देश को संविधान निर्माता, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री देने के बावजूद दलित दलित ही रह गया

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उत्तर प्रदेश के हाथरस जनपद में दलित युवती मनीषा वाल्मिकि के साथ रेप की अमानवीय घटना के बाद उसकी जीभ तक काट लेने और रीढ़ की हड्डी तोड़ देने और अंत में उसकी मौत के बाद रातोरात उसके शव को जला देने की घटना से बिना किसी संदेह के यही लग रहा है कि देश के सबसे बड़े राज्य में दलित समाज के लोग अब भी प्राचीनकाल और मध्यकाल जैसी छूआछूत व्यवस्था में सांस ले रहे हैं। नागरिक तो दूर उन्हें इंसान ही नहीं समझा जा रहा है। यह सब उस देश में हो रहा है, जो अपने आपको उदार और सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है।

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कहना न होगा कि आज़ादी के बाद इस राज्य में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी की सरकारें बनती रहीं और दलित की बेटी कही जाने वाली मायावती समेत अपने आपको दलितों का हितैषी बताने वाले कई नेता मुख्यमंत्री भी बनते रहे, लेकिन इस राज्य का दलित दलित ही रह गया। एकदम से उपेक्षित, दबा-कुचला और अपने मौलिक अधिकारों से पूरी तरह वंचित। वह मौलिक अधिकारों से इस कदर वंचित हैं कि उससे यौन-हमले में जान गंवाने वाली अपनी बेटी का सम्मानजनक तरीक़े से अंतिम संस्कार करने का मौलिक अधिकार भी डंके की चोट पर छीन लिया गया।

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सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सब रामराज्य का नारा देने वाली भारतीय जनता पार्टी के शासन में हो रहा है और राष्ट्रवाद की बात करने वाली इस पार्टी ने राज्य में उस शख़्स को मुख्यमंत्री बना रखा है जो, अपने आपको सांसारिक माया-मोह से परे और खुद को योगी यानी फकीर कहता है। उसी संन्यासी के शासन में बलात्कार की शिकार दलित बेटी के शव को रात के अंधेरे में जलवा दिया गया। जबकि राज्य में अपराधियों तक के शव को भी अंतिम संस्कार के लिए उनके परिजनों को सौंपने की परंपरा है। लेकिन दलित परिवार के साथ अंतिम संस्कार में भी घोर पक्षपात किया गया।

कल्पना कीजिए, रेप और हमले की वारदात 14 सितंबर 2020 को हुई। फौरन एफआईआर दर्ज करने की बजाय पुलिस महकमा पीड़िता पर सुलह समझौते के लिए दबाव डालता रहा। हफ्ते भर मामला चलता रहा। इस बीच युवती की हालत बद से बदतर होती चली गई। आठ दिन बाद पुलिस तब एफआईआर दर्ज करती है, जब उसे भी समाचार मिलता है कि लड़की की हालत बहुत सीरियस है और उसके मर जाने पर पुलिस छीछालेदर हो सकती है। दुर्भाग्य से 15वें दिन लड़की मर भी गई। इसके बाद प्रदेश की पुलिस ने लाश को दिल्ली से उठाया और हाथरस लाकर रात के अंधेरे में मिट्टी का तेल छिड़क कर शव को जला दिया। आम आदमी या गांव के लोग तो दूर की बात, पीड़िता में परिवार के लोगों को भी अर्थी को कंधा नहीं देने दिया।

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इस पूरे प्रकरण से एक संदेश निकलता है। पहले तो युवती को दिन दहाड़े पकड़कर पहले रेप करने और बाद में उसकी जीभ काटने और रीढ़ की हड्डी तोड़ देने की घटना एक संदेश देती है। इसका अर्थ है, चारों आरोपी संदीप सिंह, रामू सिंह, लवकुश सिंह और रवि सिंह कह रहे हैं, तुम लोगों की कोई औक़ात नहीं, देखों न तुम्हारी बेटी से बलात्कार किया। उसने विरोध में बोलने की जुर्रत की तो उसकी जीभ काट दी और विरोध में उठ खड़ी होने की कोशिश की तो उसकी रीढ़ तोड़ दी। इस देश में रोज़ाना तक़रीबन सौ महिलाओं के साथ बलात्कार होता है, लेकिन रेप विक्टिम के साथ इतना अमानवीय व्यवहार कही देखने को नहीं मिलता।

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चारो बलात्कारियों ने बलात्कार ही, पुलिस और नागरिक प्रशासन ने भी मनीषा वाल्मिकि के साथ रेप से कम अपराध नहीं किया। यहां प्रशासन यानी सरकार ने भी अपने कार्रवाई से एक संदेश दिया है। वह संदेश यह है, तुम लोगों की औक़ात जानवर से अधिक नहीं। तुम्हारी बेटी से बलात्कार हुआ। प्राथमिकी ही दर्ज नहीं होगी। पीड़ित को इसलिए जिला सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया, ताकि उसकी हालत और ख़राब हो जाए। मर गई तो रात को ही मिट्टी का तेल छिड़क कर जला दिया, तुम लोगों के लिए अंतिम संस्कार को क्या मतलब? तुम लोगों की तो कोई औक़ात ही नहीं है।

पुलिस और नागरिक प्रशासन का संकेत इतना परेशान करने वाला है कि इस देश में कई बार बलात्कार की शिकार घायल महिलाओं को बेहतर इलाज के लिए विदेश तक इलाज के लिए ले जाया गया है। सन् 2013 में दिल्ली गैंगरेप की शिकार ज्योति सिंह को सरकार ने एयर एंबुलेंस से सिंगापुर के माउंट एलिजाबेथ अस्पताल भेजा था, हालांकि ज्योति वहां भी नहीं बच सकी। लेकिन मनीषा को अगर समय रहते सही उपचार मिला होतता तो कम से कम उसकी मौत न होती।

