गलवान के बाद चीन की कुदृष्टि अब ब्रह्मपुत्र पर

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तिब्बत में महाबांध निर्माण के चीनी फ़ैसले से भारत, बांग्लादेश की सिरदर्द बढ़ा

हरिगोविंद विश्वकर्मा
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार सुनियोजित तरीक़े से भारत के लिए एक के बाद एक मुसीबत पैदा करने में जुटी हुई है। पहले लद्दाख के गलवान घाटी में घुसपैठ करके चार हज़ार वर्ग किलोमीटर भारतीय ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लिया और अब भारत और बांग्लादेश में बहने वाली ब्रह्मपुत्र जैसी अंतरराष्ट्रीय नदी पर तिब्बत में दुनिया के सबसे बड़े बांध बनाने का एकतरफ़ा फैसला करके नई दिल्ली के साथ साथ ढाका को भी चिंता में डालने की कोशिश कर रहा है। हालांकि भारत ने भी ब्रह्मपुत्र पर बांध की बनाने की प्रक्रिया शुरू करके अपने पड़ोसी को कड़ा संदेश दिया है।

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प्रस्तावित सुपर डैम से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के साथ साथ पूरे बांग्लादेश में भी कभी महाबाढ़ तो कभी जलापूर्ति का गंभीर संकट खड़ा हो सकता है। मेगाडैम परियोजना भारत में ब्रह्मपुत्र के रूप में जानी जाने वाली यारलुंग त्संगपो नदी पर की घोषणा नवंबर में की गई थी। बांध निर्माण की ज़िम्मेदारी चीन की प्रमुख विद्युत कंपनी पावर कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन ऑफ़ चाइना को सौंपी गई है। हालांकि अभी तक निर्माण कार्य शुरू नहीं किया गया है, लेकिन 2021 में ही इस परियोजना पर काम शुरू होने वाला है।

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भारत में विश्लेषकों का मानना है कि इस बांध अस्तित्व में आने के बाद भारत और बांग्लादेश के सामने महाबाढ़ के साथ-साथ महा जल संकट का ख़तरा पैदा हो सकता है। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय पर चीन की भारी सैन्य सीमा जमावड़े के बाद यह बांध निश्चित रूप से बीजिंग को रणनीतिक लाभ देगा, क्योंकि दोनों देशों के बीच हिमालयन पहाड़ों में विवादित सीमाओं को लेकर गंभीर मतभेद चल रहा है। प्रस्तावित बांध का निर्माण पूर्वोत्तर भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश, जिसे बीजिंग दक्षिण तिब्बत का हिस्सा बताते हुए दावा करता है, की सीमा के बहुत क़रीब ब्रह्मपुत्र नदी पर होने जा रहा है। चीनी की मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यह बांध, दुनिया के सबसे बड़े बांध थ्री गोरज डैम जो चीन की ही यांग्त्ज़ी नदी पर बना है, से आकार का लगभग तीन गुना होगा और यहां 60 गीगावाट बिजली पैदा होगी।

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नई दिल्ली में मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस के विशेषज्ञ जगन्नाथ पांडा के अनुसार, “भारत की चिंता चीन की बांध जैसी परियोजना शुरू करने की एकतरफा कार्रवाई है, क्योंकि यह चीन की ब्रह्मपुत्र जैसी अंतरराष्ट्रीय नदी में पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने की कोशिश है। दरअसल, इस परियोजना का आरंभ ऐसे समय में किया जा रहा है, जब गलवान घाटी में सीमा विवाद और सैन्य गतिरोध के चलते चीन के भारत के साथ संबंध पहले से ही ख़राब है। चीनी भारत पर दबाव बनाने के लिए सीमा विवादों को पानी के मुद्दों के साथ जोड़ने की कोशिश कर रहा है।”

दूसरी ओर चीनी के सरकारी अख़बार ‘ग्लोबल टाइम्स’ को दिए एक इंटरव्यू में पावर कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन ऑफ चाइना के अध्यक्ष यांग जियोंग ने कहा कि कि चीन यारलुंग ज़ंग्बो नदी (ब्रह्मपुत्र का तिब्बती नाम) के निचले हिस्से में जलविद्युत उपयोग परियोजना शुरू करेगा। ब्रह्मपुत्र पर बांध बनाने की घोषणा को “ऐतिहासिक अवसर” करार देते हुए कहा है कि इस परियोजना के पूरा करने के बाद बीजिंग अपने स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को पूर्ण करने और जल सुरक्षा को मजबूत करने में सफल होगा।

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नई दिल्ली में सैन्य विशेषज्ञ, हालांकि, यह रेखांकित करते हैं कि सीमा के क़रीब इस बांध का निर्माण भारत के लिए गंभीर सीमा विवाद के रूप में सामने आएगा जिससे भारतीय क्षेत्र की सुरक्षा पर भी प्रभाव पड़ सकता है। नई दिल्ली में एक थिंक टैंक दिल्ली पॉलिसी ग्रुप के ब्रिगेडियर अरुण सहगल का कहना है, “ज़हिर है चीन इस तरह की बहुत बड़ी परियोजना बनाने के बाद वहां वहां एयर विपन सिस्टम को तैनात करेगा और सड़क निर्माण के अलावा वहां नया टाउनशिप का विकास करेगा।”

