अंत तक अनसुलझी ही रही दीनदयाल उपाध्याय की हत्या की गुत्थी

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चिंतक, संगठनकर्ता और भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष रहे पंडित दीनदयाल उपाध्याय (Pandit Deen Dayal Upadhyay) ने भारत की सनातन विचारधारा को प्रस्तुत करते हुए देश को एकात्म मानववाद नामक विचारधारा दी। वह एकात्म मानववाद के आधार पर ही भारत राष्ट्र की कल्पना करते थे, जिसमें सभी राज्यों की संस्कृतियां आपस में मिलकर एक मज़बूत राष्ट्र का निर्माण करें। मजबूत और सशक्त भारत के पक्षधर दीनदयाल समावेशित विचारधारा को भी मानते थे, इसीलिए उन्होंने हिंदू शब्द को धर्म के तौर पर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के रूप में परिभाषित किया।

अमरजीत सिंह की किताब ‘एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीन दयाल उपाध्याय’ और डॉ. विनोद मिश्र की किताब ‘पं. दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद दर्शन’ के मुताबिक, दीनदयाल का उद्देश्य स्वतंत्रता की पुनर्रचना के प्रयासों के लिए विशुद्ध भारतीय तत्व-दृष्टि प्रदान करना था। वह जनसंघ के राष्ट्रजीवन दर्शन के निर्माता माने जाते हैं। संस्कृतिनिष्ठा उनके द्वारा निर्मित राजनैतिक जीवन दर्शन का पहला सूत्र है। उनके शब्दों में, “भारत में रहने वाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह एक जन हैं। उनकी जीवन प्रणाली, कला, साहित्य, दर्शन सब भारतीय संस्कृति है। इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है। इस संस्कृति में निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा।” वह आर्थिक नीति के भी रचनाकार माने जाते हैं। उनका विचार था कि आर्थिक विकास का मुख्य उद्देश्य सामान्य मानव का सुख है।

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राजनीति के अतिरिक्त साहित्य और पत्रकारिता में भी दीनदयाल की गहरी अभिरुचि थी। बचपन में किसी ज्योतिषी ने उनकी जन्मकुंडली देख कर भविष्यवाणी कर दी थी कि यह बालक महान विचारक, अग्रणी राजनेता और निस्वार्थ सेवाव्रती होगा, लेकिन शादी नहीं करेगा। 1940 के दशक में वह लखनऊ से प्रकाशित मासिक पत्रिका ‘राष्ट्रधर्म’ से जुड़े और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र ‘पांचजन्य’ और ‘स्वदेश’ दैनिक शुरू किया। हिंदी और अंग्रेजी में कई लेख लिखने के अलावा उन्होंने ‘सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य’ नाटक और हिंदी में शंकराचार्य की जीवनी लिखी। उन्होंने संघ संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार की जीवनी का मराठी से हिंदी में अनुवाद किया। उनकी प्रसिद्ध साहित्यिक कृतियों में ‘अखंड भारत क्यों हैं’, ‘राष्ट्र जीवन की समस्याएं’, ‘राष्ट्र चिंतन’ और ‘राष्ट्र जीवन की दिशा’ आदि प्रमुख हैं। केएस भारती की अपनी किताब ‘द पोलिटिकल थॉट ऑफ़ पंडित दीनदयाल उपाध्याय’ और सुरेंद्र प्रसाद गैन की किताब ‘इकोनॉमिक आइडियाज ऑफ़ पंडित दीनदयाल उपाध्याय’ में क्रमशः दीनदयाल के राजनीतिक और आर्थिक दर्शन को पेश किया है।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर 1916 को पवित्र ब्रजभूमि पर मथुरा में नगला चंद्रभान नामक गांव में हुआ था। दो वर्ष बाद दीनदयाल के भाई शिवदयाल का जन्म हुआ। माता रामप्यारी धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थीं। पिता भगवती प्रसाद उपाध्याय रेलवे में जलेसर रोड के सहायक स्टेशन मास्टर थे। रेल की नौकरी के कारण उनका अधिकतर वक़्त बाहर ही बीतता था। कभी-कभार छुट्टी मिलने पर ही घर आ पाते थे। इसीलिए दोनों बच्चों को ननिहाल आगरा में फतेहपुर सीकरी के पास ‘गुड़ की मंढ़ई’ भेज दिया गया। नाना के बड़े परिवार में दीनदयाल अपने ममेरे भाइयों के साथ पले और बड़े हुए। नाना चुन्नीलाल शुक्ल राजस्थान में धानक्या में स्टेशन मास्टर थे।

