तेल देखो तेल की मार देखो

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सरोज कुमार

पुरानी कहावत है तेल देखो, तेल की धार देखो। लेकिन आज इसमें ‘धार’ की जगह मार लिखना अधिक प्रासंगिक है। तेल की धार की मार से आज हर कोई त्राहि-त्राहि कर रहा है। तेल यानी ईंधन, और आज ईंधन का संबंध अर्थ-व्यवस्था से कुछ उसी तरह है, जिस तरह दिल की धड़कन का संबंध आक्सीजन से है। भारत एक विकासशील अर्थ-व्यवस्था है और साथ ही दुनिया का तीसरा सर्वाधिक ईंधन खपत करने वाला देश। लेकिन भारत अपनी खपत का ज़्यादातर हिस्सा आयात करता है। इसलिए ईंधन की क़ीमत अर्थ-व्यवस्था को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। कोरोना महामारी की दूसरी लहर ने अर्थ-व्यवस्था को पहले से ही बुरी तरह प्रभावित कर रखा है, और इसके जल्द पटरी पर लौटने की उम्मीद धूमिल हो गई है। ईंधन मूल्य में तेज़ी इस धुंध को और गहरा बना रही है।

ईंधन की क़ीमत बढ़ने से परिवहन और विनिर्माण लागत बढ़ती है और परिणामस्वरूप महंगाई। वाहनों की बिक्री घटती है, और इससे अर्थ-व्यवस्था के दूसरे क्षेत्र भी प्रभावित होते हैं, क्योंकि वाहन उद्योग रोज़गार मुहैया कराने वाला एक प्रमुख क्षेत्र है। इसका बड़ा ख़ामियाज़ा आम जनता को भुगतना पड़ता है। फिलहाल ईंधन की क़ीमत घटने की उम्मीद कम है, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत में तेज़ी का रुख है, और दुनिया के कई तेल आयातक देशों में मांग बढ़ने के कारण इस रुख के आगे भी बने रहने का अनुमान है।

हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव ख़त्म होने के बाद पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में वृद्धि का सिलसिला फिर से शुरू हुआ है। सरकारी तेल विपणन कंपनियां क़ीमत की दैनिक समीक्षा के साथ उसमें संशोधन करती हैं। मई माह में ही अबतक दर्जन भर से अधिक बार पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें बढ़ चुकी हैं और कई शहरों में पेट्रोल 100 रुपए प्रति लीटर के पार जा चुका है। इसकी वजह अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत में वृद्धि बताई जा रही है। बेशक कच्चे तेल की क़ीमत में इस समय तेज़ी का रुख है, लेकिन जब क़ीमत बिल्कुल नीचे आ गई थी तब उसका लाभ आम उपभोक्ताओं को देने के बदले सरकार ने उत्पाद शुल्क बढ़ाकर मुनाफ़ा अपनी जेब में रख लिए थे। अब कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ने पर भी सरकार उत्पाद शुल्क घटाने को तैयार नहीं है। जबकि चालू वित्त वर्ष के शुरुआत में यदि सरकार उत्पाद शुल्क साढ़े आठ रुपए प्रति लीटर घटा देती तो भी 2021-22 के 3.2 लाख करोड़ रुपए के बजट अनुमान का लक्ष्य पूरा हो जाता। उत्पाद शुल्क की मौजूदा दर से सरकार को 4.35 लाख करोड़ रुपए की कमाई हो सकती है।

