महंगाई और बेरोजगारी की चुनौती

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सरोज कुमार

महंगाई और बेरोज़गारी दो ऐसे शब्द हैं, जिसे आम से लेकर ख़ास तक कोई पसंद नहीं करता है। लेकिन अर्थशास्त्र में महंगाई को बुरा नहीं माना जाता, बशर्ते यह एक सीमा में हो, और रोज़गार की स्थिति उसे समर्थन करती हो। लेकिन जब महंगाई के साथ बेरोज़गारी के हालात बन जाएं तो किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए यह संकट की घड़ी मानी जाती है। हमारा देश आज इसी संकट में फंसा हुआ है। महंगाई और बेरोज़गारी दोनों एकसाथ क़दम ताल कर रहे हैं। जो रोज़गार और नौकरियां हैं, वहां भी कमाई नहीं रह गई है। आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपैया वाली स्थिति है।

कोरोना काल के दौरान या पहले से ही अर्थव्यवस्था का कमोबेश यही हाल रहा है। अब कोरोना के नियंत्रण में आने और महामारी का टीका तैयार हो जाने के बाद भी इस स्थिति से जल्द निजात मिलने के आसार नहीं हैं। कहानी पूरे 2021 तक बनी रह सकती है। बेशक आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं और बाज़ार में मांग भी बढ़ी है, लेकिन बाज़ार रोज़गार पैदा नहीं कर पा रहा है। वेतन में कटौती अभी भी बहाल नहीं हुई है। यह स्थिति चिंताजनक है।

पिछले महीने यानी दिसंबर में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) पर आधारित खुदरा महंगाई दर घटकर 4.59 फ़ीसदी पर आ गई, जो बीते मार्च (5.84 फ़ीसदी) से अबतक की सबसे निम्न दर है। लेकिन इस गिरावट से बहुत खुश होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि प्रकृति में यह क्षणिक है। यह गिरावट खाद्य वस्तुओं की क़ीमतों में कमी के कारण हुई है, वह भी सिर्फ़ सब्ज़ियों की क़ीमतों में 10.41 फ़ीसदी की भारी कमी के कारण। खाद्य महंगाई दर दिसंबर में घटकर 3.41 फ़ीसदी पर आ गई, जबकि नवंबर में यह 9.50 फ़ीसदी थी। आपूर्ति श्रृंखला के सुचारु होने का भी इसमें थोड़ा योगदान हो सकता है, लेकिन उतना नहीं, जितना कि महंगाई के लिए इसे ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा था। यदि महंगाई की वजह आपूर्ति श्रृंखला होती तो सिर्फ सब्ज़ियों की क़ीमतें नहीं घटतीं।

दिसंबर से पहले नवंबर में खुदरा महंगाई दर 6.93 प्रतिशत थी, जो अक्टूबर में छह साल के सर्वोच्च स्तर 7.61 फ़ीसदी पर थी। यानी कुछ महीनों से महंगाई दर में गिरावट का रुख बना हुआ है, और दिसंबर की दर (4.59 फ़ीसदी) क्षणिक ही सही पिछले नौ महीने में पहली बार आरबीआई द्वारा निर्धारित दो से छह फ़ीसदी के लक्ष्य के अंदर है। सरकार इसे शुभ संकेत मान रही है और आशावान है कि महंगाई लक्ष्य के अंदर बनी रहेगी।

लेकिन सब्ज़ियों को छोड़कर बाकी खाद्य उत्पादों की क़ीमतों में वृद्धि के रूझान सरकार की बात को बेमानी बनाते हैं। अनाज और संबंधित उत्पादों की क़ीमतों में दिसंबर में हालांकि मामूली 0.98 फ़ीसदी की वृद्धि हुई। लेकिन मांस और मछली की क़ीमतें क्रमशः 15.21 फ़ीसदी और 16.08 फ़ीसदी बढ़ीं। तेल और वसा की क़ीमतों में 20.05 फ़ीसदी वृद्धि हुई। दूध और दुग्ध उत्पाद 3.98 फ़ीसदी महंगे हुए। फल की क़ीमतें 2.68 फ़ीसदी बढ़ीं। जबकि दालों और उससे जुड़े उत्पादों की क़ीमतों में 15.98 फ़ीसदी वृद्धि दर्ज की गई। चीनी 0.53 फ़ीसदी महंगा हुआ। जबकि मसाले 10.29 प्रतिशत महंगे हो गए। पेय पदार्थों (शराब को छोड़कर) की क़ीमतें 11.86 फ़ीसदी बढ़ीं। तैयार भोजन, नाश्ते, मिठाई आदि की क़ीमतों में दिसंबर में 4.81 फ़ीसदी की वृद्धि देखी गई। वृद्धि का यह रूझान आगे बना रह सकता है। इसकी अपनी वजहें हैं। विनिर्मित वस्तुओं की क़ीमतों में सालाना वृद्धि की परंपरा है, लेकिन कोरोना महामारी के कारण पिछले साल यह नहीं हो पाया था। अब जब स्थिति सामान्य होने को है तो निश्चित रूप से इस साल क़ीमतें बढ़ाई जाएंगी। दूसरे वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार के कारण मांग बढ़ रही है, तो उसका असर भी क़ीमतों पर पड़ेगा।

