कोई महिला कम से कम रेप का झूठा आरोप नहीं लगा सकती – सुप्रीम कोर्ट

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“नो! नो का मतलब नो होता है योरऑनर। केवल नो! नो को किसी व्याख्या, किसी एक्सप्लानेशन या किसी परिभाषा की ज़रूरत नहीं। नो अपने आपमें व्याखित, स्पष्ट और पूर्ण परिभाषित है। इसीलिए कोई लड़की या महिला अगर नो कहती है, तो उसका मतलब नो ही होता है। मतलब नहीं। वह लड़की या महिला कोई भी हो, कैसी भी हो, उसके नो का अर्थ नो ही होता है। नो यानी उससे दूर रहो। महिला शराब पीती है, वह हंसती है, दोस्तों के बीच नॉन-वेज जोक्स कहती है, देर रात तक पार्टी करती है, या जीवन में कुछ भी करती है, यह कोई मायने नहीं रखता। अगर वह सेक्स के लिए ‘नो’ कहती है तो इसका मतलब ‘नो’ ही है। यानी उसके क़रीब जाने की कोशिश मत कीजिए। यहां तक कि अगर कोई ‘सेक्स वर्कर’ भी नो कहे, तो भी उसकी ‘नो’ का मतलब ‘नो’ ही है।” यौनाचार पर आधारित असाधारण फिल्म ‘पिंक’ के इस डायलॉग को सदी के महानायक अमिताभ बच्चन बहुत प्रभावी ढंग से डिलिवर किया है। यह डायलॉग अमिताभ को महान अभिनेता की कैटेगरी में खड़ा करती है।

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अब इसे संयोग कहेंगे या दुर्भाग्य कि जब अभिनेत्री पायल घोष ने फिल्मकार अनुराग कश्यप पर यौनाचार का आरोप लगाया तो, उसी पिंक फिल्म में यौनाचार की पीड़ित युवती का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री तापसी पन्नू ने अनुराग कश्यप का सबसे पहले बचाव किया। अभिनेत्री पायल घोष के यौनाचार के आरोप को ग़लत करार देते उन्होंने अनुराग कश्यप की ढाल बनने की कोशिश की। उन्हें चरित्र प्रमाणपत्र देते हुए कहा कि अनुराग कश्यप बॉलीवुड के ‘सबसे बड़े नारीवादी’ पुरुष हैं। हालांकि रेप का मामला दर्ज होने पर तापसी पन्नू ने  कहा, “अगर अनुराग कश्यप दोषी पाए जाते हैं, तो वह उनसे सारे संबंध ख़त्म कर दूंगी।”

बहरहाल, ऐसे समय जब लीक से हटकर बेहतरीन फिल्में बनाने के लिए मशहूर अनुराग कश्यप के ऊपर पायल घोष ने भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (I), 354, 341 और 342 के तहत एफ़आईआर दर्ज करा दी, तब सुप्रीम कोर्ट के 1983 में दिए गए फैसले का ज़िक्र करना समीचीन होगा, जिसमें देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा था कि कोई महिला कम से कम रेप का झूठा आरोप नहीं लगा सकती। कहने का मतलब अगर किसी व्यक्ति ने किसी महिला के साथ संभोग नहीं किया तो वह महिला दूसरे आरोप भले लगा दे, लेकिन रेप का आरोप नहीं लगा सकती।

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देश की सबसे बड़ी अदालत ने इसके लिए भारत के सामाजिक तानेबाने का हवाला देते हुए कहा था कि जिस महिला के साथ रेप होता है, वह कौमार्य अथवा सतीत्व-भंग की क्षति ही नहीं सहती, बल्कि गहन भावनात्मक दंश, मानसिक वेदना, भय, असुरक्षा और अविश्वास अमूम पूरी ज़िंदगी उसका पीछा नहीं छोड़ते। ऐसी महिलाएं अपना दुखड़ा अंतरंग-से-अंतरंग साथी के सामने भी रो नहीं पातीं। यही वजह है कि वक़्त के साथ-साथ उनका एकाकीपन भी बढ़ता जाता है और जीवन का बोझ भी, जबकि बलात्कारी पीड़ित महिला के साथ-साथ अक्सर न्याय-व्यवस्था का भी शीलभंग करने में सफल हो जाता है, और दोनों में से कोई भी उसका बाल तक बांका नहीं कर पाता।

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रेप के एक मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, “भारत परंपराओं और संस्कारों वाला देश है। बेशक पश्चिम के किसी देशों में कोई महिला किसी पुरुष पर छेड़खानी, यौनाचार या बलात्कार की झूठी शिकायत दर्ज करा सकती है, क्योंकि वह पैसे के लिए अमीर पुरुष से संबंध बना सकती है या फिर उससे शादी कर सकती है। वह मनोरोगी हो सकती हैं। वह ईर्ष्या की वजह से किसी पर ऐसा आरोप लगा सकती हैं। या नाम पब्लिशिटी पाने के लिए ऐसा कर सकती है। लेकिन भारत में कोई महिला ऐसा कदापि नहीं कर सकती।”

अंत में फ़ैसला लिखने वाले जज ने कहा था, “कुल मिलाकर पश्चिमी देशों के के तमाम कारण भारत में प्रासंगिक नहीं हैं, क्योंकि भारतीय नारी परंपराओं से बंधी होती है, वह यौन हमले के बारे में झूठ नहीं बोलेगी क्योंकि ऐसा आरोप लगाने पर वह ख़ुद सामाजिक रूप से बहिष्कृत की जा सकती है। इससे परिवार और पति से मिलने वाला मान-सम्मान खो सकती है और अगर अविवाहित है तो शादी होने की संभावनाएं धूमिल पड़ सकती हैं। दरअसल, भारतीय नारी की अपनी गरिमा होती है और वह उसी गरिमा के साथ अपना जीवन जीना चाहती है। इसीलिए अगर किसी ने उसके साथ रेप नहीं किया है तो वह झूठा रेप का आरोप नहीं लगा सकती है।”

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इसीलिए अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की रहस्यमय मौत के मामले में जांच में अपनी भद्द पिटवा चुकी मुंबई पुलिस के लिए भूल सुधारने का अच्छा अवसर था और उसे पायल के आरोप का संज्ञान लेकर अविलंब कार्रवाई करनी चाहिए थी। अभिनेत्री ने अपनी शिकायत में कश्यप पर 2013 में वर्सोवा में यरी रोड स्थित एक स्थान पर उनके साथ बलात्कार करने का आरोप लगाया था। 48 वर्ष के अनुराग ने पायल के आरापों को ‘निराधार’ बताते हुए अपने आप को चुप कराने की साज़िश करार दिया था। अनुराग का कई महिलाओं से संबंध रहा है, वह दो पत्नियों (आरती बजाज और कल्कि कोचलिन) को तलाक़ दे चुके हैं। कहा जाता है कि वह दो अभिनेत्रियों (सबरीना खान और हुमा कुरैशी) के साथ रोमांस कर चुके हैं और फिलहाल 24 साल की अभिनेत्री शुभ्रा शेट्टी के साथ डेट कर रहे हैं।

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जो भी हो, मुंबई पुलिस इस मामले में ढीला रवैया अपना कर सुप्रीम कोर्ट के ही फैसले की अवमानना किया जिसमें देश की सबसे बड़ी अदालत ने भरवाड़ा भोगिनभाई हीरजीभाई बनाम गुजरात राज्य {1983 (3) एससीसी 217)} के मामले में साफ़ तौर पर कहा था कि भारतीय परिस्थितियों में संपुष्टि के बिना पीड़ित महिला की गवाही पर एक्शन लेने से मना करना, पीड़िता के ज़ख़्मों को और अपमानित करने जैसा है। अदालत ने इस मामले में कहा था कि यौन अपराध की शिकायत करने वाली महिला या लड़की को शक, अविश्वास अथवा संशय की नज़र से देखना एकदम ग़ैरकानूनी और अमानवीय है। ऐसा करना पितृसत्तात्मक व्यवस्था के दुराग्रहों को उचित ठहरने जैसा होगा।

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में कानून के प्रोफेसर और देश में रेप पर एक हज़ार से अधिक फैसले का अध्ययन कर चुके प्रो. मृणाल सतीश कहते हैं कि देश में बलात्कार के मामलों में दी जाने वाली सज़ा पर मिथकों और भ्रांतियों का अक्सर असर होता है। रेप से जुड़े मिथक बलात्कार पीड़ितों के लिए बेहद नुकसानदेह होते हैं और रेप, बलात्कार पीड़ितों के बारे में पूर्वाग्रह, भ्रांतियों और गलत मान्यताएं हैं। देश के कई हाई कोर्ट्स ने रेप के मामलों में इसी बिना पर सही और ग़लत के फ़ैसला कर चुके हैं।”

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दरअसल, सभ्य समाज में स्त्री के इच्छा के विरुद्ध या उसे काम देने के बदले उसके साथ यौन संबंध बनाने को भी अपराध की कैटेगरी में रखा जाता है। कई लोग, कुछ महिलाएं भी अनुराग के पक्ष में उतर गई हैं। कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि चूंकि अनुराग कश्यप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के ख़िलाफ़ मुखर रहे हैं, इसीलिए उनके ख़िलाफ़ यह मामला बनाया गया है। ऐसे में इस तरह के बयान को अपरिपक्व ही कहा जाएगा। जब मामला दर्ज हो गया है तो कार्रवाई होने दीजिए। दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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