डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर लघु नाटक

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डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर लघु नाटक

(एक बैनर सड़क पर लगा है। डॉ श्यामप्रसाद मुखर्जी की पुण्य तिथि मनाने का जिक्र है। तीन बच्चे खड़े होकर बैनर को देख रहे हैं। उनमें एक अमर भी है।)

एक बच्चा – डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी कौन थे?

दूसरा बच्चा – नहीं पता, पर कोई बहुत मशहूर व्यक्ति थे।

तीसरा बच्चा – चलो अपने दद्दू से पूछता हूं।

(एक बच्चा अपने घर की ओर भागता है।)

बच्चा – दद्दू! दद्दू!! दद्दू कहां हो?

दद्दू – क्या हुआ बेटा?

बच्चा – दद्दू मुझे एक सवाल पूछना है आपसे।

दद्दू – बोलो बेटा।

बच्चा – दद्दू डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी कौन थे।

दद्दू – बेटा वह बहुत बड़े राष्ट्रवादी थे। राजनेता तो थे ही साथ में वह चिंतक और शिक्षाविद् भी थे।

बच्चा – राष्ट्रवादी थे, मतलब वह मोदीजी की पार्टी के थे।

दद्दू – मोदीजी की पार्टी के नहीं, बल्कि वह मोदीजी की पार्टी के संस्थापक थे।

बच्चा – संस्थापक?

दद्दू – जी हां बेटा, भारतीय जनता पार्टी का नाम इंमरजेंसी से पहले भारतीय जनसंघ था। उस जनसंघ के संस्थापक थे डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी।

बच्चा – मतलब गैर काग्रेस?

दद्दू – हां बेटा, गैर कांग्रेसवाद का नारा सबसे पहले उन्होंने ही दिया।

बच्चा – डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी पैदा कहां हुए थे दद्दू?

दद्दू – डॉ. श्यामा प्रसाद का जन्म छह जुलाई 1901 को कलकत्ता में मशहूर शिक्षाविद आशुतोष मुखर्जी एवं जोगमाया देवी के यहां हुआ था।

बच्चा – अच्छा तब तो वह बहुत पढ़े लिखे रहे होंगे।

दद्दू – हां, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भी अल्पायु में ही स्टडी शुरू कर दी थी। 1917 में मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की। 1921 में बैचलर की डिग्री।

बच्चा – क्या पढ़ाई के लिए वह विदेश भी गए थे?

दद्दू – 1923 में लॉ की डिग्री लेने के बाद विदेश चले गये। 1926 में इंग्लैंड से बैरिस्टर बनकर स्वदेश लौटे।

बच्चा – दद्दू क्या वह बहुत विद्वान थे?

दद्दू – हां, वह असाधारण प्रतिभा के धनी थे। महज़ 33 साल की अल्पायु में वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बन गए। एक विचारक और प्रखर शिक्षाविद के रूप में उनकी उपलब्धि तथा ख्याति निरंतर आगे बढ़ती गयी।

बच्चा – मतलब वह जीनियस थे!

दद्दू – हां, इसमें दो राय नहीं कि वह जीनियस थे। वह ‘इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ़ साइंस’ बंगलौर की परिषद एवं कोर्ट के सदस्य और इंटर यूनिवर्सिटी ऑफ़ बोर्ड के चेयरमैन भी रहे।

बच्चा – अच्छा।

दद्दू – वह अपने समय के असाधारण राजनेता, चिंतक,शिक्षाविद् और महान देशभक्त थे।

बच्चा – वह एक मुल्क एक संविधान की भी बात करते थे?

दद्दू – हां बेटा, आज हम अगर कश्मीर में बिना परमिट के जाते हैं, तो इसका श्रेय डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जाता है। आज से ठीक 66 साल पहले कश्मीर में कथिततौर पर न्यायिक हिरासत के दौरान उनकी मौत हो गई थी।

बच्चा – मौत हुई थी या हत्या?

दद्दू – डॉक्टर साहब की मां लेडी जोगमाया देवी मुखर्जी की मांग के बावजूद न तो केंद्र और न ही जम्मू-कश्मीर सरकार ने उनकी मौत की जांच करवाई।

बच्चा – अच्छा!

