गोम्स की गेंद पर लगाए गए एक शानदार छक्के की मदद से 27 रन बनाकर खेल रहे संदीप पाटिल को गारनर की गेंद पर मिड ऑन पर लैरी गोम्स ने लपक लिया। यह भारत का आठवाँ विकेट था। अब क्रीज़ पर मदन लाल का साथ देने के लिए विकेटकीपर-बल्लेबाज़ सैयद मुस्तफ़ा हुसैन किरमानी उतरे।

मदन लाल और किरमानी स्कोर को 161 तक लेकर गए। इसी स्कोर पर 31 गेंद पर 17 बहुमूल्य रन बनाने वाले मदन लाल को 45वें ओवर में मार्शल ने नर्सरी एंड से एक बड़ी तेज़ गेंद पर क्लीन बोल्ड कर दिया। नौवें विकेट के रूप में आउट होने वाले मदन ने अपनी पारी में गोम्स की गेंद पर एक शानदार छक्का भी जड़ा। अब क्रीज़ में किरमानी का साथ देने के लिए बलविंदर सिंह संधू उतरे। दोनों ने मार्शल और होल्डिंग की गेंदों का बहादुरी से मुक़ाबला किया। इस दौरान संधू मार्शल के बाउंसर से घायल होते-होते बचे। वह किरमानी के साथ एक-एक रन लेते रहे और स्कोर को बढ़ाते रहे। भारत का स्कोर 9 विकेट पर 183 रन पहुँच गया। जब लगने लगा कि भारत 200 के जादुई आँकड़े को पार करके वेस्टइंडीज़ के सामने चुनौती पेश कर सकता है तभी होल्डिंग ने 43 गेंद खेलकर 14 रन बनाने वाले किरमानी को बोल्ड कर दिया। इस तरह भारतीय टीम 54 ओवर में 183 रन के स्कोर पर सिमट गई। अंतिम बल्लेबाज़ के रूप में संधू एक-एक रन करके 30 गेंद पर 11 बेशक़ीमती रन बनाकर नाबाद रहे।

वेस्टइंडीज़ की ओर से रॉबर्ट्स, गार्नर, मार्शल, होल्डिंग और गोम्स ने क्रमश 10, 12, 11, 9.4 और 11 ओवर में 32, 24, 24, 26 और 49 रन देकर 3, 1, 2, 2 और 2 विकेट लिए। रिचर्ड्स ने केवल एक ओवर डाले और 8 रन दिए। इस तरह कैरेबियन चौकड़ी ने भारत की टीम को सस्ते में समेट दिया। भारत के 183 पर धराशायी होने के बाद इस बात की पूरी संभावना थी कि वेस्टइंडीज़ आसानी से तीसरी बार विश्वकप चैंपियन बन जाएगा। बस जीत की औपचारिकता ही बाक़ी है, जिसे डेसमंड हेंस, गॉर्डन ग्रीनिज़ और विव रिचर्ड्स ही पूरा कर देंगे। कई लोग तो अनुमान लगाने लगे कि कैरेबियन बल्लेबाज़ 30 ओवर में ही मैच समाप्त कर देंगे। सट्टा बाज़ार में भी भारतीय टीम सबसे फिसड्डी टीम थी।

बहरहाल, भारत की ओर से आक्रमण की शुरुआत पैवेलियन एंड से कपिल देव ने की। उनके सामने दुनिया की सबसे सफल और सशक्त सलामी जोड़ी थी डेसमंड हेंस और गॉर्डन ग्रीनिज़ की। कपिल के पहले ओवर में 5 रन बनाकर हेंस और ग्रीनिज़ ने अपने इरादे साफ़ कर दिए। कपिल ने नई गेंद मदन लाल या रोज़र बिन्नी की जगह संधू को थमा दी। इस तरह भारत की ओर से दूसरा ओवर संधू डालने आए। संधू ने फाइनल में ग़ज़ब की गेंदबाज़ी की। जब भारतीय क्रिकेट की लॉर्ड्स में ऐतिहासिक जीत का इतिहास लिखा जाएगा, तब बलविंदर सिंह संधू के नाम का उल्लेख ज़रूर किया जाएगा। केवल 2 साल के करियर में 8 टेस्ट और 22 एकदिवसीय मैच खेलने वाले संधू ने अपना शुरुआती ओवर कमाल का फेंका। किसी को पता नहीं था कि संधू इतिहास बनाने जा रहे हैं।

