महात्मा गांधी की हत्या न हुई होती तो उन्हें ही मिलता शांति नोबेल सम्मान

0
972

दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित शांति नोबेल पुरस्कार इस साल किसी व्यक्ति को नहीं बल्कि वर्ल्ड फूड प्रोग्राम नाम के संगठन को दिया गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ से जुड़े वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के तहत दुनिया में भूखमरी की समस्या से निपटने की दिशा में उल्लेखनीय काम किया गया और दुनिया भर के 88 से ज्यादा देशों के 10 करोड़ से भी ज़्यादा लोगों तक वर्ल्ड फूड प्रोग्राम के तहत भोजन पहुंचाया गया। कोविड-19 संकट के दौरान भी भूखमरी की समस्या पैदा ना हो, वर्ल्ड फूड प्रोग्राम ने ये सुनिश्चित किया।

इसे भी पढ़ें – क्या पुरुषों का वर्चस्व ख़त्म कर देगा कोरोना?

राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी की 30 जनवरी 1948 को अगर हत्या न हुई होती, तो निश्चित रूप से उस साल दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित और सम्मानित शांति नोबेल पुरस्कार उन्हें ही मिलता। हत्यारे नाथूराम गोड्से ने उनकी हत्या करके उन्हें दुनिया के सबसे ज़्यादा मान्य शांति पुरस्कार से वंचित कर दिया। इसीलिए, उस साल का शांति नोबेल पुरस्कार स्वीडिश अकादमी ने यह कहते हुए किसी को नहीं दिया कि नोबेल कमेटी किसी भी ‘ज़िंदा’ व्यक्ति को ही पुरस्कार देने लायक़ समझती है।

इसे भी पढ़ें – किसने दिलवाई अमिताभ बच्चन को हिंदी सिनेमा में इंट्री?

स्वीडिश नोबेल अकादमी यानी नोबेल फाउंडेशन की अधिकृत वेबसाइट नोबेलप्राइज़डॉटऑर्ग के मुताबिक नोबेल कमेटी ने अपनी प्रतिक्रिया में जो टिप्पणी की उसमें ‘ज़िंदा’ शब्द के इस्तेमाल से यह आभास होता है कि अगर महात्मा गांधी की हत्या न हुई गई होती, तो निश्चित रूप से उस साल का शांति नोबेल पुरस्कार उन्हें दिया जाता।

महात्मा गांधी को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए पांच बार सन् 1937, 1938, 1939, 1947 और 1948 नोबेल पुरस्कार के लिए नॉमिनेट किया गया था। 1937 में पहली बार नॉर्वे की संसद ‘स्टॉर्टिंग’ में लेबर पार्टी सदस्य ओले कोल्बजोर्नसन ने महात्मा गांधी का नाम सुझाया था। कोल्बजोर्नसन नोबेल कमेटी के 13 सदस्यों में से एक थे। उस साल केवल कोल्बजोर्नसन ने महात्मा गांधी का नामांकन नोबेल कमेटी को नहीं किया था, बल्कि गांधीजी का समर्थन मशहूर गांधीवादी संस्था ‘फ्रेंड्स ऑफ़ इंडिया’ की नार्वे शाखा की एक शीर्ष महिला सदस्य ने भी किया था। उस प्रपोज़ल में गांधीजी के कार्यों का विस्तृत विवरण था। मसलन, पहले दक्षिण अफ्रीका और फिर भारत में गांधी जी ने किस तरह अहिंसक संघर्ष यानी सत्याग्रह किया और सफलता हासिल की।

इसे भी पढ़ें – देश को संविधान निर्माता, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री देने के बावजूद दलित दलित ही रह गया

