मुझे अपनी आवाज दे गए ‘बड़े चाचा’

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सुनील मेहरोत्रा

किरदार सिर्फ फिल्मों में ही नहीं होते, हर इंसान की जिंदगी का, कहानी का हिस्सा होते हैं। पर काम की व्यस्तता और जिंदगी की भागमभाग के बीच अक्सर हम अपनों के इन किरदारों को देखने और समझने की कोशिश नहीं करते। जब ये अपने, अपने सामने नहीं रहते, तो हमें अपनों के ये किरदार बहुत रूलाते हैं, कहीं न कहीं अपराधबोध से भी ग्रस्त कराते हैं।

बड़े चाचा की कहानी भी बहुत कुछ ऐसी ही है।

बड़े चाचा के दो नाम सबको पता हैं। एक नाम है हृदयेश, जिसने साहित्य में अलग पहचान बनाई। दूसरा नाम है हृदय नारायण मेहरोत्रा। इस नाम से उन्होंने नौकरी की, इस नाम से मिलने वाली छोटी-सी पगार से उन्होंने हम बच्चों को अपना अलग मुकाम, पहचान देने की कोशिश की। बच्चे बड़े हो गए, अच्छे से सेटल भी हो गए, पर हृदय नारायण मेहरोत्रा, वैसे ही रहे, जैसे गर्दिश के दिनों में थे। गर्दिश के दिनों में उनके पास पैसों की बहुत तंगी थी, पर जब आर्थिक रूप से थोड़े संपन्न हुए, तो भी गर्दिश के दिनों जैसी अपनी सादगी नहीं छोड़ी ।

सादे जीवन को अक्सर लोग कंजूसी से जोड़कर देखते हैं, लेकिन बड़े चाचा के लिए अच्छे जीवन का मतलब अय्याशी नहीं था। करीब पांच साल पहले सुबह- सुबह पलंग से गिर गए। हाथ में फ्रेक्चर हो गया। मैंने गुस्से में कहा कि आपका एक बेटा डॉक्टर है, एक अमेरिका में है, मैं भी ठीक- ठाक पगार पाता हूं, इस उम्र में अब आप इतने रुपये किसके लिए बचा रहे हो? जिंदगी भर संघर्ष किया, अब ऐश से क्यों नहीं रहते? क्यों नहीं, रात में घर की मुख्य लाइट्स जला कर रखते‌ हो? जवाब में खुद भी बेहद गुस्सा हो गए। बोले, इस उम्र में मैं अपनी आदतें नहीं बदल सकता।… मैं खामोश हो गया।

आदतों की जब बात आई, तो उनकी चाय की आदत का जिक्र न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। 27 साल पहले जब मैं धर्मयुग जॉइन करने मुंबई गया था, तो लोगों ने कहा था कि यदि तुम शराब नहीं पीते हो, तो कभी पत्रकार नहीं बन सकते। ऐसे ही साहित्य में भी यह एक मिथ है कि यदि शराब नहीं पीओगे, तो अच्छा नहीं लिख पाओगे।

सच क्या है, मैं नहीं जानता, पर मैं इतना जरूर जानता हूं कि बड़े चाचा यानी मेरे पापा ने पिछले पांच-छह दशक में जितना भी साहित्य लिखा है- उनकी चाय की लत ने इसमें टॉनिक का काम किया है। लत शब्द का यहां जानबूझकर जिक्र कर रहा हूं–ऐसी लत कि रात में उन्हें यदि कम से कम दो कप चाय न मिले, तो उनकी सुबह कभी हो ही न पाए, उनका 60 साल पुराना टाइप राइटर कभी खट- खट ही न कर पाए।

चार-पांच साल पहले की बात है। भतीजी अदिति की शाहजहांपुर में शादी थी। नवंबर का महीना था। अच्छी खासी सर्दी थी। सभी रिश्तेदार होटेल में सो रहे थे, होटल का स्टॉफ भी गहरे खर्राटे भर रहा था। उसी दौरान एकाएक रात करीब ढाई बजे बड़े चाचा ने मुझे जगाया। बोले – बेटा, मेरे साथ नीचे चलो, एक कप चाय पीनी है। मैंने कहा कि इतनी रात में चाय कहां मिलेगी? बोले, चलो तो …और कुछ देर बाद कुछ सौ कदम दूर सदर बाजार पुलिस चौकी के पास बेंच पर सो रहे एक चाय वाले को उन्होंने खुद जगाया। …’यारों क्या हम दोनों के लिए दो कप चाय बना सकोगे?’ वह हलका सा मुस्कराया, फिर गैस का चूल्हा जलाया। कई मिनट तक हम दोनों ने उसके सामने ही चाय की चुस्कियां लीं और फिर वापस होटल आकर अपनी- अपनी रजाइयों में घुस गए।

