कभी शतक न लगा पाने वाले टेस्ट इतिहास के सबसे दुर्भाग्यशाली सलामी बल्लेबाज चेतन चौहान

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भारत की ओर से जहां अजित आगरकर, अनिल कुंबले और हरभजन सिंह जैसे विशुद्ध गेंदबाज़ों ने टेस्ट क्रिकेट में शतक लगाने का कारनामा कर डाला, वहीं सलामी बल्लेबाज चेतन प्रताप सिंह चौहान इतने दुर्भाग्यशाली बल्लेबाज रहे कि 12 साल के टेस्ट करियर में 40 टेस्ट मैच में ओपनिंग करने के बावजूद एक भी टेस्ट शतक नहीं बना सके। वह जब भी शतक के क़रीब पहुंचते थे, नर्वस नाइंटीज के शिकार हो जाते थे और उन्हें पैवेलियन लौटना पड़ता था।

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इसीलिए क्रिकेट के जानकार चेतन चौहान को टेस्ट इतिहास का सबसे दुर्भाग्यशाली खिलाड़ी करार देते हैं। 1960 के दशक के अंतिम साल में टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण करने वाले चेतन चौहान ने 12 साल के क्रिकेट करियर में बतौर सलामी बल्लेबाज 40 टेस्ट क्रिकेट मैच खेले, लेकिन टेस्ट क्रिकेट में शतक बनाने के लिए जीवन भर तरसते रहे और 1981 में बिना शतक बनाए अपने टेस्ट करियर का अंत किया। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि चेतन चौहान के साथ दूसरे छोर पर बल्लेबाजी करने वाले सुनील मनोहर गावस्कर शतकों का कीर्तिमान बनाते गए और डॉन ब्रैडमैन का सबसे अधिक शतकों 29 शतकों का रिकॉर्ड तोड़कर ऐसा कीर्तिमान बनाया जिसे बाद में सचिन तेंडुलकर ने तोड़ा। जबकि चौहान एक शतक बनाने के लिए संघर्ष करते रहे।

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भारतीय क्रिकेट में सबसे साहसी ओपनिंग बल्लेबाजों की फेहरिस्त में रहे चेतन चौहान को 1970 और 1980 के दशक की शुरुआत में टेस्ट मैचों में मुख्य रूप से सुनील गावस्कर के साथी के रूप में याद किया जाता है। यह जोड़ी दस शतकीय साझेदारियों के साथ भारत की सबसे सफल टेस्ट ओपनिंग जोड़ी रही। चौहान की बल्लेबाजी में कुछ तकनीकी कमियां थीं, जिससे उनका स्ट्रोकप्ले बिल्कुल धाराप्रवाह नहीं रहा। इसके बावजूद कोई भी उनकी हिम्मत, उनकी रक्षात्मक स्टाइल और गेंद की लाइन के पीछे आकर खेलने की उनकी क्षमता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। वह हमेशा गेंदबाजों के लिए मुश्किल बल्लेबाज रहे और उनकी धैर्यपूर्ण खेली गई पारी का भारतीय टीम ने भरपूर फायदा उठाया।

चेतन चौहान ने 22 वर्ष की उम्र में 25 सितंबर 1969 को न्यूजीलैंड के खिलाफ बंबई टेस्ट मैच में पदार्पण किया। अपना पहला रन बनाने में उन्हें 25 मिनट लगे। बहरहाल, ब्रूस टेलर की गेंद पर चौका लगाकर उन्होंने खाता खोला। टेलर की गेंद पर इसके बाद छक्का लगा दिया। उन्होंने पहले टेस्ट की पहली पारी में 18 रन और दूसरी पारी में 34 रन बनाए और एक कैच लपका। पहला टेस्ट खेलने के बाद उसी सीजन में उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ भी एक टेस्ट मैच खेला। उसके बाद उनका चयन टीम में नहीं हुआ।

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चेतन चौहान ने 1972-73 में महाराष्ट्र के लिए रणजी सीज़न में 873 रन बनाए जो उस समय एक सीज़न में दूसरा सबसे बड़ा स्कोर था। इसमें गुजरात और विदर्भ के खिलाफ लगातार मैचों में दोहरे शतक शामिल थे। चौहान और मधु गुप्ते की सलामी जोड़ी ने पहले विकेट के लिए 405 रन की भागीदारी की। इस दमदार प्रदर्शन के आधार पर उन्हें 1972-73 में इंग्लैंड के खिलाफ दो टेस्ट मैचों के लिए वापस बुलाया गया। दो टेस्ट मैच में असफल रहने के बाद उन्हें अगले मैच के लिए पांच साल इंतज़ार करना पड़ा। उनका सबसे शानदार दौर तब शुरू हुआ, जब उन्हें 1977-78 में ऑस्ट्रेलिया दौरे के लिए चुना गया था।

