महंगाई में कच्चे तेल का तड़का

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सरोज कुमार

महंगाई की मौजूदा तकलीफ वैसे ही कम न थी। तेल अब इसमें नई तकलीफ जोड़ने वाला है। तेल की नई तकलीफ आमजन तक सीमित नहीं रहने वाली, यह अर्थव्यवस्था को भी अशक्त करेगी। पहले से सुस्त अर्थव्यवस्था का यह एक नया चरण होगा। ऊंची महंगाई, बेरोजगारी के बीच समाज का आचरण भी बदलेगा। नहीं पता, हम आप कहां, किस रूप में होंगे! लेकिन जहां भी, जिस भी रूप में होंगे, वह तस्वीर कम से कम सुखद तो नहीं होगी।

महामारी के हालात सुधरने के बाद आर्थिक गतिविधियां शुरू ही हुई थीं कि रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हो गया। आपूर्ति श्रृंखला एक बार फिर बाधित हुई। यूरोप, अमेरिका सहित दुनिया के कई देशों में महंगाई आसमान पहुंच गई। इसी बीच पश्चिमी देशों ने रूस पर सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। रूस दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक है। कच्चे तेल की कीमत ऊपर जाने लगी। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय बास्केट की जो कीमत अप्रैल 2022 में 102.97 डॉलर प्रति बैरल थी, वह जून 2022 आते आते 116.01 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई। अमेरिका में महंगाई पर लगाम लगाने फेडरल रिजर्व मैदान में उतरा। उसने ब्याज दर बढ़ानी शुरू की।

मार्च 2022 से अबतक फेड की ब्याज दर छह बार में 3.50 फीसद बढ़कर 3.75-4.00 फीसद हो चुकी है। यह सिलसिला आगे भी जारी रहने वाला है। दिसंबर 2022 में एक और वृद्धि का संकेत है। फेड की ब्याज दर बढ़ने से जहां डॉलर मजबूत होता गया, वहीं भारत सहित अन्य देशों की मुद्राएं कमजोर होती गईं। डॉलर में भुगतान के कारण आयात महंगा होता गया। महंगाई बढ़ती गई। ईंधन अर्थव्यवस्था का एक अनिवार्य अवयव है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है और अपनी जरूरत का 85 फीसद कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि सीधे तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है। आयात महंगा होगा तो निश्चित तौर पर महंगाई बढ़ेगी। महंगाई बढ़ेगी तो अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा।

भारत के लिए अच्छी बात यह रही कि पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों से अपनी अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए रूस सस्ते दर पर कच्चा तेल बेचने को राजी हो गया। भारत ने इसका लाभ भी उठाया। अप्रैल 2022 से अगस्त 2022 के दौरान रूस से कच्चे तेल का आयात पिछले साल की तुलना में पांच गुना बढ़कर कुल आयात का लगभग 16 फीसद हो गया। सितंबर 2022 में हालांकि इसमें दो फीसद की गिरावट आई, फिर भी मौजूदा समय में भारत रूसी कच्चे तेल का चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा खरीददार है। रूसी तेल ने आयात बिल में काफी राहत दी।

इसी दौरान दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देश चीन में महामारी से बचाव के सख्त उपायों के कारण आर्थिक गतिविधियां थम गईं और कच्चे तेल की मांग घट गई। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत नीचे आने लगी। भारतीय बास्केट के कच्चे तेल की औसत कीमत जुलाई 2022 में घट कर 105.49 डॉलर प्रति बैरल हो गई, अगस्त में 97.40 डॉलर, सितंबर में 90.71 डॉलर और अक्टूबर में औसत कीमत 91.70 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई। लेकिन सरकार ने आम जनता को इसका कोई लाभ नहीं दिया। जून 2022 से अबतक पेट्रोल, डीजल की घरेलू कीमतें यथावत बनी हुई हैं।

दुनिया में मंदी की आहट के बीच कच्चे तेल की कीमत और नीचे आने की उम्मीद थी। यदि ऐसा होता तो कम से कम सरकार को राजस्व के मोर्चे पर राहत मिलती। क्योंकि भारत अभी भी कच्चे तेल का सबसे ज्यादा आयात इराक से, और उसके बाद सऊदी अरब से करता है। लेकिन तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक प्लस को सस्ता तेल बेचना मंजूर नहीं था। दुनिया में कच्चे तेल की आपूर्ति में 79 फीसद से अधिक की हिस्सेदारी रखने वाले 23 देशों के इस समूह ने मांग घटने के साथ ही उत्पादन घटाने का निर्णय ले लिया, ताकि कच्चे तेल की कीमत नीचे न आने पाए। ओपेक प्लस के प्रतिनिधियों की चार अक्टूबर को वियना में हुई बैठक में नवंबर 2022 से उत्पादन 20 लाख बैरल प्रतिदिन घटाने का निर्णय लिया गया। अगले ही दिन नवंबर के लिए कच्चे तेल का वायदा 0.15 फीसद बढ़ गया।