पेट्रोल-डीज़ल पर केंद्र के साथ ही राज्य सरकारें भी मूल्यवर्द्धित कर यानी वैट वसूलती हैं। मौजूदा समय में पेट्रोल की कुल क़ीमत का लगभग 63 फ़ीसदी हिस्सा केंद्र और राज्य के कर का है। इसी तरह डीज़ल पर दोनों कर का हिस्सा क़ीमत का लगभग 60 फ़ीसदी है। महामारी के कारण लोगों की कमाई घट गई है। अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार, देश की 23 करोड़ आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे चली गई है, जिसकी कमाई 375 रुपए की न्यूनतम दैनिक दिहाड़ी से भी कम रह गई है। ऐसे में पेट्रोल-डीज़ल की ऊंची क़ीमतें लोगों की जेब के साथ उनके दिल भी जला रही हैं। ऊंची ईंधन क़ीमत की जो परिस्थिति बन रही है, वह अर्थ-व्यवस्था को किसी भी हाल में ऊंचाई पर नहीं ले जाने वाली है।

अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत लगातार बढ़ रही है। दुनिया के कई प्रमुख तेल आयातक देशों में कोरोना का टीका आने के कारण आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं, जिसके कारण मांग बढ़ रही है। दूसरी ओर सऊदी अरब ने अमेरिका और एशिया के लिए कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ा दी है, और ओपेक देशों ने भी बाज़ार में तेज़ी के मकसद से तेल का उत्पादन थाम रखा है। इसके अलावा ईरान पर से अमेरिकी प्रतिबंध उठाए जाने को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। इन सबके कारण कच्चे तेल की क़ीमत में तेज़ी का रुख है और इस रुख के आगे भी बने रहने का अनुमान है।

कच्चे तेल की क़ीमत यदि मांग के कारण बढ़ती है, तो इसे अर्थ-व्यवस्था के लिए बुरा नहीं माना जाता, लेकिन क़ीमत में वृद्धि यदि आपूर्ति की बाधाओं के कारण होती है, तो यह अर्थ-व्यवस्था के लिए अच्छा नहीं माना जाता है। फिलहाल कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ने के पीछे दोनों ही कारण हैं, और भारतीय अर्थ-व्यवस्था के लिए यह स्थिति अच्छी नहीं है। कच्चे तेल की क़ीमत बढ़ने से आयात बिल बढ़ता है और इससे राजकोषीय घाटा और चालू खाता घाटा चौड़ा हो़ता है। भारत कच्चे तेल की अपनी जरूरत के लिए चूंकि ज़्यादातर आयात पर निर्भर है, लिहाजा क़ीमत में मामूली वृद्धि भी खजाने पर बड़ा असर डालती है।

यह अलग बात है कि कोरोना काल में देशव्यापी बंदी के कारण वित्त वर्ष 2020-21 में ईंधन खपत 9.1 फ़ीसदी नीचे चली गई थी, लेकिन इसी वित्त वर्ष में बंदी समाप्त होने के बाद दिसंबर 2020 में कच्चा तेल आयात तीन साल के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गया था और यह पचास लाख बैरल प्रति दिन था। तेल मंत्रालय का अनुमान है कि मौजूदा वित्त वर्ष में ईंधन की खपत लगभग 10 फ़ीसदी बढ़ेगी, जो 2152.4 लाख टन हो सकती है, जबकि वित्त वर्ष 2020-21 में खपत 1959.4 लाख टन थी। यदि कच्चे तेल की क़ीमत 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ती है तो चालू खाता घाटा लगभग 10 अरब डॉलर बढ़ जाता है। कच्चे तेल की क़ीमत में वृद्धि का असर जीडीपी पर भी पड़ता है। प्रत्येक 10 डॉलर की वृद्धि पर जीडीपी 0.5 फ़ीसदी घट जाती है।

भारत एक विकासशील अर्थ-व्यवस्था है, और अमेरिका, चीन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे अधिक ईंधन खपत करने वाला देश। लेकिन यहां ईंधन के स्रोत नहीं हैं। खपत का 84-86 फ़ीसदी हिस्सा आयात किया जाता है। वर्ष 2013 और 2015 के बीच कच्चे तेल की क़ीमत में भारी गिरावट का भारत को भारी लाभ हुआ था। वित्त वर्ष 2014 और 2016 के बीच राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.6 फ़ीसदी घट गया था। वर्ष 2015 में कच्चे तेल की क़ीमत 2014 के 93.17 डॉलर प्रति बैरल से घटकर 48.66 डॉलर प्रति बैरल हो गई थी। साल 2016 में यह और नीचे गई और क़ीमत 43.29 डॉलर प्रति बैरल हो गई।