उसके अगले साल वह सुबह- सुबह पलंग से नीचे गिर गए । मैं बाजू की चारपाई पर था। जमीन पर उनके गिरने की जब जोर से आवाज आई, मैं बुरी तरह घबरा गया। इससे पहले कि मैं उन्हें उठाने की कोशिश करता, मैंने उनसे कहा कि पहले राकेश भइया (डॉक्टर भाई) को फोन कर बुला लेते हैं, पर मेरे फोन लगाने से पहले वह मुझसे बोले, पहले बेटा, मेरे लिए एक कप चाय बना दो। मैं तब बहुत गुस्सा हो गया। बोला-आपका एक हाथ लगता है फ्रेक्चर हो गया है, पहले पलंग पर तो वापस आ जाओ, फिर चाय बनाते हैं। मैंने राकेश भइया को फोन लगाया, पलंग पर उन्हें वापस लिटाया और गुस्से में भी हलका सा मुस्कराया… मुझे अच्छी तरह याद है कि जब हम दोनों भाई उन्हें डॉक्टर राजेश रस्तोगी के पास ले गए, तो उन्होंने उनसे कहा था कि अरे यारों (यह उनका तकियाकलाम है) मुझे अभी 85 (साल) के बाद वाली भी पेंशन लेनी है । शायद उस वक्त उनकी 81 या 82 की उम्र रही होगी। डॉक्टर रस्तोगी के यहां से लौटने के बाद कुछ वक्त मामा के यहां कच्चा कटरा रुके। बोले, जिंदगी रेलवे का सफर जैसी हो गई है-कभी यहां स्टापेज, कहीं वहां स्टापेज ।

86 साल की उम्र में उनकी मौत हुई। पर इस उम्र में भी उनमें बच्चों जैसी मासूमियत और बच्चों जैसा जुनून मैंने किसी और में नहीं देखा। जुनून से भी शायद और अच्छा शब्द उनके लिए होगा अनुशासन। अपनी कहानी या उपन्यास के एक-एक शब्द को कई कई बार पढ़ना। जरा भी कन्फयूजन हो, तो किसी को भी सीधे फोन कर देना। मुझे अच्छी तरह याद है वह अपनी किसी कहानी के कुछ किरदारों को आमिर खान की फिल्म थ्री इडिएट्स से जोड़ रहे थे। कुछ कन्फ्यूज थे, मुझे फौरन लगाया।

संपादक से कहानी छपने की सूचना आने पर वह अपने बच्चों को 86 साल की उम्र में जिस अंदाज में फोन करते थे, बताने की उस खुशी में वैसा ही जोश रहता था, जैसे उनकी यह पहली कहानी हो।

वह बहुत गुस्सैल थे, यह सब जानते हैं। मम्मी से किसी न किसी बात पर उनका झगड़ा हम लोगों के लिए बहुत आम बात हुआ करती थी, पर जब मम्मी की मौत हुई, तो दो- तीन दिन बाद मैंने उन्हें खुद अपनी आंखों से देखा कि जब अपने सबसे पुराने साहित्यक दोस्त मधुरेश जी से बात करने के बाद उन्होंने फोन कट किया, तो वह फूट फूट कर रो पड़े थे। उस दिन उनके चेहरे को देखकर मैं भी बुरी तरह हिल गया था। पत्नी के बिना जिंदगी जीने का कड़वा अहसास उन्हें हो गया था । कई बार कहते भी थे कि पति के रूप में हां मैंने काफी गलतियां कीं, पर एक बाप के रूप में अपना पूरा फर्ज निभाया।

