इंदिरा गांधी का वह फैसला जिसे लोग नहीं जानते…

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देश की पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (India Gandhi) आम जनता के बीच इस कदर लोकप्रिय थीं जिसकी कोई सीमा ना थी। यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि इंदिरा गांधी वाकई भारत आयरन लेडी थीं। सही मायने में उन्होंने ही ‘गरीबी हटाओ’ के नारे को फलीभूत किया था। इंदिरा गांधी के 1971 में लिए गए साहसिक और ऐतिहासिक फैसले की चर्चा हर कोई करता है, क्योंकि ऑपरेशन ट्राइडेंट ने इंदिरा गांधी को इतिहास में अमर ही नहीं किया बल्कि आयरन लेडी बना दिया था। आज भी जब 1971 युद्ध का जिक्र होता है तो हर भारतीय गर्व से पाकिस्तान से कहता है कि उस युद्ध में हमने तुम्हें झुकने पर मजबूर कर दिया था।

लेकिन इंदिरा गांधी ने राष्ट्रहित में एक और फैसला लिया था जिसकी चर्चा या तो नहीं होती और होती भी है तो बहुत कम। फरवरी 1984 में इंदिरा गांधी ने वह फैसला लिया था जिसे कोई दूसरा प्रधानमंत्री (शायद नरेंद्र मोदी भी) नहीं ले पाता। इंदिरा गांधी का वह फैसला था आतंकवादियों की कोई बात नहीं मानने का। दरअसल, भारतीय राजनयिक रवींद्र म्हात्रे की तीन फरवरी 1984 को ब्रिटेन में सक्रिय जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के सहयोगी संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन आर्मी के आतंकवादियों ने बर्मिंघम में अपहृत कर लिया। हुआ यह था कि तत्कालीन उच्चायुक्त डॉ. सईद मोहम्मद के विदाई समारोह के बाद सह-उच्चायुक्त म्हात्रे हमेशा की तरह शाम पांच बजे ऑफ़िस से दो किलोमीटर दूर बारटले ग्रीन इलाके में स्थित अपने घर के लिए निकले। उस दिन शुक्रवार था और अगले दिन उनकी बेटी आशा का 14वां जन्मदिन था, जिसकी तैयारी उन्हें करनी थी। लिहाज़ा, रास्ते में केक लेते हुए जैसे ही घर के सामने बस से उतरे थे, आतंकियों ने गनपॉइंट पर उन्हें अपनी कार में बिठा लिया।

जब म्हात्रे सात बजे तक घर नहीं पहुंचे तो पत्नी डॉ. शोभा पठारे-म्हात्रे परेशान होने लगीं। दफ़्तर फोन लगाया, पर कोई जवाब नहीं मिला। फिर शोभा ने बर्मिंघम महावाणिज्य दूतावास के प्रभारी डिप्टी कमिश्नर बलदेव कोहली जो उस समय लंदन में थे को फोन लगाया। कोहली भी हैरान हुए, क्योंकि म्हात्रे अमूमन साढ़े पांच बजे तक घर पहुंच जाते थे। जब 9 बजे तक उनका सुराग नहीं मिला तो कोहली ने बर्मिंघम पुलिस को सूचना दे दी। शनिवार की सुबह किसी अज्ञात व्यक्ति ने न्यूज़ एजेंसी रॉयटर के दफ़्तर में जम्मू-कश्मीर लिबरेशन आर्मी का टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में हाथ से लिखा पत्र ड्रॉप कर दिया। जिसमें दावा किया गया था कि म्हात्रे को अगवा किया गया है। म्हात्रे को छोड़ने के बदले आतंकवादियों ने उसी दिन शाम 7 बजे तक भारत के सामने जेल में बंद आतंकवादी मक़बूल भट की रिहाई और दस लाख ब्रिटिश पाउंड की मांग रखी। लेटर पर कोई नाम पता या फोन नंबर नहीं था, लिहाज़ा, रॉयटर के संपादक ने ख़बर चलाने से पहले स्कॉटलैंड यार्ड को सूचना दी। जहां म्हात्रे के ग़ायब होने की शिकायत दर्ज थी।

