अंगने में मुंह जुठारने की परंपरा

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1961

आजकल गांव में होने वाली शादियों का भी शहरीकरण हो रहा है। हर रस्म का शहरीकरण होता जा रहा है और शहर से कई परंपराएं आयात की जा चुकी हैं। इसके बावजूद बारात की विदाई से पहले दूल्हे को अंगने में जाने की पंरपरा जस की तस विद्यमान है। वस्तुतः शादी के बाद जब दुल्हन की विदाई होती है, या होने वाली होती है तब दूल्हे को मुंह जुठारने के लिए अंगने में बुलाया जाता है। पूर्वांचल उत्तर प्रदेश में दूल्हे के मुंह जुठारने की परंपरा बहुत पुरानी है।

इस परंपरा के तहत दूल्हें को बलहे और अन्य क़रीबी बाराती नए-नए कपड़े पहन कर अंगने में आते थे। पहले तो अंगने के लिए दूल्हे के लिए पैंट शर्ट या सफारी सूट बनवाया जाता था। कई लोग तो अंगने में बैठने के लिए विशेष तैयारी करते थे। लेकिन आजकल लोग सूट पहनकर अंगने में आते हैं। बहरहाल, उन्हें मंडप में रखी चारपाई पर बिठा दिया जाता है। उसके सामने थाली में मुंह जूठा करने के लिए दही और शक्कर तथा दूल्हे को माथे पर चंदन लगाने का सामान रख दिया जाता है।

इसके बाद बेहद उल्लासमय एवं हँसी-मज़ाक के माहौल में कन्या पक्ष की महिलाएँ दूल्हे और उसके साथ आए लोगों को विभिन्न तरह के उपहारों से नवाज़ती हैं। इस दौरान गांव के बुजुर्ग और दूसरी महिलाएं गाली गाती थी। गांवों में गाली गाने की सदियों पुरानी बड़ी गौरवशाली परंपरा है। गाली की परंपरा को एक पैरा में समेटना इस रस्म के साथ न्याय नहीं करेगा। इसलिए इस सब्जेक्ट पर अलग से लिखने की ज़ररूत है।

1980 के दशक तक उपहार के रूप में रूमाल, पर्स, तौलिया, गुड़िया, कंघी, छोटा दर्पण और कैश रुपए दिए जाते थे। इसी दौरान सास, चाची, फुआ और मामी दूल्हे में माथे पर टीका लगाती थीं जबकि हम उम्र लड़कियां, ख़ासकर सालियां, सरहज और दुल्हन की सहेलियाँ दूल्हे को बहुत तंग करती थी और हास-परिहास के माहौल में कई लड़कियां तो सामने रखी दही को दूल्हे में मुंह में चपोर देती थीं। जैसे आजकल बर्थडे केक काटने पर बर्थडे बॉय या बर्थडे गर्ल के फेस पर केक लगा देते हैं।

पुराने ज़माने में सक्षम लोग अपनी बेटी शादी में दूल्हे को साइकिल, रेडियो, घड़ी, अंगूठी और चेन देते थे। जब दूल्हा अंगने में आता था तब ये सभी चीज़ें उसे दी जाती थी। मसलन, दूल्हन का भाई लाकर साइकल खड़ी कर देता था। तब साइकल का वही क्रेज़ था जो आजकल मोटरसाइकल का होता है। दुल्हन की भाभी या मां दूल्हे के गले में चेन डालती थी। इसी तरह बहुत क़रीबी संबंधी महिला दूल्हे को घड़ी पहनाती थी। दूसरी संबंधी महिला अंगूठी पहनाती थी। इसी तरह को लेकर दूल्हे के कंधे से रेडियो लटका देता था। जहां वर पक्ष के यहां बिजली लगी होती थी वहां दूल्हे को पंखे और आयरन जैसे इलेक्ट्रिकल सामान भी दिए जाते थे।

कन्या पक्ष की ओर से दूल्हे को इन तमाम वस्तुओं को देने के बाद दूल्हे से मुंह जुठारने का आग्रह किया जाता था। कभी-कभी दूल्हा कुछ और सामान की मांग को लेकर मुंह जूठारने से इनकार कर देता था। जब वह चीज़ उसे दी जाती थी तो वह मुंह जुठारता था। पुराने ज़माने में साइकल, रेडियो घड़ी, अंगूठी और चेन जैसे कीमती सामान देने की हैसियत औसत गांववासी की नहीं होती थी तो दूल्हा काफी मान-मनौव्वल के बाद ही मुंह जुठारता था। कभी-कभी अपेक्षित सामान न मिलने पर दूल्हा नाराज़ हो जाता था और कुछ सामान की ज़िद पकड़ लेता था। कई घटनाएं ऐसी भी प्रकाश में आती थीं, जब नाराज़ दूल्हा बिना मुंह जुठारे ही अंगने से वापस चला जाता था।

बहरहाल दूल्हे के अंगने में बैठने के दौरान कन्या की बहन या दूसरी लड़कियां उसके दोनों या एक जूता ग़ायब कर देती हैं। जूता चुराने की परंपरा आज भी वैसी ही है। लड़कियां जीजा जी का जूता चुराने की प्लानिंग पहले से ही कर लेती हैं। वे आपस में तय कर लेती हैं कि कौन जूता चुराने जाएगी और कौन उसे गुप्त जगह छिपाएगी और कौन पैसे के लिए बारगेनिंक करेगी। जूता ग़ायब होने पर इस पर भी बड़ी हंसी मज़ाक होता है, क्योंकि जूता चुराने वाली लड़कियां भारी-भरकम पैसे की मांग करती हैं। वहां भी बहुत मान-मनौव्वल होती है और पैसे देने के बाद दूल्हे को जूता वापस मिलता है।

जूता वापस मिलने के बाद दुल्हन की विदाई हो जाती है। सभी नम आँकों से बेटी को विदाई दी जाती है। विदाई की रस्म के बाद कन्यापक्ष के दरवाज़े पर दोनों ससुर अक्षत यानी हल्दी में रंगे चावल का आदान प्रदान करते हैं। उसके बाद प्रजा की विदाई होती थी और सबसे अंत में बारात की विदाई जहां कन्या पक्ष वाले नकद राशि देकर समधी और दूसरे लोगों से मिलते-जुलते हैं। इस तरह शादी की रस्म लगभग फ़ीसदी पूर्ण हो जाती है।

हरिगोविंद विश्वकर्मा

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