गेंदों को स्विंग कराने के लिए परिस्थितियां संधू के लिए आदर्श थीं। संधू के दूसरे ओवर की अंतिम गेंद ऑफ स्टंप के बाहर पिच हुई और ग्रीनिज़ ने इस गेंद को छोड़ने का फ़ैसला किया और बल्ला ऊपर कर लिया। उन्होंने मान लिया था कि गेंद पहली स्लिप की ओर जाएगी। लेकिन भाग्य और समय को कुछ और मंज़ूर था। गेंद हैरतअंगेज़ ढंग से स्विंग हुई और ऑफ़ स्टंप का बेल गिरा गई। ग्रीनिज़ हैरत में पड़ गए, लेकिन उनके पास पैवेलियन वापस लौटने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं था। इसके बाद तो पूरे स्टेडियम में सन्नाटा पसर गया। किसी को यक़ीन नहीं हो रहा था कि ग्रीनिज़ को संधू ने बोल्ड कर दिया। मैदान और स्टेडियम में भारत की संभावित जीत की पहली ख़ुशबू उठी, लेकिन जल्द ही ख़त्म हो गई।

तीसरे नंबर पर बल्लेबाज़ी करने उतरे विवियन रिचर्ड्स के तेवर से स्पष्ट हो गया कि उन्हें दूसरे विश्व कप फाइनल में भी शतक बनाना है। उन्होंने अपनी शैली के अनुरूप बल्लेबाज़ी शुरू की। वह तूफ़ानी ट्रेन की तरह तेज़ दौड़ रहे थे। स्कोर तेज़ी से लक्ष्य की ओर बढ़ रहा था। उनकी आक्रामक बल्लेबाज़ी के आगे भारतीय आक्रमण बिल्कुल साधारण हो गया। रिचर्ड्स हर गेंदबाज़, चाहे वह कपिल देव हों, संधू हों या फिर मदन लाल हों, सबकी धुनाई कर रहे थे। वह लगातार गेंदों को बाउंड्री रेखा के पार भेज रहे थे। इस बीच 50 रन के स्कोर पर मदन लाल ने दूसरा विकेट दिलाया। आत्मविश्वास के साथ बैटिंग कर रहे सलामी बल्लेबाज़ डेसमंड हेंस मदन की एक उठती गेंद हवा में खेल गए। कवर में मुस्तैद फील्डर बिन्नी ने अवसर को भुनाते हुए गेंद को लैंड होने से पहले ही लपक लिया। वेस्टइंडीज़ का स्कोर 11.3 ओवर में 50 रन पर दो विकेट हो गया। हेंस 33 गेंद खेल कर 13 रन बनाए।

डेसमंड हेंस का विकेट गिरने का रिचर्ड्स की बल्लेबाज़ी पर कोई भी असर नहीं दिखा। उनका क़त्लेआम जारी था। उधर हेंस के आउट होने पर क्लाइव लॉयड बल्ला लेकर मैदान में उतरे। लॉयड को देखकर दर्शक तो हैरान रह गए, क्योंकि लंबे समय से टेस्ट और वनडे में कैरेबियन टीम में टू-डाउन पर लैरी गोम्स ही मैदान में उतरते थे। लेकिन आज कप्तान पैड बाँधे उनसे पहले आ गए। शायद रिचर्ड्स और कप्तान लॉयड मैच को जल्दी ख़त्म करना चाहते थे। अब क्रीज़ में कप्तान और उपकप्तान दोनों बैटिंग कर रहे थे। अचानक मदन की एक गेंद लॉयड के दाहिने पांव में लगी और वह लंगड़ाने लगे। उनके लिए डेसमंड हेंस को रनर के रूप में मैदान में उतरना पड़ा।

अचानक एक अनोखी घटना हुई। मदन लाल ने एक गेंद ऑफ स्टंप के बाहरी ओर थोड़ा सा शॉर्ट फेंकी। कई चौके जड़ चुके रिचर्ड्स पहले ही गेंद को मिडविकेट के पीछे स्टैंड में भेजने के लिए खुद को सेट कर चुके थे। उन्होंने शुरुआत में ही टच खेल दिया। गेंद ने टॉप-एज किया और हवा में बहुत ऊपर तक चली गई। कपिल देव मिड-ऑन पर क्षेत्ररक्षण कर रहे थे। वह गेंद की ओर दौड़ने लगे, तो दर्शक ही नहीं, बल्कि भारत में टीवी पर मैच देख रहे करोड़ों लोगों की धड़कन रुक गईं। बाक़ी फील्डर्स ने कपिल देव को ही कैच पकड़ने का मौक़ा दिया। कपिल दौड़ते हुए आगे बढ़ते रहे। उनका सिर उनके दाहिने कंधे की ओर था, आँखें गेंद पर टिकी थीं। अंत में उन्होंने आराम से कैच ले लिया। कैच पकड़ने के बाद उन्होंने दोनों हाथों को हवा में लहराया। कपिल का यह शानदार प्रदर्शन था।