अपहरणकर्ताओं ने जेकेएलएफ से जुड़े आज़ाद कश्मीर के पैरोकार ज़ुबैर अंसारी को भी फोन किया और उनसे भारत के साथ मक़बूल की रिहाई के लिए वार्ता करने की अपील की गई। अंसारी ने अपहर्ताओं से समय सीमा रात 10 बजे तक बढ़ाने की अपील की, जिसे मान लिया गया। अंसारी ने स्कॉटलैंड यार्ड को सूचित कर दिया, जिससे उनका फोन सर्विलॉन्स पर रख दिया गया। भारत को भी घटना से अवगत करा दिया गया। उस समय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी गुवाहाटी के दौरे पर निकल चुकी थीं। विदेश मंत्रालय में वरिष्ठतम अधिकारी रोमेश भंडारी और विदेश सचिव एमके रसगोत्रा ने इंदिरा गांधी से संपर्क करने की कोशिश की, परंतु विमान आसमान में था। आईबी और रॉ के प्रमुख आरएन कॉव और प्रिंसिपल सचिव पीसी अलेक्ज़ेंडर को भी सूचित कर दिया गया था। सवा चार बजे जैसे ही विमान ने लैंड किया, इंदिरा को सूचित कर दिया गया।

ब्रिटेन से पहले बांग्लादेश और ईरान में राजनयिक रहे म्हात्रे की जीवन इंडियन एयरलाइंस के विमान सी-814 में सवार यात्रियों के जीवन से कम महत्वपूर्ण नहीं था। सन् 1999 में सी-814 में सवार यात्रियों की जान बचाने के लिए प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने अपने विदेश मंत्री जसवंत सिंह को जैश-ए-मोहम्मद चीफ़ मौलाना मसूद अज़हर, अहमद सईद शेख और मुश्ताक़ अहमद ज़रगर जैसे ख़तरनाक आतंकवादियों को लेकर कंधार भेजा था। अटल सरकार ने आतंकवाद के आगे भले घुटने टेक दिया था लेकिन आतंकवाद की शरणस्थली बने स्वर्ण मंदिर में सेना भेजने का साहस करने वाली इंदिरा ने दहशतगर्दों के आगे झुकने से साफ़ इनकार कर दिया। इंदिरा ने कहा कि न तो मक़बूल को रिहा जाएगा न ही भारत आतंकियों से कोई बातचीत करेगा। नतीजतन छह फरवरी को आतंकियों ने म्हात्रे की हत्या करके शव बर्मिघंम शहर से 40 किलोमीटर दूर लीसेस्टरशायर के हिंकली में हाइवे के किनारे फेंक दिया। म्हात्रे के सिर में दो गोली मारी गई थी।

बहरहाल, उसी दिन इंदिरा की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट की आपात बैठक हुई, जिसमें वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी, गृहमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी, रक्षामंत्री आर वेंकटरमन और विदेश मंत्री पीवी नरसिंह राव मौजूद थे। कैबिनेट ने राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से मक़बूल की दया याचना नामंजूर करने की सिफ़ारिश की, ताकि उसे जल्दी से जल्दी फांसी पर लटकाया जा सके। राष्ट्रपति कोलकाता प्रवास पर थे। लिहाज़ा, एक अधिकारी कैबिनेट प्रस्ताव लेकर उनके पास गया और जैलसिंह ने फ़ौरन मर्सी पिटीशन को रिजेक्ट कर दिया। गृह मंत्रालय के अफ़सर पीपी नैयर को ब्लैक वारंट लेने और मक़बूल भट की फांसी में आने वाली किसी भी संभावित बाधा को दूर करने के लिए जम्मू-कश्मीर भेजा गया। बहरहाल, म्हात्रे की हत्या के छह दिन बाद 11 फरवरी 1984 को मकबूल भट को तिहाड़ जेल में फ़ांसी पर लटका दिया गया और उसके शव को जेल में ही अज्ञात जगह दफ़ना दिया गया।