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बचपन में ही दीनदयाल को एक के बाद एक गहरे आघात सहने पड़े। वह तीन वर्ष के भी नहीं हुए थे, कि उनके पिता का देहांत हो गया। पति की मृत्यु से मां रामप्यारी को जीवन अंधकारमय लगने लगा। वह अत्यधिक बीमार रहने लगीं। तपेदिक रोग के चलते 8 अगस्त 1924 को उनका भी देहावसान हो गया। 1926 में नाना चुन्नीलाल शुक्ल भी नहीं रहे। 1931 में बच्चों को पालने वाली मामी का भी निधन हो गया। 18 नवंबर 1934 को अनुज शिवदयाल ने भी दुनिया से विदा ले ली। 1835 में स्नेहमयी नानी भी स्वर्ग सिधार गईं। 19 वर्ष की अवस्था तक दीनदयाल ने मृत्यु-दर्शन से गहन साक्षात्कार कर लिया था। 1939 को बड़ी बहन रमादेवी की मृत्यु भी हो गई। इस तरह शुरुआती दौर में एक के बाद हुई मौतों ने उन्हें झकझोर कर रख दिया था।

बहरहाल, आठवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद दीनदयाल कल्याण हाईस्कूल, सीकर से मैट्रिक परीक्षा में राजस्थान बोर्ड में पहले स्थान पर रहे। विद्याध्ययन में उत्कृष्ट होने के कारण सीकर के तत्कालीन नरेश ने उनको स्वर्ण पदक, किताबों के लिए 250 रुपए और दस रुपए की मासिक छात्रवृत्ति से पुरुस्कृत किया। 1937 में पिलानी से इंटरमीडिएट की परीक्षा में भी बोर्ड में प्रथम रहे। उसके बाद विक्रमजीत सिंह सनातन धर्म कॉलेज कानपुर में प्रवेश ले लिया। 1939 में प्रथम श्रेणी में बीए करने के बाद आगरा चले गए। अंग्रेजी से एमए करने के लिए सेंट जॉन्स कालेज, आगरा में प्रवेश ले लिया। पहले सेमेस्टर में प्रथम श्रेणी आए, लेकिन बहन की देखभाल में लगे रहने के कारण दूसरे सेमेस्टर की परीक्षा नहीं दे सके। लिहाज़ा, उनकी छात्रवृत्ति भी समाप्त हो गई।

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परिवार के बहुत आग्रह पर दीनदयाल ने प्रशासनिक परीक्षा दी। पहले प्रयास में ही प्रशासनिक सेवा के लिए चुन लिए गए किंतु अंग्रेज़ सरकार का मुलाज़िम बनना स्वीकार नहीं किया। 1941 में प्रयाग से बीटी की परीक्षा उत्तीर्ण की। बीए और बीटी करने के बावजूद नौकरी नहीं की। 1937 में बीए में दाखिला लेते ही मित्र बलवंत महाशब्दे के आग्रह पर संघ से जुड़ गए। डॉ केशव बलिराम हेडगेवार का सान्निध्य उन्हें कानपुर में ही मिला। पढ़ाई पूरी करने के बाद संघ का द्वितीय वर्ष का प्रशिक्षण पूर्ण किया और संघ के प्रचारक हो गए। आजीवन संघ के प्रचारक रहे। संघ के माध्यम से ही वह राजनीति में आए। आगरा में पढ़ाई के दौरान उनका संपर्क नानाजी देशमुख और भाउ जुगडे से हुआ।

