रिश्ते की डोर मजबूत करती थीं चिट्ठियां

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9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस पर विशेष

एक दौर था, जब टेलीफोन कॉल और टेलीग्राम बहुत महंगे थे। लिहाज़ा, लोग अपने प्रियजनों का हालचाल जानने के लिए उनको चिट्टियां भेजा करते थे और फिर चिट्ठी के जवाब का इंतजार किया करते थे। पत्र के इस आदान-प्रदान में शहरों में 15 से 20 दिन और गांवों में 30 दिन तक लग जाते थे। ये 15-20 या 30 दिन का दौर बेसब्री का दौर होता था। एक दूसरे को मिस करने का दौर होता था। एक दूसरे का कुशलक्षेम जान लेने के उतावलेपन का दौर होता था।

प्रेमी-प्रेमिका भी जब एक दूसरे से मिल नहीं पाते थे या मिलन में लंबा फासला आ जा जाता था तो अपनी कसक, अपना दर्द, अपने मन की बात, अपनी भावनाएं कागज पर उतारते थे और प्रेम-पत्र लिखते थे। कई लोग तो प्रेम-पत्र लिखते-लिखते श्रृंगार रस के कवि बन जाते थे और अपने प्रियतम या प्रियतमा की प्रशंसा में कविता और शेर लिखने लगते थे। उनकी रचना नैसर्गिक होती थी, क्योंकि वह उनके दिल से निकली होती थी।

दरअसल, किसी की कमी से मन में एक टीस सी उभरती थी। अजीब सा दर्द होता था। कभी वह दर्द दुख देता था, तो कभी वह दर्द सुखद होता था। वस्तुतः किसी की कमी महसूस करने से रिश्ते में प्रगाढ़ता आती थी। वह प्रगाढ़ता अद्भुत होती थी। उसकी जुनून होता था, दीवानगी होती थी। इसीलिए वह प्रागढ़ता ताउम्र बनी रहती थी। उसमें कोई झूठ या लाग-लपेट नहीं होता था। वह स्वाभाविक होती थी और रिश्ते की डोर को मजबूत करती थी।

रिश्ते की डोर को मजबूत और स्थायी बनाने के लिए डाकघर एक बड़ा माध्यम होता था। संयोग से आज विश्व डाक दिवस है। 1840 में आज ही के दिन यानी 9 अक्टूबर को हुई पत्र भेजने की शुरुआत हुई थी। वर्ष 1874 में इसी दिन यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का गठन करने के लिए स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में 22 देशों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किया था।

वर्ष 1874 में इसी दिन यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का गठन करने के लिए स्विट्जरलैंड की राजधानी बर्न में 22 देशों ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किया था। एक जुलाई 1876 को भारत यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन का सदस्य बनने वाला भारत पहला एशियाई देश था। 1969 में जापान के टोकियो शहर में आयोजित सम्मेलन में विश्व डाक दिवस के रूप में इसी दिन को चयन किए जाने की घोषणा की गई थी।

पहले डाक विभाग हमारे जनजीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता था। गांव में जब डाकिया डाक का थैला लेकर आता था तो बच्चे-बूढ़े सभी उसके साथ डाक घर की तरफ इस उत्सुकता से चल पड़ते थे कि उनके भी किसी परिजन की चिट्ठी आयेगी। साइकल का ईजाद होने के बाद डाकिया साइकल से अपने थैले में चिट्ठियां भर कर लाने लगा। लोग बड़ी व्याकुलता के साथ डाकिए का इंतजार करते थे। डाकिया अपने थेले में किसी के लिए खुशी का तो किसी के लिए गम का समाचार लेकर आता था।

जब डाकिया बाबू नाम लेकर एक-एक चिट्ठी बांटना शुरू करता तो सभी लोग अपनी या अपने पड़ौसी की चिट्ठी ले लेते और उसके घर जाकर उस चिट्ठी को बड़े चाव से देते थे। उस वक्त शिक्षा का प्रसार ना होने से अक्सर महिलाएं अनपढ़ होती थीं। इसलिए चिट्ठी लाने वालो से ही चिट्ठियां पढ़वाती भी थी और लिखवाती भी थी। चिट्ठियां पढ़ने का भी अपना ही मजा होता था। कई बार चिट्ठी पढने-लिखने वाले बच्चों को इनाम स्वरूप कुछ पैसे मिल जाते थे। कहीं-कहीं गुड़ या बताशे भी खाने के लिए मिल जाया करते थे। इसी लालच में बच्चे ज्यादा से ज्यादा घरों में चिट्ठियां पहुंचाने का प्रयास करते थे।