महंगाई का एक और बड़ा कारण ईंधन की क़ीमतें हैं। ईंधन क़ीमतें, ख़ास तौर से डीजल की क़ीमतें बढ़ने से माल ढुलाई महंगी होती है, और इसका असर खुदरा महंगाई दर पर पड़ता है। सरकार ने कोरोना काल में पेट्रोल, डीज़ल पर दो महीने से भी कम अंतराल में दो बार उत्पाद शुल्क बढ़ा दिया। पहली बार 14 मार्च को पेट्रोल और डीज़ल दोनों पर प्रति लीटर तीन-तीन रुपये और उसके बाद पांच मई को पेट्रोल पर 10 रुपए प्रति लीटर और डीज़ल पर 13 रुपए प्रति लीटर। हालांकि कोरोना काल के दौरान वैश्विक बंदी के कारण मांग न होने से कच्चे तेल की क़ीमतें दो दशक के न्यूनतम स्तर लगभग 18 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई थीं, जिसके कारण उत्पाद शुल्क में भारी वृद्धि के बाद भी ईंधन क़ीमतें यथावत बनी रहीं। लेकिन वैश्विक बंदी समाप्त होने के बाद अब मांग बढ़ने से कच्चे तेल की क़ीमतें भी बढ़ रही हैं, तो उसका असर हर रोज़ तेल क़ीमतों पर दिख रहा है। पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतें हर रोज़ नई ऊंचाइयां छू रही हैं।

इसके अलावा राज्यों ने भी ईंधन पर कोरोना अधिभार के रूप में वैट बढ़ा दिया। यह ग़ौर करने वाली बात है कि आज की तारीख में पेट्रोल-डीज़ल की जो क़ीमत हम चुकाते हैं, उसका 70 फ़ीसदी हिस्सा सिर्फ कर का है। यदि सरकार ने कम से कम कोरोना काल के दौरान दो बार उत्पाद कर नहीं बढ़ाए होते तो उपभोक्ताओं को मौजूदा संकट काल में थोड़ी राहत मिलती। लेकिन गुड़ का नफ़ा चीटा खा गया और अभी भी खा रहा है।

अगर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की ही बात करें तो यहां पिछले साल जून के अंतिम सप्ताह से अब तक पेट्रोल की प्रति लीटर क़ीमत लगातार 80 रुपए के ऊपर बनी हुई है। बाकी शहरों में भी स्थानीय वैट के अनुसार क़ीमतें इसी के आसपास थोड़ा कम-अधिक रही हैं। 29 जून, 2020 को पेट्रोल की क़ीमत 80.43 रुपये के स्तर पर पहुंच गई और तब से अबतक यह नीचे नहीं गई है। इस साल 27 जनवरी को दिल्ली में पेट्रोल की क़ीमत अबतक के सर्वोच्च स्तर 86.30 रुपए प्रति लीटर पर पहुंच गई। मुंबई सहित कई शहरों में पेट्रोल की क़ीमत 90 रुपए से ऊपर चली गई है। डीज़ल की क़ीमत में हालांकि इस अवधि के दौरान उतार-चढ़ाव देखने को मिला है, लेकिन ज़्यादातर सत्रों में यह 70 रुपए प्रति लीटर से ऊपर ही रहा है। कुछ सत्रों में यह पेट्रोल से भी महंगा रहा और 80 रुपए प्रति लीटर से ऊपर बिका। राष्ट्रीय राजधानी में 29-30 जून को डीजल 80.57 रुपए प्रति लीटर था, जबकि पेट्रोल 80.43 रुपए प्रति लीटर। इसके बाद 26, 27 और 28 जुलाई को डीजल 82 रुपए प्रति लीटर बिका। डीजल की यह अबतक की सर्वोच्च दर थी।

पेट्रोल, डीजल की क़ीमतों में वृद्धि का रुझान लगातार बना हुआ है। वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार के बाद मांग बढ़ रही है। अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतों में तेज़ी का रुझान है। इसका असर महंगाई दर पर हर हाल में होगा। कई विशेषज्ञों का अनुमान है कि निकट भविष्य में महंगाई दर पांच-छह फ़ीसदी तक रह सकती है। उपभोक्ताओं की आमदनी के लिहाज़ से महंगाई की यह दर चिंता का विषय है।