इंदिरा को एहसास था कि म्हात्रे की जान उनके कारण ही गई, लेकिन उन्होंने व्यापक राष्ट्रीय हित में मक़बूल को न छोड़ने का फ़ैसला किया था। घर में प्यार से दादा पुकारे जाने वाले रवींद्र के बूढ़े माता-पिता मुंबई के विक्रोली में छोटे बेटे अविनाश को साथ रहते थे। इंदिरा दूसरे दिन मुंबई गईं और एयरपोर्ट से सीधे म्हात्रे के घर गईं। प्रधानमंत्री को देख 75 वर्षीय पिता हरेश्वर म्हात्रे और 74 वर्षीय माता ताराबाई फूट-फूट कर रोने लगे। इंदिरा उनके हाथ पांच मिनट हाथ मे लेकर बैठी रहीं और सांत्वना देती। इंदिरा गांधी ने साफ़-साफ़ कहा, “मैं ख़ुद एक मां हूं, इसलिए आपका दर्द समझ सकती हूं। आपके बेटे की जान मेरे कारण ही गई, लेकिन मेरे लिए राष्ट्रहित ऊपर था, जिसके लिए रवींद्र को जान गंवानी पड़ी। इसके लिए मैं दोषी हूं और आपसे क्षमा मांगती हूं।” इंदिरा गांधी और कहीं नहीं गईं और सीधे हवाई अड्डे से दिल्ली वापस आ गईं।

आजादी की लड़ाई का नेतृत्व करने वालों में शामिल पं. जवाहर लाल नेहरू के यहां 19 नवंबर, 1917 को जन्मी इंदिरा बचपन से ही होनहार थीं। उन्होंने इकोले नौवेल्ले, बेक्स (स्विट्जरलैंड), इकोले इंटरनेशनेल, जिनेवा, पूना और बंबई में स्थित प्यूपिल्स ओन स्कूल, बैडमिंटन स्कूल, ब्रिस्टल, विश्व भारती, शांति निकेतन और समरविले कॉलेज, ऑक्सफोर्ड जैसे प्रमुख संस्थानों से शिक्षा प्राप्त की। उन्हें विश्व भर के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया था। प्रभावशाली शैक्षिक पृष्ठभूमि के कारण उन्हें कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा विशेष योग्यता प्रमाण दिया गया। इंदिरा गांधी ने पिता नेरू से ही राजनीति का ककहरा सीखा। शुरू से ही स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहीं। मात्र ग्यारह साल की उम्र में उन्होंने ब्रिटिश शासन का विरोध करने के लिए बच्चों की वानर सेना बनाई। बचपन में उन्होंने ‘बाल चरखा संघ’ की स्थापना की और असहयोग आंदोलन के दौरान कांग्रेस पार्टी की सहायता के लिए 1930 में बच्चों के सहयोग से ‘वानर सेना’ का निर्माण किया। सितम्बर 1942 में उन्हें जेल में डाल दिया गया। 1947 में इन्होंने गांधी जी के मार्गदर्शन में दिल्ली के दंगा प्रभावित क्षेत्रों में कार्य किया।


1938 में वह औपचारिक तौर पर इंडियन नेशनल कांग्रेस का सक्रिय सदस्य बन गईं। उन्होंने 26 मार्च 1942 को फ़िरोज़ गांधी से विवाह किया। राजीव गांधी और संजय गांधी की मां इंदिरा गांधी 1955 में कांग्रेस कार्य समिति और केंद्रीय चुनाव समिति की सदस्य बनी। 1958 में उन्हें कांग्रेस के केंद्रीय संसदीय बोर्ड के सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया।वे एआईसीसी के राष्ट्रीय एकता परिषद की उपाध्यक्ष और 1956 में अखिल भारतीय युवा कांग्रेस और एआईसीसी महिला विभाग की अध्यक्ष बनीं।वे वर्ष 1959 से 1960 तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं। जनवरी 1978 में उन्होंने फिर से यह पद ग्रहण किया।