लेकिन 2017 में कच्चे तेल में तेज़ी का रुख शुरू हुआ और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में तेल की क़ीमत 50.80 डॉलर प्रति बैरल हो गई। उसके बाद से वृद्धि का रुझान बना हुआ है। साल 2018 में कच्चा तेल 65.23 डॉलर प्रति बैरल हो गया और इसी साल एक समय तो क़ीमत 2014 से अबतक के सर्वोच्च स्तर 77.41 डॉलर तक चढ़ गई। हालांकि 2019 में थोड़ा सुधार हुआ और क़ीमत 56.99 डॉलर प्रति बैरल रही। महामारी की पहली लहर के दौरान वैश्विक बंदी के कारण जब सारी आर्थिक गतिविधियां बंद थीं तब कच्चे तेल की क़ीमत भी पेंदी में पहुंच गई थी।

साल 2020 में कच्चा तेल औसतन 39.68 डॉलर प्रति बैरल था और बंदी की अवधि के दौरान तो यह 11 डॉलर प्रति बैरल तक टूट गया था। लेकिन तेल की क़ीमत में इस गिरावट का लाभ आम जनता की जेब में नहीं गया। सरकार ने उस दौरान मार्च से मई के बीच दो बार में पेट्रोल पर 13 रुपए और डीज़ल पर 16 रुपए उत्पाद शुल्क बढ़ाकर पूरा लाभ अपनी जेब में रख लिए थे। यदि उत्पाद शुल्क नहीं बढ़ाया गया होता तो आज आम उपभोक्ता थोड़ी राहत में होता। अभी भी सरकार उत्पाद शुल्क घटाने के मूड में नहीं है। मौजूदा समय में पेट्रोल पर 32.9 रुपए और डीज़ल पर 31.8 रुपए प्रति लीटर उत्पाद शुल्क है। राज्यों का कर अलग से है।

अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (ईआईए) के नवीनतम अल्पकालिक ऊर्जा परिदृश्य के अनुमान बताते हैं कि 2021 में कच्चे तेल की क़ीमत औसतन 60.67 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है। इस लिहाज से 2021 में भारत को कच्चे तेल के लिए प्रति बैरल लगभग 21 डॉलर अतिरिक्त खर्चने होंगे। इससे चालू खाता घाटा में 20 अरब डॉलर से अधिक की वृद्धि हो जाएगी और जीडीपी लगभग एक फीसदी से अधिक घट जाएगा। यह देश की आर्थिक सेहत के लिए ठीक नहीं है। जीडीपी में गिरावट का सबसे ज़्यादा ख़ामियाज़ा ग़रीबों को भुगतना पड़ता है, क्योंकि भारत एक ऐसा समाज है, जहां असमानता की खाईं आज भी बहुत चौड़ी है।

वार्षिक जीडीपी दर में एक फ़ीसदी गिरावट का अर्थ होता है प्रति व्यक्ति मासिक आय में 105 रुपए की कमी। जिस देश में किसानों को 500 रुपए देना भी सम्मान की बात है, और जहां अतिरिक्त 23 करोड़ लोगों की कमाई घटकर 375 रुपए की न्यूनतम दिहाड़ी से भी नीचे चली गई है, वहां मासिक आमदनी में अब और 105 रुपए की कमी का क्या अर्थ है, इसकी गवाही आने वाले समय में अर्थ-व्यवस्था ही देगी। ईंधन क़ीमतों में उछाल अर्थ-व्यवस्था के लिए किसी भूचाल से कम नहीं है, और रुपए का अवमूल्यन उसमें नए मूल्य जोड़ेगा।

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(वरिष्ठ पत्रकार सरोज कुमार इन दिनों स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।)