दद्दू – हां, जोगमाया देवी ही नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. विधानचंद राय और तब के बड़े कांग्रेस नेता पुरुषोत्तमदास टंडन ने भी डॉ. मुखर्जी की मौत की जांच सुप्रीम कोर्ट के जज से कराने की ज़ोरदार मांग की थी  लेकिन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू टस से मस नहीं हुए।

बच्चा – लेडी जोगमाया ने कोई पत्र भी लिखा था?

दद्दू – हां, चार जुलाई 1953 को जोगमाया ने नेहरू को अंग्रेज़ी में मार्मिक पत्र लिखा था।

लेडी जोगमाया – उसकी (डॉ. मुखर्जी) मौत रहस्य में डूबी हुई है। क्या यह हैरतअंगेज़ और अविश्वसनीय नहीं है कि बिना किसी ट्रायल के उसे गैरक़ानूनी ढंग से 43 दिन हिरासत में रखा गया और मुझे उसकी मां को जानकारी तक नहीं नहीं दी गई और वहां की सरकार ने मुझे सूचना उसके निधन के दो घंटे बाद दी।

लेडी जोगमाया – मैं अपने पुत्र की मृत्यु के लिए राज्य सरकार को ही ज़िम्मेदार मानती हूं और आरोप लगाती हूं कि उसने ही मेरे पुत्र की जान ली है। मैं तुम्हारी सरकार पर भी यह आरोप लगाती हूं कि घटना को छुपाने के लिए सांठगांठ करने की कोशिश की।

लेडी जोगमाया – इसलिए मैं स्वतंत्र भारत के उस निडर सपूत की मां उसकी दुखद और रहस्यमय मौत की अविलंब निष्पक्ष जांच की मांग करती हूं। मैं जानती हूं कि अब कुछ भी हो उसका जीवन वापस नहीं लाया जा सकता लेकिन मैं चाहती हूं देश के लोगों पूरी घटना के असली कारणों से अवगत हों जिससे मेरे बेटे व्यक्ति की मौत हो गई।

(पं जवाहरलाल नेहरू ने पांच जुलाई 1953 को जोगमाया को पत्र लिखा।)

पं नेहरू – मैं डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की हिरासत और मौत के बारे में ईमानदारी से जुटाई गई जानकारी के आधार पर आपको जवाब देना चाहता हूं।

पं नेहरू – मैंने ढेर सारे लोगों से पूछताछ की जो उस समय घटनास्थल पर ही मौजूद थे। अब मैं केवल इतना ही कह सकता हूं कि मैं सच्चे और स्पष्ट निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि डॉ. मुखर्जी की मौत पर इस तरह का कोई रहस्य नहीं है  जिस पर विचार किया जाए।

जोगमाया – जवाहरलाल, मुझे तुम पर बिल्कुल यकीन नहीं। तुम लोगों ने अमानवीय कार्य किया है।

बच्चा – नेहरू ने ऐसा क्यों किया दद्दू?

दद्दू – बेटा, दरअसल नेहरू का डॉ अंबेडकर और सरदार पटेल की तरह डॉ. मुखर्जी से गंभीर मतभेद था। यहां तक कि 13 फरवरी 1953 को लोकसभा में दोनों की बीच बहुत तल्ख बहस हुई थी।

(लोकसभा की कार्यवाही का दृश्य।)

डॉ मुखर्जी – मैं सरकार से दरख्वास्त करता हूं। अगर देश में अमन कायम रखना चाहते हैं तो अनुच्छेद 370 समाप्त कर दीजिए। पूरी संसद इसके लिए तैयार है।

पं नेहरू – नहीं   ऐसा कभी नहीं होने दूंगा। कश्मीर का विशेष दर्जा नहीं खत्म होगा।

डॉ मुखर्जी – इसके लिए आने हमारी आने वाली पीढ़ी आपको कभी माफ नहीं करेगी। आपकी नीतियां देश के लिए विनाशकारी साबित होंगी।

(जवाहरलाल नेहरू ने अपना आपा तक खो दिया था।)

पं नेहरू – (गुस्से में) कुछ भी बोलते हो। अपनी हद में रहो।

डॉ मुखर्जी – मैं तो अपने हद में हूं, लेकिन आप कश्मीरियों को अनुचित लाभ देने के लिए देश के 36 करोड़ लोगों के साथ अन्याय कर रहे हैं।

पं नेहरू – कोई अन्याय नहीं हो रहा है किसी के साथ।

बच्चा – ये अनुच्छेद 370 क्या थी दद्दू?