1947 से 1964 तक प्रधानमंत्री पिता पं. नेहरू के साथ काम किया। ऐसा भी कहा जाता था कि वह उस वक्त प्रधानमंत्री नेहरू की निजी सचिव की तरह काम करती थीं, हालाकि इसका कोई आधिकारिक ब्यौरा नहीं मिलता। बहरहाल, नेहरू के निधन के बाद कांग्रेस में इंदिरा का ग्राफ अचानक बहुत ऊपर पहुंच गया। लोग उनमें पार्टी एवं देश का नेता देखने लगे। वह सबसे पहले लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में 1966-1964 तक सूचना और प्रसारण मंत्री रहीं। शास्त्री जी के निधन के बाद 1966 में वह देश की प्रधानमंत्री बनीं। इस पद पर जनवरी 1966 से मार्च 1977 तक रहीं। जनवरी 1980 से वह योजना आयोग की अध्यक्ष रहीं। 14 जनवरी 1980 में वे फिर से प्रधानमंत्री बनीं। एक समय ‘गूंगी गुडिया’ कही जाने वाली इंदिरा गांधी तत्कालीन राजघरानों के प्रिवी पर्स को समाप्त कराने को लेकर उठे तमाम विवाद के बावजूद तत्संबंधी प्रस्ताव को पारित कराने में सफलता हासिल करने, बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने जैसा साहसिक फैसला लेने में सफल होने के बाद बहुत तेजी से भारतीय राजनीति के आकाश पर छा गईं। विभिन्न विषयों में रुचि रखने वाली इंदिरा जीवन को एक सतत प्रक्रिया के रूप में देखती थीं जिसमें कार्य एवं रुचि इसके विभिन्न पहलू हैं जिन्हें किसी खंड में अलग नहीं किया जा सकता या न ही अलग-अलग श्रेणियों में रखा जा सकता है।

इंदिरा गांधी पर भ्रष्टाचार के कई आरोप साबित हो चुके थे इसीलिए 12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनके लोकसभा चुनाव को रद्द कर दिया। उन्हें कुर्सी छोड़ने और छह साल तक चुनाव ना लड़ने का निर्देश मिला, लेकिन इंदिरा गांधी ने अपनी ताकतवर छवि और गर्म मिजाज दिमाग से आपातकाल का रास्ता निकाला। 25 जून, 1975 को इंदिरा ने संविधान की धारा- 352 के प्रावधानानुसार आपातकालीन स्थिति की घोषणा कर दी। यह ऐसा समय था जब हर तरफ सिर्फ इंदिरा ही नजर आ रही थीं। वर्ष 1975 में आपातकाल लागू करने का फैसला करने से पहले भारतीय राजनीति एक ध्रुवीय सी हो गई थी जिसमें चारों तरफ इंदिरा ही इंदिरा नजर आती थीं। उनकी ऐतिहासिक कामयाबियों के चलते उस समय देश में ‘इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा’ का नारा जोर शोर से गूंजने लगा।

इंदिरा गांधी कमला नेहरू स्मृति अस्पताल, गांधी स्मारक निधि और कस्तूरबा गांधी स्मृति न्यास जैसे संगठनों और संस्थानों से जुडी हुई थीं। वे स्वराज भवन न्यास की अध्यक्ष थीं। 1955 में वह बाल सहयोग, बाल भवन बोर्ड और बच्चों के राष्ट्रीय संग्रहालय के साथ जुड़ीं।श्रीमती गांधी ने इलाहाबाद में कमला नेहरू विद्यालय की स्थापना की थी।वह 1966-77 में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय और पूर्वोत्तर विश्वविद्यालय जैसी कुछ बड़ी संस्थानों के साथ जुडी रहीं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय न्यायालय, 1960-64 में यूनेस्को के भारतीय प्रतिनिधिमंडल, 1960-1964 में यूनेस्को के कार्यकारी बोर्ड और 1962 में राष्ट्रीय रक्षा परिषद के सदस्य के रूप में कार्य किया। वह संगीत नाटक अकादमी, राष्ट्रीय एकता परिषद, हिमालयन पर्वतारोहण संस्थान,दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, नेहरू स्मारक संग्रहालय, पुस्तकालय समाज और जवाहर लाल नेहरू स्मृति निधि के साथ जुडी रहीं। अगस्त 1964 से फ़रवरी 1967 तक गांधी राज्य सभा की सदस्य रहीं। वह चौथे, पांचवें और छठे सत्र में लोकसभा की सदस्य थी। जनवरी 1980 में उन्हें रायबरेली (उत्तर प्रदेश) और मेडक (आंध्र प्रदेश) से सातवीं लोकसभा के लिए चुना गया। इन्होंने रायबरेली की सीट का परित्याग कर मेडक में प्राप्त सीट का चयन किया। उन्हें 1967-77 में और फिर जनवरी 1980 में कांग्रेस संसदीय दल के नेता के रूप में चुना गया था।

