बोतल से बाहर बेरोजगारी का जिन्न

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सरोज कुमार

बेरोजगारी महामारी से पहले भी पैंतालीस साल के निचले पायदान पर थी, लेकिन महामारी के दौरान बेरोजगारी का ठीकरा फोड़ने के लिए हमें एक मुकम्मल सिर मिल गया था। आज जब आर्थिक गतिविधियां पटरी पर लौट आई हैं तब बेरोजगारी के सवाल पर रोजगार के प्रबंधक सिर खुजला रहे हैं। अपै्रल 2022 में बेरोजगारी दर एक बार फिर बढ़ गई। मार्च 2022 बेरोजगारी दर घटी थी, लेकिन नौकरियां भी घटीं थीं। नौकरी के लिए दर दर भटकने के बाद निराश हाल बेरोजगार घरों को लौट रहे हैं। यह एक डरावनी तस्वीर है। अर्थव्यवस्था बंजर भूमि बन गई है, जहां रोजगार का अंकुर असंभव हो गया है।

मार्च 2022 में बेरोजगारी की दर नीचे आई तो आर्थिक पंडितों ने अर्थ निकाला अर्थव्यवस्था सुधार पर है। रोजगार के आंकड़े आते ही इस अर्थ में छिपा अनर्थ सामने आ गया। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनॉमी (सीएमआइई) के आंकड़े बताते हैं कि मार्च, 2022 में बेरोजगारी दर घट कर सात दशमलव छह शून्य फीसद पर आ गई, जो फरवरी, 2022 में आठ दशमलव एक शून्य फीसद थी। हालांकि अप्रैल 2022 में एक बार फिर बेरोजगारी दर बढ़कर सात दशमलव आठ फीसद हो गई। मार्च 2022 में बेरोजगारी दर घटने से नौकरियां बढ़नी चाहिए थीं, लेकिन यहां तो चौदह लाख नौकरियां घट गईं। फिर बेरोजगारी दर घटने का क्या अर्थ? बेरोजगारी दर का सीधा अर्थ श्रम बाजार में श्रमिकों की भागीदारी से जुड़ता है। श्रम बाजार में उपलब्ध रोजगाररत और बेरोजगार श्रमिकों के औसत के आधार पर बेरोजगारी दर बनती है। यदि श्रम बाजार में श्रमिक काम मांगने ही नहीं जाएंगे तो बेरोजगारी दर स्वतः नीचे आ जाएगी। मार्च महीने में बेरोजगारी दर के नीचे आने की वजह यही रही है।

मार्च, 2022 में श्रमिक भागीदारी दर (एलपीआर) घट कर उनतालीस दशमलव पांच फीसद रह गई, जो फरवरी में उनतालीस दशमलव नौ फीसद थी। यानी श्रमिक भागीदारी दर जितनी घटी, लगभग उतनी ही बेरोजगारी दर नीचे आई है। आश्चर्य यह कि मार्च की श्रमिक भागीदारी दर महामारी की दूसरी लहर के दौरान की दर से भी नीचे है, जब कई सारे प्रतिबंधों के कारण आर्थिक गतिविधियां बुरी तरह बाधित थीं। उस दौरान अप्रैल-जून, 2021 की अवधि में औसत श्रमिक भागीदारी दर चालीस फीसद थी, और न्यूनतम श्रमिक भागीदारी दर भी जून में उनतालीस दशमलव छह फीसद। श्रमिक भागीदारी दर पिछले पांच सालों में 2017 से 2022 के बीच लगभग छह फीसद घट गई है।

देश में लगभग 90 करोड़ लोग नौकरी योग्य है। जबकि मार्च 2022 में श्रम बाजार में श्रमिकों की संख्या अड़तीस लाख घटकर बयालीस करोड़ अस्सी लाख रह गई। यानी अकेले मार्च में अड़तीस लाख लोग नौकरी की उम्मीद छोड़ घर बैठ गए। जुलाई 2021 से आठ महीने की अवधि में श्रम बाजार में श्रम बल की यह न्यूनतम संख्या है। मार्च का महीना आर्थिक गतिविधि के लिहाज से साल का सबसे व्यस्त महीना माना जाता है, ऐसे में श्रम बाजार में श्रमिक भागीदारी दर के साथ नौकरियों का घटना देश की अर्थव्यवस्था में बड़े संकट की आहट है। जून 2018 के बाद तीन वर्षों की अवधि में श्रम बाजार में श्रमिकों की संख्या में इस तरह की गिरावट पहली घटना है।

