सहकारिता को सरकारिता से चुनौती

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सरोज कुमार

सहकारिता का सीधा अर्थ साथ मिलकर लोकतांत्रिक तरीके से काम करना है। शासन में नहीं, आत्मानुशासन में। सहकार समाज का हमेशा से आधार रहा है। स्वराज, स्वावलंबन और समृद्धि का समयसिद्ध उपकरण। आजादी के बाद सहकारिता को सार्वजनिक, निजी के मध्य अर्थव्यवस्था का तीसरा क्षेत्र माना गया, पंचवर्षीय योजना का अभिन्न अंग बनाया गया। सहकारिता आंदोलन तेजी से आगे बढ़ा। समय के साथ जैसे-जैसे सहकारिता में सरकारिता घुसती गई, आंदोलन अवरुद्ध होता गया।

सहकारिता आंदोलन आज निजी-सरकारी दो पाटों के बीच पिस रहा है। एक तरफ अकुशल प्रबंधन के कारण यह निजी क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहा, तो दूसरी तरफ सरकारी नियंत्रणकारी कदम इसे निस्तेज कर रहे। सहकारिता यानी सरकार से मुक्त। लेकिन आज पूरा सहकारी क्षेत्र किसी न किसी रूप में सरकारी नियंत्रण में है। यह सहकारिता के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न है।

नियंत्रण सत्ता का स्वभाव है। सरकारें नियंत्रण के लिए कानून बनाती हैं। तर्क दिया जाता है व्यवस्था की सफलता-विफलता के लिए सरकारें जवाबदेह ठहराई जाती हैं। फिर वे चुस्त नियम-कानून क्यों न बनाएं। सभी सरकारों ने समय-समय पर ऐसे कदम उठाए हैं। मौजूदा सरकार भी। बैंक नियमन अधिनियम,1949 में संशोधन, बहु-राज्य सहकारी समिति (संशोधन) विधेयक,2022 और अलग सहकारिता मंत्रालय मौजूदा सरकार के सहकारिता क्षेत्र को खास तोहफे हैं।

सहकारिता इसके पहले तक कृषि मंत्रालय के अधीन एक विभाग था। अलग सहकारिता मंत्रालय के गठन से साफ है सरकार यहां कुछ खास करना चाहती है। अब सरकार जो करेगी, वह सरकारी ही होगा, सहकारी नहीं। आलोचकों को सरकार की नियत पर संदेह है। वे अलग सहकारिता मंत्रालय को संघीय ढांचे पर केंद्र का हमला मानते हैं, क्योंकि सहकारिता राज्य का विषय है।

अब जरा एक नजर उन कानूनों पर, जिनके जरिए समय-समय पर सहकारिता आंदोलन पर नियंत्रण करने की कोशिशें की गईं। सहकारिता को सरकारी निगरानी में लाने के लिए पहली बार 1904 में ’सहकारी क्रेडिट सोसायटी अधिनियम’ पारित किया गया। 2011 तक 5300 सहकारी समितियां अस्तित्व में आ गईं। 1912 में इस अधिनियम में आवश्यक संशोधन किए गए। नए कानून का नाम ’सहकारी समिति अधिनियम’ हो गया। सहकारिता के विस्तार के लिए खुली धरती, खुला आसमान था, हौंसलों की उड़ान भी थी।

सहकारी समितियों की संख्या बढ़ती गई। इसी बीच केंद्र और राज्यों के अधिकारों को निर्धारित करने वाला ’चेल्म्सफोर्ड सुधार अधिनियम, 1919’ पारित हुआ, और सहकारी समितियां राज्य का विषय बन गईं। इस दौरान ऐसी सहकारी समितियां भी बन गई थीं, जिनमें एक से अधिक राज्यों के सदस्य शामिल थे। अब इन समितियों से निपटने के लिए 1942 में ’बहु-इकाई सहकारी समिति अधिनियम’ पारित करना पड़ा। इसमें 1984 में सुधार किया गया और ’बहु-राज्य सहकारी समिति (एमएससीएस) अधिनियम’ अस्तित्व में आया।

साल 2002 में अधिनियम में फिर संशोधन किया गया। यह आदर्श अधिनियम था। अब एक बार फिर एमएससीएस अधिनियम में संशोधन की तैयारी है। बहु-राज्य सहकारी समिति (संशोधन) विधेयक-2022 संसद के मानसून सत्र में पारित होना है।

नए विधेयक के प्रावधान नए सहकारिता मंत्रालय की मंशा को स्पष्ट कर देते हैं। एक प्रमुख प्रावधान है कि कोई भी सहकारी समिति किसी भी बहु-राज्य सहकारी समिति में अपना विलय कर सकती है। मौजूदा अधिनियम में किसी एमएससीएस के ही दूसरी एमएससीएस में विलय का प्रावधान है। राज्य सहकारी समितियों को केंद्र की निगरानी में लाने का यह एक रास्ता लगता है। विधेयक सात दिसंबर, 2022 को लोकसभा में पेश किया गया था। विपक्ष की आपत्ति के बाद इसे संसद की एक संयुक्त समिति को सौंप दिया गया।

समिति ने अपनी रपट 15 मार्च, 2023 को लोकसभा को सौंप दी है, जिसमें विधेयक के लगभग सभी प्रावधानों को स्वीकृति दी गई है। विधेयक के कानून बनने के बाद एमएससीएस के चुनाव के लिए एक केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण भी होगा और वित्तीय पारदर्शिता के लिए लोकपाल भी। सरकार इस संशोधन विधेयक को सहकारिता के लिए रूपांतरकारी बताती है, जबकि आलोचक नियंत्रणकारी। यहां सवाल सरकार की सोच पर नहीं, विधेयक के स्वरूप पर है, जो कहीं से सहकारी नहीं है। जरूरत सहकारी अधिनियमों की है। जैसे 2003 का उत्पादक कंपनी अधिनियम आज भी सहकारी उद्यमों के लिए सहकारी बना हुआ है।