तत्कालीन संघ सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर की प्रेरणा से 21 अक्टूबर 1951 को डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अगुवाई में ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना हुई। 1952 में पहला अधिवेशन कानपुर में हुआ और दीनदयाल महामंत्री बनाए गए। अधिवेशन में पारित 15 प्रस्तावों में से 7 दीनदयाल ने प्रस्तुत किए। डॉ मुखर्जी ने उनकी कार्यकुशलता और क्षमता को देखकर कहा, “यदि मुझे दो दीनदयाल मिल जाएं, तो मैं भारतीय राजनीति का चेहरा बदल ही दूं।” 1953 में डॉ. मुखर्जी के असमय निधन से पूरे संगठन की जिम्मेदारी दीनदयाल के युवा कंधों पर आ गई। क़रीब 15 साल उन्होंने महासचिव के रूप में जनसंघ की सेवा की। 1967 में कालीकट अधिवेशन में भारतीय जनसंघ के 14वें वार्षिक अधिवेशन में दीनदयाल उपाध्याय को जनसंघ का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया। वह केवल 43 दिन ही जनसंघ के अध्यक्ष रहे।

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11 फरवरी 1968 की रात मुगलसराय स्टेशन के यार्ड में उनकी अनजान लोगों द्वारा हत्या कर दी गई। इसके बाद पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गयी। हरीश शर्मा की किताब ‘पंडित दीनदयाल उपाध्याय’ के मुताबिक 10 फरवरी, 1968 को दीनदयाल अपनी मुंहबोली बहन लता खन्ना से मिलने लखनऊ गए थे। अगले दिन उन्हें संसद के बजट सत्र के शुरू होने से पहले होने वाली जनसंघ के 35 सदस्यीय संसदीय दल में शामिल होने के लिए दिल्ली जाना था। सुबह आठ बजे लता के घर बिहार जनसंघ के संगठन मंत्री अश्विनी कुमार का फोन आ गया। उन्होंने दीनदयाल से बिहार प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में शामिल होने का आग्रह किया। दिल्ली में सुंदरसिंह भंडारी से बात करने के बाद दीनदयाल ने बिहार जाने का निर्णय लिया।

आनन-फानन में पटना के लिए पठानकोट-सियालदह एक्सप्रेस में आरक्षण कराया गया। कोच ‘ए’ में सीट मिल गई। शाम के सात बजे ट्रेन लखनऊ पहुंची। प्रदेश के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री रामप्रकाश गुप्त और विधायक पीतांबर दास उन्हें छोड़ने आए थे। इसी कोच में जिओग्राफ़िकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के एमपी सिंह यात्रा कर रहे थे। लखनऊ से कोच ‘बी’ में कांग्रेस विधायक गौरीशंकर राय भी सवार हुए। बाद में दीनदयाल ने गौरी शंकर से सीट की बदली कर ली। ट्रेन रात 12 बजे जौनपुर पहुंची, जहां महाराजा जौनपुर के आदमी कन्हैया ने उन्हें चिट्ठी दी। खत पढ़ने के बाद उन्होंने जल्द ही जवाब भेजने का आश्वासन दिया। ट्रेन 2.15 बजे मुग़लसराय के प्लेटफॉर्म एक पर पहुंची। यहीं कोच को दिल्ली-हावड़ा एक्सप्रेस से जोड़ा जाना था। शंटिंग के बाद ट्रेन को रात 2.50 बजे रवाना होना और सुबह 6 बजे पटना पहुंचना था। गाड़ी पटना पहुंची तो अगवानी के लिए कैलाशपति मिश्र मौजूद थे। उन्होंने पूरी बोगी छान मारी लेकिन दीनदयाल नहीं मिले। कैलाशपति ने सोचा कि शायद वह सीधे दिल्ली चले गए।