उस कैच ने एक महान खिलाड़ी को चकमा दे दिया। खुद काल यानी समय को पूर्ण अविश्वास हुआ। वक़्त ठहर सा गया। क्रिकेट का बादशाह धराशायी हो गया। इस एक गेंद ने भारतीय क्रिकेट की सबसे अप्रत्याशित जीत को संभव बना दिया। रिचर्ड्स पश्चाताप करते हुए पैवेलियन लौट रहे थे। दूसरे छोर पर खड़े लॉयड पहली बार नर्वस दिख रहे थे, क्योंकि स्कोर बोर्ड पर महज़ 57 रन दिख रहे थे। लक्ष्य अभी 127 रन दूर था और वेस्टइंडीज़ के तीनों धाकड़ बल्लेबाज़ पैवेलियन लौट चुके थे। अब तक हुड़दंग मचा रहे कैरेबियन देशों के दर्शकों को मानों साँप सूँघ गया। लॉयड का साथ देने के लिए गोम्स क्रीज़ में पहुँच चुके थे। स्कोर में 9 रन और जुड़े थे कि 66 के स्कोर पर गोम्स का कैच सुनील गावस्कर ने स्लिप में बड़ी सफ़ाई के साथ पकड़ लिया। गेंदबाज़ मदन लाल ही थे। हेंस और रिचर्ड्स के बाद गोम्स उनके तीसरे शिकार बने। मदन लाल ने मैच में अपना काम कर दिया।

बहरहाल, गोम्स के आउट होने के बाद क्लाइव लॉयड का साथ देने के लिए पैड बाँधकर फाउद बैकस मैदान में उतरे। बेकस से लॉयड देर तक बातचीत करते रहे। शायद उन्हें समझा रहे थे कि जीत के लिए लंबी साझेदारी करना समय की मांग है। लेकिन 66 रन पर चौथा विकेट गंवाने वाली कैरेबियन टीम को उसी स्कोर पर बहुत ज़ोरदार झटका लगा। कप्तान लॉयड ने मिड-ऑन पर हवा से ड्राइव किया। एक्स्ट्रा कवर में कपिल ने शानदार कैच पकड़ा। इस बार गेंदबाज रोजर बिन्नी थे। बिन्नी ने 17 गेंद पर 8 रन बनाने वाले लॉयड को पाँचवें विकेट के रूप में आउट करके वेस्टइंडीज़ के खेमे में बेचैनी पैदा कर दी। विश्व चैंपियन टीम की आधी टीम 66 के स्कोर पर पैवेलियन लौट चुकी थी। वातावरण में पहली बार भारत की जीत की ख़ुशबू दूर तक फैली, लेकिन दिल्ली अभी दूर थी, क्योंकि वेस्टइंडीज के निचले क्रम के बल्लेबाज़ भी शतकीय साझेदारी के लिए जाने जाते थे।

लॉयड के आउट होने के लिए बाद विकेट-कीपर बल्लेबाज़ जैफ़ डुजोन मैदान में उतरे। डुजोन और फाउद बैकस पर बड़ी ज़िम्मेदारी थी। दोनों की जोड़ी ने संभल कर और सावधानीपूर्वक खेलना शुरू किया। रनों की रफ़्तार थम सी गई। पहली बार भारतीय गेंदबाज़ हावी दिख रहे थे। स्कोर में 10 रन की बढ़ोतरी हुई और 76 रन पहुँच गया। उसी समय कपिल ने गेंद संधू के हवाले कर दी। संधू ने एक और शानदार इन-स्विंग गेंद फेंकी, जिसे बैकस बिल्कुल समझ नहीं पाए और गेंद बल्ले का बाहरी किनारा लेती हुई पहली स्लिप की ओर जा रही थी, लेकिन विकेट के पीछे मुस्तैद खड़े किरमानी ने डाइव मार कर गेंद को अपने दस्ताने में क़ैद कर लिया और बैकस बेबस होकर पैवेलियन लौट रहे थे। यह संधू का दूसरा विकेट था। स्कोर छह विकेट पर 76 रन हो गया। अभी लक्ष्य 107 रन दूर था और वेस्टइंडीज़ के पास केवल चार पुच्छले बल्लेबाज़ बचे थे। क्रिकेट विशेषज्ञों ने पहली बार कहा कि अगर भारतीय गेंदबाज़ इसी तरह दबाव बनाए रखें तो भारत पहली बार विश्वकप जीत भी सकता है।

