क्या हैं पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के हालात ?

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भारत ने जब से जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35ए को अप्रभावी किया है, तब से पूरा पाकिस्तान हिस्टिरिया का शिकार है। सत्तापक्ष, विपक्ष, सेना, नौकरशाही, मीडिया और खिलाड़ी सभी का दिमाग़ी संतुलन बिगड़ गया है। पूरी दुनिया इस बात से हैरान हो रही है कि भारत ने अपने एक गृह राज्य के बेहतर विकास के लिए कोई क़दम उठाया है तो पीड़ा पाकिस्तानी हुक़्मरानों को क्यों हो रही है। दरअसल, सितंबर-अक्टूबर 1947 से ही पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में बदनीयती से अनैतिक कार्य करता रहा है। दोनों अनुच्छेद उसके लिए अब तक ढाल का काम करते थे। ख़ासकर 1989 से घाटी में शुरू आतंकवाद पर अंकुश लगाने के रास्ते में ये दोनों अनुच्छेद सबसे बड़ी बाधा बन रहे हैं। चूंकि पाकिस्तान नहीं चाहता कि घाटी में शांति स्थापित हो और राज्य विकास की मुख्य धारा से जुड़े, इसलिए वह इस फ़ैसले का हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर विरोध कर रहा है। यह दीगर बात ही कि हर जगह उसकी भद्द पिट रही है।

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जब प्रधानमंत्री इमरान ख़ान जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन की बात कर रहे हैं। तब यह जानना ज़रूरी है कि पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर यानी पीओके और उत्तरी प्रांत गिलगित-बाल्टिस्तान यानी जीबी में मानवाधिकार कितना महफ़ूज़ है। वहां मौजूदा समय में सूरत-ए-हाल क्या है। गौर करने वाली बात यह है कि इसी महीने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त (ओएचसीएचआर) ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि पीओके में मानवाधिकार का उल्लंघन गंभीर है। यह वहां अधिक संरचनात्मक प्रकृति में हो रहा है।ओएचसीएचआर कार्यालय ने अपनी रिपोर्ट में पीओके और जीबी में मानवाधिकार हनन को रोकने के लिए पाकिस्तानी अधिकारियों को कई कड़े निर्देश दिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि पीओके में बलूचिस्तान की ही तरह लोगों के ग़ायब होने की घटनाएं आम हैं। गुमशुदा के परिजन कह रहे हैं कि उनके बच्चों को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसएई आंतकी ट्रेनिंग कैंप में ले जाकर जबरन हथियार चलाने और आतंकवाद की ट्रेनिंग दे रही है। इसी तरह जीबी में भी मानवाधिकार हनन की गंभीर घटनाएं हो रही हैं। इस प्रांत को चीन के शिंज़ियांग से जोड़ने वाले काराकोरम हाइवे और सीपेक प्रोजेक्ट का स्थानीय स्तर पर भारी विरोध हुआ था। इस उपेक्षित प्रांत के अनेक मानवाधिकार कार्यकर्ता कई साल से जेलों में पड़े सड़ रहे हैं।

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गिलगिट-बालिटिस्तान के प्रमुख राजनीतिक दल यूनाइटेड कश्मीर पीपल्स नेशनल पार्टी के प्रवक्ता नासिर अज़ीज़ ख़ान कहते है, “पीओके औऱ जीबी की हालत बहुत ही ख़राब है। पाकिस्तान के इशारे पर जीबी में चाइनीज़ कंपनियां सोने की खदानों सहित वहां के प्राकृतिक संसाधनों को लूट रही हैं। संसाधनों की ऐसी लूट के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वाले लोगों को आईएसआई टॉर्चर करती है। उनका अपहरण करवा लेती है।” नासिर कहते हैं कि पाकिस्तानी हुक़्मरानों ने पीओके संस्थापक राष्ट्रपति सरदार इब्राहिम ख़ान, जम्मू-कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के प्रमुख चौधरी ग़ुलाम अब्बास और पाकिस्तान के कश्मीर मामले के मंत्री मुश्ताक गुरमानी के ‘फ़र्ज़ी दस्तख़त’ वाले ग़ुप्त समझौते की मदद से गिलगित-बाल्टिस्तान पर बलात् क़ब्ज़ा किया था। धोखे से हमारी जमीन हड़प ली और हर क़दम पर लोगों को धोखा दिया। नासिर दावा करते हैं कि सरदार इब्राहिम ने बताया था कि उन्होंने कोई हस्ताक्षर नहीं किया। उनके हस्ताक्षर मुहम्मद दीन तासीर (पत्रकार लवलीन सिंह के ससुर) ने किए थे। लंबे समय तक इस समझौते के बारे में कोई भी नहीं जानता था। पाकिस्तान कहता है कि कराची समझौता 28 अप्रैल 1949 को हुआ था।

