हर स्त्री को खुद करनी है अपनी हिफाजत

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सुषमा मौर्या

हां माँ, बस मैं कुछ ही देर में घर पहुंच रही हूं। आप चिंता मत करो। पर वो कुछ देर का सफ़र मेरी जिंदगी का ऐसा अनुभव होने वाला था जिसे आज भी याद करके मैं आज भी डर जाती हूं।

मुझे याद है यह किस्सा साल 2005 का है। कॉलेज ख़त्म हो गया था और एक निजी कंपनी में मुझे नौकरी मिल गई थी। उसी की ट्रेनिंग ख़त्म करके मैं अहमदाबाद से मुंबई आ रही थी। मेरी ट्रेन रात तीन बजे बोरिवली पहुंचने वाली थी। मन में अजीब सी हलचल हो रही थी। मुझे लगा, पहली बार इतनी रात को अकेली सफ़र कर रही हूं, इसलिए ऐसा महसूस कर रही हूं। मैंने मन को शांत किया।

ट्रेन स्टेशन पहुंची। अपना समान लेकर मैं एक ऑटोरिक्शा मैं बैठ गई। मेरा घर वहां से बीस मिनट की दूरी पर था। ऑटोवाले ने मुझसे बात करनी शुरू कर दी कि मैं इतनी रात को कहां से आ रही हूं? मेरे घर पर कौन कौन है? वो मुझसे ऐसी कई सारी जानकारियां हासिल करना चाहता था। मैं उसके सवालों को नज़रअंदाज़ करती रही। अचानक मुझे लगा कि मैं ग़लत रास्ते पर जा रही हूं। मैंने तुरंत उस रिक्शा वाले कहा कि वो मुझे ग़लत रास्ते पर ले जा रहा है। लेकिन उसने मेरी बात को अनसुना कर दिया। मुझे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था, मुझे जैसे सांप सूंघ गया था।

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मैंने ख़ुद को संभाला और एक बार फिर से मैने ज़ोर से कहा, भइया आप ग़लत रास्ते से ले जा रहें हैं।

उसके बाद उसने कहा, सॉरी मैडम अंधेरे में रास्ता समझ नहीं पाया।

मैंने कहा, कोई बात नहीं आप ओटो मोड़ लीजिए।

पर मन में बार बार यही सवाल उठ रहा था कि क्या सच में यह रास्ता भटक गया था या मुझे ग़ुमराह कर रहा था। मैंने सोचा जो भी है बस मैं सही सलामत घर पहुंच जाऊं। जैसे ही मैं घर पहुंची मैंने चैन की सांस ली और ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया। आज भी मन में यह सवाल उठता है कि क्या होता अगर उस रात मेरे साथ कोई अनहोनी हो जाती। ऐसी कई घटनाएं हमें सुनने को मिलती जिससे महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कई सवाल उठते हैं।

भारत में महिला सुरक्षा को लेकर आज भी हालात बेहद चिंताजनक है। जहां एक ओर हम ज़ोर-शोर से महिला सशक्तीकरण की बातें करते हैं, वहीं हमारे देश में विडंबना यह है कि महिलाएं न तो घर में सुरक्षित हैं और न ही घर के बाहर। कई शहरों की हालात इतनी बुरी है कि महिलाएं आज भी अकेली रात में घर से बाहर नहीं निकल सकती हैं। पहले महिलाओं को घर से बाहर निकल कर काम करने की आज़ादी नहीं थी, लेकिन आजकल महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है। कैब चलाने से लेकर मल्टीनेशनल कंपनी में सीईओ बनकर कामयाबी हासिल कर रही हैं। जहां एक ओर वे हर क्षेत्र में उपल्बधियां हासिल कर रही हैं वही दूसरी तरफ उनके ख़िलाफ़ हो रहे अपराध लगातार बढ़ते जा रहे हैं। महिला सशक्तीकरण के जितने भी प्रयास किए जाएं पर वास्तविकता यही है कि नारी को अपने अस्तित्व की लडाई मां के कोख से ही लड़नी शुरू कर देनी पड़ती है। कन्या भ्रूण हत्या, बलात्कार, दहेज उत्पीड़न, लिंग भेदभाव, छेड़छाड़, एसिड अटैक, शोषण, मानसिक यातना, लड़कियों की तस्करी जैसी कई समस्याएं हैं जिनका सामना महिलाओं को करना पड़ता है।