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गावस्कर-चौहान की सलामी साझेदारी का औसत 53.75 था जो वीरेंद्र सहवाग-गौतम गंभीर की सलामी जोड़ी के औसत 52.52 से बेहतर था। 1979 में ओवल मैदान पर जब भारत इंग्लैंड को हराने के लिए 439 रन के लक्ष्य का पीछा कर रहा था, तब चेतन ने गावस्कर के साथ पहले विकेट के लिए 213 रनों की सर्वश्रेष्ठ साझेदारी की। खुद चौहन ने 80 रन बनाए। एक समय तो लग रहा था कि भारत मैच जीत कर रिकॉर्ड बनाएगा। लेकिन भारत 8 विकेट पर 429 तक पहुंच सका और समय समाप्त हो गया। गावस्कर ने उस मैच में 221 रन बनाए थे।

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1981 का ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड दौरा उनके लिए यादगार रहा। खासकर ऑस्ट्रेलिया में एडिलेट टेस्ट में भारत के विस्फोटक बल्लेबाज संदीप पाटिल (174 रन) के साथ शतकीय साझेदारी की, लेकिन जैसे ही चेतन 97 के स्कोर पर पहुंचे डेनिस लिली की गेंद पर विकेट के पीछे रॉडनी मार्श ने उनका कैच लेकर शतक पूरा किए बिना ही पैवेलियन वापस भेज दिया। यह 97 रन चौहान का उच्चतम स्कोर रहा। यह मैच ड़्रॉ रहा।

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मेलबोर्न टेस्ट में डेनिस लिली की गेंद पर जब गावस्कर को ग़लत पगबाधा आउट दिया गया तो गावस्कर के साथ चेतन भी पैवेलियन वापस लौट गए। इससे अफरा-तफरी मच गई। बहरहाल, बाद में मैदान में उतरे चेतन ने 198 गेंद पर 85 रनों की शानदार पारी खेली। वह मैच भारत ने जीतकर सीरीज बराबर कर ली। ग्रेग चैपल की शक्तिशाली टीम को कपिल देव और करसन घावरी की मारक गेंदबाजी के चलते कंगारू टीम 83 पर सिमट गई। चैपल को उस मैच में घावरी ने पहली गेंद पर ही शून्य पर आउट किया था।

न्यूजीलैंड के खिलाफ 13 मार्च 1981 को ऑकलैंड में खेला गया मैच उनका आखिरी टेस्ट मैच साबित हुआ, क्योंकि इसके बाद उनका चयन भारतीय टीम में नहीं हुआ। अपने अंतिम मैच में उन्होंने 36 और 7 रन बनाए। टेस्ट में चेतन के नाम 40 टेस्ट मैच की 68 पारियों में 2084 रन दर्ज हैं। उनका सर्वोच्च स्कोर 97 रन है। उन्होंने 16 अर्धशतक लगाए और 38 कैच पकड़े। सुनील गावस्कर के साथ उन्होंने सफल सलामी साझेदारी की। दोनों ने एक साथ 59 पारियों में 3010 रन बनाए,जिसे बाद में वीरेंद्र सहवाग और गौतम गंभीर की जोड़ी ने तोड़ा। दरअसल, 1981 में विस्फोटक बल्लेबाज कृष्णमाचारी श्रीकांत के उदय के बाद चेतन चौहान का करियर ख़त्म हो गया।

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चेतन चौहान ने 7 वनडे मैच भी खेला। पाकिस्तान के खिलाफ क्वैटा में अपने पहले वनडे में वह केवल 2 ही रन बना सके। इसी तरह अंतिम वनडे मैच न्यूजीलैंड के खिलाफ हेमिल्टन में खेला और रोजन बिन्नी के साथ पारी शुरू करते हुए चेतन ने 31 रन बनाए। हालांकि भारत यह मैच हार गया। उन्होंने अपने टेस्ट करियर में डेनिस लिली, ज्यौफ थॉमसन, मैलकम मार्शल, माइकल होल्डिंग, जोएल गारनर, कोलिन क्राफ्ट, एंडी रॉबर्ट्स, रिचर्ड हैडली, इमरान खान और बॉब विलिस जैसे खतरनाक तूफानी गेंदबाज़ों का मुकाबला बतौर सलामी बल्लेबाज बहादुरी से किया।

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चेतन चौहान का जन्म तो बरेली में हुआ था लेकिन भारतीय सेना में ऑफसर होने के कारण उनकी पोस्टिंग पुणे में हो गई। इस कारण बाद में चेतन पिता के साथ पुणे आ गए। वह दिल्ली और महाराष्ट्र के लिए घरेलू क्रिकेट खेलते थे। चौहान जून 2016 से निफ्ट (NIFT) के चेयरमैन के पद पर हैं। वह उत्तर प्रदेश के अमरोहा ज़िले के नौगांव सादात विधान सभा के सदस्य और राज्य सरकार मे खेल एवं युवा मामले के मंत्री थे। इससे पहले वह भाजपा से लोकसभा सांसद रहे। 1991 और 1998 के चुनाव में वह बीजेपी के टिकट पर सांसद बने थे। 73 वर्षीय चेतन चौहान की एक दिन पहले ही तबीयत और बिगड़ गई थी। उनकी किडनी फेल हो गई, जिसके कारण उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया। जुलाई के महीने में ही चौहान की कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके निधन पर शोक जताया है।

भारतीय क्रिकेट के उस अद्वितीय सलामी बल्लेबाज को श्रद्धांजलि।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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