दद्दू – बेटा यह अनुच्छेद जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देती थी। 26 अक्टूबर 1947 को विलय संधि के बाद जम्मू-कश्मीर देश का हिस्सा तो हो गया, लेकिन अनुच्छेद 370 के तहत उसे विशेष अधिकार दे दिया गया। राज्य का अलग झंडा और अलग संविधान था। वहां देश के सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला लागू नहीं होता था।

बच्चा – क्या सचमुच दद्दू?

दद्दू – हां बेटा, वहां पहले मुख्यमंत्री वजीरे आज़म अर्थात् प्रधानमंत्री कहलाता था। भारत का कोई भी नागरिक जम्मू-कश्मीर में जमीन भी नहीं खरीद सकता। इतना ही नहीं, पहले तो भारतीयों को जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने के लिए पासपोर्ट की तरह परमिट लेनी पड़ती थी। यानी देश के अंदर एक स्वतंत्र देश के रूप में दर्जा दे दिया गया।

बच्चा – डॉ मुखर्जी क्या चाहते थे?

दद्दू – वह परमिट सिस्टम डॉ. मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाने के प्रबल पैरोकार थे। पूरा देश उनके साथ था। क्या जोश था उनमें।

(अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में डॉ मुखर्जी ने अपना संकल्प व्यक्त किया था।)

डॉ मुखर्जी – या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपने जीवन की आहुति दे दूंगा।

डॉ मुखर्जी – मैं प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनकी सरकार को चुनौती देता हूं। वह अपना अपने दृढ़ निश्चय पर अटल रहे। मैं अपने संकल्प को पूरा करूंगा।

(मई 1953 की चिलचिलाती धूप में वह बिना परमिट लिए जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े और उनका कारवां पंजाब के उत्तरी छोर पर बसे माधोपुर तक पहुंच गए।)

(माधोपुर में रावी को पार करते ही जम्मू कश्मीर राज्य शुरू होता है। डाक्टर मुखर्जी के साथ उनके सहयोगी अटलबिहारी वाजपेयी थे।)

डॉ मुखर्जी – अटलजी आप यहां से आगे लौट जाइए। यहां से आगे की राह बहुत कठिन है। पात नहीं मैं जिंदा लौटूगा या भी नहीं। मुझे इजाजत दीजिए कि मैं एक राष्ट्र एक ध्वज के अपने मिशन में कामयाब होऊं।

अटलबिहारी वाजपेयी – जैसा आपका आदेश। वैसे मैं भी आपके साथ चलना चाहता हूं।

डॉ मुखर्जी – नहीं अटल जी आप लौट जाइए। पार्टी का काम काम भी देखना है। नेहरू और कांग्रेस पर अंकुश भी रखना है। आपको लौटना होगा।

अटलबिहारी वाजपेयी – जैसा आपका आदेश। ठीक है मैं लौटता हूं। लेकिन आप अपना ध्यान रखना। देश के लिए आपका जीवन बहुत कीमती है।

डॉ मुखर्जी – भारतमाता की जय! वंदेमातरम्!!

पुलिस अधिकारी – सर डॉ मुखर्जी पंजाब की सीमा पार करने वाले हैं। माधोपुर में ही उन्हें हम पंजाब में गिरफ्तार कर लें सर? जम्मू-कश्मीर में उनकी जान जा सकती है। वहां का प्रशासन उनसे चिढ़ा हुआ है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय का अधिकारी – नहीं उनको आगे बढ़ने दो। माधोपुर पार करने दो। लखनपुर जाने दो। पंजाब में गिरफ्तार करने का ऊपर से आदेश नहीं है हमारे पास। मुझे बताया गया है कि पंजाब में गिरफ्तारी होने पर उन्हें सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल सकती है। इसलिए उन्हें जाने दो, ताकि जम्मू-कश्मीर पुलिस गिरफ्तार करे। वहां सुप्रीम कोर्ट कुछ नहीं कर पाएगा। हा हा हा हा। पं. नेहरू जिंदाबाद!

