शरद जोशी के नाटक ‘अंधों का हाथी’ का बेहतरीन मंचन

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2007

मैं मरा नहीं हूं। मैं कैसे मरूंगा। मैं तो सूत्रधार हूं। मैं इसी तरह हाथी का प्रसंग खड़ा करूंगा। हाथी को बार-बार स्टेज पर लाऊंगा और अनंत बार जन्म लेता रहूंगा, क्योंकि मैं सूत्रधार हूं…

संवाददाता
मुंबई, मैं मरा नहीं हूं। मैं कैसे मरूंगा। मैं तो सूत्रधार हूं। मैं इसी तरह हाथी का प्रसंग खड़ा करूंगा। हाथी को बार-बार स्टेज पर लाऊंगा और अनंत बार जन्म लेता रहूंगा, क्योंकि मैं सूत्रधार हूं। यह संवाद व्यंग्य विधा के शिखर पुरुष शरद जोशी के नाटक ‘अंधों का हाथी’ के सूत्रधार का है, जो देश में सरकारी तंत्र के निकम्मेपन और राजनीति एवं राजनेताओं की असंवेदनशीलता पर आधारित इस व्यंग्य नाटक में मुख्य किरदार निभाता है।

चित्रनगरी संवाद मंच मुम्बई के साप्ताहिक आयोजन में रविवार की शाम शरद जोशी स्मृति दिवस के अवसर पर उनके नाटक ‘अंधों का हाथी’ का शानदार मंचन किया गया। इस नाट्य प्रस्तुति को दर्शकों ने बेहद पसंद किया। इस नाटक में व्यंग्य की ऐसी धार है जो श्रोताओं को कभी विचलित करती है तो कभी वे सरकारी तंत्र के निकम्मेपन और राजनीति की असंवेदनशीलता पर तालियां भी बजाते हैं तथा इसके संवादों पर हंसते भी हैं।

इस नाटक का मुख्य पात्र सूत्रधार समस्या के रूप में हाथी को सामने लाता है ताकि पांच अंधे समस्या को समझें और उससे लोगों को मुक्ति दिलाएं। मगर ये अंधे अपने अंधत्व में पहले तो निकम्मे, आलसी, भ्रष्ट सरकारी तंत्र में और बाद में षड्यंत्रकारी राजनेता में तब्दील हो जाते हैं। ये अंधे दरअसल, कभी जनता तो कभी सरकारी मुलाजिमों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

सूत्रधार राष्ट्र का एक सजग नागरिक है। इसलिए अंधे समस्या को सुलझाने के बजाय उसकी हत्या कर देते हैं और उसे श्रद्धांजलि देते हैं। नाटक के अंत में सूत्रधार कहता है- “मैं मरा नहीं हूं। मैं कैसे मरूंगा। मैं तो सूत्रधार हूं। मैं इसी तरह हाथी का प्रसंग खड़ा करूंगा। हाथी को बार-बार स्टेज पर लाऊंगा और अनंत बार जन्म लेता रहूंगा, क्योंकि मैं सूत्रधार हूं।”

रंगकर्मी प्रज्ञा गान्ला के निर्देशन में ‘अंधों का हाथी’ की प्रस्तुति बहुत असरदार रही। सभी कलाकारों ने सशक्त अभिनय किया। उनका आपसी तालमेल भी सराहनीय था। चुटीले संवादों पर दर्शकों ने कई बार तालियां बजाईं। कुल मिलाकर शरद जोशी की स्मृति में रचनात्मकता की यह एक यादगार शाम थी। कार्यक्रम की शुरुआत में डॉ मधुबाला ने आयोजन की प्रस्तावना पेश की।

दिल्ली से पधारे व्यंग्य यात्रा के संपादक प्रेम जनमेजय ने बड़ी आत्मीयता से शरद जोशी के व्यक्तित्व और कृतित्व को याद किया। शरद जोशी के व्यंग्य की विशेषताओं को उजागर करने के साथ ही प्रेम जी ने इस तथ्य को भी रेखांकित किया कि कैसे शरद जोशी रिश्तों नातो को अहमियत देते थे। प्रेम जी ने शरद जोशी की रचनात्मकता पर केंद्रित किताब ‘व्यंग्य के नावक : शरद जोशी’ का परिचय भी श्रोताओं को दिया।

इसी तरह व्यंग्यकार सुभाष काबरा का व्यंग्य लेख “आप जाने के बाद ज़्यादा काम आ रहे हो शरद जी” काफ़ी दिलचस्प था। कार्यक्रम के संचालक देवमणि पांडेय ने शरद जोशी से जुड़े कुछ रोचक प्रसंग साझा किए। उन्होंने बताया कि मुम्बई के परिवार काव्य उत्सव में शरद जोशी हर साल आते थे और हर बार दो नई व्यंग्य रचनाएं सुनते थे। कार्यक्रम में पर्यावरण प्रेमी अफ़ज़ल खत्री और नुसरत खत्री के साथ रचनाकार जगत से कई रचनाकार पत्रकार मौजूद थे।

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