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बचपन से ही हम लड़कियों को समाज में रहने के तौर तरीक़े सिखाते हैं। अधिकतर महिलाओं को घरेलू सामंजस्य और रीति-रिवाज़ों के नाम पर सिर्फ़ सहना सिखाया जाता है। इस सोच के साथ पली बढी महिलाएं घरेलू हिंसा को अपनी नियती मानकर उसे ख़ामोशी से सहन करती रहती हैं। कभी दहेज के लिए उन्हें प्रताड़ित किया जाता है, तो कभी रीति-रिवाज़ों के नाम पर महिलाओं का शोषण होता है। अगर राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) की मानें तो कोरोना काल में महिलाओं के ख़िलाफ़ हुए क्राइम में 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। राष्ट्रीय महिला आयोग को पिछले साल महिलाओं के ख़िलाफ़ क़रीब 31000 अपराधों की शिकायतें मिली थी जो कि दस सालों में सबसे अधिक थे। एनसीड़ब्ल्यू के आंकड़ों के मुताबिक 30,864 शिकायतों में से, अधिकतम 11013 महिलाओं के भावनात्मक शोषण को ध्यान में रखते हुए सम्मान के साथ जीने के अधिकार (Right To Live With Dignity) से संबंधित थीं। इसके बाद घरेलू हिंसा (Domestic Violence) से संबंधित 6,633 शिकायतें दर्ज की गईं थी।जबकि दहेज उत्पीड़न (Dowry Harassment) से संबंधित 4,589 शिकायतें थीं

हम गर्ल चाइल्ड को अकेले घर से बाहर भेजने में भी घबराते हैं, लेकिन वास्तविकता यही है कि लड़कियां घर के सदस्यों और पड़ोसियों द्वारा ही एक्सप्लायट की जाती हैं। मानसिक तौर पर विक्षिप्त लोगों को 4 साल की बच्ची से लेकर 80 साल तक की बुजुर्ग महिला में कोई फ़र्क़ नज़र नही आता है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर घंटे महिलाओं के ख़िलाफ़ कम से कम 39 अपराधिक मामले होते है, जिसमें 11 फ़ीसदी हिस्सेदारी बलात्कार के है। पिछले दशक में भारत में महिलाओं के ख़िलाफ़ करीब 2.5 लाख अपराध दर्ज किए गए। ऐसे लाखों मामले भी हैं जिसमें महिलाएं लोकलाज के डर से चुप रह जाती है।

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ऐसा नहीं हैं कि महिलाओं की यह स्थिति आज है। अगर हम इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो हम इसका बात का अंदाज़ा लगा सकते है कि सदियों से ही नारी को सिर्फ़ उपभोग की ही वस्तु समझा जाता था। महारानी पदमावत से लेकर कस्बे की भंवरी देवी, या मेट्रो शहर की निर्भया और दामिनी महिलाओं की स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। पुराने समय में बाल विवाह, सती प्रथा, परदा प्रथा जैसी कुरीतियों के नाम पर महिलाओं का शोषण हुआ। हालांकि आगे चलकर ये प्रथाएं बंद हो गई। अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर कई महिला संगठनों और विचारकों ने महिलाओं की स्थिति सुधारने की कोशिश की जिसमें कुछ हद तक बदलाव हुआ लेकिन फिर भी स्थिति बहुत संतोषजनक नहीं रही।

दरअसल, महिलाओं को अपनी सुरक्षा के लिए ख़द ही प्रयास करना होगा। सबसे ज़रूरी है सतर्कता। अगर आपको कुछ ग़लत होने को आभास हो तो ज़रा भी लापरवाही न बरतें क्योंकि थोड़ी सी भी लापरवाही ही बड़ी मुसीबत को दावत दे सकती है। साथ ही लोगों को अपनी सोच में बदलाव लाने की ज़रूरत है। बचपन से ही लड़का और लड़की में भेदभाव न करके उन्हें महिलाओं की रिस्पेक्ट करना सिखाना चाहिए। महिला सशक्तीकरण के साथ साथ पुरुष मानवीकरण भी ज़रूरी है। महिलाओं से संबंधित केस की सुनवाई फास्ट ट्रेक पर करने और साथ ही सख़्त क़ानून बनाने और उसे अमल में लाने की ज़रूरत है।

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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