डाक से पहले पैसे भी आते थे, मनीऑर्डर या बीमे के रूप में। उस वक्त गांवो में बैंक शाखा भी नहीं होती थी। इस कारण बाहर कमाने गए लोग अपने घर पैसा भी डाक में मनीआर्डर या बीमे द्वारा ही भेजते थे। मनी ऑर्डर लेकर डाकिया स्वयं प्राप्तकर्ता के घर जाता था, व भुगतान के वक्त एक गवाह के भी हस्ताक्षर करवाता था। इसी तरह रजिस्टर्ड पत्र देते वक्त भी प्राप्तकर्ता के हस्ताक्षर करवाए जाते थे। डाक विभाग अति आवश्यक संदेश को तार के माध्यम से भेजता था। तार की दर अधिक होने से उसमें संक्षिप्त व जरूरी बातें ही लिखी जाती थी। तार भी साधारण जरूरी होते थे। जरूरी तार की दर सामान्य से दुगुनी होती थी।

पहले पत्रकारिता में भी जरूरी खबरे तार द्वारा भेजी जाती थी, जिनका भुगतान समाचार प्राप्तकर्ता समाचार पत्रों द्वारा किया जाता था। इस बाबत समाचार पत्र का सम्पादक जिलों में कार्यरत अपने संवाददाताओं को डाक विभाग से जारी एक अधिकार पत्र देता था। जिनके माध्यम से संवाददाता अपने समाचार पत्र को बिना भुगतान किए डाकघर से तार भेजने के लिए अधिकृत होता था। 15 जुलाई 2013 से सरकार ने तार सेवा को बंद कर दिया।

आज डाक में लोगों की चिट्ठियां नहीं के बराबर आती हैं। मनी ऑर्डर भी कई साल पहले बंद हो गए। डाक विभाग कई दशकों तक देश के अंदर ही नहीं बल्कि एक देश से दूसरे देश तक सूचना पहुंचाने का सर्वाधिक विश्वसनीय, सुगम और सस्ता साधन रहा था। भारतीय डाक विभाग पिनकोड नंबर (पोस्टल इंडेक्स नंबर) के आधार पर देश में डाक वितरण का कार्य करता है। पिनकोड नंबर की शुरुआत 15 अगस्त 1972 को हुई। इसके अंतर्गत डाक विभाग द्वारा देश को नो भौगोलिक क्षेत्रो में बांटा गया। संख्या 1 से 8 तक भौगोलिक क्षेत्र हैं व संख्या 9 सेना की डाक सेवा को आवंटित किया गया। पिन कोड की पहली संख्या क्षेत्र दूसरी संख्या उपक्षेत्र, तीसरी संख्या जिले को दर्शाती थी। अंतिम तीन संख्या उस जिले के विशिष्ट डाकघर को दर्शाती थी।

भारत की आजादी के बाद हमारी डाक प्रणाली को आम आदमी की जरूरतों को केंद्र में रख कर विकसित करने का नया दौर शुरू हुआ था। नियोजित विकास प्रक्रिया ने ही भारतीय डाक को दुनिया की सबसे बड़ी और बेहतरीन डाक प्रणाली बनाया है। राष्ट्र निर्माण में भी डाक विभाग ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।

मगर आज नजारा पूरी तरह से बदल चुका है। इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव ने डाक विभाग के महत्व को बहुत कम कर दिया है। आज लोगों ने हाथों से चिट्ठियां लिखना छोड़ दिया है। अब ई-मेल, वाट्सएप के माध्यमों से मिनटो में लोगो में संदेशों का आदान प्रदान होने लगा है। यह लाइव वीडियो कॉलिंग का दौर है। यानी आप अपनी प्रेमिका, बीवी या दूसरे परिजन से जब चाहें तब उसे देखते हुए बातचीत कर सकते हैं। यानी अब आप किसी को मिस नहीं करते सकते। जब किसी को मिस नहीं करेंगे तो जाहिर है रिश्ते में प्रगाढ़ता ही नहीं आएगी।

हरिगोविंद विश्वकर्मा

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