भारत में इस्लाम को बढ़ावा देता है तबलीगी आलमी मरकज

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हरिगोविंद विश्वकर्मा
अपना दिल थाम लीजिए, क्योंकि भारत में चीनी कोरोना वायरस (चीनी कम्युनिस्ट पार्टी वाइरस यानी सीसीपी वायरस यानी कोविड-19) से संक्रमित कोरोना पॉजिटिव मरीज़ों की संख्या में विस्फोट होने वाला है। यह संख्या किसी भी समय बहुत ज़्यादा बढ़ सकती है। यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि राजधानी दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे देश में सीसीपी वायरस का एपीसेंटर दिल्ली के निजामुद्दीन पश्चिम में स्थित तबलीग़ी जमात का आलमी मरकज़ यानी ग्लोबल सेंटर ही होगा।

ऐसे समय में जब विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य विशेषज्ञ घातक कोरोनावायरस के प्रसार पर अंकुश लगाने के लिए ‘सामाजिक दूरी’ रखने की अपील कर रहे हैं और चीनी वायरस को और फैलने से रोकने के लिए पूरे देश में लॉकडाउन घोषित किया गया है। 17 से 19 मार्च 2020 के दौरान 300 से ज़्यादा विदेशियों समेत तक़रीबन 3500 तबलीग़ जमात के लोग इस मकरज़ की बंगलेवाली मस्जिद में एकत्रित हुए थे।

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तबलीग़ी आलमी मरकज़ में हुए तीन दिवसीय सम्मेलन के बाद तक़रीबन हज़ार देसी-विदेशी इस्लामी प्रचारक 10 या 12 के समूह में देश के अलग-अलग हिस्सों में चले गए। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि तबलीग़ी जमात के लोगों ने कोरोना वायरस को देश के हर इलाक़े में मुसलमानों में फैला दिया है। ऐसा ही एक समूह तेलंगाना की मस्जिद में बैठक में भाग लिया, जिनमें से सोमवार को पांच लोगों को कोविड-19 से मौत हो गई है। इसके अलावा प्रोग्राम में शिरकत करने वाले तमिलनाडु के व्यक्ति की मौत हो गई। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में सभी 10 कोरोना पॉजिटिव यहीं से गए थे। कश्मीर में जिस व्यक्ति की जान गई है, वह भी यहां से इस्लाम के प्रचार-प्रसार का हुनर सीख कर गया था।

जब पूरा देश अपने घरों में क़ैद है, तब लीग़ी मरकज़म 1500 लोग सोशल डिस्टेंसिंग की अपील को धता-बता कर एक साथ रह रहे थे। इन लोगों ने एक साथ जुमे की नमाज़ भी पढ़ी। यहां आए लोगों को मौलानाओं ने आश्वस्त करते हुए कहा था, “डरो मत अल्लाह-ताला हमें कोरोना वाइरस से दूर रखेगा।” अब बड़ी संख्या में इस कार्यक्रम मं शामिल हुए लोग कोरोना पॉजिटिव निकल रहे हैं। यह देखकर सरकार के हाथ-पांव फूल गए हैं।

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दरअसल, सोमवार को तेलंगाना में छह लोगों की कोरोना वायरस से मौत की खबर आई तो पूरे देश में हड़कंप मच गया। ये सभी लोग तबलीग़ी आलमी मरकज़ में इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए आयोजित मजहबी प्रोग्राम में हिस्सा लेकर अपने घरों को लौटे थे। कार्यक्रम में शामिल क़रीब नौ सौ लोगों में कोरोना के संक्रमण की आशंका बताई जा है। पूरे देश में लॉकडाउन के बावजूद इतनी बड़ी संख्या में राजधानी में हुए इस धार्मिक आयोजन ने सुरक्षा-व्यवस्था की पोल खोल दी है।

अब केंद्र और राज्य सरकारें तबलीग़ी आलमी मरकज़ में हुए तीन दिवसीय सम्मेलन में शामिल सभी लोगों को ढूंढकर उनकी जांच करने में जुटी हैं। ऐसे में, ज़ाहिर है, आपकी जिज्ञासा तबलीगी जमात के बारे में जानने की हो रही होगी, कि आखिर क्या है यह जमात और दिल्ली में इतनी बड़ी संख्या में क्यों हो रहा था इसका आयोजन? दरअसल, तबलीगी जमात मरकज का हिंदी में अर्थ होता है, अल्लाह की कही बातों का प्रचार करने वाले तालिबों के समूह का केंद्र। तबलीगी जमात से जुड़े लोग पारंपरिक इस्लाम को मानते हैं और इसी का प्रचार-प्रसार करते हैं। एक दावे के मुताबिक इस जमात के दुनिया भर में 15 करोड़ सदस्य हैं। बताया जाता है कि तबलीगी जमात आंदोलन को 1927 में मुहम्मद इलियास अल-कांधलवी ने हरियाणा के नूंह जिले के गांव से शुरू किया था।

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तबलीगी जमात के मुख्य उद्देश्य “छह उसूल” (कलिमा, सलात, इल्म, इक्राम-ए-मुस्लिम, इख़्लास-ए-निय्यत, दावत-ओ-तबलीग़) हैं। एशिया में इनकी अच्छी खासी आबादी है। राजधानी दिल्ली का निजामुद्दीन में इस जमात का मुख्यालय है। इस जमात को अपनी पहली बड़ी मीटिंग करने में करीब 14 साल का समय लगा। अविभाजित भारत में ही इस जमात ने अपना आधार मज़बूत कर चुका था। 1941 में 25,000 तबलीग़ियों की पहली मीटिंग आयोजित हुई।

बहुमंजिला बंगलेवाली मस्जिद भीड़ वाली सड़क पर स्थित है। सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया का मकबरे इससे सटा हुआ है। इस्लाम मजहब के प्रचार प्रसार के लिए यहां हर साल तबलीग़ ढोल और नगाड़े की थापों के बीच सूफी की मजार पर चादर चढ़ते हैं। लंबी दाढ़ी रखने और लंबा कुरता और छोटा पैजामा पहनने वाले मौलवी इस्लाम का प्रचार-प्रचार करते हैं। तब्लीगी जमात के मरकज़ और निज़ामुद्दीन औलिया की मजार के बीच, कालजयी शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की मजार है। समुदाय के कई लोग कहते हैं कि तबलीग़ी जमात के लोग धर्म प्रचारकों को पलायनवादी और दुनिया से कटे हुए होते हैं, क्योंकि ये लोग ज़मीन के नीचे और आकाश के ऊपर की बातों का ज़िक्र करते हैं।

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तबलीग़ी का दावा है कि किसी के पास इस मरकज़ में आने वाले सदस्यों की सूची या रजिस्टर नहीं है, लेकिन इसके सदस्य दुनिया भर में फैले हुए हैं। धीरे-धीरे यह आंदोलन पूरी दुनिया में फैल गया और दुनिया के अलग-अलग देशों में हर साल इसका सालाना कार्यक्रम होता है। तबलीग़ी इस जमात का सबसे बड़ा जलसा हर साल बांग्लादेश में आयोजित होता है। भारत और पाकिस्तान में भी इस जमात का सालाना जलसा होता है। इन जलसों में दुनिया के क़रीब 200 देशों से बड़ी संख्या में मुसलमान शिरकत करते हैं। इस तरह तबलीगी आलमी मरकज़ के कारण भारत में आंशिक सामुदायिक विस्तार शुरू हो गया है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने यह बात स्वीकार किया है कि स्थिति ख़तरनाक है।

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