इंदिरा गांधी ने जीवन में कई उपलब्धियां प्राप्त की। उन्हें 1972 में भारत रत्न पुरस्कार, 1972 में बांग्लादेश की आज़ादी के लिए मैक्सिकन अकादमी पुरस्कार और 1976 में नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा साहित्य वाचस्पति (हिंदी) पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1953 में उन्हेंको अमरीका ने मदर पुरस्कार, कूटनीति में उत्कृष्ट कार्य के लिए इटली ने इसाबेला डी ‘एस्टे पुरस्कार और येल विश्वविद्यालय ने होलैंड मेमोरियल पुरस्कार मिला। फ्रांस जनमत संस्थान के सर्वेक्षण के अनुसार वह 1967 और 1968 में फ्रांस की सबसे लोकप्रिय महिला थी। 1971 में अमेरिका के विशेष गैलप जनमत सर्वेक्षण के अनुसार वह दुनिया की सबसे लोकप्रिय महिला थी। पशुओं के संरक्षण के लिए 1971 में अर्जेंटीना सोसायटी द्वारा उन्हें सम्मानित उपाधि दी गई।

इंदिरा के मुख्य प्रकाशनों में ‘द इयर्स ऑफ़ चैलेंज’ (1966-69), ‘द इयर्स ऑफ़ एंडेवर’ (1969-72), ‘इंडिया’ (लन्दन) 1975, ‘इंडे’ (लौस्सैन) 1979 एवं लेखों एवं भाषणों के विभिन्न संग्रह शामिल हैं। उन्होंने व्यापक रूप से देश-विदेश की यात्रा की। श्रीमती गांधी ने अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, बर्मा, चीन, नेपाल और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों का भी दौरा किया। उन्होंने फ्रांस, जर्मन लोकतांत्रिक गणराज्य, जर्मनी के संघीय गणराज्य, गुयाना, हंगरी, ईरान, इराक और इटली जैसे देशों का आधिकारिक दौरा किया।श्रीमती गांधी ने अल्जीरिया, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया बेल्जियम, ब्राजील, बुल्गारिया, कनाडा, चिली, चेकोस्लोवाकिया, बोलीविया और मिस्र जैसे बहुत से देशों का दौरा किया।वह इंडोनेशिया, जापान, जमैका, केन्या, मलेशिया, मॉरिशस, मेक्सिको, नीदरलैंड, न्यूजीलैंड, नाइजीरिया, ओमान, पोलैंड, रोमानिया, सिंगापुर, स्विट्जरलैंड, सीरिया, स्वीडन, तंजानिया, थाईलैंड,त्रिनिदाद और टोबैगो, संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन, अमेरिका, सोवियत संघ, उरुग्वे, वेनेजुएला, यूगोस्लाविया, जाम्बिया और जिम्बाब्वे जैसे कई यूरोपीय अमेरिकी और एशियाई देशों के दौरे पर गई। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

1980 का दशक इंदिरा गांधी के सामने खालिस्तानी आतंकवाद के रूप में बड़ी चुनौती लेकर आया। 1984 में सिख चरमपंथ की धीरे-धीरे सुलगती आग फैलती गई और अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में जरनैल सिंह भिंडरवाला के नेतृत्व में चरमपंथियों का जमावड़ा होने लगा। जून 1984 में इंदिरा ने स्वर्ण मंदिर परिसर में हजारों नागरिकों की उपस्थिति के बावजूद सेना को मंदिर परिसर में घुसने और ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाने का आदेश दिया। इस ऑपरेशन में कई निर्दोष नागरिक भी मारे गए। ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ को लेकर उन्हें कई तरह की राजनीतिक समस्याओं का सामना करना पड़ा। राजनीति की नब्ज को समझने वाली इंदिरा मौत की आहट को तनिक भी भाप नहीं सकीं और 31 अक्टूबर, 1984 को उनकी सुरक्षा में तैनात दो सुरक्षाकर्मियों सतवंत सिंह और बेअंत सिंह ने उन्हें गोली मार दी। दिल्ली के एम्स अस्पताल में ले जाते रास्ते में ही इंदिरा गांधी का निधन हो गया।

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लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा