देश में 90 फीसदी असंगठित श्रमिकों की दयनीयता के मायने

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सरोज कुमार

त्रेतायां मंत्र-शक्तिश्च ज्ञानशक्तिः कृते-युगे।
द्वापरे युद्ध-शक्तिश्च, संघे शक्ति कलौ युगे।

ऋग्वेद के इस श्लोक की अंतिम पंक्ति कलियुग में संगठन शक्ति का बखान करती है। हमें संगठन की शक्ति का भान और ज्ञान भी है। उद्देश्य के लिए अक्सर संगठित होने और एकजुट होने के नारे भी दिए जाते हैं। राजनीति, समाजनीति और अर्थनीति में सफलता का मूल तत्व संगठन शक्ति ही है। राजनीतिक सत्ता संगठन के बल हासिल की जाती है, सामाजिक वर्चस्व एकजुटता से बनता है, और आर्थिक समृद्धि संगठित व्यवस्था के जरिए सोपान चढ़ती है। संगठन शक्ति का ही परिणाम है कि 10 फीसदी से भी कम श्रमशक्ति वाला अर्थव्यवस्था का संगठित क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 50 फीसदी का योगदान करता है। जबकि बाकी 50 फीसदी की भरपाई करने में असंगठित क्षेत्र के 90 फीसदी से अधिक श्रमिक पसीना बहाते हैं। अर्थव्यवस्था में संगठित और असंगठित का अर्थ औपचारिक और अनौपचारिक भी होता है।
सवाल यह कि इतनी बड़ी श्रमशक्ति वाला अर्थव्यवस्था का आधा हिस्सा असंगठित क्यों है? संगठन शक्ति के जरिए सत्ता पर काबिज होने वाले नीतिनियंता इस बारे में क्यों नहीं सोचते कि पूरी अर्थव्यवस्था संगठित हो जाए, ताकि पूरी श्रमशक्ति को समान रूप से लाभ मिल सके, और अर्थव्यवस्था भी नई ऊंचाई चढ़े? या संगठित क्षेत्र की सत्ता के लिए इतने बड़े असंगठित क्षेत्र का होना आवश्यक है? दरअसल, सच यही है कि संगठित क्षेत्र की बुलंद इमारत असंगठित क्षेत्र के ईंट-गारे से खड़ी होती है। फिर 10 फीसदी लोग क्यों चाहेंगे कि बाकी 90 फीसदी भी इस इमारत में हिस्सेदार बन जाएं। यही कारण है कि असंगठित क्षेत्र के पक्ष में बातें तो होती हैं, लेकिन निष्पक्ष बात यह है कि बातें व्यवहार में नहीं दिखाई देती हैं। यह स्थिति आजादी के 70 साल बाद की है। जबकि सच यह है कि कोई भी अर्थव्यवस्था इतने बड़े असंगठित क्षेत्र के साथ वह ऊंचाई कभी हासिल नही कर सकती, जिसके सपने नारों में दिखाई और सुनाई देते हैं।

असंगठित क्षेत्र का सीधा-सा अर्थ है अनौपचारिक क्षेत्र, असुविधाओं और अभावों वाला क्षेत्र, जहां जीवन के मौलिक अधिकार भी अक्सर बेमानी होते हैं, बाकी सुविधाएं तो दूर की बात है। किसी तरह जिंदगी कट गई तो सौभाग्य की बात, वरना दुर्घटना, आपदा, आर्थिक मंदी जैसी परिस्थितियां वक्त से पहले और सबसे पहले इस क्षेत्र के उद्यमों और श्रमिकों को निवाला बना लेती हैं। असंगठित क्षेत्र में श्रमिक सबसे दयनीय हालत में हैं। अब जरा सोचिए, जिस देश की लगभग 93 फीसदी श्रमशक्ति दयनीयता के अंधेरे में जीवन बसर करती हो, वह देश किस उजाले की बात कर सकता है। और यदि करता भी है तो उसके मायने क्या हैं? जब संगठन ही मजबूती का पैमाना है तो आर्थिक रूप से वही देश मजबूत हैं, जहां की अर्थव्यवस्था अधिकतम व्यवस्थित और संगठित है।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की 2018 की एक रपट के अनुसार, असंगठित क्षेत्र में कार्यरत श्रमशक्ति का वैश्विक औसत 60 फीसदी से अधिक है। इसमें अफ्रीका का औसत सबसे ज्यादा 85.8 फीसदी, एशिया और प्रशांत क्षेत्र का 68.2 फीसदी, अरब देशों का 68.8 फीसदी, अमेरिका का 40 फीसदी, जबकि यूरोप और मध्य एशिया का औसत सबसे कम 25.1 फीसदी है। रपट कहती है कि दुनिया में 93 फीसदी असंगठित रोजगार उभरते और विकासशील देशों में हैं। असंगठित श्रमशक्ति के मामले में भारत की स्थिति अफ्रीकी देश यूगांडा जैसी है, जहां श्रमशक्ति का 94 फीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है। जबकि भारत जैसी मांग आधारित अर्थव्यवस्था में लगभग 93 फीसदी श्रमशक्ति का दयनीय हालत में होना, अर्थव्यवस्था की ही दयनीयता का दर्शन कराता है।