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पीओके में मुज़फ़्फ़राबाद, नीलम वैली, मीरपुर, भीमबार, कोटली, बाग, रावलाकोट, सुधनोटी, हटियन और हवेली के रूप में दस ज़िले हैं। इनका स्वतंत्रता के बाद समुचित विकास नहीं हो पाया। लिहाज़ा, ग़रीबी दिनोंदिन बढ़ रही है। इसीलिए बेरोज़गार युवा सेना के झांसे में आकर चंद पैसे के लिए आतंकी बन जाते हैं। वैसे कुल 2.22 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले जम्मू-कश्मीर के 30 फ़ीसदी हिस्से पर पाकिस्तान और 10 फ़ीसदी हिस्से पर चीन का अवैध क़ब्जा है, जबकि भारत के पास 60 फ़ीसदी हिस्सा ही है। पीओके में रहने वाले नागिरकों का हेल्थ बजट केवल 290 करोड़ रुपए का है, जबकि भारत जम्मू-कश्मीर के लोगों के स्वास्थ पर हर साल 3037 करोड़ रुपए खर्च करता है। अभी पीओके प्रधानमंत्री राजा फारूक हैदर खान प्रधानमंत्री सहायता के लिए अमेरिका गए थे। लेकिन अमेरिकी लीडरशिप ने उन्हें घास भी नहीं डाला। हैदर ने यह बताने की कोशिश की कि पीओके में सब कुछ ठीक है, लेकिन उनका तर्क किसी अमेरिकी नेता या अधिकारी के गले नहीं उतरा। फारूक हैदर खाली हाथ ही लौट आए।

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पाकिस्तानी हुक़्मरान कहते हैं कि आज़ाद कश्मीर में 1974 से संसदीय प्रणाली है और चुनाव हो रहे हैं। वहां राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हैं। मतलब इस्लामाबाद के मुताबिक, पीओके में सब कुछ ठीक चल रहा है। दूसरी ओर मानवाधिकार कार्यकर्ता ज़ुल्फ़िकार बट कहते हैं, “आज़ाद कश्मीर बिल्कुल आज़ाद नहीं है। लोग ख़ुश नहीं हैं। वे पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बनना चाहते। उन पर अत्याचार होता है, पर कोई सुनवाई नहीं। पीओके का सारा नियंत्रण पाकिस्तान के हाथ में है। वहां काउंसिल का चेयरमैन पाकिस्तान का प्रधानमंत्री होता है, जिसका नियंत्रण सेना करती है। लोग पाक सेना को जबरन घुस आई सेना मानते हैं। इसीलिए वहां पाकिस्तान के ख़िलाफ़ बड़ा मूवमेंट चल रहा है। इस आंदोलन में अनके नेशनलिस्ट संगठन शामिल हैं, जिसमें पांच छह सक्रिय तंज़ीम हैं। ये तंज़ीम पाकिस्तान के उन दावों की हवा निकाल देते हैं जिनमें दावा किया जाता है कि उसके नियंत्रण वाला कश्मीर ‘आज़ाद’ है। बहरहाल, अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की ख़ामोशी इस्लामाबाद को मनमानी करने का हौसला देती है।”

