व्यंग्य – ‘वो’ वाली दुकान

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हरिगोविंद विश्वकर्मा
वह मुस्करा रहा था। मुस्करा ही नहीं रहा था, बल्कि हंस भी रहा था। बहुत ख़ुश लग रहा था। ऐसा लग रहा था, जैसे उसके मन में लड्डू फूट रहे हैं। वह अपनी ख़ुशी संभाल नहीं पा रहा था। फिर अचानक ठठा कर हंसने लगा।
अचानक सबकी नज़र उसकी ओर गई। मैं उसे देखने से ख़ुद को नहीं रोक पाया। लिहाज़ा, उस पर मेरी नज़र चली गई। मैं उसकी ओर लपक लिया। पहुंचते ही जानने का प्रयास किया। उसकी ख़ुशी का कारण।
-अरे भाई आपकी इस ख़ुशी का राज़? मैंने कलाई हिलाकर इशारे से पूछा।
-मुझे वॉट्सअप पर मैसेज आया है।
-क्या मैसेज आया है। मुझे भी तो बताओ। ऐसा कौन सा मैसेज आ गया जो तुम ठठाकर हंस रहे हो?
-साहब, इस मैसेज का मैं लॉकडाउन शुरू होने से ही इंतज़ार कर रहा था। बड़ी बेसब्री से इस संदेश की राह देख रहा था।
-क्या मैसेज है, बताओगे या ऐसे ही पहेलियां बुझाते रहोगे।
-‘वो’ वाली दुकान भी खुल रही है साहब।
-कौन ‘वो’ वाली दुकान?
-सोमरस वाली दुकान!
-दारू की दुकान? मैं उसकी ओर देखकर ज़ोर से बोला।
-दारू की दुकान कहकर उसका अपमान न करें! चाहे तो आप मदिरा की दुकान कह सकते हैं। आप मधु की दुकान कह सकते हैं। या फिर आप वाइन शॉप कह सकते हैं। वाइन शॉप खुल रही है। उसने बड़े आहिस्ता से जवाब दिया।
मैं उसकी ओर देखता रह गया। यह सोचने लगा कि शराब के कितने पर्यायवाची जानता है यह व्यक्ति।
-एक बात कहूं साहब? वह फिर धीरे से कहा।
-हां-हां, बोलो-बोलो। मैं पुलिसवाला नहीं हूं, इसलिए बिंदास बोलो। एक प्रशंसापात्र मैंने भी उसकी ओर बढ़ा दिया।
-पहली बार देश ही नहीं, देश की जनता ने महसूस किया है। उसने लंबी सांस छोड़ी।
-क्या महसूस किया है भाई, देश और देश की जनता ने? मैंने उत्सुकतावश पूछा।
-हमारी कम्युनिटी की अहमियत को। उसे चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान तैर गई।
-हमारी कम्युनिटी की अहमियत का मतलब?
-हां, हम सोमरस पान करने वालों की कम्युनिटी साहब। अचानक वह भावुक हो गया। आगे बोला -पूरी दुनिया में हमारी एक ही कम्युनिटी है। हमारे साथ न तो किसी देश का नाम जुड़ता है। न किसी धर्म का। हमें जाति के बंधन में नहीं बाधा जा सका। हम नस्लभेद से भी परे हैं। ऐसी है हमारी कम्युनिटी साहब। हम न तो देश के नाम पर लड़ते हैं, न धर्म के नाम पर। न तो जाति के नाम पर लड़ते हैं, न ही नस्ल के नाम पर। हमें अपनी कम्युनिटी पर गर्व है। आई एम प्रउड ऑफ माई कम्युनिटी।
-मतलब तुम शराबी हो? मैंने सीधा सवाल कर दिया। संगीत की भाषा में मेरा स्वर आरोहक्रम में था।
-शराबी मत कहो साहब। मदिराप्रेमी कहो। सोमरस पान करने वाला कहो। मैं सोमरस पान करने वालों की बात कर रहा हूं। सरकार को अब समझ में आई मदिराप्रेमियों की अहमियत साहब। उसने अवरोह क्रम में जवाब दिया।
-इसमें अहमियत जैसी क्या बात है?
-अहमियत है साहब। देखो न, एक महीने से अधिक समय से देश में वाइन शॉप बंद हैं। इससे सरकार को हज़ारों करोड़ के राजस्व का नुकसान हुआ गया। देश की अर्थ-व्यवस्था पर भारी चपत लगी है। यह हमारे न पीने से हुआ है। अगर आगे भी हमें पीने से रोका गया तो यह घाटा लाखों में पहुंच सकता है। उसने किसी अध्यापक की तरह मुझे अर्थशास्त्र का गणित समझाया।
-बात तो सही कह रहे हो यार। सरकार को शराब से हर महीने हज़ारों करोड़ राजस्व मिलता है। यह बात तो सही है। मैंने उसकी बात से सहमति जताई।
-इस तरह हर साल लाखों करोड़ रुपए का राजस्व हुआ न।
-सही कहा आपने। चलो, अब तो शराब की दुकानें खुलनेवाली हैं।
-वाइन शॉप कहिए न साहब। इसमें स्टेटस सिंबल भी है। हमारा मान भी बढ़ता है। हमारे कंधों पर देश की अर्थ व्यवस्था टिकी है।
-सही कहा आपने। आप लोगों की वजह से अर्थ व्यवस्था गुलज़ार रहती है। लाखों लोगों के घर में चूल्हा जलता है।
-लेकिन साहब मैंने भी एक संकल्प लिया है।
-कौन सा संकल्प?
-यही कि देश की अर्थ व्यवस्था में मंदी लाने का आरोप हमारी कम्युनिटी पर न पड़े।
-मैं समझा नहीं।
-यही कि हम थोड़ा अधिक पीएंगे, ताकि कमबख़्त कोरोना के कारण 40 दिन में राजस्व का जो घाटा हुआ है, उसकी भरपाई कर दें। आख़िर हमारी भी तो कोई जिम्मेदारी है, उस देश के प्रति जिस देश के हम वासी हैं। मैं अपनी कम्युनिटी के लोगों से अपील करता हूं, उनके थोड़े प्रयास से देश की अर्थ व्यवस्था संभल जाएगी। लोगों की रोज़ी-रोटी छिनने से बच जाएगी। इसलिए देश के लिए पीएं। कोराना को हराने के लिए पीएं।
आप सच्चे देशभक्त हैं। आप महान हैं। यहां सड़क पर क्या कर रहे हैं? आपकी ज़रूरत तो वित्तमंत्रालय में है। कोरोना से लड़ाई जीतने के लिए देश को आपकी कम्युनिटी की ही ज़रूरत है।