वेबसाइट नोबेल प्राइज़डॉटऑर्ग पर नोबेल कमेटी की ओर से उन कारणों का जिक्र किया गया है, जिनके चलते गांधीजी को नोबेल पुरस्कार नहीं मिल पाया। नोबेल कमेटी के उस समय के सलाहकार जैकब वार्म-मूलर की गांधीजी के बारे में निगेटिव कमेंट के चलते उन्हें सन् 1937 में नोबेल पुस्कार नहीं दिया गया। जैकब वार्म-मूलर ने लिखा था, “भारतीय राजनीति के शलाका पुरुष महात्मा गांधी निःसंदेह अच्छे, विनम्र और आत्मसंयमी व्यक्ति हैं। भारत की क़रीब-क़रीब संपूर्ण जनता उन्हें बेइंतहां प्यार और सम्मान देती है। लेकिन गांधीजी अहिंसा की अपनी नीति पर सदैव क़ायम नहीं रहे। इतना ही नहीं गांधीजी को इन बातों की कभी कोई परवाह नहीं रही कि अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ उनका शांतिपूर्ण और अहिंसक आंदोलन कभी भी हिंसक रूप ले सकता है, जिसमें जान-माल का भारी नुक़सान हो सकता है।” वार्म-मूलर ने यह टिप्पणी दरअसल 1920-21 में गांधीजी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन के संदर्भ में की थी। जब गोरखपुर के चौरीचौरा में भीड़ ने एक पुलिस थाने को आग लगा दी जिसमें कई पुलिसकर्मियों ज़िंदा जल गए। इसके बाद भारत में हिंदू-मुस्लिम क्लैश और विभाजन जैसे घटनाक्रमों ने यह साबित कर दिया कि वार्म-मूलर की इस तरह की आशंका पूरी तरह बेबुनियाद नहीं थी।

इसे भी पढ़ें – कोई महिला कम से कम रेप का झूठा आरोप नहीं लगा सकती, 1983 में ही कह चुका है सुप्रीम कोर्ट

नोबेल कमेटी के सलाहकार जैकब वार्म-मूलर ने यह भी लिखा, “गांधीजी का आंदोलन केवल भारतीय हितों तक सीमित रहा, यहां तक कि दक्षिण अफ़्रीका में उनका आंदोलन भी भारतीय लोगों के हितों के लिए था। गांधीजी ने अश्वेत समुदाय लिए कुछ नहीं किया जो उस समय भारतीयों से भी बुरी ज़िंदगी गुज़र-बसर कर रहे थे।” वार्म-मूलर ने यहां तक लिखा, “गांधी के बदलती नीति और क़िरदार के बारे में उनके अनुयायी ही हैरान रह जाते हैं। गांधीजी बेशक महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं, लेकिन वह तानाशाह भी हैं, जो किसी की बात सुनना ही नहीं चाहता है। वह घनघोर आदर्शवादी व राष्ट्रवादी हैं। गांधीजी बार-बार ईसा यानी शांतिदूत के रूप में सामने आते थे, लेकिन फिर अगले पल अचानक वह साधारण राजनेता बन जाते हैं।”

वार्म-मूलर के तर्क से नोबेल कमेटी सहमत हो गई। उसका विचार बन गया कि गांधीजी अंतरराष्ट्रीय शांति कानून के समर्थक नहीं हैं। वह न तो प्राथमिक तौर पर मानवीय सहायता कार्यकर्ता हैं न ही अंतरराष्ट्रीय शांति कांग्रेस में उन्होंने कोई योगदान किया है। इसके अलावा तब अंतरराष्ट्रीय शांति आंदोलन में गांधीजी के कई आलोचक भी थे। इस कारण उन्हें नोबेल पुरस्कार नहीं दिया गया। उनकी जगह नोबेल पुरस्कार ब्रिटेन के राजनेता और इंटरन्शनल पीस कैंपेन के संस्थापक-अध्यक्ष और लेखक रॉबर्ट सेसिल को दिया गया। किसी ब्रिटिशर को नोबेल देने से कुछ लोग यह कहने लगे कि नोबेल कमेटी गांधीजी को नोबेल से सम्मानित करके अंग्रेज़ी साम्राज्य की नाराज़गी मोल लेना नहीं चाहती थी। यह धारणा मित्था है क्योंकि कई दस्तावेज़ों से साबित हो चुका है कि नोबेल कमेटी पर ऐसा कोई दबाव ब्रिटिश सरकार की तरफ़ से नहीं था। बहरहाल, इसी तरह सन् 1938 और 1939 में भी गांधीजी को नामांकन के बावजूद नोबेल शांति पुरस्कार नहीं दिया गया।

