प्रेम तो एकतरफा ही होता है… दोतरफा प्रेम की उम्मीद तो व्यापार हुआ

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ओशो की पुण्यतिथि पर विशेष

ओशो उर्फ आचार्य रजनीश न तो किसी के अनुयायी थे और न ही कोई उनका गुरु था। परंतु उन्हें पढ़कर ऐसा लगता है उन्होंने हर महापुरुष से कुछ न कुछ ग्रहण किया। उन्होंने संपूर्ण विश्व के लगभग हर प्रबुद्ध व्यक्ति पर प्रवचन दिया, लेकिन शायद गौतम बुद्ध से उन्हें अतिरिक्त स्नेह था। वैसे तो जब भी उन्होंने किसी भी विभूति पर प्रवचन दिया, वह यही कहते कि उनके जैसे कोई और न हुआ और न होगा। महावीर, मीरा लाओत्ज़े, दादू, रैदास, बोधिधर्म, कयोझान, कबीर और मातज़ु जैसे महान विचारकों की वह ख़ूबियां बताते थे। उसकी ख़ूबियों की बयानी वह इस तरह करते थे कि उनकी बात सुनकर सुननेवाला भी उस महापुरुष के प्रेम में पड़ जाता था। यही ओशो की ख़ूबी थी।

वह कहते थे, “जिस आदमी का ‘मैं’ जितना मजबूत होता है, उतनी ही उस आदमी की सामर्थ्य दूसरे से संयुक्त हो जाने की कम हो जाती है, क्योंकि ‘मैं’ एक दीवार है, एक घोषणा है कि मैं हूं। मैं की घोषणा कह देती है, तुम ‘तुम’ हो, मैं ‘मैं’ हूं। दोनों के बीच फ़ासला है। फिर मैं कितना ही प्रेम करूं और आपको अपनी छाती से लगा लूं, लेकिन फिर भी हम दो हैं। छातियां कितनी ही निकट आ जाएं, फिर भी बीच में फ़ासला है- मैं ‘मैं’ हूं, तुम ‘तुम’ हो। इसीलिए निकटतम अनुभव भी निकट नहीं ला पाते। शरीर पास बैठ जाते हैं, आदमी दूर-दूर बने रह जाते हैं। जब तक भीतर ‘मैं’ बैठा हुआ है, तब तक दूसरे का भाव नष्ट नहीं होता।”

आचार्य रजनी ने अपने सरल और ग्रहणीय संदेशों के माध्यम से मानव जीवन के इन्हीं वास्तविक अर्थों को समझाया है। सही मायने में उन्होंने इस जगत को मनुष्यता की नई परिभाषा के अवगत कराया। उसे नया अर्थ दिया और मानव जीवन को बोझपूर्ण से बोधपूर्ण बनाने शिक्षा और प्रेरणा दी। उन्होंने सदियों से चली आ रही रूढ़िवादी सोच और मान्यताओं को नया अर्थ देने का काम किया और धर्म की व्यावहारिक परिभाषा गढ़ी। उन्होंने दुनिया को सिखाया कि बाहर और भीतर के जगत के साथ किस तरह से तालमेल बैठाकर जीवन को ख़ूबसूरत बनाया जा सकता है।

ओशो ने ऐसी ध्यान की विधियों से दुनिया को परिचय करवाया जिससे इंसान अपने अंतस की गहराइयों में पहुंचकर जीवन के अर्थों को समझ सकता है। उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि जीवन जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार कर लो, जीवन को इसे बदलने की चेष्टा मत करो, कृत्रिम जीवन जीने का प्रयास मत करो। वह मानते थे कि हर आदमी अपना सहज जीवन जीए तो समाज में कोई समस्या ही नहीं रह जाएगी। उन्होंने बताया कि परिस्थतियों को बदलने या उससे भागने की कोशिश मत करो, उसके प्रति जागरूक होकर उसे पार करो।