अटलबिहारी वाजपेयी – तो मैं चलूं वापस। मैं फिर कहूंगा। आप अपना विशेष ध्यान रखिएगा। आपका जीवन इस देश की धरोहर है।

डॉ मुखर्जी – मेरा ध्यान तो अब केवल भारत माता ही रखेंगी। मैं उन्हीं की शरण में उन्हीं की गोद में हूं। भारतमाता की जय! वंदेमातरम्!! भारतमाता की जय! वंदेमातरम्!!

(डॉ मुखर्जी ने 11 मई 1953 को अंततः जम्मू-कश्मीर की सीमा में कदम रख ही दिया। वह पहले भारतीय थे, जिसने बिना परमिट के जम्मू कश्मीर की सीमा में प्रवेश किया।)

पुलिस अधिकारी – हैलो सर, डॉ मुखर्जी जम्मू कश्मीर में बिना परमिट के प्रवेश कर गए है। वह लखनपुर सीमा से हमारी सर जमीन पर आ गए हैं। क्या किया जाए। क्या उन्हें हम उन्हें गिरफ्तार कर लें सर?

वज़ीरे आज़म शेख अब्दुल्ला – हां, उस काफिर हिंदू को फौरन हिरासत में ले लो और उसे जम्मू की जेल में मत रखों। इस हिंदू को श्रीनगर भेज दो। उसकी इतनी हिम्मत कि हमारे आदेश का उल्लंघन करके हमारी सर जमीन पर कदम रखने का दुस्साहस करे।

पुलिस अधिकारी – यस सर। डॉ. मुखर्जी को आपके आदेश पर लखनपुर में ही हिरासत में ले लिया है। उन्हें हम श्रीनगर लेकर आ रहे हैं।

वज़ीरे आज़म शेख अब्दुल्ला – ठीक है, आ जाओ। अब तो उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। अब वह लौट कर वापस नहीं जा सकता।

पुलिस अधिकारी – डॉ मुखर्जी, यू आर अंडर अरेस्ट!

डॉ मुखर्जी – आपकी मर्जी, मैं तो आगे बढ़ता रहूंगा।

पुलिस अधिकारी – नहीं अब आप आगे नहीं बढ़ सकते। ऊपर से आदेश है। हम आगको गिरफ्तार करके श्रीनगर ले चलेंगे।

डॉ मुखर्जी – श्रीनगर क्यों ले जाएंगे? क्या मेरे लिए जम्मू में जगह नहीं है।

पुलिस अधिकारी – हमें ऊपर से आदेश मिला है। हम कुछ नहीं कर सकते।

डॉ मुखर्जी – नहीं, मुझे श्रीनगर ले जाने का क्या तुक?। रात में 500 किलोंमीटर की यात्रा ठीक नहीं होगी। इसलिए मुझे जम्मू में ही रखिए, कल चलेंगे श्रीनगर और तुम्हारे शेख अब्दुल्ला से बात भी करेंगे।

पुलिस अधिकारी – हमें आदेश मिला है, रात में ही आपको लेकर श्रीनगर पहुंचने का।

डॉ मुखर्जी – ठीक है जब ऊपर से आदेश है तब मैं क्या कर सकता हूं। भारत माता की जय, वंदे मातरम।

पुलिस अधिकारी – इन्हें जीप में पीठे बिठा लो। और चलो श्रीनर की ओर रवाना होते है।

बच्चा – दद्दू, डॉ मुखर्जी को माधोपुर में ही गिरफ्तार क्यों नहीं कर लिया गया।

दद्दू – यह तो रहस्य है बेटा। यही बात सबसे ज़्यादा हैरान करने वाली है। डॉ. मुखर्जी को माधोपुर से राज्य में प्रवेश करने पर लखनपुर में ही हिरासत में क्यों लिया गया।

बच्चा – इसकी क्या वजह हो सकती है दद्दू?