इसे भी पढ़ें – कहानी – बदचलन

बहरहाल, नॉर्वे के इतिहासकार और नोबेल पीस प्राइज़ एक्सपर्ट ओइविंड स्टेनरसेन ने कुछ साल पहले नोबेल पुरस्कार कैलाश सत्यार्थी को दिए जाने के बाद ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ से बातचीत के दौरान कहा था कि स्वीडिश अकादमी महात्मा गांधी जैसी महान शख़्सियत को नोबेल पुरस्कार न दे पाने के अपराधबोध से हमेशा ग्रस्त रही। अकादमी ने शिद्दत से महसूस किया कि गांधीजी को नोबेल पुरस्कार न देने का निर्णय ऐतिहासिक भूल थी। उसी अपराधबोध से उबरने के लिए जब-जब भारत, भारतीय मूल, भारतीय उपमहाद्वीप या भारत से संबंधित किसी भी व्यक्ति का नाम नोबेल पुरस्कार के लिए आया, तब-तब नोबेल कमेटी ने त्वरित फैसला लिया।

इसे भी पढ़ें – कहानी – डू यू लव मी?

यही वजह है कि अब तक तीन भारतीयों – 1979 में मदर टेरेसा (शांति), 1998 में अमर्त्य सेन (अर्थशास्त्र), 2014 में कैलाश सत्यार्थी (शांति), तीन भारतीय मूल के लोगों – 1968 में डॉ. हरगोबिंद खुराना (चिकित्सा), 1983 में डॉ. सुब्रमणियम चंद्रशेखर (भौतिक) और 2001 में त्रिनिडाड में जन्मे ब्रिटिश लेखक सर विद्याधर सूरजप्रसाद नायपाल (साहित्य), तीन भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों- 1979 में पाकिस्तानी अब्दुस सलाम (भौतिक), 2006 में बांग्लादेशी मोहम्मद यूनुस (शांति) और 2014 में पाकिस्तानी मलाला यूसुफ़जई (शांति) और 1989 में भारत में रहने वाले तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा (शांति) को नोबेल पुरस्कार देने का फ़ैसला बिना देरी किए लिया गया। ख़ुद स्टेनरसेन ने कैलाश सत्यार्थी और मलाला यूसुफजई को नोबेल से सम्मानित करने के स्वीडिश अकादमी के फ़ैसले को ‘स्मार्ट मूव’ माना था।

दूसरी बार महात्मा गांधी के नाम का चयन भारत के आज़ाद होने के बाद 1947 में किया गया। यूनाइटेड प्रॉविंस के प्रीमियर गोविंद वल्लभ पंत, बॉम्बे प्रेसिडेंसी के प्राइम मिनिस्टर बीजी खेर और सेंट्रल लेजिस्लेटिव एसेंबली के स्पीकर गणेश वासुदेव मावलंकर ने उन्हें नामांकित किया था। उस साल तत्कालीन नोबेल कमेटी के सलाहकार जेन्स अरूप सीप थे। गांधीजी के बारे में उनकी रिपोर्ट वोर्म-मूलर की तरह आलोचनात्मक नहीं थी। फिर भी तत्कालीन नोबेल कमेटी के प्रमुख गुन्नर जान ने अपनी डायरी में लिखा कि सीप की रिपोर्ट गांधी के अनुकूल है लेकिन एकदम स्पष्ट रूप से उनके पक्ष में नहीं जा रही है।

इसे भी पढ़ें – कहानी – बेवफ़ा

गुन्नर जान के लिखा कि कार्यकारी सदस्य हरमैन स्मिट और क्रिश्चियन ऑफटेडल ने गांधीजी का समर्थन किया है। लेकिन तभी 27 सितंबर 1947 को रायटर की ख़बर आई कि गांधीजी ने युद्ध का विरोध करने का अपना फ़ैसला छोड़ दिया है और भारतीय संघ को पाकिस्तान के ख़िलाफ़ युद्ध करने की इजाज़त दे दी है। दरअसल, उस दिन प्रार्थना सभा में गांधीजी ने कहा, “मैं हर तरह के युद्ध का विरोधी हूं, लेकिन पाकिस्तान चूंकि कोई बात नहीं मान रहा है, इसलिए पाकिस्तान को अन्याय करने से रोकने के लिए भारत को उसके ख़िलाफ़ युद्ध के लिए जाना चाहिए।”