ऐसा नहीं है कि असंगठित क्षेत्र नीति-नियंताओं के एजेंडे में नहीं है और इस क्षेत्र के नाम पर कुछ किया नहीं गया है। दिक्कत यह है कि इस क्षेत्र के नाम पर अबतक जो कुछ हुआ है, वह या तो नाम मात्र का रहा है या फिर संगठित क्षेत्र के काम का साबित हुआ है। अलबत्ता असंगठित क्षेत्र कमजोर होता गया है। देश की मौजूदा सरकार ने अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाने के लिए दो बड़े कदम उठाए। लेकिन नोटबंदी और जीएसटी के रूप में उठाए गए दोनों कदम अनौपचारिक क्षेत्र के लिए अन-उपचारिक ही साबित हुए। यह क्षेत्र तबाह हो गया। द ऑल इंडिया मैन्यूफैक्चरर्स ऑर्गनाइजेशन के एक सर्वे के मुताबिक, आठ नवंबर, 2016 की रात लागू की गई नोटबंदी के कारण 31 दिसंबर, 2016 तक ही असंगठित क्षेत्र में 60 फीसदी श्रमिक बेरोजगार हो गए थे, और छोटे कारोबारियों, दुकानों और सूक्ष्म उद्यमों के राजस्व में 47 फीसदी की गिरावट आई थी।

नोटबंदी के बाद अनौपचारिक क्षेत्र को औपचारिक बनाने का सरकार का दूसरा बड़ा कदम वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) था। जुलाई 2017 में जीएसटी लागू होने के परिणामस्वरूप पंजीकृत करदाताओं की संख्या 64 लाख से बढ़कर 1.12 करोड़ हो गई। सरकार ने इसके लिए अपनी पीठ भी थपथपाई कि करदाताओं की संख्या में 40 फीसदी की यह वृद्धि अनौपचारिक क्षेत्र के औपचारिक होने का परिणाम और प्रमाण है। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह अपने आप में डरावना है। तमाम छोटे उद्यम अनुपालन की जटिलताओं के कारण खुद को संभाल नहीं पाए और बंद हो गए। सरकार हालांकि इसे खारिज करती रही है, क्योंकि इसके पक्ष में कोई अध्ययन और आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। लेकिन उस समय सामने आई बेरोजगारी दर छोटे उद्यमों की बर्बादी का अपने आप में एक आंकड़ा है। जीएसटी लागू होने के बाद 2017-18 में बेरोजगारी दर 45 साल के सर्वोच्च स्तर 6.1 फीसदी पर पहुंच गई और इसमें लगभग 75 फीसदी योगदान असंगठित क्षेत्र का था। हालांकि फरवरी 2019 में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की लीक हुई एक रपट 2017-18 की बेरोजगारी दर को 8.9 फीसदी बताती है। नोटबंदी और जीएसटी के बाद ऊपर गई बेरोजगारी दर फिर नीचे नहीं लौटी। कोरोना महामारी ने कोढ़ में खाज का काम किया, जब बेरोजगारी दर 24 फीसदी तक पहुंच गई थी।

असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की किस्मत बदलने के नाम पर हाल ही में तथाकथित ऐतिहासिक श्रम सुधार लागू किए गए। कई सारे श्रम कानूनों को खत्म कर चार नई श्रम संहिताएं बनाई गईं। मजदूरी पर श्रम संहिता 2019 में ही संसद में पारित हो गई थी। जबकि व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कामकाजी स्थिति संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता और औद्योगिक संबंध संहिता कोरोना काल के दौरान सितंबर 2020 में पारित हुईं। चारों संहिताएं अप्रैल, 2021 से लागू हो चुकी हैं। लेकिन इन संहिताओं के भीतर जो रसायन भरा गया है, उससे असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की बीमारी ठीक नहीं होने वाली है। हां, इससे व्यापार की आसानी सूचकांक और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में देश की रैंकिंग जरूर सुधर सकती है। और इससे संगठित क्षेत्र को लाभ होगा।

लंबे समय से श्रम सुधारों की चल रही कवायद का यह हाल तब है, जब कोरोना महामारी के कारण मार्च 2020 में लागू की गई देशव्यापी बंदी के दौरान बेरोजगार हुए लगभग बारह करोड़ लोगों में से लगभग 75 फीसदी असंगठित क्षेत्र से थे। बंदी के दौरान प्रवासी श्रमिकों, असंगठित श्रमिकों और साथ ही सरकारी नीतियों की दबी-छिपी वास्तविक तस्वीर खुलकर सड़क पर सामने आ गई थी। लेकिन उस तस्वीर को बदलने के लिए बनाए गए चारों कानून उसे कहीं स्पर्श तक नहीं करते। कुल मिलाकार ये कानून असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए किसी काम के नहीं हैं। प्रवासी मजदूरों, खेतिहर मजदूरों, स्वरोजगारी, दिहाड़ी मजदूरों सहित असंगठित क्षेत्र के अधिकांश श्रमिक इन कानूनों के दायरे से ही बाहर हैं।

असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा और बेरोजगारी से सुरक्षा दो बड़े मुददे हैं। लेकिन चारों कानून इस दिशा में श्रमिकों की कहीं से कोई मदद करते नहीं दिखते। संविधान ने हर श्रमिक को सामाजिक सुरक्षा का अधिकार दे रखा है। लेकिन सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के अनुसार, सिर्फ वही इकाइयां, कार्यस्थल या संस्थाएं इस संहिता के तहत आएंगी, जहां 10 या इससे अधिक मजदूर काम कर रहे हों। चूंकि सामाजिक सुरक्षा का कानून सार्वभौमिक नहीं है, लिहाजा इस बात की कोई गारंटी नहीं कि 10 या इससे अधिक श्रमिकों के समूह को भी नए कानून का लाभ मिल पाएगा। यह सबकुछ नियोक्ता की मर्जी पर निर्भर करेगा। हैरान करने वाली बात यह है कि सामाजिक सुरक्षा संहिता के तहत जिस फंड का प्रावधान किया गया है, 2021 के बजट में उसके लिए कोई आवंटन ही नहीं किया गया है।

आर्थिक मंदी और आपदा की स्थिति में बेरोजगारी की पहली और सबसे बड़ी मार असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को झेलनी पड़ती है। लेकिन नए कानूनों में इन श्रमिकों के लिए रोजगार सुरक्षा के संबंध में कुछ भी नहीं है। उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। जबकि महामारी की दूसरी लहर ने इस क्षेत्र पर एक बार फिर से ताले लगा दिए हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनामी (सीएमआईई) के अनुसार, अलग-अलग राज्यों में लागू सख्त पाबंदियों के कारण अकेले अप्रैल महीने में 75 लाख लोग बेरोजगार हो गए हैं। इसमें लगभग 80 फीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्र का है। अप्रैल, 2021 में बेरोजगारी दर आठ फीसदी पर पहुंच गई। इस संकट के आगे और गंभीर होने की आशंका है, क्योंकि संक्रमण के दैनिक आंकड़े चार लाख के पार पहुंच गए हैं।

स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में तो आम और खास सभी की सांसें उखड़ रही हैं, लेकिन रोजगार के अभाव में असंगठित श्रमिकों के भूख से भी मरने की नौबत आ पहुंची है। ऐसे में हर गरीब को दो महीने पांच किलोग्राम मुफ्त अनाज घड़ियाली आंसू से ज्यादा कुछ नहीं है। संगठित क्षेत्र के राज में असंगठित क्षेत्र का यह प्रजारूप पीड़ादायक है। ध्यान रहे, वही राज्य और राजा मजबूत होता है, जहां की प्रजा भी खुशहाल हो। लेकिन आज का सबसे बड़ा संकट तो यही है।

(वरिष्ठ पत्रकार सरोज कुमार इन दिनों स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।) 

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