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ब्रिगेडियर अरुण सहगल ने कहा, “अगर आप इस तरह के विकास परियोजना सटी हुई सीमा के पास लाते हैं, तो यह ख़तरे का सिग्नल है और भारत को जवाबी कार्रवाई के लिए विवश करेगी।” दूसरी ओर नई दिल्ली में चीनी दूतावास ने परियोजना के बारे में भारत की चिंताओं को ख़ारिज़ करते हुए कहा है कि यह विकास परियोजना “प्रारंभिक योजना और प्रदर्शन” चरण में है। चीनी दूतावास ने बयान जारी करके कहा है कि चीन ने हमेशा “सीमा पार नदियों के विकास और उपयोग के लिए जिम्मेदार रवैया अपनाता रहा है।”

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दरअसल, भारत और चीन के बीच जल-बंटवारे को लेकर कोई भी औपचारिक संधि नहीं है। फ़िलहाल दोनों पड़ोसी देशों के बीच जल प्रवाह पर डेटा साझा करने पर एक समझौता भर है। इसी का फ़ायदा उठाकर चीन पहले ही यारलुंग त्सांगपो नदी पर दर्जन भर छोटे और मध्यम आकार के बांध का निर्माण कर चुका है। जानकारों का मानना है कि इस मुद्दे पर कोई भी बयानबाजी मदद नहीं करेगी, क्योंकि बीजिंग ने पूर्वोत्तर राज्यों में बांढ के पूर्वानुमान को लेकर कभी भी किसी तरह का हाइड्रोलॉजिकल डेटा नई दिल्ली के साथ शेयर नहीं किया है। सीमाओं को लेकर दोनों देशों के बीच 2017 से ही तनावपूर्ण सैन्य गतिरोध बना हुआ है। इस बांध के ज़रिए चीन ब्रह्मपुत्र के जरिए रणनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर सकता है।

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हालांकि सुपरडैम की परियोजना के बारे में चीनी की ताजी घोषणा के बाद केंद्रीय जल मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी टीएस मेहरा ने कहा था कि भारत भी ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनाने की परियोजना को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है। इस परियोजना में 10 गीगावाट बिजली पैदा करने की क्षमता होगी। यह परियोजना चीन के जल विद्युत परियोजना के प्रभाव को कम करने में मदद करेगी। उधर जुलाई में ऑस्ट्रेलिया के लोवी इंस्टीट्यूट द्वारा प्रकाशित एक लेख में कहा गया था कि भारत को यह आकलन करने की आवश्यकता है कि ब्रह्मपुत्र के मामले चीन अपर रिपेरियन स्टेट होने के नाते कैसे इसे “हथियार” के रूप में इस्तेमाल कर सकता है।

चीनी की इस प्रस्तावित परियोजना के चलते बांग्लादेश का भी सिरदर्द बढ़ गया है। बांग्लादेश के जानकारों का मानना है कि इस परियोजना से भारत की तुलना में बांग्लादेश बहुत अधिक प्रभावित हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि योजनाबद्ध बांध भविष्य में ब्रह्मपुत्र के प्रवाह को प्रभावित करेगा, जिसका असर घनी आबादी वाले क्षेत्रों में आजीविका और कृषि पर होगा। इसीलिए परियोजना के आगे बढ़ने से पहले भारत और बांग्लादेश जैसे निचले क्षेत्र के देशों के साथ विचार-विमर्श की ज़रूरत है।

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ढाका में पर्यावरण और भौगोलिक सूचना सेवा केंद्र के कार्यकारी निदेशक मलिक फ़िदा खान का कहना है कि गर्मी और सूखे के मौसम में ब्रह्मपुत्र नदी बांग्लादेश में जल उपलब्ध कराकर सबसे महत्वपूर्ण योगदान देती रही है। चीन का सुपरबांध न सिर्फ़ पानी के प्रवाह की मात्रा को प्रभावित करेगा, बल्कि पर्यावरण को भी गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। इससे नदी के साथ आने वाले पोषक तत्वों को नियंत्रित करके भारत और बांग्लादेश में पर्यावरण पर प्रतिकूल असर डाला जाएगा। दरअसल, दक्षिण पूर्व एशिया में क्षेत्रीय तनावों पैदा करने के लिए चीन में यह पहली पनबिजली परियोजना नहीं है। इससे पहले भी चीन पर मेकांग नदी पर बांधों की श्रृंखला बनाकर नही के प्रवाह को प्रभावित करने के आरोप लगते रहे हैं। हालांकि बीजिंग इन आरोपों को ख़ारिज़ करता रहा है।

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