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इधर, मुग़लसराय स्टेशन के यार्ड में लाइन से करीब 150 गज दूर बिजली खंबा संख्या 1267 से क़रीब तीन फुट की दूरी पर लाश पड़ी थी। लाश को सबसे पहले रात करीब 3.30 बजे लीवरमैन ईश्वर दयाल ने देखा. उसने सहायक स्टेशन मास्टर को सूचना दी। करीब पांच मिनट बाद सहायक स्टेशन मास्टर वहां पहुंचे। रामप्रसाद और अब्दुल गफूर नाम के रेलवे पुलिस के दो सिपाही करीब 3.45 बजे वहां पहुंचे। पीछे-पीछे रेलवे पुलिस के दरोगा फ़तेहबहादुर सिंह भी पहुंच गए। रेलवे का डॉक्टर डॉक्टर सुबह 6 बजे पहुंचा। शव का मुआयना करके अधिकारिक तौर पर मृत घोषित कर दिया गया। वहां समय के कॉलम में भरा गया था, 5 बजकर 55 मिनट, जिसे पता नहीं क्यों काटकर 3 बजकर 55 मिनट कर दिया गया। उस समय एसके पाटिल रेलमंत्री थे।

पुलिस के ब्योरे के हिसाब से लाश के साथ एक प्रथम श्रेणी का टिकट (नंबर 04348), एक आरक्षण की पावती और हाथ में बंधी घड़ी, जिस पर नाना देशमुख दर्ज था और 26 रुपए बरामद किए गए। बहरहाल, शव प्लेटफार्म पर रखा गया तो लोगों की भीड़ में से चिल्लाया- “अरे, यह तो भारतीय संघ के अध्यक्ष दीनदयाल उपाध्याय हैं।” स्टेशन के रेलकर्मी बनमाली भट्टाचार्य ने भी शिनाख़्त कर दी। पुलिस को यक़ीन नहीं हुआ। लिहाज़ा, सूचना स्थानीय जनसंघ कार्यकर्ताओं को दी गई। बहरहाल, मृतक की शिनाख्त दीनदयाल उपाध्याय के रूप में हो गई। मामला राष्ट्रीय नेता की हत्या का था। लिहाज़ा, जांच सीबीआई को सौंप दिया गया। सीबीआई की वेबसाइट के मुताबिक पांच दिन के भीतर ही पहला सुराग मिला। दो सप्ताह के भीतर केस सुलझा लिया गया। सिर्फ दो आरोपी राम अवध और भरत लाल थे, जिनका किसी न किसी किस्म का संबंध इस केस के साथ जोड़ा जा सकता था।

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बोगी गार्ड ने बयान में बताया कि बोगी में सवार एक किसी मेजर शर्मा ने उसे बनारस आने पर उठा देने के लिए कहा था। जब वो बनारस आने पर उन्हें उठाने गया तो उसे रास्ते में उपाध्याय की शॉल ओढ़े एक आदमी मिला. उसने बताया कि मेजर शर्मा उतर चुके हैं और डिब्बे में कोई नहीं है। पटना रेलवे स्टेशन के जमादार भोला का खुलासा भी कहानी के कई अलग पक्ष उजागर करता है। भोला ने बताया कि उसे एक आदमी ने बोगी साफ़ करने को कहा, लेकिन निर्देश देने वाला आदमी बोगी में नहीं चढ़ा। मुग़लसराय स्टेशन पर काम करने वाले एक पोर्टर ने पुलिस को दिए बयान में बताया कि उसे उस रात एक आदमी ने बोगी को यार्ड में आधा घंटा खड़े रखने के लिए 400 रुपए देने का प्रस्ताव रखा था।

इस बीच संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी नानाजी देशमुख ने 25 मार्च 1968 को नागपुर में एक बयान जारी करके दीनदयाल की मौत को राजनीतिक हत्या करार दिया था। उनका कहना था कि दीनदयाल के पास कुछ गोपनीय दस्तावेज थे। उन्हें हासिल करने के लिए उनकी हत्या करवा दी गई। इस केस में गिरफ्तार किए गए दोनों चोर इस हत्या को अंजाम नहीं दे सकते। बहरहाल, मुकदमा वाराणसी के विशेष सत्र अदालत में चला। दोनों आरोपियों ने अपने इकबालिया बयान में स्वीकार किया कि चोरी का विरोध करने पर दीनदयाल को चलती ट्रेन से नीचे फेंक दिया, लेकिन सहयात्री एमपी सिंह के बयान में इस घटना का जिक्र नहीं था। 9 जून 1969 को सेशन कोर्ट के जज मुरलीधर ने साक्ष्यों के अभाव में दोनों आरोपियों को हत्या के आरोप से बरी कर दिया। हालांकि पेशेवर चोर भरत लाल को चोरी के इल्ज़ाम में चार साल की सज़ा दी गई।

