महिलाओं के लिए लेखन भारत ही नहीं पूरी दुनिया में चुनौतीपूर्ण – दिव्या माथुर

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मुंबई। ब्रिटेन मे बसी भारतीय मूल की हिंदी लेखिका दिव्या माथुर का मानना है कि तमाम विकास के बावजूद महिलाओं के लिए लेखन कार्य भारत ही नहीं पूरी दुनिया में चुनौतीपूर्ण है। लेकिन यह खुशी की बात है कि भारत ही नहीं पूरी दुनिया में महिलाएं चुनौती स्वीकार करके तेजी से लेखन ही नहीं कर रही हैं, बल्कि अपनी असरदार उपस्थिति भी दर्ज करवा रही हैं।

अपने कहानी संग्रह ‘आक्रोश’ के लिए वर्ष 2001 का पद्मानंद साहित्य सम्मान पाने वाली दिव्या माथुर ने गोरेगांव पश्चिम के केशव गोरे सभागृह में रविवार की शाम चित्रनगरी संवाद मंच के साप्ताहिक कार्यक्रम में कवियों, लेखकों एवं बौद्धिक तबके को संबोधित करते हुए कहा कि भारत में भी स्त्रियां बेहतरीन लेखन कर रही हैं। ब्रिटेन में साहित्यिक गतिविधियां करने वाली संस्था `वातायन’ की प्रमुख, यूके हिन्दी समिति की उपाध्यक्ष और लंदन के नेहरू सेंटर की कार्यक्रम अधिकारी दिव्या माथुर ने अपनी इस अवसर पर पिछले साल प्रकाशित अपनी चर्चित उपन्यास ‘तिलिस्म’ के कुछ अंशों का पाठ किया।

देश विदेश में हिंदी को बढ़ावा दे रहे और ब्रिटेन और फिज़ी में अपनी सेवाएं दे चुके विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी डॉ. अनिल जोशी ने भी अपनी कुछ कविताओं एवं व्यंग्य का वाचन किया। कार्यक्रम में आशू शर्मा, पूनम विश्वकर्मा, सविता दत्त, डॉ रोशनी किरण, यशपाल सिंह, नरोत्तम शर्मा, केपी सक्सेना दूसरे, मोहम्मद ताज और महेश साहू ने भी कविता पाठ किया। बुजुर्ग कथाकार आबिद सुरती और स्टेट बैंक के सेवानिवृत्त महाप्रबंधक प्रदीप गुप्ता के सानिध्य में हुए इस कार्यक्रम के पहले सत्र का संचालन पहले देवमणि पांडेय और दूसरे सत्र का संचालन डॉ रवींद्र कात्यायन ने किया।

कार्यक्रम के पहले सत्र में भोपाल से पधारे गांधीवादी चिंतक सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य आयकर आयुक्त आरके पालीवाल ने ग्राम्य विकास से जुड़े अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि जब वे मुंबई में थे तो उन्होंने गुजरात की सीमा पर अंतिम गांव का चयन किया और कुछ दोस्तों की मदद से इस गांव में शिक्षा, चिकित्सा, रोज़गार और मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराकर उसे आदर्श ग्राम में रूपांतरित किया। कुछ सालों में ही आदिवासियों का वह गांव आत्मनिर्भर बन गया।

आरके पालीवाल ने बताया कि कुछ सालों में आदिवासियों का वह गांव आत्मनिर्भर बन गया। इसी तरह मध्य प्रदेश में पालीवाल जी और उनके गांधीवादी दोस्तों ने चार गांवों को आत्मनिर्भर बनकर उन्हें जैविक खेती के प्रति जागरूक किया। उन्होंने खेती में प्रयोग किये जा रहे ज़हरीले रसायनों के प्रति श्रोताओं को आगाह किया और कहा कि स्वस्थ रहने के लिए जैविक खेती को अपनाना निहायत ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि हमारे कई साहित्यकार गांव की सच्चाई को जाने बिना गांव का चित्रण करते हैं। रचनाकारों को कभी-कभी गांव में जाकर वहां के वास्तविक जीवन को भी देखना चाहिए।

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