पत्नी यानी मेरी मां के बाद के अकेलेपन को दूर करने और खुद को व्यस्त रखने के लिए उन्होंने पिछले आठ साल में बहुत कुछ लिखा, हालांकि बीच में उन्होंने यह भी मन बना लिया था कि अब पढ़ेंगे ज्यादा, लिखेंगे बहुत कम। सिर्फ संस्मरण और छोटी छोटी कहानियां ही लिखने का ही उनका इरादा था, लेकिन वह जन्मजात लेखक थे, इसलिए चुप बैठने वाले कहां? मैं जब भी सितंबर या नवंबर में मुंबई से शाहजहांपुर आता, वह अपने उपन्यास और कहानी को लिफाफे में रखने, चिपकाने और उसे पोस्ट करने का जिम्मा अक्सर मुझे ही सौंप देते। मुझे अच्छी तरह याद है कि जब उन्होंने चार दरवेश उपन्यास लिखा था, तो नया ज्ञानोदय के संपादक रवींद्र कालिया जी को जो पत्र लिखा था, उसमें वादा किया था कि यह आखिरी उपन्यास लिख रहा हूं, इसके बाद अब कोई उपन्यास नहीं लिखूंगा या भेजूंगा। अगले साल जब मैं फिर अक्टूबर में मुंबई से शाहजहांपुर आया, तो फिर उन्होंने मुझे एक छोटा सा उपन्यास एक बड़ लिफाफे में डालने, चिपकाने और उसे पोस्ट करने को कहा। उस वक्त भी मैंने कालिया जी के नाम उनका लिखा लेटर फिर पढ़ लिया। इस पत्र में भी कालिया जी को फिर ‘ यह आखिरी उपन्यास है, इसके बाद नहीं लिखूंगा’, का वादा किया गया। …मैं कुछ बोला नहीं, समझ गया कि लिखने का उनका यह नशा कभी रूकेगा नहीं। रूका भी नहीं। मृत्यु से करीब 17 दिन पहले उन्होंने आखिरी कहानी लिखी, 14 अक्टूबर, 2016 को नया ज्ञानोदय के संपादक लीलाधर मंडलोई जी को भेजी। मौत के बाद अगले महीने यह छपी भी।

उन्होंने कितना साहित्य लिखा, इसका सबूत घर की आलमारी में रखे उनके दर्जनों उपन्यास, कहानी संग्रह और संस्मरण हैं। उनका खामोश और कई बार उदास चेहरा अक्सर बताता था कि उन्होंने जितना लिखा, उस हिसाब से उन्हें साहित्य में जितनी पहचान मिलनी चाहिए थी, साहित्य के कुछ मठाधीशों व प्रकाशकों ने उनके गुट में शामिल न होने की वजह से उन्हें वह इज्जत दी नहीं । उन्हें रायल्टी देने के लिए अक्सर मुझे या मेरे डॉक्टर भाई राकेश मेहरोत्रा को प्रकाशकों को फोन करना या करवाना पड़ता था। पिछले साल जब मैं सितंबर में शाहजहांपुर आया और चिकनगुनिया से आए तेज बुखार से घबराकर वापस मुंबई भाग गया था, तो एक दिन दोपहर उनका लगभग रोते हुए फोन आया। बोले- बेटा मेरा एक छोटा सा अनुरोध है। तुम दिल्ली के किसी अखबार में लिखो कि साहित्य में छह दशक से ज्यादा सेवा करने के बाद भी प्रकाशकों ने मेरी घोर उपेक्षा की है। उनकी आवाज में गहरा दर्द झलक रहा था, पर इससे पहले कि मैं उन्हें कोई जवाब देता, वह खुद मुझसे पूछने लगे कि क्या ऐसा लिखना ठीक होगा? मैंने कहा, बिल्कुल नहीं। उसके बाद मैं उन्हें अलग-अलग तरह से दिलासे देता रहा। उस दिन पूरी रात मैं सो नहीं पाया। अगले दिन मैंने दिल्ली में उनके पुराने परिचित डॉक्टर वीरेंद्र सक्सेना जी को फोन किया कि पापा बहुत ज्यादा डिप्रेशन में हैं, उन्हें आप फोन कर समझाओ। सक्सेना जी से पता चला कि पापा पिछले दिन खुद उन्हें भी फोन कर अपना दिल का दर्द बयां कर चुके थे।

