दहेज हत्या में गलत फैसला देने वाली महिला जज लीना दीक्षित की सेवा समाप्त (Judge Leena Dixit sacked)

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पत्नी को जलाकर मारने वाले दरिदे को सुनाई थी केवल पांच साल की सजा

न्यायधीशों को भी उनके दिए गए फैसले के लिए जवाबदेह (Accountability of Judge) ठहराने के एक अभूतपूर्व मामले में देश की सबसे बड़ी अदालत ने अपने दहेज के लिए पत्नी की हत्या करने वाले आरोपी को महज पांच साल की सज़ा और पांच हज़ार रुपए ज़ुर्माना सुनाने वाली मध्य प्रदेश की महिला जज लीना दीक्षित (Leena Dixit) को बतौर जज सेवा करने के अयोग्य करार देते हुए उसकी सेवा समाप्त करने के मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और जज द्वारा दी गई सज़ा की समीक्षा करने का आदेश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को, शीर्ष अदालत की जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस रवींद्र भट और जस्टिस सुधांशु धूलिया की खंडपीठ ने मध्य प्रदेश राज्य की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश लीना दीक्षित की ओर से दायर की गई याचिका को खारिज कर दिया। लीना दीक्षित ने परिवीक्षा अवधि पर रहते हुए गलत न्यायिक आदेश पारित करने के लिए अपना सेवा समाप्त करने के मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फ़ैसले को चुनौती दी थी।

सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ की सिफारिश पर जज की सेवा समाप्त करने के फैसले में कुछ भी गलत नहीं है। इस मामले में, न्यायाधीश लीना दीक्षित ने परिवीक्षा पर रहते हुए दहेज हत्या के मामले की सुनवाई की थी और हत्या के अपराध के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत आरोपी को हत्या सिद्ध होने के बावजूद केवल पांच साल की सजा और पांच हजार रुपए जुर्माने की सज़ा सुनाई थी।

गौरतलब है कि हत्या के पूरे साक्ष्य के बावजूद मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले की न्यायाधीश लीना दीक्षित ने 2021 में दोषसिद्धि को आईपीसी की धारा 304 के भाग 1 में बदलाव करके, इसे गैर-इरादतन हत्या की श्रेणी में रखा था। इसकी शिकातय होने पर मप्र हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने आक्षेपित आदेश का हवाला देते हुए जज की बर्खास्तगी की सिफारिश की थी जसे राज्य सरकार ने स्वीकार कर लिया।

सुप्रीम कोर्ट अदालत के समक्ष, व्यक्तिगत रूप से याचिकाकर्ता के रूप में पेश होते हुए न्यायाधीश लीना दीक्षित ने कहा कि उन्हें कोई नोटिस नहीं दिया गया था और महज़ गलती बर्खास्तगी का आधार नहीं हो सकती। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनकी दलील स्वीकार नहीं की और कहा कि यह कोई टाइपोग्राफ़िकल त्रुटि नहीं थी, यह जानबूझ कर दिया गया ग़लत फैसला था, लिहाजा ये अदालत इस तरह की असंगति को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती।

जज की गलती को माफ करने से इनकार करते हुए, अदालत ने कहा कि एक सत्र न्यायाधीश के रूप में उसे हत्यारे को क़ानू के अनुसार उचित की सजा देने की शक्ति थी, लेकिन जज ने ऐसा नहीं किया। ऐसे में जज की इस तरह की किसी गलती को माफ़ नहीं किया जा सकता है। पीठ ने महिला जज के प्रति सहानुभूति व्यक्त की और उसके भाग्य की कामना की लेकिन उसकी याचिकाकर्ता को खारिज कर दिया और जज की सेवा समाप्त करने के राज्य सरकार के फैसले की पुष्टि की।

खंडपीठ ने साफ़ साफ़ कहा कि यदि हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति ने यह निर्णय लिया कि परिवीक्षा सफलतापूर्वक पूरी नहीं हुई है, तो यह अदालत उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकती। गौरतलब है कि तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश के रूप में लीना दीक्षित ने एक दहेज हत्या के आरोपी को नाममात्र की सज़ा सुनाने से न्यायिक क्षेत्रों में घोर आश्चर्य व्यक्त किया गया था।

अभियोजन के अनुसार नरसिंहपुर के करेली थाने हनुमान वार्ड निवासी आरोपी विनोद उर्फ बिल्लू जाटव ने अपनी पत्नी को 24 मार्च 2018 को घर पर कैरोसिन डालकर आग लगा दी थी। गंभीर अवस्था में पत्नी को अस्पताल में भर्ती कराया गया था जहां 15 अप्रैल 2018 को उसने दम तोड़ दिया।

करेली पुलिस ने आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 498, 307 और 302 के तहत आरोप पत्र दाखिल किया। न्यायाधीश लीना दीक्षित ने आरोपी को लगाई गई धाराओं के तहत दोषी माना लेकिन केवल 5 साल की सश्रम कारावास एवं 5000 रुपए के अर्थदंड सुनाया था।