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मुज़फ़्फ़राबाद में रहने वाले कश्मीरी लेखक अब्दुल हकीम कश्मीरी कहते हैं, “आज़ाद कश्मीर की असेंबली को मिले अधिकार बेमानी हैं। इसका कोई अंतरराष्ट्रीय स्टेटस नहीं है। इस हुकूमत को पाकिस्तान के अलावा दुनिया में कोई भी नहीं मानता। अगर सच्ची बात की जाए तो इस असेंबली की पोजीशन अंगूठा लगवाने से ज़्यादा नहीं है।” 2005 के विनाशकारी भूकंप के बाद ह्यूमन राइट्स वाच ने एक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें कहा गया था कि आज़ाद कश्मीर में मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है। अभिव्यक्ति की आज़ादी पर कड़ा नियंत्रण है। जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की पैरवी करने वाले चरमपंथी संगठनों को खुली छूट है। लाइन ऑफ कंट्रोल के क़रीब 1989 से असंख्य आतंकवादी कैंप चल रहे हैं। वहां अनगिनत लॉन्च पैड भी हैं। वहीं से भारत में घुसपैठ होती है।

दरअसल, पीओके मूल जम्मू-कश्मीर का वह भाग है, जिस पर पाक ने 1947 में हमला कर क़ब्ज़ा कर लिया था। तभी से यह विवादित क्षेत्र है। संयुक्त राष्ट्र सहित अधिकांश अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं इसे पाक-अधिकृत कश्मीर कहती हैं। इसकी सीमाएं पाकिस्तानी पंजाब, उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रांत, अफ़गानिस्तान, चीन और भारतीय कश्मीर से लगती हैं। इसके पूर्वी भाग ट्रांस-काराकोरम को पाकिस्तान ने चीन को दे चुका है। पाकिस्तान पूरे कश्मीर पर दावा करता है। उसके दावे का आधार पाकिस्तान घोषणपत्र है। दरअसल, मुस्लिम राष्ट्रवादी चौधरी रहमत अली ने 28 जनवरी, 1933 को चार पेज का बुकलेट छापा था, जिसमें “अभी या कभी नहीं : हम जीएं या हमेशा के लिए खत्म हो जाएं” नारा लिखा था। उन्होंने ब्रिटिश इंडिया के पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत, कश्मीर, सिंध और बलूचिस्तान को मिलाकर इस्लामिक देश बनाने की पैरवी की थी। अली का तर्क था, “पांचों प्रांतों की चार करोड़ आबादी में तीन करोड़ मुसलमान हैं। हमारा मजहब, तहजीब, वेशभूषा, इतिहास, परंपराएं, सामाजिक एवं आर्थिक व्यवहार, लेन-देन, उत्तराधिकार, शादी-विवाह और क़ानून यहां के मूल बाशिंदों से बिल्कुल अलग है। हमारे बीच खानपान या शादी-विवाह के संबंध नहीं है।” उनके इस प्रस्ताव को 23 मार्च 1940 को मुस्लिम लीग के लाहौर घोषणा पत्र में स्वीकार किया गया था। पाकिस्तान के दावे को भारत नहीं मानता, क्योंकि अली के पाकिस्तान में पूर्वी बंगाल नहीं था, जो बाद में पाकिस्तान का हिस्सा बना।

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वस्तुतः इसी दावे के आधार पर सिंतबर 1947 में पाकिस्तान ने कबायली आक्रमणकारियों की आड़ में जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दिया और कबीले श्रीनगर के क़रीब आ गए थे। इसके बाद महाराजा हरिसिंह भागे-भागे दिल्ली गए और 26 अक्टूबर 1947 को भारत के साथ विलय प्रस्ताव पर दस्तख़त किए। इस विलय के उपरांत कश्मीर भारत का हिस्सा हो गया। भारतीय सेना ने घाटी में जब जवाबी कार्रवाई शुरू की तो पाकिस्तान सेना खुलकर लड़ने लगी। लड़ाई के बीच दोनों देशों के बीच यथास्थिति बनाए रखने का समझौता हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने युद्ध विराम की घोषणा कर दी। इससे भारतीय सेना को वर्तमान नियंत्रण रेखा के पूरब तरफ़ रुकना पड़ा और हथियाए गए हिस्से को पाकिस्तानी नियंत्रण से मुक्त नहीं कराया जा सका। लिहाज़ा, वे हिस्से पाकिस्तान के पास ही रह गए। इस क्षेत्र को पाकिस्तान आज़ाद जम्मू-कश्मीर कहता है। भारत का दावा है कि संधि के बाद पूरे कश्मीर पर उसका अधिकार बनता है। अगर अब भारत इस हिस्से को पाकिस्तान से वापस लेने के लिए कूटनीतिक प्रयास कर रहा है तो इसमें कोई बुराई नहीं है।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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