संभवतः इसीलिए दुनिया ने आचार्य रजनीश को एक विवादास्पद रहस्यदर्शी, दार्शनिक और आध्यात्मिक शिक्षक के रूप में देखा। अपनी विवादास्पद टिप्पणी के चलते वह तब विवादों में आ गए जब उन्होंने रूढ़िवादी भारतीय धर्म के अनुष्ठानों को आडंबर बताते हुए कहा, “हम भारत के पिछड़ेपन का उपचार पूंजीवाद, जन्म नियंत्रण और विज्ञान के माध्यम से कर सकते हैं।” धार्मिक रूढ़िवादिता की आलोचक उन्हें बहुत महंगी पड़ी। इसकी वजह से वह विवादास्पद संत करार दे दिए गए। एक बार जब विवाद उनसे चिपका तो ताउम्र उनसे चिपका ही रहा। ओशो और विवाद एक दूसरे के पर्यायवाची हो गए। जहां ओशो थे वहां विवाद था, जहां विवाद था वहां ओशो थे।

ओशो रजनीश का 1 दिसंबर, 1931 को जन्म मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के कुचवाड़ा कस्बे में तरणपंथी जैन परिवार में हुआ था। उनके दादा तरणपंथी जैन थे। उनकी माता का नाम सरस्वतीबाई जैन उर्फ़ माँ अमृत सरस्वती और पिता का नाम बाबूलाल जैन उर्फ स्वर्गीय देवतार्थ भारती था। उनका बचपन का नाम चंद्रमोहन जैन था। ओशो अपने माता-पिता की दस संतानों में सबसे बड़े थे। विजय कुमार खाते, शैलेंद्र शेखर, अमित मोहन खाते, अकलंक कुमार खाते और निकलंक कुमार जैन रजनीश के भाई थे। रसा कुमारी, स्नेहलता जैन, निशा खाते और नीरू सिंघाई चार बहनें थीं।

बचपन में रजनीश अपने दादा के साथ ही रहे। दादा ने उन्हें संपूर्ण आज़ादी दे दी थी। इससे बाल्यावस्था में ही उनका बौद्धिक विकास नैसर्गिक माहौल में हुआ। इसीलिए बचपन से ही उनका रूझान दर्शन की ओर हो गया। जब वह सात साल के थे तो उनके दादा का देहांत हो गया और वह नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा अपने माता-पिता के पास आ गए। पहले दादा की मृत्यु और कुछ दिन बाद चचेरे भाई के आकस्मिक निधन ने उनकी मनःस्थिति को बहुत प्रभावित किया। अपने स्कूल के दिनों में वह प्रतिभाशाली और तर्कसंगत स्वभाव के छात्र थे। धीरे-धीरे उन्होंने प्रतिवाद को स्वीकार किया और सम्मोहन के क्षेत्र में जाने का निर्णय किया।

ओशो रजनीश ने किशोरावस्था में ही ‘ग्लिप्सेंस ऑफड माई गोल्डन चाइल्डहुड’ नाम की किताब लिख डाली। उनकी पढ़ाई-लिखाई मध्य प्रदेश के कई शहरों में हुई। रायपुर कॉलेज के प्रिंसिपल ने उन्हें अपने कॉलेज के छात्रों के नैतिक चरित्र के लिए खतरा मानते हुए किसी अन्य कॉलेज में स्थानांतरण करने के लिए विचार विमर्श किया। उसके बाद उन्होंने हितकर्णी कॉलेज जिसका नाम बाद में डीएन जैन कॉलेज हो गया और सागर विश्वविद्यालय शिक्षा ली। अपने कॉलेज के खाली समय में उन्होंने एक स्थानीय अख़बार में सहायक संपादक की नौकरी की। कहा जाता है कि आरंभ में ओशो शुरुआत में वह इंडियन नेशनल आर्मी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे राष्ट्रवादी संगठनों से जुड़े थे, लेकिन बाद में उन्होंने इन संगठनों से नाता तोड़ लिया।

1957 में रायपुर विश्वविद्यालय में वह संस्कृत लेक्चरर बन गए। उनकी गैर-परंपरागत धारणाओं और जीवन-यापन के तौर-तरीके को छात्रों के नैतिक आचरण के लिए घातक समझा गया। लिहाज़ा, उनका तबादला कर दिया गया। लेकिन अगले ही वर्ष वह जबलपुर विश्वविद्यालय में बतौर लेक्चरर अध्यापन करने लगे। 1951 से 1968 तक, उन्होंने जबलपुर में तारणपंथी जैन समुदाय द्वारा आयोजित हर साल सर्व धर्म सम्मेलन में चर्चा की। रजनीश कहते थे कि 21 मार्च 1953 को उन्हें जबलपुर के भंवर्थल बाग में एक पेड़ के नीचे ज्ञान की अनुभूति हुई थी। उन्होंने देश भर में अलग-अलग धर्म और विचारधारा पर प्रवचन देना शुरू किया।

