नागरिकों में चेतनाविहीनता की स्थिति बहुत खतरनाक

0
1212

विद्यानंद चौधरी

समाज में जब एक समुदाय की नागरिकता पर हमला होता है और बहुमत इसका समर्थन करता है तो वह खुद अपनी नागरिकता हारने की भी सहमति दे देता है। सवाल वह भी नहीं कर सकता। अधिकार वह भी नहीं मांग सकता। शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार, किसानी, मजदूरी, महिलाओं, बच्चों, युवाओं आदि के नागरिक अधिकारों का क्या हाल है? किसने क्या खोया? बहुमत ने कुछ पाया क्या? नागरिकता संपूर्णता में हासिल होती है और संपूर्णता में खत्म भी हो जाती है।

विभाजन केवल संपूर्णता में नागरिक अधिकारों को छीनने के लिए, उनके आंदोलनों के अधिकारों को कुचलने के लिए इस्तेमाल में लाए जाते हैं। वास्तविकता यह है कि कट्टरता और उन्माद पूंजीवाद द्वारा एक स्मोक स्क्रीन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। अपने छिनते अधिकारों को न देख नागरिक केवल नफरत और कट्टरता के अंधकार में गुम हो गया है। नशे में वह नफरत के नालियों में गिरा कीड़े की तरह गंदगी में लिपटा खुद को खो चुका होता है।

नागरिकों में चेतनाविहीनता की यह स्थिति बहुत खतरनाक होती है। वह पूंजीवादी अधिनायक को सर्वशक्तिमान समझ खुद निर्बल निरीह जीव बन समर्पण भाव में नतमस्तक खड़ा है। वह नफरती उन्मादी अधिनायक का हथियार बन गया है। सवाल यह है कि इस स्थिति का दोषी कौन है। इसका क्या निवारण हो सकता है। नागरिक, बुद्धिजीवी और मेहनतकश के रूप में हमारी क्या भूमिका बनती है।

अगर आप दुनिया के नक्शे पर नजर डालेंगे तो दिखेगा कि दुनिया के बहुत बड़े हिस्से में कट्टरता, उन्माद और नफरत की राजनीति व्याप्त है। जिन यूरोपीय देशों और अमेरिका को लोकतंत्र का अगुवा कहा जाता था, जहां लोकतंत्र की दुहाई दी जाती थी, आज उन्हीं देशों में में फासीवाद अलग अलग रूपों में अपने पैर पसार चुका है। इन सभी देशों में मेहनतकशों के अधिकारों के आंदोलन कमजोर हुए हैं। पर उसके अलावा इन सभी देशों में पूंजीवाद एक संकट के दौर से गुजर रहा है।

मुनाफा और निवेश की रफ्तार मंथर पड़ी है। बाजार के विस्तार पर सवालिया निशान लगे हैं और पूंजीवादी साम्राज्यवादी होड़ बहुत तीखी हुई है। विश्व पूंजीवाद खुद को आसन्न मंदी से बचाने और उबारने में खुद को नाकाम पा रहा है। दूसरी तरफ मेहनतकशों की माली हालत बहुत कमजोर पड़ी है। रोजगार और आय की हालत दिन ब दिन बदतर होती जा रही है। मजदूरी और व्यापार के कानूनों में लगातार बदले कर पूंजी के सम्मुख श्रम की स्थिति को कमजोर किया जा रहा है।

मजदूरी के कानूनों में बदलाव कर मेहनतकशों के मजदूरी तथा अन्य सुविधाओं पर लगातार प्रहार कर तथा मजदूरी के खातों को बढ़ा कर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा बढ़ाने की कोशिशें की जा रही हैं। भारत में नए श्रम संहिता के जरिए एक तरफ जहां मजदूरी और मोलजोल के परिस्थितियों को कमजोर किया गया है, वहीं पूंजीपतियों को बारह घंटे मजदूरी करवाने का अधिकार दिया है। यही नहीं, हड़ताल और आंदोलनों के अधिकारों पर भी तीखा कुठाराघात किया गया है।

एक तरफ मेहनतकशों की हालत लगातार खास्ता हुई है तो दूसरी ओर पूंजीपतियों की संपत्ति बेतहाशा बढ़ती जा रही है। न सिर्फ मेहनतकशों को प्रत्यक्ष लूटकर वरन सामाजिक संपत्तियों को बेमोल हासिल कर, सट्टा बाजार के सैकड़ों तिकड़मों के जरिए हर तरह से मेहनतकशों को लूटा जा रहा है। आपको साफ दिखेगा कि जहां मजदूरी और आज लगातार घट रही हैं, वहीं दूसरी तरफ पूंजीपतियों के तंत्र, वित्त पूंजी में लगातार विस्तार हो रहा है। हरेक वस्तु और उत्पाद जो वित्तीय सट्टेबाजी के दायरे से बाहर थे, उन सभी को असंगठित क्षेत्र से निकाल, संगठित क्षेत्र अर्थात वित्त पूंजी के हवाले किया जा रहा है।