हम जैसा कि जानते हैं महंगाई को तबतक बुरा नहीं माना जाता जबतक कि रोज़गार की स्थिति बुरी न हो। लेकिन यहां रोज़गार की स्थिति अच्छी नहीं है। बेरोज़गारी दर खतरनाक स्तर पर है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़े के अनुसार, दिसंबर में बेरोज़गारी दर बढ़कर 9.07 फ़ीसदी हो गई, जो नवंबर में 6.50 फ़ीसदी थी। अक्टूबर में यह 7.02 फ़ीसदी थी। जून के 10.18 फ़ीसदी के बाद दिसंबर में यह अबतक की सर्वोच्च बेरोज़गारी दर है। राष्ट्रव्यापी बंदी लागू होने के बाद बेरोज़गारी दर अप्रैल में 23.52 फ़ीसदी के ऐतिहासिक सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गई थी। मई में इसमें थोड़ा सुधार हुआ और यह 21.73 फ़ीसदी पर थी। आगे बेरोज़गारी दर में कैसे सुधार होगा, फिलहाल कोई खाका दिखाई नहीं देता है। सरकार का मानना है कि अर्थव्यवस्था में सुधार हो रहा है और इससे बेरोज़गारी दर में भी सुधार होगा। लेकिन आंकड़े इस कथ्य के पक्ष में संकेत नहीं देते हैं।

बेरोज़गारी दर में वृद्धि यानी रोज़गार में कमी। दिसंबर में रोज़गार में 48 लाख की कमी हुई और यह 38.88 करोड़ रह गया, जो नवंबर में 39.36 करोड़ था। रोज़गार में सितंबर 2020 से ही हर महीने लगातार कमी आ रही है, जब यह 39.76 करोड़ पर था। रोज़गार का मौजूदा स्तर दो साल पहले के स्तर से भी नीचे है। रोज़गार के मामले में भारत का रिकॉर्ड दुनिया में सबसे बुरा है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के आंकड़े के अनुसार, विश्व की औसत रोज़गार दर 57 फ़ीसदी है। जबकि भारत की औसत रोज़गार दर 47 फ़ीसदी है। पड़ोसी देश पाकिस्तान, श्रीलंका और बांग्लादेश भी इस मामले में भारत से आगे हैं। पाकिस्तान और श्रीलंका की रोज़गार दर क्रमशः 50 फ़ीसदी और 51 फ़ीसदी है। जबकि बांग्लादेश में रोज़गार दर 57 फ़ीसदी है।

भारत में रोज़गार दर की इस हालत के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार सार्वजनिक क्षेत्र है। भारत का सार्वजनिक क्षेत्र दुनिया में सबसे बुरी हालत में है, और यहां निजीकरण जिस रफ़्तार से चल रहा है, और सार्वजनिक क्षेत्र सिकुड़ रहा है, आगे हालत और बुरी ही होने वाली है। आईएलओ के आंकड़े के अनुसार, भारत में कुल श्रमशक्ति का मात्र 3.8 फ़ीसदी ही सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत है। अमेरिका में यह दर 15.8 फ़ीसदी, ब्रिटेन में 21.5 फ़ीसदी, जर्मनी में 12.9 फ़ीसदी, फ्रांस में 24.9 फ़ीसदी, दक्षिण कोरिया में 10.3 फ़ीसदी, जापान में 10.5 फ़ीसदी, सिंगापुर में 32 फ़ीसदी, और चीन में 50 फ़ीसदी है। यहां तक कि बांग्लादेश में भी श्रमशक्ति का आठ फ़ीसदी हिस्सा सार्वजनिक क्षेत्र में कार्यरत है।

अब एक तरफ महंगाई और दूसरी तरफ बेरोज़गारी। इसका सीधा अर्थ होता है कि अर्थव्यवस्था को उबरने में अभी वक्त लगेगा। सरकार का ध्यान महंगाई पर अधिक है,  लिहाजा उच्च महंगाई दर के बावजूद उसने अपना लक्ष्य चार फ़ीसदी बरकरार रखा है। जबकि मौजूदा परिस्थिति में ध्यान रोज़गार बढ़ाने पर होना चाहिए। लोगों की जेब में पैसा होगा, अर्थव्यवस्था तभी सुधरेगी। लंबे समय तक अर्थव्यवस्था में ठहराव अच्छा संकेत नहीं है। फिलहाल सबकी नजरें आगामी बजट पर है।

(वरिष्ठ पत्रकार सरोज कुमार इन दिनों स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं।) 

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