दो दिन बाद सुबह-सुबह मेरे मोबाइल स्क्रीन पर फिर बड़े चाचा का नाम चमकने लगा। मैंने जैसे ही रिसीव का बटन ऑन किया, उधर से आवाज आई – बेटा एक अच्छी खबर है, मेरा नया उपन्यास किताबघर से आ रहा है। मैंने राहत की सांस ली। मानकर चला कि अब वह डिप्रेशन से उबरेंगे, इनकी सेहत सुधरेगी, सुधरी भी। किताबघर से आई उस खुशखबरी के बाद ही उन्होंने फिर कागज और कलम उठाया और नया ज्ञानोदय के लिए नई कहानी लिखनी शुरू कर दी। कहानी खत्म की, पोस्ट की, इस सारी बातों की सूचना डॉक्टर भाई, मुझे- सभी को दी, पर भाई को धीरे- धीरे अहसास हो गया था कि इनकी तबीयत तेजी से बिगड़ रही है। इसलिए उन्होंने पहले मुझे नवंबर में और फिर 29 अक्टूबर, 2016 को तुरंत शाहजहांपुर आने की सलाह दी। बिटिया से मैंने 31 अक्टूबर की सुबह सवा 10 बजे की फ्लाइट का टिकट बुक कराया। लेकिन 31 को मुंबई से निकलने से एक दिन पहले 30 अक्टूबर को मैंने मोबाइल के गुगल प्ले में कॉल रेकॉर्डिंग का सॉफ्टवेअर डाउनलोड कर लिया। मुझे मालूम था कि कभी भी अनहोनी हो सकती है, इसलिए मैं बड़े चाचा से आखिरी वार्तालापों को अपने मोबाइल में रेकॉर्ड करना चाहता था। मैंने 30 अक्टूबर को सुबह फोन लगाया। करीब सवा दो मिनट तक बात हुई। मैंने उनसे उनकी आखिरी कहानी और आखिरी उपन्नास के बारे में बात कर उनका मन बहलाने की कोशिश की, पर उस दौरान वह बार बार यह रिपीट करते रहे कि बेटा, मेरी तबीयत खराब होने के साथ अब मेरी आवाज भी चली गई है। उनकी आवाज की यह तड़पन उनके साथ मुझे भी बहुत तकलीफ दे रही थी। उसके बाद भी मैंने अपने डॉक्टर भाई के जरिए उनसे फिर बात करने की कोशिश की, पर वह सिर्फ हैलो हैलो ही कहते रहे।

अगले दिन यानी 31 अक्टूबर को सुबह साढ़े 12 बजे जैसे ही प्लेन लखनऊ में अमोसी एयरपोर्ट पर लैंड हुआ, एकाएक मोबाइल की घंटी घनघनाने लगी। मोबाइल स्क्रीन देखा, तो सामने धीरेंद्र अस्थाना जी का नाम दिख रहा था। इससे पहले कि मैं उनसे नमस्ते भाईसाहब का थोड़ा शिष्टाचार निभाता, उन्होंने मुझसे सवाल कर दिया कि सुनील, हृदयेश जी के बारे में जो फेसबुक पर खबर चल रही है, क्या वह सही है? मैं समझ गया कि मेरी, हमारी, परिवार के लोगों की दुनिया बहुत अकेली हो गई है। कुछ सेकंड के अंदर फिर घर वालों के फोन, एसएमएस,व्हाट्सऐप आने लगे। कुछ घंटे बाद राजरानी एक्सप्रेस से शाहजहांपुर आया और फिर चंद मिनट बाद घर भी पहुंच गया। देखा, जो चेहरा हमेशा सूटकेस के जमीन पर रखने से पहले मुझसे यह पूछता था कि बेटा पहले चाय पी लो, वह चेहरा जमीन पर खामोश पड़ा था। बड़े चाचा की यह खामोशी मुझसे बर्दाश्त नहीं हो पाई । मैंने मोबाइल को फ्लाइट मोड पर किया और कुछ मिनट बाद ऊपर छत पर चला गया। काफी देर तक रोया और फिर दो दिन पहले मोबाइल पर रेकॉर्ड की गई उनकी आवाज बार-बार सुनने लगा। उस आवाज को सुनते- सुनते खुद से सवाल करने लगा कि यदि बड़े चाचा न होते, तो मैं क्या आज वह होता, जो हूं? मेरे दोनों भाई अपने टैलेंट से इंजिनियर और डॉक्टर बने, पर मुझे तो लिखने की विरासत बड़े चाचा से ही मिली।

अब जब भी किसी मुसीबत में होता हूं, दुखी होता हूं, अकेलापन महसूस करता हूं, दिन या रात कभी भी बड़े चाचा की वह आवाज ऑन कर देता हूं। यही आवाज ही उनकी मौत के बाद उनके अपने पास होने का लगातार अहसास कराती रहती है।

(लेखक साहित्यकार हृदयेश जी के पुत्र और नवभारत टाइम्स के वरिष्ठ अपराध संवाददाता हैं। लेख नया प्रतिमान से साभार)

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