रोजगार बाजार में जो नौकरियां बची हैं, अब जरा उनकी तासीर देखिए। मार्च, 2022 में चौदह लाख की गिरावट के बाद कुल नौकरियों की संख्या उनतालीस दशमलव छह करोड़ रह गई, जो जून, 2021 के बाद का सबसे निचला स्तर है। नौकरियों का यह निचला स्तर रसातल में पहुंच जाता अगर कृषि क्षेत्र न होता। कृषि क्षेत्र की अधिकांश नौकरियां हलांकि छद्म श्रेणी में रखी जाती हैं, जिसे सरल भाषा में ’बैठे की बेगार’ कहते हैं। माना जाता है जब दूसरे क्षेत्रों में नौकरियां नहीं मिलतीं, श्रमिक कृषि क्षेत्र में लौट जाते हैं। इसी कृषि क्षेत्र में मार्च 2022 में एक करोड़ तिरपन लाख नौकरियां बढ़ गईं, जिसके कारण दूसरे क्षेत्रों में एक करोड़ सरसठ लाख नौकरियों के खत्म होने की काफी हद तक भरपाई हो गई। कृषि क्षेत्र ने रोजगार के आकड़े को रसातल में जाने से भले बचा लिया, लेकिन यहां कार्यरत श्रमिकों की हालत क्या है, किसी से छिपी नहीं है। किसान की खेती से रोज की कमाई 27 रुपये है।

पिछले पांच सालों में कुल दो दशमल एक करोड़ नौकरियां जा चुकी हैं। मार्च 2022 में जिन क्षेत्रों में नौकरियां गई, उनमें वे क्षेत्र शामिल हैं जो सर्वाधिक नौकरियां पैदा करने के लिए जाने जाते हैं -उद्योग, विनिर्माण, निर्माण, खनन और खुदरा क्षेत्र। मार्च, 2022 में औद्योगिक नौकरियां छिहत्तर लाख घट गईं। विनिर्माण क्षेत्र में इकतालीस लाख नौकरियां समाप्त हुईं, जिसमें ज्यादातर नौकरियां सीमेंट और धातु जैसे संगठित क्षेत्र की हैं। निर्माण क्षेत्र में उनतीस लाख और खनन क्षेत्र में ग्यारह लाख नौकरियां चली गईं। विनिर्माण क्षेत्र की सेहत बताने वाला इंडिया मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआइ) मार्च में घटकर चौवन दशमलव शून्य पर आ गया, जो फरवरी में चौवन दशमलव नौ था। यह आंकड़ा फैक्टरी संबंधित गतिविधि में सितंबर 2021 से अबतक की सबसे धीमी वृद्धि को प्रदर्शित करता है।

महामारी की भेंट चढ़े वित्त वर्ष 2020-21 के बाद जुलाई, 2021 को छोड़ दिया जाए तो 2021-22 के पूरे वित्त वर्ष के दौरान विनिर्माण क्षेत्र में सुधार का रुख था। मार्च में भी यह सिलसिला जारी रहने की उम्मीद थी। पर परिस्थिति दगा दे गई। आर्थिक गतिविधियां बहाल होने के बाद निर्माण क्षेत्र में भी तेजी की उम्मीद थी। लेकिन छह करोड़ चालीस लाख नौकरियों तक पहुंच कर यह क्षेत्र भी ठिठक गया। वर्ष 2018 में यहां छह करोड़ अस्सी लाख से सात करोड़ बीस लाख लोग रोजगाररत थे। मार्च 2022 में तो निर्माण क्षेत्र में छह करोड़ बीस लाख से भी कम नौकरियां दर्ज की गईं। खुदरा क्षेत्र के लिए भी मार्च का महीना मायूसी भरा रहा, जहां नौकरियां घटकर छह करोड़ छप्पन लाख रह गईं। फरवरी 2022 में यहां सात करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ था।