तो इस स्थिति के लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं? शोषण की तेज चक्की और संकटग्रस्त पूंजी को एक ऐसी सत्ता की दरकार होती है जो उसे संकट से बचाने के लिए मेहनतकशों को ज्यादा से ज्यादा लूटने और सामाजिक साधनों पर ज्यादा से ज्यादा कब्जा करने का मौका दे। पर ऐसा करने पर नागरिकों में रोष भी तो हो सकता है। शोषणपूर्ण जनविरोधी नीतियों का विरोध भी तो होगा। तो सत्ता का काम हैं कि ऐसे विरोधों की परिस्थितियों को कमजोर करें। पूंजीपतियों को वाह सरकार चाहिए जो इन सभी लूट और शोषण को या तो राष्ट्रीय महानता के जुमले में लपेट दे या इन्हें नागरिकों से छुपाने में मदद करे।

तो नफरत, उन्माद और कट्टरता का इस्तेमाल इसी उद्देश्य से किया जाता है। अंधराष्ट्रवाद और साम्प्रदायिक कट्टरता, राष्ट्र हित का झूठा ढोंग आदि ऐसे ही स्मोक स्क्रीन हैं जिनके पीछे न सिर्फ मेहनतकश अपनी बदहाली को भुला देते हैं, वरन सरकार के जनविरोधी और शोषक नीतियों का समर्थन करने लगते हैं। पूंजीपतियों को ऐसा ही हथियार फासीवाद के रूप में हासिल हो जाता है। उदाहरण सामने है।

तो इस स्थिति से कैसे लड़ा जाए? मेरा मानना है कि इसमें समाज के हरेक तबके की भूमिका बनती है। नागरिक मंचों, बुद्धिजीवियों, नौजवानों आदि की स्पष्ट भूमिका नजर आती है। परंतुन इनमे से सभी की सीमाएं हैं। इनकी लड़ाई पूंजीवादी दायरे के अंदर ही कुछ अधिकारों की या आर्थिक लाभों की सीमा के अंदर ही संभव है। परंतु जैसा कि आपने पहले ही देखा है, समस्या पूंजीवाद के अंदर ही है। इसका संकटग्रस्त होना कोई घटना नहीं, बल्कि इसका मौलिक चरित्र है। दूसरे पूंजीवाद के तहत जो भी विकास संभव था, वह हासिल किया जा चुका है।

कोई शक नहीं कि पूंजीवाद ने सामंतवाद के विरुद्ध क्रांतिकारी परिवर्तन की भूमिका निभाई है और मेहनतकशों ने इसमें क्रांतिकारी भूमिका निभाई है। परंतु यह अपनी उच्चतम अवस्था के परे अब प्रतिगामी हो गया है। इसके तहत मेहनतकशों और मध्यमवर्गीय नागरिकों के रूप में जो अधिकार हासिल किए थे, जिन उपलब्धियों की यात्रा तय किए थे, अब यह उन्हीं उपलब्धियों को तेजी से खत्म कर रहा है। सामाजिक, सांस्कृतिक, पारिस्थितिक और मानवीय रिश्तों को परिस्थितियों को यह प्रतिकूल और प्रतिगामी बना रहा है। आज पूंजीवाद के प्रतिगामी चरित्र का ही परिणाम है कि महामारी, युद्ध और जलवायु परिवर्तन के खतरे के जरिए आज मानवता अपने अस्तित्त्व की लड़ाई हार रहा है।

इतने सारे संकट और लगातार पैदा होती नई विसंगतियां साफ बता रही हैं कि पूंजीवाद खुद मानवता के अस्तित्व के लिए खतरा बन गया है। तो स्पष्ट है कि इस लड़ाई को पूंजीवादी दायरे के अंदर अंतिम तौर पर तो नहीं लड़ा जा सकता। और जितनी भी पूंजीवादी संस्थाएं, संगठन और एजेंसियां है, उनकी सीमाएं हैं। तो इस लड़ाई को लड़ने की जवाबदेही उसे ही लेनी होगी जो समाज व्यवस्था को पूंजीवाद के अगले मुकाम यानि समाजवाद की यात्रा पर अग्रसर कर सके।

जो वर्ग संघर्ष के रास्ते समाजवाद के संघर्ष को आगे बढ़ा सके। कहना नहीं होगा कि मेहनतकशों का हिरावल दस्ता ही इस मंजिल को हासिल कर सकता है। यही हमारी जवाबदेही है कि वर्ग चेतना को मजबूत करने और पूंजीवाद का विकल्प हासिल करने के लिए मेहनतकशों के राजनीतिक आंदोलन को मजबूत करें। समाजवादी आंदोलन में हर संभव भूमिका निभाएं।

(लेखक विद्यानंद चौधरी पटना के सेंट जेवियर कॉलेज पटना में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं।)