दद्दू – ताकि डॉ. मुखर्जी की गिरफ्तारी पर सुप्रीम कोर्ट भी कुछ न कर सके। नेहरू और शेख अब्दुल्ला को यह लाभ हुआ कि लोकसभा सदस्य डॉ मुखर्जी की गिरफ़्तारी पर भी सुप्रीम कोर्ट भी दख़ल नहीं दे सका

बच्चा – ऐसा कैसे?

दद्दू – क्योंकि जम्मू कश्मीर राज्य तब देश की सबसे बड़ी अदालत की ज्यूरीडिक्शन से बाहर था।

बच्चा – दद्दू डॉ मुखर्जी को जम्मू की किसी जेल में रखने की बजाय क़रीब 500 किलोमीटर दूर श्रीनगर क्यों ले जाया गया।

दद्दू – यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है बेटा कि बताया जाता है कि डॉ मुखर्जी को जम्मू में रखने की बजाय शेख अब्दुल्ला के आदेश पर रातोंरात श्रीनगर ले जाया गया।

बच्चा – यह तो बहुत अमानवीय कदम था।

दद्दू – बिल्कुल। एक देश के सपूत के साथ उसके अपने देश में यह बर्ताव। डॉ मुखर्जी रास्तें में ही बीमार पड़ गए और बीमारी की हालत में ही जीप में डालकर उन्हें श्रीनगर ले जाया गया।

बच्चा – ओह तभी वह बीमार पड़े गए।

दद्दू – हां, इतनी लंबी यात्रा उनकी सेहत के लिए बहुत घातक थी। परंतु जम्मू कश्मीर के पुलिस अधिकारी उन्हें श्रीनगर ले जाने के लिए अड़े रहे और ले भी गए। श्रीनगर पहुंचते पहुंचते डॉ मुखर्जी को चक्कर आने लगा था।

बच्चा – उन्हें उपचार या डॉक्टर उपलब्ध नहीं कराया गया। किर वह लोकसभा सदस्य थे।

दद्दू – नहीं बेटा। डॉ. मुखर्जी बीमार थे। उन्हें श्रीगनर में जिस जेल में रखा गया था ,  वह तब एक वीराने और उजाड़ स्थान पर था

बच्चा – कितनी दूर था जेल से अस्पताल दद्दू?

दद्दू – 15 किलोमीटर दूर था। श्रीनगर जेल में टेलीफोन की भी सुविधा नहीं थी।

बच्चा – ओह यह तो बहुत बुरा हुआ।

दद्दू – मृत्यु से पहले डॉ. मुखर्जी को अस्पताल में जिस गाड़ी में ले जाया गया उसमें जानबूझ कर उनके किसी और साथी को बैठने नहीं दिया गया।

बच्चा – ओह यह तो बहुत बुरा हुआ!

दद्दू – हां, सबसे बड़ी बात यह कि डॉ. मुखर्जी की व्यक्तिगत डायरी को रहस्यमय ढंग से ग़ायब कर दिया गया। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से यह भी स्पष्ट होता है कि मुखर्जी को हिरासत में लेने के लिए भी किसी न किसी स्तर पर बड़ी साज़िश हुई थी।

बच्चा – डॉ. मुखर्जी के खिलाफ इतनी बड़ी साजिश रची गई?

दद्दू – हां बेटा, सबसे बढ़कर   मुखर्जी के इलाज के तमाम दस्तावेज़ संदेहास्पद हालात में छिपा लिए गए। इन्हीं साक्ष्यों के आधार पर भारतीय जनसंघ समेत देश के कई गणमान्य लोगों ने मुखर्जी की मौत की जांच की मांग की। शेख अब्दुल्ला सरकार पर मुखर्जी की मौत में शामिल होने का शक बहुत गहरा था।

बच्चा – फिर शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया?

दद्दू – शेख अब्दुल्ला को गिरप्तार किया गया था आठ अगस्त 1953 को। जब उनको गिरफ़्तार किया गया तो कई लोगों ने यही माना कि उनकी गिरफ़्तारी मुखर्जी की मौत के सिलसिले में हुई।

बच्चा – तो क्या उनकी गिरफ्तारी का डा मुखर्जी की मौत से कोई कनेक्शन नहीं था?