इसे भी पढ़ें – कहानी – अनकहा

बहरहाल, गुन्नर जान लेबर लिखा है कि उस समय गांधीजी की पैंतरेबाज़ी से राजनेता मार्टिन ट्रैनमील और पूर्व विदेशमंत्री बर्गर ब्राडलैंड उनका मुखर विरोध करने लगे और कमेटी में गांधीजी का विरोध करने वालों की संख्या बढ़ गई। कमेटी ने आमराय से गांधीजी के युद्ध वाले बयान को शांति-विरोधी माना और 1947 का नोबेल पुरस्कार मानवाधिकार आंदोलन क्वेकर को दे दिया गया। इस पर सफ़ाई देते हुए नोबेल कमेटी के अध्यक्ष ने लिखा है, “नॉमिनेटेड लोगों में गांधीजी सबसे बड़ी शख़्सियत थे। उनके बारे में बहुत-सी अच्छी बातें कही जा सकती थीं। वह शांति के दूत ही नहीं, बल्कि सबसे बड़े देशभक्त थे। वह बेहतरीन न्यायविद और अधिवक्ता थे।” अंत में नोबेल कमेटी अध्यक्ष ने कमेटी के फ़ैसले का समर्थन करते हुए आगे लिखा, “हमें यह भी दिमाग में रखनी चाहिए कि गांधीजी भोले-भाले नहीं हैं।”

गांधीजी को 1948 साल में तीसरी बार (पांचवां नॉमिनेशन) चयनित किया गया, लेकिन चार दिन बाद 30 जनवरी को उनकी हत्या कर दी गई। इस घटना के चलते नोबेल कमेटी इस पर विचार करने लगी कि गांधीजी को मरणोपरांत पुरस्कार दिया जाए या नहीं। उस समय नोबेल फाउंडेशन के नियमों के मुताबिक़ विशेष परिस्थितियों में मरणोपरांत पुरस्कार देने का प्रावधान था। रिपोर्ट में लिखा गया, “गांधीजी को पुरस्कार देना संभव था, लेकिन वह न तो किसी संगठन से संबंधित थे और न ही कोई वसीयत छोड़कर गए थे।” लिहाज़ा, पुरस्कार राशि किसे दी जाए, इस बारे में अकादमी ने चर्चा की, परंतु जवाब नकारात्मक रहा। 18 नवंबर 1948 को अकादमी ने फ़ैसला किया कि इस साल नोबेल पुरस्कार किसी को नहीं दिया जाएगा। इस तरह गांधीजी को नोबेल पुरस्कार देने की अंतिम कोशिश भी बेकार गईं।

इसे भी पढ़ें – कहानी – एक बिगड़ी हुई लड़की

वैसे तो शांति के लिए नोबेल पुरस्कार का मुद्दा हमेशा से विवाद का विषय बना रहा है। सन् 1901 से शुरू हुआ यह सम्मान अब तक 100 लोगों को दिया जा चुका है। यह विडंबना ही है कि गांधी के अहिंसा के सिद्धांत के पैरोकार मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला जैसे लोगों को शांति नोबेल दिया गया लेकिन गांधीजी को नहीं। अकसर चर्चा होती है कि क्या गांधीजी जैसे असाधारण नेता नोबेल के मोहताज थे? कई लोग मानते हैं कि गांधीजी का क़द इतना विशाल है कि नोबेल पुरस्कार उनके सामने छोटा पड़ता है। अगर स्वीडिश अकादमी अगर गांधीजी को नोबेल पुरस्कार देती तो इससे उसी की शान बढ़ जाती। खैर ऐसा नहीं हुआ और गांधी जी दुनिया से सबसे प्रतिष्ठित शांति पुरस्कार से वंचित रह गए।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

इसे भी पढ़ें – ठुमरी – तू आया नहीं चितचोर