गैर कृषि क्षेत्र में नौकरियों का जाना इन क्षेत्रों में सुस्ती का संकेत है। लेकिन यह सुस्ती चुस्ती में कैसे बदले? बड़ा सवाल यही है। अर्थव्यवस्था की चुस्ती आमजन की जेब से जुड़ी हुई है। लोगों की जेब में पैसे होंगे तो वे खर्च करेंगे, तभी बाजार में मांग बढ़ेगी। बाजार में मांग बढ़ेगी तभी नौकरियां पैदा होंगी। मुनाफा अगर बाजार का मूल सिद्धांत है तो घाटा सह कर बाजार नौकरियां नहीं पैदा करेगा। बाजार आधारित अर्थव्यवस्था इसी तरह चलती है, और आज सबकुछ बाजार के चंगुल में है। मुनाफे का सिद्धांत महंगाई बढ़ा रहा है, और आमजन की जेबें खुरच-खुरच कर चंद लोगों की जेबें भरी जा रही हैं। यह एक खतरनाक रुझान है, जिसकी भयावहता की कल्पना हिला कर रख देती है।

देश ने वित्त वर्ष 2021-22 में चार सौ अरब डॉलर से अधिक मूल्य के निर्यात का इतिहास रचा। मार्च, 2022 में चालीस दशमलव तीन आठ अरब डॉलर का निर्यात भी अबतक का सर्वोच्च मासिक निर्यात है। निर्यात के इस आंकड़े के अनुसार बाजार में मांग और रोजगार का टोटा नहीं होना चाहिए था। लेकिन अर्थव्यवस्था के तमाम संकेतकों से लगता है निर्यात में यह उछाल परिस्थितिजन्य प्रकृति की है, बाधित आपूर्ति श्रृंखला के बहाल होने का तात्कालिक परिणाम। यदि निर्यात की यह रफ्तार आगे बनी रहती है तो रोजगार बढ़ने की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन अस्थिर वैश्विक आर्थिक हालात इसकी संभावना को कमतर करते हैं। ऐसे में रोजगार के लिए घरेलू स्तर पर ही ठोस उपाय करने होंगे। बाजार के समानांतर स्वतंत्र नियंत्रणकारी व्यवस्था के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है।

कृषि क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र संकट की हर घड़ी में लाभ-हानि की परवाह किए बगैर रक्षक की भूमिका में रहे हैं। इन दोनों क्षेत्रों को मजबूत करना समय की मांग है। वित्त वर्ष 2019-20 में जहां कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर पांच दशमलव पांच फीसद थी, वहीं गैर कृषि क्षेत्र तीन दशमलव पांच फीसद वृद्धि दर के साथ घिसट रहा था। वित्त वर्ष 2020-21 में जब अर्थव्यवस्था छह दशमलव तीन फीसद गोता लगा गई, तब भी कृषि क्षेत्र तीन दशमलव तीन फीसद की दर से आगे बढ़ रहा था। वित्त वर्ष 2021-22 में भी अर्थव्यवस्था सिर्फ गड्ढे से बाहर ही निकली है, जबकि कृषि क्षेत्र तीन दशमलव तीन फीसद की दर के साथ लगातार विकास के पथ पर है। ऐसे में कम से कम कृषि क्षेत्र को एक स्वतंत्र नियंत्रणकारी स्वरूप प्रदान किया जाना चाहिए, ताकि बाजार के नियंत्रण से परे रोजगार का एक मजबूत आधार खड़ा हो सके। रोजगार का सवाल आज इतना बड़ा है, जिसके आगे जीवन के सभी सवाल बौने हो चुके हैं। बेरोजगारी बोतल से बाहर आए जिन्न जैसी है, जिसे वापस बोतल के अंदर पहुंचाए बगैर जान नहीं बचने वाली, न आमजन की, न अर्थव्यवस्था की और न आका की ही।

(वरिष्ठ पत्रकार सरोज कुमार इन दिनों स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)

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