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कहने का मतलब, भले दिलत तबके के प्रतिनिधियों ने देश को संविधान बनाकर दिया। इस समाज के लोग राष्ट्रपति और मुख्यमंत्री बने, लेकिन पिछले सात दशक के अंतराल के दौरान इस समाज की सामाजिक-आर्थिक हालत में कोई भी सुधार नहीं हुआ। इनकी हालत आज भी उस दौर जैसी है। दबंग लोग दरवाजे पर आते हैं, मारते-पीटते हैं। घर की महिलाओं के साथ जबरदस्ती सहवास करते हैं और हरिजन उत्पीड़न विरोधी अधिनियम यानी एससी-एसटी एक्ट के बावजूद पुलिस उनकी शिकायत दर्ज नहीं होती है। एफआईआर दर्ज करने की बजाय पुलिस सुलह समझौते के लिए दबाव डालती है।

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कहना न होगा कि आजादी के बाद इस देश में हर समाज ने खूब तरक़्क़ी की और अपना आर्थिक और सामाजिक स्तर उठाया, लेकिन दलित मुख्यधारा से कटे ही रह गए। इसी मुख्य वजह यह रही कि इस समाज के जिन लोगों को नेतृत्व करने या प्रशासन का हिस्सा बनने का अवसर मिला, उन्होंने अपने संपूर्ण समाज को आगे ले जाने में कोई दिलचस्पी ही नहीं ली। ऐसे लोगों ने मौक़ा मिलने पर केवल और केवल अपना ही विकास किया। यही वजह है कि आरक्षण समेत तमाम सुविधाएं देने के बावजूद ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि यह समाज विकास की मुख्य धारा से दूर ही रह गया।

जहां तक रेपिस्ट को कठोर सज़ा देने की बात है तो बलात्कार और हत्या करने वाले आरोपियों को सज़ा-ए-मौत देने का प्रावधान शुरू से है। यौन हिंसा कानून को 2013 के दिल्ली गैंगरेप के बाद और सख़्त कर दिया गया। इसके बावजूद बलात्कार के आरोपियों को सज़ा नहीं हो पाती, क्योंकि इस देश की न्यायपालिक सारे मूवमेंट की हवा निकाल देती है। आज़ाद भारत में पिछले 73 साल में बलात्कार की केवल चार घटनाओं के आरोपियों को फांसी की सज़ा दी गई है और बलात्कार करने वाले को आठ हैवानों को फांसी पर लटकाया गया है। नेशनल क्राइम ब्यूरो के मुताबिक रोज़ाना लगभग सौ महिलाओं के साथ रेप होता है। 2019 में रेप की 32033 घटनाओं की प्राथमिकी दर्ज़ हुई। इनमें बलात्कार की शिकार 3524 युवतियां या महिलाएं यानी 11 फ़ीसदी दलित तबके की थीं।

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दरअसल, मध्यकाल तक तो रेप को अपराध ही नहीं माना जाता था। इसका श्रेय अंग्रज़ों को जाता है। 1833 में लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता में विधि आयोग का गठन किया गया। मैकाले ने पहली बार जबरन संभोग को रेप यानी बलात्कार कहा। 1837 में इंडियन पैनल कोड बना। इससे पहले भारतीय संस्कृति बेशक गौरवशाली थी, लेकिन महिलाओं के साथ यौन-उत्पीड़न की घटना को बलात्कार या अपराध नहीं माना जाता था। 1853 में सर जॉन रोमिली की अध्यक्षता में दूसरा विधि आयोग बनाया गया। इसके बाद क़ानूनों की ड्राफ़्टिंग हुई। 1860 से इडियन पैनल कोड लागू हुआ। इसकी धारा 376 के तहत किसी महिला से उसकी इच्छा के विरुद्ध सेक्स करने का बलात्कार माना गया।

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महिलाओं के साथ निरंकुश होकर ऐय्याशी करने वालों को 1876 में जब पता चला कि जबरन सेक्स करने पर वे गिरफ़्तार होकर जेल जा सकते हैं, तब सबकी हवाइयां उड़ने लगीं। लोग मुखर होने लगे। जैसे 1828-29 में सती प्रथा को प्रतिबंधित करने का गौरवशाली संस्कृति के पैरोकारों की ओर से विरोध किया गया था, उसी तरह इस क़ानून का भी विरोध हुआ, लेकिन अंग्रज़ो ने विरोध दबा दिया। इस तरह लॉर्ड मैकाले की कोशिश से भारत में जबरन सेक्स करने की गंदी प्रथा बंद हो गई।

बहरहाल, जैसा अपने देश में होता आया है। बलात्कार और हत्या की कोई वारदात होती है, तो कुछ दिन के लिए सभी लोग अपने-अपने काम पर लग जाते हैं। सरकार त्वरित जांच और फॉस्ट ट्रैक कोर्ट के गठन की घोषणा करती है। मीडिया रिपोर्टिंग करते हुए उसे इंसाफ़ दिलाने की बात करती है और विपक्ष जनता को आंदोलित करके इंसाफ दिलाने के लिए हाय तौब मचाता है। लब्बोलुआब होता कुछ नहीं, सब वैसे ही चलता रहता है, जैसे इस देश के आज़ाद होने के बाद से चला आ रहा है। यह मामला भी कुछ दिन में ठंडा पड़ जाएगा। कहने का तात्पर्य जब तक ख़ुद दलित एकजुट नहीं होंगे, जिसकी संभावना नहीं के बराबर है, तब तक इसी तरह उनकी बहू-बेटियों की इज़्ज़त लूटी जाती रहेगी और लाश को चुपचाप रात के अंधेरे में जलाया जाता रहेगा।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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