सहकारिता में सरकारिता के अफसाने और भी हैं। सितंबर 2020 में ’बैंकिंग नियमन (संशोधन) अधिनियम-2020’ पारित हुआ, और 1482 शहरी सहकारी बैंक और 58 बहु-राज्य सहकारी बैंक सीधे भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) की निगरानी में आ गए। इस संशोधन के लिए सरकार के पास एक मजबूत तर्क था – 2019 का पंजाब एंड महाराष्ट्र सहकारी (पीएमसी) बैंक धोखाधड़ी मामला। मगर तथ्य यह भी है कि थाने खुलने से अपराध कम नहीं होते। केंद्र के इस कदम पर भी सवाल उठे। आरबीआइ के जरिए राज्य सहकारी बैंकों पर नियंत्रण की मंशा के सवाल। अधिनियम के खिलाफ उच्च न्यायालयों में मुकदमें हुए। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर फिलहाल सभी मुकदमों की सुनवाई मद्रास उच्च न्यायालय कर रहा है।

दिसंबर 2011 में 97वें संविधान संशोधन के जरिए भी सहकारी समितियों के प्रबंधन को चुस्त-दुरुस्त करने की कोशिश की गई थी। गुजरात उच्च न्यायालय ने नए जोड़े गए खंड 9बी के पूरे हिस्से को 22 अप्रैल, 2013 को निरस्त कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने 2021 में गुजरात उच्च न्यायालय के फैसले पर मुहर लगा दी। सहकारिता संविधान की 7वीं अनुसूची के तहत राज्य का विषय है, लिहाजा संबंधित कानून में संसद के जरिए किसी बदलाव से पहले देश की 50 फीसद राज्य विधानसभाओं की स्वीकृति आवश्यक है। सर्वोच्च न्यायालय ने हालांकि एमएससीएस से संबंधित संशोधनों को लागू करने की स्वीकृति दे दी। देश में फिलहाल 1500 से अधिक एमएससीएस हैं।

न्यायालय के इस फैसले से सरकार सचेत हो गई लगता है। उसने देशभर की प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों (पीएसीएस) को एक कानून से संचालित करने का नया तरीका ढूढ़ निकाला है। एक बाय-लॉज (उपनियम) तैयार किया गया और सुझाव के लिए उसे सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भेज दिया गया। सहकारिता मंत्री अमित शाह ने पिछले दिनों 17वें सहकारिता महासम्मेलन में कहा कि कुल 26 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इस उपनियम को स्वीकृति दे दी है।

देश के 85 फीसद पीएसीएस इस साल सितंबर के बाद से एक कानून से संचालित होने लगेंगे। सरकार का मानना है अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग कानून होने से पीएसीएस सम्यक रूप से प्रभावी प्रदर्शन नहीं कर पा रहे। देश में अभी 85,000 पीएसीएस हैं। अगले तीन सालों में हर ग्राम पंचायत में एक पीएसीएस स्थापित करने की योजना है। एक कानून की बात सुनने में अच्छी लगती है। लेकिन राज्यों की भिन्न-भिन्न भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक और जलवायु स्थितियों के लिहाज से यह अव्यवहारिक है। यदि उत्तर प्रदेश के नियम, उत्तराखंड या पूर्वोत्तर राज्यों में लागू किए जाएं तो क्या परिणाम होंगे? यह सहकारिता पर सरकारिता थोपने से ज्यादा कुछ नहीं है।

यह सच है आज के समय में नियम-कानून विहीन व्यवस्था का संचालन कठिन है, भले ही वह सहकारिता क्यों न हो। लेकिन सच यह भी है कि कोई व्यवस्था तभी सहकारिता कहलाएगी, जब संबंधित नियम-कानून और कार्यपद्धति सहकारी हों। वरना इतिहास कानूनों के विकास का बनेगा, सहकारिता के विकास का नहीं। हालांकि, सरकारिता की बढ़ती जकड़न का एक अर्थ यह भी है कि कहीं न कहीं सहकारी भाव और भूमिकाएं अभी बची हुई हैं। जरूरत उनके संरक्षण और संवर्धन की है। भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ (एनसीयूआई) को इस भूमिका में गिना जा सकता है।

अमूल, नेफेड, इफको, क्रिभको, लिज्जत पापड़, केंद्रीय सहकारी भंडार जैसे नाम सहकारिता के उज्ज्वल उदाहरण हैं। बुरी हालत में भी कृषि ऋण वितरण में लगभग 29 फीसद, उर्वरक वितरण में 35 फीसद, उर्वरक उत्पादन में 25 फीसद, चीनी उत्पादन में 35 फीसद, दूध खरीद, बिक्री और उत्पादन में लगभग 15 फीसद, गेहूं खरीद में 13 फीसद, और धान खरीद में 20 फीसद सहकारिता क्षेत्र की हिस्सेदारी है। लगभग साढे़ आठ लाख सहकारी समितियां देश में काम कर रही हैं। लगभग 13 करोड़ लोग सीधे तौर पर उनसे संबद्ध हैं। यदि सरकार, समाज और प्रबंधन शुद्ध सहकार की भूमिका में आ जाएं तो सहकारिता आंदोलन अर्थव्यवस्था की धुरी बन सकता है।

(वरिष्ठ पत्रकार सरोज कुमार इन दिनों स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)

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