दद्दू – हां, दस्तावेज़ों के मुताबिक़ उनको कथित तौर पर कश्मीर को भारत से अलग करने की साज़िश रचने के आरोप में डिसमिस कर जेल में डाला गया था। बहरहाल  अब्दुल्ला की गिरफ़्तारी के बाद भी मुखर्जी की मौत की जांच के लिए न तो राज्य सरकार तैयार हुई न ही केंद्र।

बच्चा – (दुखी होकर) तब तो एक प्रखर देशभक्त नेता को देश ने खो दिया।

बच्चा – इस देश में कई जांच आयोग बने हैं, पर डॉ मुखर्जी के लिए क्या कोई जांच आयोग बना था?

दद्दू – नहीं बेटा, इस देश में किसी भी संदिग्ध मौत की केंद्रीय एजेंसी  एसआईटी या आयोग गठित करके जांच की लंबी परंपरा रही है।

बच्चा – कई नेताओं की मौत या हत्या की जांच के लिए आयोग बने चुके हैं।

दद्दू – हां, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कथित तौर पर हवाई दुर्घटना में मारे जाने की जांच के लिए तीन तीन आयोग बनाए गए, महात्मा गांधी, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी की हत्या की जांच के लिए आयोग बने।

बच्चा – यहां डॉ मुखर्जी के साथ पक्षपात क्यों हुआ?

दद्दू – डॉ. मुखर्जी के साथ घोर पक्षपात इसलिए किया गया, क्योंकि वह हिंदुओं के हितों की बात करते थे।

बच्चा – डॉ मुखर्जी की मौत के लिए तो नेहरू और शेख अब्दुलाल ही जिम्मेदार थे।

दद्दू – हां, प्रो. बलराज मोधक ने अक्टूबर 2008 में अपने एक लेख फाउंडिल ऑफ जनसंघ में कहा है कि डॉ. मुखर्जी की संदिग्ध मौत नेहरू और शेख़ के आशीर्वाद से हुई।

बच्चा – ओह डॉ मुखर्जी राजनीति में आए ही क्यों बेचारे?

दद्दू – दरअसल, डॉ. मुखर्जी ने देशप्रेम का अलख जगाने के उद्देश्य से ही राजनीति में प्रवेश किया था। वह सच्चे अर्थों में मानवता के उपासक और सिद्धांतवादी थे। वह वीर सावरकर से ख़ासे प्रभावित थे और उनके राष्ट्रवाद के प्रति आकर्षित हुए और हिंदू महासभा में शामिल हुए।

बच्चा – अच्छा!

दद्दू – जब मुस्लिम लीग की राजनीति से बंगाल का माहौल हिंसक हो गया था। वहां सांप्रदायिक विभाजन की नौबत आ गई थी। कम्युनल लोगों की ब्रिटिश सरकार मदद कर रही थी।

बच्चा – यह तो हैरान करने वाली बात है।

दद्दू – यस, इस विषम परिस्थिति में डॉ मुखर्जी ने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिंदुओं की उपेक्षा न हो।

बच्चा – यह तो बहुत महान कार्य था।

दद्दू – हां बेटा, अपनी विशिष्ट रणनीति से उन्होंने बंगाल के विभाजन के मुस्लिम लीग के प्रयासों को पूरी तरह से नाकाम कर दिया।

बच्चा – वह सही अर्थों में भारतमाता के सपूत थे।

दद्दू – हां, बेटा, डॉ. मुखर्जी इस धारणा के प्रबल समर्थक थे कि सांस्कृतिक दृष्टि से सभी भारतीय एक हैं। हममें कोई अंतर नहीं। हम सब एक ही रक्त के हैं। एक ही भाषा   एक ही संस्कृति और एक ही हमारी विरासत है।

बच्चा – यह तो बहुत महान विचार था। यही होना भी चाहिए था।

दद्दू – हां, इसलिए डॉ मुखर्जी ने कहा था कि धर्म के आधार पर विभाजन नहीं होना चाहिए। परंतु उनके इन विचारों को अन्य राजनैतिक दल के तत्कालीन नेताओं ने दूसरे रूप से प्रचारित प्रसारित किया।

बच्चा – उस दुष्प्रचार का कोई असर हुआ?