मांग और आपूर्ति के सिद्धांत पर संचालित बाजार में आपूर्ति कम होगी तो कीमत हर हाल में बढ़ेगी। ऐसे में मजबूत डॉलर और महंगा तेल महंगाई को किस ऊंचाई तक ले जाएंगे, उसे देखने के लिए हमें गर्दन ऊंचा करने का अभ्यास अभी से शुरू कर देना चाहिए। सरकार ने सस्ते तेल का लाभ आमजन के साथ भले नहीं साझा किया, लेकिन महंगे तेल का बोझ वह हर हाल में साझा करना चाहेगी। महंगाई की मौजूदा मार ही आम आदमी की कमर तोड़ रही है। जेब में पैसे नहीं तो भला बाजार कौन, क्यों और कैसे जाए! जब मांग घटेगी तो विनिर्माण को नीचे आना ही है। सितंबर 2022 में विनिर्माण का पीएमआइ (पर्चेजिंग मैनेजर इंडेक्स) अगस्त के 56.2 से घटकर 55.1 पर आ गया। अक्टूबर में हालांकि इसमें सुधार हुआ और यह 55.3 पर दर्ज किया गया। लेकिन इसी महीने बेरोजगारी दर बढ़कर 7.77 फीसद हो गई। इससे इस संभावना को बल मिलता है कि अक्टूबर का विनिर्माण पीएमआइ मौसमी (दीपावली) मांग का परिणाम था। इसकी असल परीक्षा नवंबर के आंकड़े से हो जाएगी।

सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) महंगाई को लेकर चिंतित नहीं हैं, ऐसा नहीं है। लेकिन उनकी चिंता का कोई परिणाम निकल रहा हो, ऐसा भी नहीं है। महंगाई पर नियंत्रण के लिए आरबीआइ मई 2022 से लेकर अबतक अपनी नीतिगत ब्याज दर में 190 आधार अंकों की वृद्धि कर चुका है। लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात। लगातार तीन तिमाहियों यानी नौ महीनों से महंगाई दर आरबीआइ की लक्षित अधिकतम सीमा छह फीसद से ऊपर बनी हुई है। नतीजा यह हुआ कि केंद्रीय बैंक को आरबीआइ अधिनियम, 1934 की धारा 45 जेडएन और आरबीआइ एमपीसी एवं मौद्रिक नीति प्रक्रिया अधिनियम,2016 के नियम 7 के तहत एमपीसी की एक विशेष बैठक बुलानी पड़ी और सरकार को रपट भेजनी पड़ी है। रपट में क्या है, फिलहाल खुलासा नहीं हो पाया है। लेकिन नियम कहता है, यदि महंगाई दर तीन तिमाहियों तक लक्षित अधिकतम सीमा के ऊपर बनी रहती है तो आरबीआइ को अपनी विफलता के कारण और उसके निवारण के उपाय सरकार को लिखित में बताने होंगे। वर्ष 2016 में मौद्रिक नीति की नई कार्ययोजना को स्वीकृति दिए जाने के बाद यह पहला मौका है जब आरबीआइ को एमपीसी (मौद्रिक नीति समिति) की यह विशेष बैठक बुलानी पड़ी और सरकार को इस तरह की रपट सौंपनी पड़ी है।

आरबीआइ की इस रपट पर सरकार क्या कुछ कदम उठाती है, यह तो देखने वाली बात होगी। फिलहाल समझने वाली बात यह है कि सरकार के पास महंगाई पर लगाम लगाने के लिए राजकोषीय उपाय के अलावा कोई रास्ता है नहीं। और राजकोष की क्या हालत है? इबारत साफ लिखी हुई है। कई वस्तुओं पर जीएसटी दर बढ़ाने और खाने-पीने के सामानों पर भी जीएसटी लगाने के बावजूद मौजूदा वित्त वर्ष (2022-23) की प्रथम छमाही का राजकोषीय घाटा 6.20 लाख करोड़ रुपये दर्ज किया गया है। जबकि साल भर पहले इसी अवधि का राजकोषीय घाटा 5.27 लाख करोड़ रुपये था। आर्थिक अस्थिरता के मौजूदा दौर में विनिवेश के जरिए राजस्व जुटाना सरकार के लिए कितना कठिन है, वह अच्छी तरह समझ चुकी है। कॉरपोरेट कर बढ़ाने का उसका कोई इरादा नहीं है। ऐसे में सरकार का सारा जोर अप्रत्यक्ष कर वसूली पर है। आम आदमी से अधिक से अधिक कर वसूलने पर। महंगाई के रूप में सरकार को कर भुगतान आमजन की मजबूरी है। महंगा कच्चा तेल इस महंगाई में पक्का आग लगाएगा। इस अग्नि-परीक्षा में कौन खरा उतरेगा? इस सवाल का जवाब समय देगा। फिलहाल सरकार को अपनी भूमिका तय करनी है कि वह इस आग पर पेट्रोल डालना चाहती है, या पानी।

(वरिष्ठ पत्रकार सरोज कुमार इन दिनों स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)