द मोस्ट वॉन्टेड डॉन – एपिसोड – 21 – दाऊद का जुबीना जरीन उर्फ मेहजबीन से निकाह

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हरिगोविंद विश्वकर्मा
सन् 1986 का वक़्त। डोंगरी का एक भव्य हॉल। इब्राहिम भाई, नूरा और अनीस समेत दाऊद इब्राहिम के सभी भाई-बहन मेहमानों का इस्तक़बाल कर रहे थे। इब्राहिम कासकर परिवार की ओर से शहर के कुछ बेहद चुनिंदा लोगों को ही निकाह का दावतनामा भेजा गया था। जलसा बहुत गोपनीय तरीक़े से हो रहा था। स्टेज पर दाऊद और मेहज़बीन के निकाह की रस्म हो रही थी।

काज़ी ने परिजनों के सामने ज़ुबीना ज़रीन उर्फ़ मेहज़बीन से पूछा, “आपको दाऊद से निकाह क़बूल है?”

मेहज़बीन ने हौले से मुस्कराकर कहा, “हां, क़बूल है…!”

दाऊद का मेहज़बीन से इस्माली रीति से निकाह हो गया। लोग तालियां बजाने लगे।

दरअसल, दाऊद की ज़ुबीना ज़रीन उर्फ़ मेहज़बीन से मुलाक़ात का सिलसिला कुछ ही माह पहले शुरू हुआ। वह मनीष मार्केट में दुकान में बैठा था, तभी उसके दोस्त का फोन आया। उसने बताया, मुमताज़ भाई नाम का एक आदमी बस आने ही वाला है, एक अर्जेंट काम के सिलसिले में। हो सके तो उसका काम करवा दे। कुछ देर में मुमताज़ पहुंच भी गया। काम, दरअसल, शॉप खाली कराने का था। मनीष मार्केट में उसकी शॉप दुकानदार खाली नहीं कर रहा था। दोस्त ने मदद के लिए कहा था। लिहाज़ा, दाऊद ख़ुद वहां गया। सारा सामान बाहर फेंक कर शटर गिरा दिया। उसका इतना ख़ौफ़ था कि कोई सामने ही नहीं आया। मुमताज़ का काम दस मिनट में हो गया।

उस घटना के बाद दाऊद की मुमताज़ भाई से अच्छी जान-पहचान हो गई। वह कभी-कभार उसकी शॉप पर जाने लगा। एक दिन मुमताज़ ने शिष्टाचार बस उसे दोपहर के भोजन पर अपने घर बुलाया था। दोनों खाना खाने पर बैठे थे और एक युवती खाना लेकर आ जा रही थी।

दाऊद ने ज़रीन को देखा तो देखता ही रह गया। पता नहीं ऐसा क्या था उसमें कि युवती पहली नज़र में ही सीधे उसके दिल में उतर गई। दाऊद को लगा वह कोई सपना देख रहा है। उसे यक़ीन ही नहीं हुआ, जो कुछ देख रहा है वह सच है। उसकी नज़र बेक़ाबू हो गईं। लाख कोशिश के बावजूद बार-बार उधर ही जा रही थी। उसकी मुस्कान ही ऐसी थी कि लड़कियों से दूर रहने का दाऊद का सारा संकल्प रेत के महल की तरह भरभरा कर गिर पड़ा।

युवती बेहद सलीके से खाना परोस रही थी। दाऊद को लगा, वह मुमताज़ की बेटी है, लेकिन वह उसकी साली निकली। उसका नाम ज़ुबीना ज़रीन उर्फ मेहज़बीन था। दाऊद असहज़ हो गया। वह खाना खा ही नहीं पा रहा था। मुमताज़ तो नहीं, मेहज़बीन ने ताड़ लिया कि जनाब की परेशानी की सबब उसका हुस्न है। वह मन ही मन मुस्कराने लगी। उधर दाऊद अपने ऊपर हैरान था कि वह इतना असहज़ क्यों महसूस कर रहा है। खाना नहीं खा पा रहा है। उसकी नज़र थी कि लाख कोशिश करने के बाद भी मेहज़बीन की ओर ही जा रही थी।