दद्दू – नहीं बेटा, उस दुष्प्रचार के बावजूद इसके लोगों के दिलों में उनके प्रति अथाह प्यार और समर्थन बढ़ता गया।

बच्चा – यह तो होना ही था।

दद्दू – एक बात और जब अगस्त 1946 में मुस्लिम लीग ने अपने ऐक्शन प्लान के तहत जंग की राह पकड़ ली और कलकत्ता में भयंकर बर्बरतापूर्वक अमानवीय मारकाट हुई।

बच्चा – तब डॉ मुखर्जी ने क्या किया?

दद्दू – उन्होंने पूरा जोर लगाया। सोहरावर्दी की तानाशाही का विरोध किया।

बच्चा – दद्दू देश का विभाजन क्यों हुआ?

दद्दू – ब्रिटेन की भारत – विभाजन की योजना और साज़िश कांग्रेस नेताओं ने अखंड भारत संबंधी अपने वादों को ताक पर रखकर स्वीकार कर लिया।

बच्चा – यानी कांग्रेस तो बहुत खतरनाक खेल खेल रही थी।

दद्दू – हां, तब मुखर्जी ने बंगाल और पंजाब के विभाजन की मांग उठाकर प्रस्तावित पाकिस्तान का विभाजन कराया और आधा बंगाल और आधा पंजाब खंडित भारत के लिए बचा लिया।

बच्चा – दद्दू डॉ मुखर्जी नेहरू मंत्रिमंडल में मंत्री भी रहे न? उदयोग मंत्री।

दद्दू – हां, वह मंत्री बने थे परंतु महात्मा गांधी और सरदार पटेल के अनुरोध पर। वह केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हुए और उन्हें उद्योग जैसे महत्वपूर्ण विभाग की ज़िम्मेदारी सौंपी गई।

बच्चा – मंत्री के रूप में उनका कामकाज कैसा रहा?

दद्दू – शाननदार, संविधान सभा और प्रांतीय संसद के सदस्य और केंद्रीय मंत्री के नाते उन्होंने शीघ्र ही अपना विशिष्ट स्थान बना लिया।

बच्चा – उनका दूसरे नेताओं से क्लैश क्यों होता रहा।

दद्दू – दरअसल, उनके राष्ट्रवादी चिंतन के चलते नेहरू समेत दूसरे नेताओं से मतभेद बराबर बना रहा।

बच्चा – उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा भी दिया था क्या?

दद्दू – हां, नेहरू और पाकिस्तानी पीएम लियाकत अली के बीच कथित तौर पर हिंदू विरोधी समझौते और पाकिस्तान के हिंदुओं के क़त्लेआम न रोक पाने के विरोध में छह अप्रैल 1950 को उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था।

बच्चा – क्या उन्होंने नई पार्टी बनाई?

दद्दू – यस, डॉ. मुखर्जी जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन संघचालक गुरु गोलवलकर से सलाह करने के बाद 21 अक्तूबर 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ की नींव रखी और इसके पहले अध्यक्ष बने।

बच्चा – क्या भारतीय जनसंघ ने चुनाव भी लड़ा?

दद्दू – हां, भारतीय जनसंघ सन् 1952 के चुनावों में उतरी और नवगठित भारतीय जनसंघ ने लोकसभा की तीन सीटों पर विजय प्राप्त की,  जिनमें से एक सीट पर खुद डॉ. मुखर्जी जीते।

बच्चा – तो वह विपक्ष की भूमिका में थे?

दद्दू – डॉ मुखर्जी ने संसद में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बनाया जिसमें 32 सदस्य लोकसभा तथा 10 सदस्य राज्य सभा शामिल हुए।

बच्चा – इतना कुछ हुआ, मगर अनुच्छेद 370 तो जस की तस है।

दद्दू – नहीं बेटा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35 ए दोनों को हटा कर देशवासियों को तोहफ़ा डॉ. मुखर्जी को सच्ची श्रद्धाजलि दी है। अब इस देश में डॉ मुखर्जी का ही विचार चलेगा, एक देश! एक संविधान!! एक ध्वज!!!