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जनसंघ के सांसद अदालती फैसले से संतुष्ट नहीं हुए। लिहाज़ा, 23 अक्टूबर 1969 को विभिन्न दलों के 70 सांसदों की मांग पर इंदिरा गांधी सरकार ने इस हत्या की जांच के लिए जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ का एक सदस्यीय आयोग बनाया। इस आयोग ने भी अपनी जांच में सीबीआई के नतीजों को ही सही ठहराया। हालांकि उस समय जनसंघ के एक धड़े ने इस निष्कर्ष को स्वीकार नहीं किया था। इसके बाद भी कई दफ़ा दीनदयाल की मौत की जांच की मांग होती रही। मगर उनकी मौत अब भी एक रहस्य बनी हुई है। बहरहाल, दीनदयाल के निधन के बाद अटलबिहारी वाजपेयी जनसंघ के अध्यक्ष बनाए गए। चार साल अध्यक्ष रहने के बाद उन्होंने पार्टी की कमान अपने भरोसेमंद मित्र लालकृष्ण आडवाणी को सौंप दी। दीनदयाल ही वाजपेयी को राजनीति में लाए थे। शुरुआती दौर में वाजपेयी उनके सचिव थे।

जब दीनदयाल की हत्या की ख़बर अटल को देने के लिए उनके आवास पर फोन किया गया तो वह संसदीय दल की बैठक में के लिए घर से निकल चुके थे। तब उनके खानसामे बिरजू को ख़बर दी गई। बैठक में जब उन्हें सूचना मिली तो रोने लगे। बहरहाल, दीनदयाल की मौत के बाद जनसंघ में खेमेबाजी तेज़ हो गई। 1973 में कानपुर अधिवेशन में संस्थापक सदस्य बलराज मधोक ने संघ के बढ़ते प्रभाव का विरोध किया। उन्हें पार्टी से ही निकाल दिया गया तब उन्होंने दीनदयाल की मौत को राजनीतिक हत्या कहते हुए नानाजी देशमुख और अटल पर आरोप लगाए थे। अपनी आत्मकथा ‘जिंदगी का सफ़र’ में भी लिखा, “1977 में मुंबई उत्तर-पूर्व सीट से जनता पार्टी के लोकसभा सदस्य चुने गए डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने तत्कालीन गृहमंत्री चौधरी चरण सिंह से दीनदयाल की मौत जांच की मांग की थी, लेकिन मोरारजी सरकार में विदेश मंत्री वायपेयी ने अड़ंगा डाल दिया।”

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बहरहाल, दीनदयाल की भतीजी मधु शर्मा ने बहुत बाद में यह दावा किया कि जनसंघ का अध्यक्ष बनने के बाद से ही पंडित दीनदयाल उपाध्याय को लगातार धमकियां मिल रही थीं। इसकी जानकारी उन्होंने अपने परिवार को दी थी और यह भई आशंका व्यक्त की थी कि उनकी कभी भी हत्या हो सकती है। इसी बिना पर मधु शर्मा दीनदयाल की हत्या की फिर से जांत कराने की मांग की थी। मधु ने यह भी दावा किया था कि दीनदयाल कोई ऐसा राज़ जरूर जानते थे, जिसके खुलासे से देश की राजनीति में भूचाल आ सकता था। 6 नवंबर, 2017 को अंबेडकरनगर के पूर्व भाजपा विधायक राकेश गुप्ता ने भी केंद्र सरकीर को पत्र लिखकर दीनदयाल की हत्या की फिर से जांच कराने की मांग की थी।  ऐसे में सवाल यह है कि क्या दीनदयाल की हत्या की जांच फिर से होनी चाहिए?

योगी आदित्यनाथ सरकार ने मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर कर दिया। दीनदयाल के नाम से कई योजनाएं शुरू की गईं हैं। आज पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती है। उस महान आत्मा का श्रद्धांजलि।

लेखक – हरिगोविंद विश्वकर्मा

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