1960 के दशक में रजनीश गांधीवाद और समाजवाद की विचारधारा आलोचना करने लगे। संस्थागत धर्म पर की गई उनकी अलोचनाओं ने उन्हें विवादास्पद बना दिया। वह मानव कामुकता के प्रति स्वतंत्र दृष्टिकोण के हिमायती थे, जिसकी वजह से उन्हें कई भारतीय और फिर विदेशी पत्रिकाओ में ‘सेक्स गुरु’ के नाम से संबोधित किया जाने लगा। उनके अनुयायी उन्हें संत-सतगुरू और भगवान के नाम से संबोधित करने लगे। किसी के लिए ओशो महज दार्शनिक हैं तो किसी के लिए विचारक है किसी के लिए वह शक्ति हैं तो किसी के लिए व्यक्ति हैं। कोई उन्हें संबुद्ध रहस्यदर्शी कहकर संबोधित करता है तो किसी की नजर में वह ‘सेक्स गुरु’ हैं।

1966 में एक दौरे के दौरान विवादास्पद भाषण के कारण उन्हें शिक्षण पद से इस्तीफा देना पड़ा। दिसंबर 1970 में रजनीश मुंबई आ गए और दो साल तक देश की आर्थिक राजधानी में रहे। ओशो कुछ समय के लिए मुंबई में रुके और उन्होने मुंबई में ही अपने शिष्यों को 26 सितंबर 1970 से “नव संन्यास” में दीक्षित किया और उन्हों नव-संन्यासी नाम दिया। उन सभी के सचिव उनकी पहली शिष्या लक्ष्मी ठाकरसी कुरुवा थी। उन्हें मां योग लक्ष्मी नाम दिया गया। ओशो कोई पारंपरिक संतों की तरह रामायण या महाभारत का पाठ नहीं करते थे। वह न ही व्रत-पूजा या धार्मिक कर्मकांड करवाते या उसका समर्थन करते थे। जल्द ही वह स्वर्ग-नरक एवं अन्य अंधविश्वासों से परे उन विषयों पर बोल रहे थे जिन पर इससे पहले किसी ने नहीं बोला था। ओशो का आकर्षण इतना प्रबल था कि विनोद खन्ना जैसे सुपस्टार फिल्मों से संन्यास लेकर उनके अनुयायी बन गए।

1970-80 के दशक में ओशो स्वीकार और इंकार के बीच, प्रेम और घृणा के बीच पुल बनकर खूब उभरे। उनके विषय बिल्कुल अलग होते थे। ऐसा ही एक विषय था- संभोग से समाधि की ओर जो आज भी विवाद का विषय बना हुआ है। इस विषय पर उनके नाम से अनेक ग्रंथ हैं। बाद में वह अपने आपको ओशो कहने लगे। ओशो, लैटिन भाषा के शब्द ओशोनिक से लिया गया है। इसका अर्थ है सागर में समा जाना। वर्ष साल 1981 मे वह अमेरिका चले गए। ओरेगॉन प्रांत में उन्होंने ओशो आश्रम की स्थापना की और उसका नाम ओशोपुरम रखा। ओशोपुरम 65 हज़ार एकड़ में फैला था। उनका अमेरिका प्रवास बेहद अधिक विवादास्पद रहा। उनके आश्रम में उनके अनुयायियों की भारी भीड़ जुटने लगी। ओशो महंगी घड़ियां, रोल्स रॉयस कारें, डिजाइनर कपड़ों की वजह से हमेशा चर्चा में रहे।