“दाऊदभाई आप खा नहीं रहे हैं।” मुमताज़ भाई ने पूछा।

“खाना अच्छा नहीं बना है क्या?” मेहज़बीन ने भी सवाल दाग़ दिया।

दरअसल, दाऊद की बहादुरी और दबदबे से ज़ुबीना ज़रीन ख़ासी प्रभावित थी। चाहती थी, जीवसाथी के रूप में उसे कोई ऐसा मर्द मिले जिसका लोहा दुनिया मानती हो। और, डॉन दाऊद इब्राहिम उसके अपने शौहर की परिभाषा में एकदम फ़िट बैठता था। उसकी आवाज़ दाऊद को इतनी मधुर लगी कि उसे सुजाता की भी आवाज़ कभी इतनी भली नहीं लगी थी।

“नहीं-नहीं, अच्छा है। खाना बहुत अच्छा है। बल्कि इतना टेस्टी गोश्त तो मैंने आज तक खाया नहीं। बहुत बढ़िया जायका है।” दाऊद के मुंह से ख़ुद-ब-ख़ुद निकल गया।

दाऊद इब्राहिम की संपूर्ण कहानी पहले एपिसोड से पढ़ने के लिए इसे क्लिक करें…

दरअसल, सुजाता को दाऊद इतना चाहने लगा था कि उसकी बेवफ़ाई से बुरी तरह टूट गया था। उसे लड़कियों से नफ़रत-सी हो गई थी। उसने प्रतीज्ञा कर ली थी कि लड़कियों के चक्कर में कभी न पड़ेगा। सुजाता के कारण दर्द भरे जिस माहौल से वह गुज़रा था, उस पीड़ा से वह दोबारा नहीं गुज़रना चाहता था, इसीलिए उसने तीन साल तक किसी लड़की की ओर नज़र उठाकर देखा तक नहीं। सारा ध्यान अपना एंपायर खड़ा करने में लगा दिया। इस दौरान बहुत बार एक से एक ख़ूबसूरत लड़कियों से उसका सामना हुआ लेकिन उसने किसी को भी लिफ़्ट नहीं दी। उसे लगा, जब भी प्यार और परिवार में से किसी एक को चुनने की बात आती है, तब हर लड़की, चाहे वह कितना भी प्यार करने का दावा करती हो, अपने परिवार को चुनती है। अपने प्यार को लात मार देती है।

लेकिन यहां दाऊद पहली नज़र में ज़ुबीना ज़रीन उर्फ मेहज़बीन से क्लीनबोल्ड हो गया। सो मुमताज़ भाई जब भी बुलाता, वह मना नहीं कर पाता था, लिहाज़ा उसकी मेहजबीन से अकसर मुलाकात होने लगी। धीरे-धीरे उसकी सुसुप्त भावनाएं फिर से उभरने लगीं। मेहज़बीन को वह जिस दिन न देख पाता अजीब-सी बैचैनी होती। मन ही नहीं लगता था। उसकी हालत फिर वैसी ही हो गई, जैसी सुजाता के साथ रिश्ते के समय थी। उसे पता चला, मेहज़बीन कभी व्यापारी रहे सलीम कश्मीरी की बेटी है। बहरहाल, रफ़्ता-रफ़्ता वे एक दूसरे में अंदर तक इन्वॉल्व होते गए। एक दिन दाऊद के आग्रह पर मेहज़बीन ख़ुद को रोक नहीं सकी और उसकी बाइक पर बैठ ही गई। दाऊद उसे लेकर चौपाटी की ओर फुर्र हो गया। दोनों रेत पर बैठे दुनिया भर की बात करते रहे। रात को दाऊद मेहज़बीन को उसके घर ड्रॉप करता हुआ निकल गया। उनका प्यार परवान चढ़ने लगा।