बहरहाल, डुजोन का साथ देने के लिए मैलकम मार्शल मैदान में उतरे। दोनों ने ज़िम्मेदारी भरी पारी खेली और 45 रनों की भागीदारी की। इस दौरान डुजोन ने संधू की एक गेंद पर छक्का भी मारा। 33वें ओवर में वेस्टइंडीज़ ने 100 रन हुए। डुजोन और मार्शल मिलकर स्कोर को 119 रन तक लेकर गए। जैफ ने 73 गेंद खेलकर 25 रन बनाए थे कि मोहिंदर अमरनाथ की एक धीमी गेंद पर सीधे बोल्ड हो गए। कैरेबियन टीम का सातवाँ विकेट गिर गया। अब मार्शल का साथ देने के लिए रॉबर्ट्स क्रीज़ पर पहुँचे। दोनों बहुत संभल कर खेल रहे थे। तभी 124 रन के स्कोर पर मार्शल को अमरनाथ की गेंद पर गावस्कर ने कैच कर लिया। आठवाँ विकेट गिरने से वेस्टइंडीज़ की जीत की उम्मीद धुँधली पड़ने लगी। भारतीय खेमे में भरोसा होने लगा कि भारत भी विश्वकप जीत सकता है। लेकिन अभी भी रॉबर्ट्स, गारनर और होल्डिंग बचे थे, जो अंतिम क्रम में अच्छी बल्लेबाज़ी कर लेते थे।

मार्शल के आउट होने पर गारनर मैदान में उतरे। वेस्टइंडीज़ का स्कोर जब 126 रन था, तभी कपिल ने रॉबर्ट्स को एलबीडब्ल्यू कर नौवाँ कैरेबियन विकेट गिरा दिया। अब भारत और जीत के बीच गारनर और होल्डिंग में से किसी एक के विकेट की दरकार थी। मैदान में पैड बाँधकर उतरने की बारी थी अंतिम बल्लेबाज माइकल होल्डिंग की। गारनर और होल्डिंग देर तक बल्लेबाज़ी करते रहे और भारत की जीत को रोककर रखा। वे स्कोर को 140 रन तक लेकर गए। तभी अचानक कमेंटेटर चिल्ला पड़ा, -होल्डिंग एलबीडब्ल्यू आउट! बोलर वाज़ मोहिंदर अमरनाथ! एंड… एंड… एंड इंडिया वन द प्रूडेंशियल वर्ल्ड कप! एंड… एंड… इंडिया एंड कपिलदेव मेड अ हिस्ट्री। ऑफ़कोर्स इट्स इंड ऑफ़ कैरेबियन एंपायर। इट्स न्यू इरा ऑफ़ दी इंडियन क्रिकेट! भारत रूपी मामूली से प्यादे ने कुछ ऐसी चाल चली कि बादशाह वेस्टइंडीज़ चारों खाने चित हो चुका था। कह सकते हैं कि लॉर्डस मैदान पर जो हुआ वो किसी करिश्मे से कम नहीं था।

जैसे ही अमरनाथ ने होल्डिंग को आउट किया कपिल देव भागे-भागे पैवेलियन पहुँचे और वहाँ बैठे लोगों से पूछा, “क्या यह सच है? क्या यह सच है कि हमने बाहुबली वेस्टइंडीज़ हो फिर हरा दिया? क्या यह सच है कि भारत ने क्रिकेट का विश्वकप जीत लिया है।” “यस… यस…” पैवेलियन में बैठे एक क्रिकेट अधिकारी ने कहा, “इट्स ट्रू। आपने और आपके लड़कों ने इतिहास बना दिया है। यकीन मानिए, भारत ने विश्व कप जीत लिया है!” लॉर्ड्स के मैदान पर तिरंगा लिए भारतीय दर्शक दौड़ रहे थे।