1984 में उन्हें रजनीशी अमेरिका पर जैव आतंकवादी हमले में षड्यंत्रकारी गतिविधि में संलिप्त पाते हुए ₹26 करोड़ का जुर्माना और पांच साल की सजा सुनाई गई। अमेरिकी सरकार ने उस घटना के बाद विश्व के 21 देशों में ओशो के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया। 23 अक्टूबर 1985 में, पोर्टलैंड के संघीय ग्रैंड जूरी ने उन्हें एवं उनके शिष्यों को आव्रजन कानूनों की अवेहलना का दोषी करार देते हुए सजा सुनाई। ओरेगॉन में ओशो के शिष्यों ने उनके आश्रम को रजनीशपुरम नाम के शहर के रूप में पंजीकृत कराना चाहा लेकिन स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया। 1985 ओशो भारत वापस लौट आए। भारत लौटने के बाद वह पुणे के कोरेगांव पार्क में अपने आश्रम में रहने लगे।

अपनी शादी के संबंध में अपने माता-पिता के फैसले का विरोध करने वाले ओशो आजीवन अविवाहित रहे। उनके बारे में कहा जाता है कि दो महिलाओं शीला अंबालाल पटेल उर्फ मां आनंद शीला और मां प्रेम निर्वाणो उर्फ मां योग विवेक से उनके बहुत क़रीबी संबंध रहे। रजनीशी बायो-टेरर अटैक में सज़ा काट चुकी मां आनंद शीला ने एक बार इंटरव्यू के दौरान कहा था, “मैं ओशो से प्यार करती थी। आज भी करती हूं। प्रेम और सेक्स दो अलग अलग चीजें हैं। मेरी भावनाएं सेक्सुअल फीलिंग्स के साथ कभी नहीं जुड़ीं। मेरे अंदर ओशो के लिए सिर्फ़ प्रेम, सम्मान, इज़्ज़त और समर्पण है। प्रेम में जब कोई व्यक्ति होता है, तो उसे कुछ और समझ नहीं आता। प्रेम में अगर ये शर्त है कि मैं तुमसे प्रेम कर रही हूं, तुम भी मुझसे प्रेम करो तो ये प्रेम नहीं, बल्कि एक सौदा हो जाता है।”

19 जनवरी, 1990 को ओशो की मृत्यु हो गई। उनका जीवन जितना रहस्यमयी रहा, उतनी ही उनकी मौत भी उतनी ही रहस्यपूर्ण रही। ओशो की मौत पर ‘हू किल्ड ओशो’ टाइटल से क़िताब लिखने वाले अभय वैद्य का कहते हैं, “19 जनवरी, 1990 को ओशो आश्रम से डॉक्टर गोकुल गोकाणी को फोन आया। उनसे कहा गया कि वह अपना लेटर हेड और इमरजेंसी किट लेकर आ जाएं।” डॉ. गोकुल गोकाणी ने अपने हलफनामे में लिखा, “वहां मैं करीब दो बजे पहुंचा। उनके शिष्यों ने बताया कि ओशो देह त्याग कर रहे हैं। आप उन्हें बचा लीजिए, लेकिन मुझे उनके पास जाने नहीं दिया गया। कई घंटों तक आश्रम में टहलते रहने के बाद मुझे उनकी मौत की जानकारी दी गई और कहा गया कि डेथ सर्टिफिकेट जारी कर दें।” डॉक्टर गोकुल ओशो की मौत की टाइमिंग को लेकर भी सवाल खड़े किए और दावा किया कि ओशो के शिष्यों ने मौत की वजह दिल का दौरा लिखने के लिए उन पर दबाव डाला।

ओशो के आश्रम में किसी संन्यासी की मृत्यु को उत्सव की तरह मनाने का रिवाज़ था, लेकिन जब खुद ओशो की मौत हुई तो इसकी घोषणा के एक घंटे के भीतर ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया और उनके निर्वाण का उत्सव भी संक्षिप्त रखा गया था। ओशो की मां भी आश्रम में ही रहती थीं। ओशो की सचिव रहीं नीलम ने बाद में उनकी मौत से जुड़े रहस्यों पर कहा था कि ओशो देह त्यागने की सूचना उनकी मां को भी देर से दी गई। दावा किया जाता हैं कि ओशो के आश्रम की संपत्ति हज़ारों करोड़ रुपए है और किताबों और अन्य चीज़ों से क़रीब 100 करोड़ रुपए रॉयल्टी मिलती है। बहरहाल, ओशो की समाधि पर लिखी इस बात से उनकी अहमियत का अंदाजा लगाया जा सकता है, “न कभी जन्मे, न कभी मरे। वह धरती पर 11 दिसंबर, 1931 से 19 जनवरी 1990 के बीच रहे।”

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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