मेहज़बीन अब दाऊद के साथ क़रीब-क़रीब रोज़ाना बाहर जाने लगी। जब मुमताज को पता चल गया कि दाऊद और मेहज़बीन एक दूसरे को पसंद करने लगे हैं। उसने बिल्कुल विरोध नहीं किया। वह ख़ुद चाहता था, दोनों का रिश्ता हो जाए। लेकिन बात जब मेहज़बीन के पिता सलीम कश्मीरी तक पहुंची तो उन्होंने साफ़-साफ़ मना कर दिया। दक्षिण मुंबई का हर मुसलमान दाऊद की रेपुटेशन से वाक़िफ़ था। वह जानते थे कि दाऊद ऐसे पेशे में है, जहां किसी भी समय पुलिस या विरोधी गिरोहों के हाथ जान गंवा सकता है। जब मेहज़बीन को पता चला कि अब्बा जान उसके सपनों के राजकुमार को पसंद नहीं करते तो उसने उनसे ख़ुद बात की। मगर अब्बा उसकी भी बात मानने को तैयार न हुए। वह बार-बार ज़ोर देते रहे, दाऊद एक वॉन्टेड अपराधी है। पुलिस उसे कभी भी मार सकती है या उसके विरोधी ख़त्म कर सकते हैं। तब उसका क्या होगा?

मेहज़बीन वापस अपने कमरे में चली गई। अचानक से वह बहुत दुखी हो गई थी। उसे कोई रास्ता ही नहीं सूझ रहा था। वह दाऊद से बेइंतहां मोहब्बत करने लगी थी। उसके बिना ज़िदगी की कल्पना ही नहीं करती थी। वह ख़ुद दाऊद को ज़बान दे चुकी थी कि निकाह करेगी तो केवल उसके साथ। अगर घर वाले, ख़ासकर उसके अब्बू जान दाऊद से निकाह के लिए तैयार नहीं हुए तो वह ताज़िंदगी निकाह ही नहीं करेगी और तन्हा ही रहेगी। उसके पिता उसे अपने घर ले गए और वह दाऊद से अलग कर दी गई। एक बार फिर दाऊद मोहब्बत की वजह से परेशान था। उसे लगने लगा कि मोहब्बत उसके नसीब में ही नहीं है, वरना कश्मीर साहब क्यों इनकार करते।

दाऊद के घर वाले किसी ङभी क़ीमत पर दाऊद का निकाह मेहज़बीन से करना चाहते थे। उन लोगों ने सलीम कश्मीरी से बातचीत की। उन्हें इब्राहिम भाई की मुंबई पुलिस में साख़ के बारे में बताया। बहुत मान-मनोव्वल के बाद आख़िरकार सलीम मेहज़बीन का हाथ दाऊद के हाथ में देने को तैयार हो गए। यानी दाऊद के बेटर हॉफ़ के उसके जीवन में आने की राह साफ़ हो गई। यह वह दौर था जब दाऊद पूरी तरह सुजाता के प्रभाव से निकलकर केवल और केवल मेहज़बीन के बारे में सोच रहा था। उसे मौसम फिर से बेहद सुहाना लगने लगा था। वह आंख मूंदकर केवल और केवल मेहज़बीन के ख़यालों में खोया रहना चाहता था। केवल उसी के बारे में सोचना चाहता था। बस वह उस लमहे का इंतज़ार करने लगा जब मेहज़बीन काज़ी के सामने कहेगी।। क़बूल है।

बहरहाल, दाऊद इब्राहिम और मेहज़बीन उर्फ़ ज़ुबीना ज़रीन के जीवन में वह पल आ भी गया। दोनों जीवनसाथी बन गए।

(The Most Wanted Don अगले भाग में जारी…)

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